सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26
राम सरीखे ह्वै रहें, यहु नांही उनहार ।
दादू साधू अमर हैं, विनशै सब संसार ॥ 5 ॥
जे कोई सेवे राम को, तो राम सरीखा होइ ।
दादू नाम कबीर ज्यों, साखी बोलै सोइ ॥ 6 ॥
अर्थ न आया सो गया, आया सो क्यों जाइ ।
दादू तन मन जीवतां, आपा ठौर लगाइ ॥ 7 ॥
जे जन बेधे प्रीति सौं, सो जन सदा सजीव ।
उलट समाने आप में, अन्तर नांही पीव ॥ 8 ॥
दया विनती
दादू कहै-सब रंग तेरे तैं रंगे, तूं ही सब रंग मांहि ।
सब रंग तेरे तैं किये, दूजा कोई नांहि ॥ 9 ॥
सजीवन
काटै फन्द तो छूटै द्वन्द, छूटै द्वन्द तौ लागै बंद ।
लागै बन्द तो अमर कंद, अमर कंद दादू आनन्द ॥ 10 ॥
प्रश्न
कहँ जम जोरा भंजिये, कहाँ काल कौ दंड ।
कहाँ मीच को मारिये, कहाँ जरा सत खंड ॥ 11 ॥
अमर ठौर अविनाशी आसन, तहाँ निरंजन लाग रहे ।
दादू जोगी जुग जुग जीवै, काल ब्याल सब सहज गये ॥ 12 ॥
रोम रोम लै लाइ धुनि, ऐसे सदा अखंड ।
दादू अविनाशी मिले, तो जम को दीजे दंड ॥ 13 ॥
दादू जरा काल जामण मरण, जहाँ जहाँ जीव जाइ ।
भक्ति परायण लीन मन, ताको काल न खाइ ॥ 14 ॥
मरणा भागा मरण तैं, दुःखैं नाठा दुःख ।
दादू भय सौं भय गया, सुःखैं छूटा सुःख ॥ 15 ॥
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