सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-उपजन का अंग 28
उपजन
दादू अनुभव उपजी गुणमयी, गुण ही पै ले जाइ।
गुण ही सौं गहि बंधिया, छूटै कौन उपाइ ॥ 4 ॥
द्वै पख उपजी परिहरै, निर्पख अनुभव सार।
एक राम दूजा नहीं, दादू लेहु विचार ॥ 5 ॥
दादू काया ब्यावर गुणमयी, मनमुख उपजै ज्ञान।
चौरासी लख जीव को, इस माया का ध्यान ॥ 6 ॥
आत्म उपज आकाश की, सुनि धरती की बाट।
दादू मारग गैब का, कोई लखै न घाट ॥ 7 ॥
आत्म बोधी अनुभवी, साधु निर्पख होइ।
दादू राता राम सौं, रस पीवेगा सोइ ॥ 8 ॥
प्रेम भक्ति जब ऊपजै, निश्चल सहज समाधि।
दादू पीवे राम रस, सतगुरु के प्रसाद ॥ 9 ॥
प्रेम भक्ति जब ऊपजै, पंगुल ज्ञान विचार।
दादू हरि रस पाइये, छूटै सकल विकार ॥ 10 ॥
दादू बंझ बियाई आत्मा, उपज्या आनन्द भाव।
सहज शील संतोष सत, प्रेम मगन मन राव ॥ 11 ॥
निन्दा
जब हम ऊजड़ चालते, तब कहते मारग मांहि।
दादू पहुंचे पंथ चल, कहैं यहु मारग नांहि ॥ 12 ॥
उपजन
पहले हम सब कुछ किया, भरम करम संसार।
दादू अनुभव उपजी, राते सिरजनहार ॥ 13 ॥
सोई अनुभव सोई ऊपजी, सोई शब्द तव सार।
सुनतां ही साहिब मिले, मन के जाहिं विकार ॥ 14 ॥
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