सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21
एकौं लेइ बुलाइ कर, एकौं देइ पठाइ।
दादू अद्भुत साहिबी, क्यों ही लखी न जाइ ॥ 15 ॥
ज्यों राखै त्यों रहेंगे, अपने बल नांही।
सबै तुम्हारे हाथ है, भाज कत जांही ॥ 16 ॥
दादू डोरी हरि के हाथ है, गल मांही मेरे।
बाजीगर का बांदरा, भावै तहाँ फेरे ॥ 17 ॥
ज्यों राखै त्यों रहेंगे, मेरा क्या सारा।
हुक्मी सेवक राम का, बन्दा बेचारा ॥ 18 ॥
साहिब राखै तो रहे, काया मांही जीव।
हुक्मी बन्दा उठ चले, जब ही बुलावे पीव ॥ 19 ॥
पति पहचान
खंड खंड प्रकाश है, जहाँ तहाँ भरपूर।
दादू कर्त्ता कर रह्या, अनहद बाजै तूर ॥ 20 ॥
ईश्वर समर्थाई
दादू दादू कहत हैं, आपै सब घट मांहि।
अपनी रुचि आपै कहैं, दादू तैं कुछ नांहि ॥ 21 ॥
दादू हम तैं हुआ न होइगा, ना हम करणे जोग।
ज्यों हरि भावै त्यों करै, दादू कहैं सब लोग ॥ 22 ॥
दादू दूजा क्यों कहै, सिर पर साहिब एक।
सो हम कौं क्यों बीसरै, जे जुग जाहिं अनेक ॥ 23 ॥
समर्थ साक्षीभूत
आप अकेला सब करै, औरों के सिर देइ।
दादू शोभा दास को, अपना नाम न लेइ ॥ 24 ॥
आप अकेला सब करै, घट में लहरि उठाइ।
दादू सिर दे जीव के, यों न्यारा ह्वै जाइ ॥ 25 ॥
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श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21
ईश्वर समर्थता
ज्यों यहु समझै त्यों कहो, यहु जीव अज्ञानी।
जेती बाबा तैं कही, इन इक न मानी ॥ 26 ॥
दादू परचा माँगें लोग सब, कहैं हमकौं कुछ दिखलाइ।
समर्थ मेरा सांइयाँ, ज्यों समझैं त्यों समझाइ ॥ 27 ॥
दादू तन मन लाइ कर, सेवा दृढ़ कर लेइ।
ऐसा समर्थ राम है, जे मांगै सो देइ ॥ 28 ॥
समर्थ साक्षीभूत
समर्थ सो सेरी समझाइनैं, कर अणकर्ता होइ।
घट घट व्यापक पूर सब, रहै निरंतर सोइ ॥ 29 ॥
रहै नियारा सब करै, काहू लिप्त न होइ।
आदि अंत भानै घड़ै, ऐसा समर्थ सोइ ॥ 30 ॥
कर्त्ता साक्षीभूत
श्रम नहीं सब कुछ करै, यौं कल धरी बनाइ।
कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥ 31 ॥
लिपै छिपै नहिं सब करै, गुण नहिं व्यापै कोइ।
दादू निश्चल एक रस, सहजैं सब कुछ होइ ॥ 32 ॥
बिन गुण व्यापै सब किया, समर्थ आपै आप।
निराकार न्यारा रहै, दादू पुन्य न पाप ॥ 33 ॥
ईश्वर समर्थाई
समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि।
सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥ 34 ॥
पैदा किया घाट घड़, आपै आप उपाइ।
हिकमत हुनर कारीगरी, दादू लखी न जाइ ॥ 35 ॥
यंत्र बजाया साज कर, कारीगर करतार।
पंचों का रस नाद है, दादू बोलणहार ॥ 36 ॥
- 227 -
श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21
पंच ऊपना शब्द तैं, शब्द पंच सौं होइ।
सांई मेरे सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥ 37 ॥
है तो रती, नहीं तो नांहीं, सब कुछ उत्पति होइ।
हुक्मैं हाजिर सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥ 38 ॥
नहीं तहाँ तैं सब किया, आपै आप उपाइ।
निज तत न्यारा ना किया, दूजा आवै जाइ ॥ 39 ॥
नहीं तहाँ तैं सब किया, फिर नांहीं ह्वै जाइ।
दादू नांहीं होइ रहु, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥ 40 ॥
दादू खालिक खेलै खेल कर, बूझै बिरला कोइ।
लेकर सुखिया ना भया, देकर सुखिया होइ ॥ 41 ॥
देबे की सब भूख है, लेबे की कुछ नांहि।
सांई मेरे सब किया, समझि देख मन मांहि ॥ 42 ॥
कस्तूत कर्म
दादू जे साहिब सिरजै नहीं, तो आपै क्यों कर होइ।
जे आप ही ऊपजै, तो मर कर जीवै कोइ ॥ 43 ॥
कर्म फिरावै जीव को, कर्मों को करतार।
करतार को कोई नहीं, दादू फेरनहार ॥ 44 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य इक्कीसवां
समर्थता काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 21 ॥ साखी 44 ॥
- 228 -
अथ शब्द का अंग २२
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
आत्म बोधक गुरु उपदेश शब्द की महिमा
दादू शब्दैं बँध्या सब रहै, शब्दैं ही सब जाइ ।
शब्दैं ही सब ऊपजै, शब्दैं सबै समाइ ॥ 2 ॥
दादू शब्दैं ही सचु पाइये, शब्दैं ही संतोंख ।
शब्दैं ही सुस्थिर भया, शब्दैं भागा शोक ॥ 3 ॥
- 229 -
श्री दादूवाणी-शब्द का अंग 22
दादू शब्दैं ही सूक्ष्म भया, शब्दैं सहज समान ।
शब्दैं ही निर्गुण मिले, शब्दैं निर्मल ज्ञान ॥ 4 ॥
दादू शब्दैं ही मुक्ता भया, शब्दैं समझे प्राण ।
शब्दैं ही सूझे सबै, शब्दैं सुरझे जाण ॥ 5 ॥
सृष्टि क्रम
दादू ओंकार तैं ऊपजै, अरस परस संजोग ।
अंकुर बीज द्वै पाप पुण्य, इहि विधि जोग रु भोग ॥ 6 ॥
ओंकार तैं ऊपजै, विनशै बहुत विकार ।
भाव भक्ति लै थिर रहै, दादू आतम सार ॥ 7 ॥
पहली किया आप तैं, उत्पत्ति ओंकार ।
ओंकार तैं ऊपजै, पंच तत्त्व आकार ॥ 8 ॥
पंच तत्त्व तैं घट भया, बहु विधि सब विस्तार ।
दादू घट तैं ऊपजै, मैं तैं वर्ण विकार ॥ 9 ॥
एक शब्द सब कुछ किया, ऐसा समर्थ सोइ ।
आगे पीछे तो करै, जे बलहीना होइ ॥ 10 ॥
निरंजन निराकार है, ओंकार आकार ।
दादू सब रंग रूप सब, सब विधि सब विस्तार ॥ 11 ॥
आदि शब्द ओंकार है, बोलै सब घट माँहि ।
दादू माया विस्तरी, परम तत्त यहु नांहि ॥ 12 ॥
ईश्वर समर्थाई
पैदा किया घाट घड़, आपै आप उपाइ ।
हिक मत हुनर कारीगरी, दादू लखी न जाइ ॥ 13 ॥
यंत्र बजाया साज कर, कारीगर करतार ।
पंचों का रस नाद है, दादू बोलनहार ॥ 14 ॥
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श्री दादूवाणी-शब्द का अंग 22
पंच ऊपना शब्द तैं, शब्द पंच सौं होइ ।
सांई मेरे सब किया, बूझै विरला कोइ ॥ 15 ॥
दादू एक शब्द सौं ऊनवै, वर्षन लागै आइ ।
एक शब्द सौं बीखरै, आप आपको जाइ ॥ 16 ॥
दादू साधु शब्द सौं मिल रहै, मन राखै बिलमाइ ।
साधु शब्द बिन क्यों रहै, तब ही बीखर जाइ ॥ 17 ॥
दादू शब्द जरै सो मिल रहै, एक रस पूरा ।
कायर भाजै जीव ले, पग मांडै शूरा ॥ 18 ॥
शब्द विचारै करणी करै, राम नाम निज हिरदै धरै ।
काया मांहीं शोधै सार, दादू कहै लहै सो पार ॥ 19 ॥
दादू काहे कौड़ी खर्चिये, जे पैके सीझै काम ।
शब्दों कारज सिध भया, तो सुरम न दीजै राम ॥ 20 ॥
दादू राम हृदय रस भेलि कर, को साधु शब्द सुनाइ ।
जानो कर दीपक दिया, भ्रम तिमिर सब जाइ ॥ 21 ॥
दादू वाणी प्रेम की, कमल विकासै होहि ।
साधु शब्द माता कहैं, तिन शब्दों मोह्या मोहि ॥ 22 ॥
दादू हरि भुरकी वाणी साधु की, सो परियो मेरे शीश ।
छूटे माया मोह तैं, प्रेम भजन जगदीश ॥ 23 ॥
दादू भुरकी राम है, शब्द कहैं गुरु ज्ञान ।
तिन शब्दों मन मोहिया, उनमन लागा ध्यान ॥ 24 ॥
दादू वाणी ब्रह्म की, अनभै घट प्रकाश ।
राम अकेला रह गया, शब्द निरंजन पास ॥ 25 ॥
शब्दों माहिं राम धन, जे कोई लेइ विचार ।
दादू इस संसार में, कबहुं न आवे हार ॥ 26 ॥
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श्री दादूवाणी-शब्द का अंग 22
दादू राम रसायन भर धन्या, साधुन शब्द मंझार ।
कोई पारखि पीवै प्रीति सौं, समझै शब्द विचार ॥ 27 ॥
शब्द सरोवर सुभर भव्या, हरि जल निर्मल नीर ।
दादू पीवै प्रीति सौं, तिन के अख्रिल शरीर ॥ 28 ॥
शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया ।
आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥ 29 ॥
गुरुमुख कसौटी
कारज को सीझै नहीं, मीठा बोलै बीर ।
दादू साचे शब्द बिन, कटै न तन की पीर ॥ 30 ॥
शब्द
दादू गुण तजि निर्गुण बोलिये, तेता बोल अबोल ।
गुण गहि आपा बोलिये, तेता कहिये बोल ॥ 31 ॥
साचा शब्द कबीर का, मीठा लागै मोहि ।
दादू सुनतां परम सुख, केता आनन्द होहि ॥ 32 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
बाईसवां शब्द काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 22 ॥ साखी 32 ॥
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जीवत मृतक का अंग
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अथ जीवित मृतक का अंग २३
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ॥ 1 ॥
धरती मत आकाश का, चंद सूर का लेइ ।
दादू पानी पवन का, राम नाम कहि देइ ॥ 2 ॥
दादू धरती ह्वै रहै, तज कूड़ कपट अहंकार।
सांई कारण सिर सहै, ताको प्रत्यक्ष सिरजनहार ॥ 3 ॥
जीवित माटी मिल रहै, सांई सन्मुख होइ।
दादू पहली मर रहै, पीछे तो सब कोइ ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23
दीनता-गरीबी
दादू आपा गर्ब गुमान तज, मत मत्सर अहंकार ।
गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥ 5 ॥
मद मत्सर आपा नहीं, कैसा गर्व गुमान ।
सपनै ही समझै नहीं, दादू क्या अभिमान ॥ 6 ॥
झूठा गर्व गुमान तज, तज आपा अभिमान ।
दादू दीन गरीब है, पाया पद निर्वाण ॥ 7 ॥
जीवित मृतक यही निशानी, दुर्बल देही निर्मल वाणी ।
दादू भाव भक्ति दीनता अंग, प्रेम प्रीति सदा तिहिं संग ॥ 8 ॥
तब साहिब को सिजदा किया, जब सिर धऱ्या उतार ।
यों दादू जीवित मरै, हिर्स हवा को मार ॥ 9 ॥
दादू राव रंक सब मरेंगे, जीवै नाहीं कोइ ।
सोई कहिये जीवता, जे मरजीवा होइ ॥ 10 ॥
दादू मेरा वैरी मैं मुवा, मुझे न मारै कोइ ।
मैं ही मुझको मारता, मैं मरजीवा होइ ॥ 11 ॥
वैरी मारे मरि गये, चित तैं बिसरे नाहिं ।
दादू अजहूँ साल है, समझ देख मन मांहि ॥ 12 ॥
उभै असमाव
दादू तो तूं पावै पीव को, जे जीवित मृतक होइ ।
आप गँवाये पीव मिलै, जानत हैं सब कोइ ॥ 13 ॥
दादू तो तूं पावै पीव का, आपा कुछ न जान ।
आपा जिस तैं ऊपजै, सोई सहज पिछान ॥ 14 ॥
दादू तो तूं पावै पीव को, मैं मेरा सब खोइ ।
मैं मेरा सहजैं गया, तब निर्मल दर्शन होइ ॥ 15 ॥
मैं ही मेरे पोट सिर, मरिये ताके भार ।
दादू गुरु प्रसाद सौं, सिर तैं धरी उतार ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23
मेरे आगे मैं खड़ा, ता तैं रह्या लुकाइ ।
दादू प्रकट पीव है, जे यहु आपा जाइ ॥ 17 ॥
सूक्ष्म-मार्ग
दादू जीवित मृतक होइ कर, मारग मांही आव ।
पहली शीश उतार कर, पीछे धरिये पांव ॥ 18 ॥
दादू मारग साधु का, खरा दुहेला जान ।
जीवित मृतक ह्वै चलै, राम नाम नीशान ॥ 19 ॥
दादू मारग कठिन है, जीवित चलै न कोइ ।
सोई चलि है बापुरा, जो जीवित मृतक होइ ॥ 20 ॥
मृतक होवै सो चलै, निरंजन की बाट।
दादू पावै पीव को, लंघै औघट घाट ॥ 21 ॥
जीवित मृतक
दादू मृतक तब ही जानिये, जब गुण इंद्रिय नांहि ।
जब मन आपा मिट गया, तब ब्रह्म समाना मांहि ॥ 22 ॥
दादू जीवित ही मर जाइये, मर माँही मिल जाइ ।
सांई का संग छाड़ कर, कौन सहै दुख आइ ॥ 23 ॥
उभय निर्दोष
दादू आपा कहा दिखाइये, जे कुछ आपा होइ ।
यहु तो जाता देखिये, रहता चीन्हों सोइ ॥ 24 ॥
दादू आप छिपाइये, जहाँ न देखै कोइ ।
पीव को देख दिखाइये, त्यों त्यों आनन्द होइ ॥ 25 ॥
आपा निर्दोष
दादू अंतरगति आपा नहीं, मुख सौं मैं तैं होइ ।
दादू दोष न दीजिये, यों मिल खेलैं दोइ ॥ 26 ॥
जे जन आपा मेट कर, रहें राम ल्यौ लाइ ।
दादू सब ही देखतां, साहिब सौं मिल जाइ ॥ 27 ॥
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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23
दीनता गरीबी
गरीब गरीबी गह रह्या, मसकीनी मसकीन ।
दादू आपा मेट करि, होइ रह्या लै लीन ॥ 28 ॥
उभय असमाव
मैं हूँ मेरी जब लगै, तब लग विलसै खाइ ।
मै नाहीं मेरी मिटै, तब दादू निकट न जाइ ॥ 29 ॥
दादू मना मनी सब ले रहे, मनी न मेटी जाइ ।
मना मनी जब मिट गई, तब ही मिले खुदाइ ॥ 30 ॥
दादू मैं मैं जाल दे, मेरे लागो आग ।
मैं मैं मेरा दूर कर, साहिब के संग लाग ॥ 31 ॥
दादू मैं नांहीं तब एक है, मैं आई तब दोइ ।
मैं तैं पड़दा मिटि गया, तब ज्यों था त्यों ही होइ ॥ 32 ॥
मनमुखी मान
दादू खोई आपणी, लज्जा कुल की कार ।
मान बड़ाई पति गई, तब सन्मुख सिरजनहार ॥ 33 ॥
परचै करुणा बिनती
नूर सरीखा कर लिया, बंदों का बंदा ।
दादू दूजा को नहीं, मुझ सरीखा गंदा ॥ 34 ॥
जीवत मृतक
दादू सीख्यों प्रेम न पाइये, सीख्यों प्रीति न होइ ।
सीख्यों दरद न ऊपजै, जब लग आप न खोइ ॥ 35 ॥
कहबा सुनबा गत भया, आपा पर का नाश ।
दादू मैं तैं मिट गया, पूर्ण ब्रह्म प्रकाश ॥ 36 ॥
दादू सांई कारण मांस का, लोही पानी होइ ।
सूखे आटा अस्थि का, दादू पावै सोइ ॥ 37 ॥
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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23
तन मन मैदा पीसकर, छांण छांण ल्यौ लाइ ।
यों बिन दादू जीव का, कबहुँ साल न जाइ ॥ 38 ॥
पीसे ऊपर पीसिये, छांणे ऊपर छांण ।
तो आत्म कण ऊबरै, दादू ऐसी जाण ॥ 39 ॥
पहली तन मन मारिये, इनका मर्दै मान ।
दादू काढै जंत्र में, पीछे सहज समान ॥ 40 ॥
काटे ऊपर काटिये, दाधे को दौं लाइ ।
दादू नीर न सींचिये, तो तरुवर बधता जाइ ॥ 41 ॥
दादू सबको संकट एक दिन, काल गहैगा आइ ।
जीवित मृतक ह्वै रहै, ताके निकट न जाइ ॥ 42 ॥
दादू जीवित मृतक ह्वै रहै, सबको विरक्त होइ ।
काढ़ो काढ़ो सब कहैं, नाम न लेवै कोइ ॥ 43 ॥
जरणा
सारा गहिला ह्वै रहै, अन्तरयामी जाणि ।
तो छूटै संसार तैं, रस पीवै सारंगपाणि ॥ 44 ॥
गूँगा गहिला बावरा, सांई कारण होइ ।
दादू दीवाना ह्वै रहै, ताको लखै न कोइ ॥ 45 ॥
जीवत मृतक
जीवित मृतक साधु की, वाणी का परकास ।
दादू मोहे रामजी, लीन भये सब दास ॥ 46 ॥
दादू जे तूं मोटा मीर है, सब जीवों में जीव ।
आपा देख न भूलिये, खरा दुहेला पीव ॥ 47 ॥
आपा मेट समाइ रहु, दूजा धंधा बाद ।
दादू काहे पच मरै, सहजैं सुमिरण साध ॥ 48 ॥
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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23
दादू आपा मेटे एक रस, मन हि स्थिर लै लीन।
अरस परस आनन्द कर, सदा सुखी सो दीन ॥ 49 ॥
स्मरण नाम निस्संशय
हम्हीं हमारा कर लिया, जीवित करणी सार।
पीछे संशय को नहीं, दादू अगम अपार ॥ 50 ॥
मध्य निरपक्ष
माटी मांहि ठौर कर, माटी माटी मांहि।
दादू सम कर राखिये, द्वै पख दुविधा नांहि ॥ 51 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
तेईसवां जीवत मृतक काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 23 ॥ साखी 51 ॥
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शूरातन
का
अंग
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अथ शूरातन का अंग २४
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ।। 1 ।।
शूर सती साधु निर्णय
साचा सिर सौं खेलहै, यह साधुजन का काम ।
दादू मरणा आसँधै, सोई कहैगा राम ।। 2 ।।
राम कहैं ते मर कहैं, जीवित कह्या न जाइ ।
दादू ऐसैं राम कहि, सती शूर सम भाइ ।। 3 ।।
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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24
जब दादू मरबा गहै, तब लोगों की क्या लाज ?
सती राम साचा कहै, सब तज पति सौं काज ॥ 4 ॥
शूरवीर कायर
दादू हम काइर कड़बा कर रहे, शूर निराला होइ।
निकस खड़ा मैदान में, ता सम और न कोइ ॥ 5 ॥
शूर सती साधु निर्णय
मड़ा न जीवै तो संग जलै, जीवै तो घर आण।
जीवन मरणा राम सौं, सोई सती करि जाण ॥ 6 ॥
जन्म लगै व्यभिचारणी, नख शिख भरी कलंक।
पलक एक सन्मुख जली, दादू धोये अंक ॥ 7 ॥
स्वांग सती का पहर कर, करै कुटुम्ब का सोच।
बाहर शूरा देखिये, दादू भीतर पोच ॥ 8 ॥
दादू सती तो सिरजनहार सौं, जलै विरह की झाल।
ना वह मरै न जलि बुझै, ऐसे संगि दयाल ॥ 9 ॥
जे मुझ होते लाख सिर, तो लाखों देती वारि।
सह मुझ दिया एक सिर, सोई सौंपै नारि ॥ 10 ॥
सती जल कोइला भई, मुये मड़े की लार।
यों जे जलती राम सौं, साचे संग भर्तार ॥ 11 ॥
मुये मड़े सौं हेत क्या, जे जीव की जाणै नांहि।
हेत हरि सौं कीजिये, जे अन्तरजामी मांहि ॥ 12 ॥
शूरवीर कायर
शूरा चढ़ संग्राम को, पाछा पग क्यों देहि ?
साहिब लाजै भाजतां, धृग् जीवन दादू तेहि ॥ 13 ॥
सेवक शूरा राम का, सोई कहेगा राम।
दादू सूर सन्मुख रहै, नहिं कायर का काम ॥ 14 ॥
- 240 -
श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24
कायर काम न आवही, यहु शूरे का खेत।
तन मन सौंपै राम को, दादू शीश सहेत ॥ 15 ॥
जब लग लालच जीव का, तब लग निर्भय हुआ न जाइ।
काया माया मन तजै, तब चौड़े रहै बजाइ ॥ 16 ॥
दादू चौड़े में आनन्द है, नाम धज्या रणजीत।
साहिब अपना कर लिया, अन्तरगत की प्रीति ॥ 17 ॥
दादू जे तुझ काम करीम सौं, तो चौहट चढ़ कर नाच।
झूठा है सो जाइगा, निहचै रहसी साच ॥ 18 ॥
जीवत मृतक
राम कहेगा एक को, जे जीवित-मृतक होइ।
दादू ढूंढे पाइये, कोटि मध्ये कोइ ॥ 19 ॥
शूर सती साध निर्णय
शूरा पूरा संत जन, सांई को सेवै।
दादू साहिब कारणै, सिर अपना देवै ॥ 20 ॥
शूरा जूझै खेत में, सांई सन्मुख आइ।
शूरे को सांई मिले, तब दादू काल न खाइ ॥ 21 ॥
मरबे ऊपरि एक पग, कर्ता करै सो होहि।
दादू साहिब कारणै, तालाबेली मोहि ॥ 22 ॥
हरि भरोसा
दादू अंग न खैंचिये, कहि समझाऊँ तोहि।
मोहि भरोसा राम का, बंका बाल न होहि ॥ 23 ॥
बहुत गया थोड़ा रह्या, अब जीव सोच निवार।
दादू मरणा मांड रहु, साहिब के दरबार ॥ 24 ॥
शूरवीर कायर
जीवों का संशय पड़या, को काको तारै।
दादू सोई शूरमा, जे आप उबारै ॥ 25 ॥
- 241 -
श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24
जे निकसे संसार तैं, सांई की दिशि धाइ।
जे कबहुँ दादू बाहुड़े, तो पीछे माऱ्या जाइ ॥ 26 ॥
दादू कोई पीछे हेला जनि करै, आगे हेला आव।
आगे एक अनूप है, नहिं पीछे का भाव ॥ 27 ॥
पीछे को पग ना भरै, आगे को पग देइ।
दादू यहु मत शूर का, अगम ठौर को लेइ ॥ 28 ॥
आगा चल पीछा फिरै, ताका मुँह मा दीठ।
दादू देखे दोइ दल, भागे देकर पीठ ॥ 29 ॥
दादू मरणां माँड कर, रहै नहिं ल्यौ लाइ।
कायर भाजै जीव ले, आ-रण छाड़ै जाइ ॥ 30 ॥
शूरा होइ सु मेर उलंधै, सब गुण बँध्या छूटै।
दादू निर्भय ह्वै रहे, कायर तिणा न टूटै ॥ 31 ॥
शूर सती साधु निर्णय
सर्प केसरी काल कुंजर, बहु जोध मारग मांहि।
कोटि में कोई एक ऐसा, मरण आसंघ जाहि ॥ 32 ॥
दादू जब जागै तब मारिये, वैरी जिय के साल।
मनसा डायनि, काम रिपु, क्रोध महाबली काल ॥ 33 ॥
पंच चोर चितवत रहैं, माया मोह विष झाल।
चेतन पहरै आपने, कर गह खड़ग संभाल ॥ 34 ॥
काया कबज कमान कर, सार शब्द कर तीर।
दादू यहु सर सांध कर, मारै मोटे मीर ॥ 35 ॥
काया कठिन कमान है, खांचै विरला कोइ।
मारै पंचों मृगला, दादू शूरा सोइ ॥ 36 ॥
जे हरि कोप करै इन ऊपर, तो काम कटक दल जांहि कहाँ।
लालच लोभ क्रोध कत भाजैं, प्रगट रहे हरि जहाँ तहाँ ॥ 37 ॥
- 242 -
श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24
जीवित मृतक
तब साहिब को सिजदा किया, जब सिर धऱ्या उतार ।
यों दादू जीव्वित मरै, हिर्स हवा को मार ॥ 38 ॥
शूरातन
दादू तन मन काम करीम के, आवै तो नीका ।
जिसका तिसको सौंपिये, सोच क्या जी का ॥ 39 ॥
जे शिर सौंप्या राम को, सो शिर भया सनाथ ।
दादू दे ऊरण भया, जिसका तिसके हाथ ॥ 40 ॥
जिसका है तिसको चढै, दादू ऊरण होइ ।
पहली देवै सो भला, पीछे तो सब कोइ ॥ 41 ॥
सांई तेरे नाम पर, शिर जीव करूं कुर्बान ।
तन मन तुम पर वारणै, दादू पिंड पराण ॥ 42 ॥
अपने सांई कारणै, क्या क्या नहिं कीजे ?
दादू सब आरम्भ तज, अपणा शिर दीजे ॥ 43 ॥
शिर के साटै लीजिये, साहिब जी का नांव ।
खेलै शीश उतार कर, दादू मैं बलि जांव ॥ 44 ॥
खेलै शीश उतार कर, अधर एक सौं आइ ।
दादू पावै प्रेम रस, सुख में रहै समाइ ॥ 45 ॥
मरण भय निवारण
दादू मरणे थीं तूं मत डरै, सब जग मरता जोइ ।
मिल कर मरणा राम सौं, तो कलि अजरावर होइ ॥ 46 ॥
दादू मरणे थीं तूं मत डरै, मरणा अंत निदान ।
रे मन मरणा सिरजिया, कहले केवल राम ॥ 47 ॥
दादू मरणे थीं तूं मत डरै, मरणा पहुँचा आइ ।
रे मन मेरा राम कह, बेगा बार न लाइ ॥ 48 ॥
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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24
दादू मरणे थीं तूं मत डरै, मरणा आज कि काल ।
मरणा मरणा क्या करै, बेगा राम सँभाल ॥ 49 ॥
दादू मरणा खूब है,निपट बुरा व्यभिचार ।
दादू पति को छाड़ कर, आन भजै भरतार ॥ 50 ॥
दादू तन तैं कहाँ डराइये, जे विनश जाइ पल बार ।
कायर हुआ न छूटिये, रे मन हो हुसियार ॥ 51 ॥
दादू मरणा खूब है, मर माहीं मिल जाइ ।
साहिब का संग छाड़ कर, कौन सहै दुख आइ ॥ 52 ॥
दादू माहीं मन सौं जूझ कर, ऐसा शूरा वीर ।
इंद्रिय अरि दल भान सब, यों कलि हुआ कबीर ॥ 53 ॥
सांई कारण शीश दे, तन मन सकल शरीर ।
दादू प्राणी पंच दे, यों हरि मिल्या कबीर ॥ 54 ॥
सबै कसौटी शिर सहै, सेवक सांई काज ।
दादू जीवन क्यों तजै, भाजे हरि को लाज ॥ 55 ॥
सांई कारण सब तजै, जन का ऐसा भाव ।
दादू राम न छाड़िये, भावै तन मन जाव ॥ 56 ॥
पतिव्रत निष्काम
दादू सेवक सो भला, सेवै तन मन लाइ ।
दादू साहिब छाड़ कर, काहू संग न जाइ ॥ 57 ॥
पतिव्रता निज पीव को, सेवै दिन अरु रात ।
दादू पति को छाड़ कर, काहू संग न जात ॥ 58 ॥
शूरातन
दादू मरबो एक जु बार, अमर झुकेड़े मारिये ।
तो तिरिये संसार, आतम कारज सारिये ॥ 59 ॥
दादू जे तूं प्यासा प्रेम का, तो जीवन की क्या आस ।
शिर के साटे पाइये, तो भर भर पीवै दास ॥ 60 ॥
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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24
कायर
मन मनसा जीते नहीं, पंच न जीते प्राण।
दादू रिपु जीते नहीं, कहैं हम शूर सुजान ॥ 61 ॥
मन मनसा मारे नहीं, काया मारण जांहि।
दादू बांबी मारिये, सर्प मरै क्यों मांहि ॥ 62 ॥
शूरातन
दादू पाखर पहर कर, सब को झूझण जाइ।
अंग उघाड़ै शूरवां, चोट मुँहैं मुँह खाइ ॥ 63 ॥
जब झूझै तब जाणिये, काछ खड़े क्या होइ।
चोट मुँहैं मुँह खाइगा, दादू शूरा सोइ ॥ 64 ॥
शूरातन सहजैं सदा, साच सेल हथियार।
साहिब के बल झूझतां, केते लिये सु मार ॥ 65 ॥
दादू जब लग जिय लागैं नहीं, प्रेम प्रीति के सेल।
तब लग पिव क्यों पाइये, नहिं बाजीगर का खेल ॥ 66 ॥
दादू जे तूं प्यासा प्रेम का, तो किसको सेतैं जीव।
शिर के साटै लीजिये, जे तुझ प्यारा पीव ॥ 67 ॥
दादू महा जोध मोटा बली, सो सदा हमारी भीर।
सब जग रूठा क्या करै, जहाँ तहाँ रणधीर ॥ 68 ॥
दादू रहते पहते राम जन, तिन भी माँड्या झूझ।
साचा मुँह मोड़ै नहीं, अर्थ इता ही बूझ ॥ 69 ॥
हरि भरोसा
दादू काँधे सबल के, निर्बाहेगा और।
आसन अपने ले चल्या, दादू निश्चल ठौर ॥ 70 ॥
दादू क्या बल कहा पतंग का, जलत न लागै बार।
बल तो हरि बलवंत का, जीवै जिहिं आधार ॥ 71 ॥
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