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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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पृष्ठ 234

श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23
दीनता-गरीबी
दादू आपा गर्ब गुमान तज, मत मत्सर अहंकार ।
गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥ 5 ॥
मद मत्सर आपा नहीं, कैसा गर्व गुमान ।
सपनै ही समझै नहीं, दादू क्या अभिमान ॥ 6 ॥
झूठा गर्व गुमान तज, तज आपा अभिमान ।
दादू दीन गरीब है, पाया पद निर्वाण ॥ 7 ॥
जीवित मृतक यही निशानी, दुर्बल देही निर्मल वाणी ।
दादू भाव भक्ति दीनता अंग, प्रेम प्रीति सदा तिहिं संग ॥ 8 ॥
तब साहिब को सिजदा किया, जब सिर धऱ्या उतार ।
यों दादू जीवित मरै, हिर्स हवा को मार ॥ 9 ॥
दादू राव रंक सब मरेंगे, जीवै नाहीं कोइ ।
सोई कहिये जीवता, जे मरजीवा होइ ॥ 10 ॥
दादू मेरा वैरी मैं मुवा, मुझे न मारै कोइ ।
मैं ही मुझको मारता, मैं मरजीवा होइ ॥ 11 ॥
वैरी मारे मरि गये, चित तैं बिसरे नाहिं ।
दादू अजहूँ साल है, समझ देख मन मांहि ॥ 12 ॥
उभै असमाव
दादू तो तूं पावै पीव को, जे जीवित मृतक होइ ।
आप गँवाये पीव मिलै, जानत हैं सब कोइ ॥ 13 ॥
दादू तो तूं पावै पीव का, आपा कुछ न जान ।
आपा जिस तैं ऊपजै, सोई सहज पिछान ॥ 14 ॥
दादू तो तूं पावै पीव को, मैं मेरा सब खोइ ।
मैं मेरा सहजैं गया, तब निर्मल दर्शन होइ ॥ 15 ॥
मैं ही मेरे पोट सिर, मरिये ताके भार ।
दादू गुरु प्रसाद सौं, सिर तैं धरी उतार ॥ 16 ॥

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