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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 504 में से

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पृष्ठ 243

श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24
जीवित मृतक
तब साहिब को सिजदा किया, जब सिर धऱ्या उतार ।
यों दादू जीव्वित मरै, हिर्स हवा को मार ॥ 38 ॥
शूरातन
दादू तन मन काम करीम के, आवै तो नीका ।
जिसका तिसको सौंपिये, सोच क्या जी का ॥ 39 ॥
जे शिर सौंप्या राम को, सो शिर भया सनाथ ।
दादू दे ऊरण भया, जिसका तिसके हाथ ॥ 40 ॥
जिसका है तिसको चढै, दादू ऊरण होइ ।
पहली देवै सो भला, पीछे तो सब कोइ ॥ 41 ॥
सांई तेरे नाम पर, शिर जीव करूं कुर्बान ।
तन मन तुम पर वारणै, दादू पिंड पराण ॥ 42 ॥
अपने सांई कारणै, क्या क्या नहिं कीजे ?
दादू सब आरम्भ तज, अपणा शिर दीजे ॥ 43 ॥
शिर के साटै लीजिये, साहिब जी का नांव ।
खेलै शीश उतार कर, दादू मैं बलि जांव ॥ 44 ॥
खेलै शीश उतार कर, अधर एक सौं आइ ।
दादू पावै प्रेम रस, सुख में रहै समाइ ॥ 45 ॥
मरण भय निवारण
दादू मरणे थीं तूं मत डरै, सब जग मरता जोइ ।
मिल कर मरणा राम सौं, तो कलि अजरावर होइ ॥ 46 ॥
दादू मरणे थीं तूं मत डरै, मरणा अंत निदान ।
रे मन मरणा सिरजिया, कहले केवल राम ॥ 47 ॥
दादू मरणे थीं तूं मत डरै, मरणा पहुँचा आइ ।
रे मन मेरा राम कह, बेगा बार न लाइ ॥ 48 ॥

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