सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21
ईश्वर समर्थता
ज्यों यहु समझै त्यों कहो, यहु जीव अज्ञानी।
जेती बाबा तैं कही, इन इक न मानी ॥ 26 ॥
दादू परचा माँगें लोग सब, कहैं हमकौं कुछ दिखलाइ।
समर्थ मेरा सांइयाँ, ज्यों समझैं त्यों समझाइ ॥ 27 ॥
दादू तन मन लाइ कर, सेवा दृढ़ कर लेइ।
ऐसा समर्थ राम है, जे मांगै सो देइ ॥ 28 ॥
समर्थ साक्षीभूत
समर्थ सो सेरी समझाइनैं, कर अणकर्ता होइ।
घट घट व्यापक पूर सब, रहै निरंतर सोइ ॥ 29 ॥
रहै नियारा सब करै, काहू लिप्त न होइ।
आदि अंत भानै घड़ै, ऐसा समर्थ सोइ ॥ 30 ॥
कर्त्ता साक्षीभूत
श्रम नहीं सब कुछ करै, यौं कल धरी बनाइ।
कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥ 31 ॥
लिपै छिपै नहिं सब करै, गुण नहिं व्यापै कोइ।
दादू निश्चल एक रस, सहजैं सब कुछ होइ ॥ 32 ॥
बिन गुण व्यापै सब किया, समर्थ आपै आप।
निराकार न्यारा रहै, दादू पुन्य न पाप ॥ 33 ॥
ईश्वर समर्थाई
समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि।
सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥ 34 ॥
पैदा किया घाट घड़, आपै आप उपाइ।
हिकमत हुनर कारीगरी, दादू लखी न जाइ ॥ 35 ॥
यंत्र बजाया साज कर, कारीगर करतार।
पंचों का रस नाद है, दादू बोलणहार ॥ 36 ॥
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