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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 504 में से

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पृष्ठ 228

श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21
पंच ऊपना शब्द तैं, शब्द पंच सौं होइ।
सांई मेरे सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥ 37 ॥
है तो रती, नहीं तो नांहीं, सब कुछ उत्पति होइ।
हुक्मैं हाजिर सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥ 38 ॥
नहीं तहाँ तैं सब किया, आपै आप उपाइ।
निज तत न्यारा ना किया, दूजा आवै जाइ ॥ 39 ॥
नहीं तहाँ तैं सब किया, फिर नांहीं ह्वै जाइ।
दादू नांहीं होइ रहु, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥ 40 ॥
दादू खालिक खेलै खेल कर, बूझै बिरला कोइ।
लेकर सुखिया ना भया, देकर सुखिया होइ ॥ 41 ॥
देबे की सब भूख है, लेबे की कुछ नांहि।
सांई मेरे सब किया, समझि देख मन मांहि ॥ 42 ॥
कस्तूत कर्म
दादू जे साहिब सिरजै नहीं, तो आपै क्यों कर होइ।
जे आप ही ऊपजै, तो मर कर जीवै कोइ ॥ 43 ॥
कर्म फिरावै जीव को, कर्मों को करतार।
करतार को कोई नहीं, दादू फेरनहार ॥ 44 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य इक्कीसवां
समर्थता काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 21 ॥ साखी 44 ॥

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