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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 504 में से

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पृष्ठ 240

श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24
जब दादू मरबा गहै, तब लोगों की क्या लाज ?
सती राम साचा कहै, सब तज पति सौं काज ॥ 4 ॥
शूरवीर कायर
दादू हम काइर कड़बा कर रहे, शूर निराला होइ।
निकस खड़ा मैदान में, ता सम और न कोइ ॥ 5 ॥
शूर सती साधु निर्णय
मड़ा न जीवै तो संग जलै, जीवै तो घर आण।
जीवन मरणा राम सौं, सोई सती करि जाण ॥ 6 ॥
जन्म लगै व्यभिचारणी, नख शिख भरी कलंक।
पलक एक सन्मुख जली, दादू धोये अंक ॥ 7 ॥
स्वांग सती का पहर कर, करै कुटुम्ब का सोच।
बाहर शूरा देखिये, दादू भीतर पोच ॥ 8 ॥
दादू सती तो सिरजनहार सौं, जलै विरह की झाल।
ना वह मरै न जलि बुझै, ऐसे संगि दयाल ॥ 9 ॥
जे मुझ होते लाख सिर, तो लाखों देती वारि।
सह मुझ दिया एक सिर, सोई सौंपै नारि ॥ 10 ॥
सती जल कोइला भई, मुये मड़े की लार।
यों जे जलती राम सौं, साचे संग भर्तार ॥ 11 ॥
मुये मड़े सौं हेत क्या, जे जीव की जाणै नांहि।
हेत हरि सौं कीजिये, जे अन्तरजामी मांहि ॥ 12 ॥
शूरवीर कायर
शूरा चढ़ संग्राम को, पाछा पग क्यों देहि ?
साहिब लाजै भाजतां, धृग् जीवन दादू तेहि ॥ 13 ॥
सेवक शूरा राम का, सोई कहेगा राम।
दादू सूर सन्मुख रहै, नहिं कायर का काम ॥ 14 ॥

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