सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24
कायर
मन मनसा जीते नहीं, पंच न जीते प्राण।
दादू रिपु जीते नहीं, कहैं हम शूर सुजान ॥ 61 ॥
मन मनसा मारे नहीं, काया मारण जांहि।
दादू बांबी मारिये, सर्प मरै क्यों मांहि ॥ 62 ॥
शूरातन
दादू पाखर पहर कर, सब को झूझण जाइ।
अंग उघाड़ै शूरवां, चोट मुँहैं मुँह खाइ ॥ 63 ॥
जब झूझै तब जाणिये, काछ खड़े क्या होइ।
चोट मुँहैं मुँह खाइगा, दादू शूरा सोइ ॥ 64 ॥
शूरातन सहजैं सदा, साच सेल हथियार।
साहिब के बल झूझतां, केते लिये सु मार ॥ 65 ॥
दादू जब लग जिय लागैं नहीं, प्रेम प्रीति के सेल।
तब लग पिव क्यों पाइये, नहिं बाजीगर का खेल ॥ 66 ॥
दादू जे तूं प्यासा प्रेम का, तो किसको सेतैं जीव।
शिर के साटै लीजिये, जे तुझ प्यारा पीव ॥ 67 ॥
दादू महा जोध मोटा बली, सो सदा हमारी भीर।
सब जग रूठा क्या करै, जहाँ तहाँ रणधीर ॥ 68 ॥
दादू रहते पहते राम जन, तिन भी माँड्या झूझ।
साचा मुँह मोड़ै नहीं, अर्थ इता ही बूझ ॥ 69 ॥
हरि भरोसा
दादू काँधे सबल के, निर्बाहेगा और।
आसन अपने ले चल्या, दादू निश्चल ठौर ॥ 70 ॥
दादू क्या बल कहा पतंग का, जलत न लागै बार।
बल तो हरि बलवंत का, जीवै जिहिं आधार ॥ 71 ॥
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