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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-विश्वास का अंग 19
दादू सोई हमारा सांइयां, जे सबका पूरणहार ।
दादू जीवन मरण का, जाके हाथ विचार ॥ 5 ॥
दादू स्वर्ग भुवन पाताल मधि, आदि अंत सब सृष्ट ।
सिरज सबन को देत है, सोई हमारा इष्ट ॥ 6 ॥
दादू करणहार कर्त्ता पुरुष, हमको कैसी चिंत ।
सब काहू की करत है, सो दादू का मिंत ॥ 7 ॥
दादू मनसा वाचा कर्मणा, साहिब का विश्वास ।
सेवक सिरजनहार का, करे कौन की आस ? 8 ॥
शर्म न आवै जीव को, अनकिया सब होइ ।
दादू मारग मिहर का, बिरला बूझै कोइ ॥ 9 ॥
दादू उद्यम औगुण को नहीं, जे कर जाणै कोइ ।
उद्यम में आनन्द है, जे सांई सेती होइ ॥ 10 ॥
दादू पूरणहारा पूरसी, जो चित रहसी ठाम ।
अन्तर तैं हरि उमग सी, सकल निरंतर राम ॥ 11 ॥
पूरक पूरा पास है, नाहीं दूर, गँवार ।
सब जानत हैं, बावरे ! देबे को हुसियार ॥ 12 ॥
दादू चिन्ता राम को, समर्थ सब जाणै ।
दादू राम संभाल ले, चिंता जनि आणै ॥ 13 ॥
दादू चिन्ता कियां कुछ नहीं, चिंता जीव को खाइ ।
होना था सो ह्वै रह्या, जाना है सो जाइ ॥ 14 ॥
प्रतिपाल
दादू जिन पहुँचाया प्राण को, उदर उर्ध्व मुख खीर ।
जठर अग्नि में राखिया, कोमल काया शरीर ॥ 15 ॥
दादू समर्थ संगी संग रहै, विकट घाट घट भीर ।
सो सांई सूं गहगही, जनि भूलै मन बीर ॥ 16 ॥

  • 215 -

श्री दादूवाणी-विश्वास का अंग 19
गोविन्द के गुण चिंत कर, नैन, बैन, पग, शीश।
जिन मुख दिया कान, कर प्राणनाथ जगदीश ॥ 17 ॥
तन मन सौंज सँवार सब, राखै बिसवा बीस।
सो साहिब सुमिरै नहीं, दादू भान हदीस ॥ 18 ॥
दादू सो साहब जनि विसरै, जिन घट दिया जीव।
गर्भवास में राखिया, पालै पोषै पीव ॥ 19 ॥
दादू राजिक रिजक लिये खड़ा, देवे हाथों हाथ।
पूरक पूरा पास है, सदा हमारे साथ ॥ 20 ॥
हिरदै राम सँभाल ले, मन राखै विश्वास।
दादू समर्थ सांइयां, सब की पूरै आस ॥ 21 ॥
दादू सांई सबन को, सेवक ह्वै सुख देइ।
अया मूढ मति जीव की, तो भी नाम न लेइ ॥ 22 ॥
दादू सिरजनहारा सबन का, ऐसा है समरथ।
सोई सेवक ह्वै रह्या, जहाँ सकल पसारैं हत्थ ॥ 23 ॥
समर्थ साक्षीभूत
धनि धनि साहिब तू बड़ा, कौन अनुपम रीत।
सकल लोक सिर सांइयां, ह्वै कर रह्या अतीत ॥ 24 ॥
दादू हौं बलिहारी सुरति की, सबकी करै सँभाल।
कीड़ी कुंजर पलक में, करता है प्रतिपाल ॥ 25 ॥
विश्वास
दादू छाजन भोजन सहज में, संइयाँ देइ सो लेइ।
तातैं अधिका और कुछ, सो तूं कांई करेइ ॥ 26 ॥
दादू टूका सहज का, संतोषी जन खाइ।
मृतक भोजन, गुरुमुखी काहे कलपै जाइ ॥ 27 ॥
दादू भाड़ा देह का, तेता सहज विचार।
जेता हरि बिच अंतरा, तेता सबै निवार ॥ 28 ॥

  • 216 -

श्री दादूवाणी-विश्वास का अंग 19
दादू जल दल राम का, हम लेवैं परसाद ।
संसार का समझैं नहीं, अविगत भाव अगाध ॥ 29 ॥
परमेश्वर के भाव का, एक कणूँका खाइ ।
दादू जेता पाप था, भ्रम कर्म सब जाइ ॥ 30 ॥
दादू कौण पकावै, कौण पीसै, जहाँ तहाँ सीधा ही दीसै ॥ 31 ॥
दादू जे कुछ खुसी खुदाइ की, होवेगा सोई ।
पच पच कोई जनि मरै, सुन लीज्यो लोई ॥ 32 ॥
दादू छूट खुदाइ कहीं को नांही, फिरिहो पृथ्‍वी सारी ।
दूजी दहन दूर कर बौरै, साधू शब्द विचारी ॥ 33 ॥
दादू बिना राम कहीं को नांही, फिरिहो देश विदेसा ।
दूजी दहन दूर कर बौरै, सुनि यहु साधु संदेशा ॥ 34 ॥
दादू सिदक सबूरी साच गह, साबित राख यकीन ।
साहिब सौं दिल लाइ रहु, मुरदा ह्वै मसकीन ॥ 35 ॥
दादू अनवांछित टूका खात हैं, मर्महि लागा मन ।
नाम निरंजन लेत हैं, यों निर्मल साधु जन ॥ 36 ॥
अनबांछा आगे पड़े, खिरा विचार रू खाइ ।
दादू फिरै न तोड़ता, तरुवर ताक न जाइ ॥ 37 ॥
अनबांछा आगे पड़े, पीछे लेइ उठाइ ।
दादू के सिर दोष यहु, जे कुछ राम रजाइ ॥ 38 ॥
अनबांछी अजगैब की, रोजी गगन गिरास ।
दादू सत करि लीजिये, सो सांई के पास ॥ 39 ॥
कर्त्ता कसौटी
मीठे का सब मीठा लागै, भावै विष भर देइ ।
दादू कड़वा ना कहै, अमृत कर कर लेइ ॥ 40 ॥

  • 217 -

श्री दादूवाणी-विश्वास का अंग 19
विपति भली हरि नाम सौं, काया कसौटी दुख ।
राम बिना किस काम का, दादू संपति सुख ॥ 41 ॥
विश्वास संतोष
दादू एक बेसास बिन, जियरा डावांडोल ।
निकट निधि दुःख पाइये, चिंतामणि अमोल ॥ 42 ॥
दादू बिन बेसासी जीयरा, चंचल नांही ठौर ।
निश्चय निश्चल ना रहे, कछू और की और ॥ 43 ॥
दादू होना था सो है रह्या, स्वर्ग न बांछी धाइ ।
नरक कनै थी ना डरी, हुआ सो होसी आइ ॥ 44 ॥
दादू होना था सो है रह्या, जनि बांछे सुख दुःख ।
सुख मांगे दुख आइसी, पै पीव न बिसारी मुख ॥ 45 ॥
दादू होना था सो है रह्या, जे कुछ किया पीव ।
पल बधै न छिन घटै, ऐसी जानी जीव ॥ 46 ॥
दादू होना था सो है रह्या, और न होवै आइ ।
लेना था सो ले रह्या, और न लिया जाइ ॥ 47 ॥
ज्यों रचिया त्यों होइगा, काहे को सिर लेह ।
साहिब ऊपरि राखिये, देख तमाशा येह ॥ 48 ॥
पतिव्रता निष्काम
ज्यों जाणों त्यों राखियो, तुम सिर डाली राइ ।
दूजा को देखूं नहीं, दादू अनत न जाइ ॥ 49 ॥
ज्यों तुम भावै त्यों खुसी, हम राजी उस बात ।
दादू के दिल सिदक सौं, भावै दिन को रात ॥ 50 ॥
दादू करणहार जे कुछ किया, सो बुरा न कहना जाइ ।
सोई सेवक संत जन, रहबा राम रजाइ ॥ 51 ॥

  • 218 -

श्री दादूवाणी-विश्वास का अंग 19
विश्वास-संतोष
दादू कर्त्ता हम नहीं, कर्त्ता औरै कोइ।
कर्त्ता है सो करेगा, तूं जनि कर्त्ता होइ ॥ 52 ॥
हरि भरोसा
काशी तज मगहर गया, कबीर भरोसे राम।
सैंदेही सांई मिल्या, दादू पूरे काम ॥ 53 ॥
दादू रोजी राम है, राजिक रिजक हमार।
दादू उस प्रसाद सौं, पोष्या सब परिवार ॥ 54 ॥
पंच संतोषे एक सौं, मन मतिवाला मांहि।
दादू भागी भूख सब, दूजा भावै नांहि ॥ 55 ॥
दादू साहिब मेरे कापड़े, साहिब मेरा खाण।
साहिब सिर का ताज है, साहिब पिंड प्राण ॥ 56 ॥
विनती
सांई सत संतोष दे, भाव भक्ति विश्वास।
सिदक सबूरी साँच दे, माँगे दादू दास ॥ 57 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
उन्नीसवां विश्वास का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 19 ॥ साखी 57 ॥

  • 219 -

पीव पहिचान
का
अंग
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अथ पीव पहिचान का अंग २०
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ।। 1 ।।
सारों के सिर देखिये, उस पर कोई नांहि ।
दादू ज्ञान विचार कर, सो राख्या मन मांहि ।। 2 ।।
सब लालों सिर लाल है, सब खूबों सिर खूब ।
सब पाकों सिर पाक है, दादू का महबूब ।। 3 ।।
परब्रह्म परापरं, सो मम देव निरंजनम् ।
निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वंदनम् ।। 4 ।।

  • 220 -
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श्री दादूवाणी-पीव पहिचान का अंग 20
ना वह जामै ना मरै, ना आवै गर्भवास ।
दादू ऊंधे मुख नहीं, नरक कुंड दस मास ॥ 17 ॥
कृत्रिम नहीं सो ब्रह्म है, घटै बधै नहिं जाइ ।
पूरण निश्चल एक रस, जगत न नाचे आइ ॥ 18 ॥
उपजै विनशै गुण धरै, यहु माया का रूप ।
दादू देखत थिर नहीं, क्षण छांहीं क्षण धूप ॥ 19 ॥
जे नांही सो ऊपजै, है सो उपजै नांहि ।
अलख आदि अनादि है, उपजै माया मांहि ॥ 20 ॥
शिष्य जिज्ञासा
जे यहु कर्ता जीव था, संकट क्यों आया ?
कर्मों के वश क्यों भया, क्यों आप बंधाया ? 21 ॥
उत्तर जीव लक्षण
दादू कृत्रिम काल वश, बंध्या गुण मांही ।
उपजै विनशै देखतां, यहु कर्त्ता नांही ॥ 22 ॥
जाती नूर अल्लाह का, सिफाती अरवाह ।
सिफाती सिजदा करै, जाती बेपरवाह ॥ 23 ॥
खंड खंड निज ना भया, इकलस एकै नूर ।
ज्यों था त्यों ही तेज है, ज्योति रही भरपूर ॥ 24 ॥
परम तेज प्रकाश है, परम नूर निवास ।
परम ज्योति आनन्द में, हंसा दादू दास ॥ 25 ॥
परम तेज परापरं, परम ज्योति परमेश्वरं ।
स्वयं ब्रह्म सदई सदा, दादू अविचल स्थिरं ॥ 26 ॥
अविनाशी साहिब सत्य है, जे उपजै विनशै नांहि ।
जेता कहिये काल मुख, सो साहिब किस मांहि ॥ 27 ॥
सांई मेरा सत्य है, निरंजन निराकार ।
दादू विनशै देखतां, झूठा सब आकार ॥ 28 ॥

  • 222 -

श्री दादूवाणी-पीव पहिचान का अंग 20
राम रटण छाड़ै नहीं, हरि लै लागा जाइ ।
बीचैं ही अटकै नहीं, कला कोटि दिखलाइ ॥ 29 ॥
उरैं ही अटकै नहीं, जहाँ राम तहँ जाइ ।
दादू पावै परम सुख, विलसै वस्तु अघाइ ॥ 30 ॥
दादू उरैं ही उरझे घणे, मूये गल दे पास ।
ऐन अंग जहाँ आप था, तहाँ गये निज दास ॥ 31 ॥
सेवा का सुख प्रेम रस, सेज सुहाग न देइ ।
दादू बाहे दास को, कहै दूजा सब लेइ ॥ 32 ॥
सुन्दरी विलाप
पर पुरषा सब परिहरे, सुन्दरि देखे जाग ।
अपना पीव पिछाण कर, दादू रहिये लाग ॥ 33 ॥
आन पुरुष हूँ बहिनड़ी, परम पुरुष भर्तार ।
हौं अबला समझूं नहीं, तूं जाणै कर्तार ॥ 34 ॥
लोहा माटी मिलि रह्या, दिन दिन काई खाइ ।
दादू पारस राम बिन, कतहूँ गया विलाइ ॥ 35 ॥
लोहा पारस परस कर, पलटै अपणा अंग ।
दादू कंचन ह्वै रहै, अपने सांई संग ॥ 36 ॥
दादू जिहिं परसे पलटै प्राणियाँ, सोई निज कर लेह ।
लोहा कंचन ह्वै गया, पारस का गुण येह ॥ 37 ॥
विचार परचै जिज्ञासु उपदेश
दहदिशि फिरै सो मन है, आवै जाय सो पवन ।
राखणहारा प्राण है, देखणहारा ब्रह्म ॥ 38 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-
सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-
ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम्
माहात्म्य बीसवां पीव पहिचान कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 20 ॥ साखी 38 ॥

  • 223 -

समर्थ का अंग
अथ समर्थता का अंग २१
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
दादू कर्त्ता करै तो निमष मैं, कीड़ी कुंजर होइ ।
कुंजर तैं कीड़ी करै, मेट सकै नहिं कोइ ॥ 2 ॥
दादू कर्त्ता करै तो निमष में, राई मेरु समान ।
मेरु को राई करै, तो को मेटै फरमान ॥ 3 ॥
दादू कर्त्ता करै तो निमष में, जल मांही थल थाप ।
थल मांही जलहर करै, ऐसा समर्थ आप ॥ 4 ॥

  • 224 -

श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21
दादू कर्त्ता करै तो निमष में, ठाली भरै भंडार।
भरिया गह ठाली करै, ऐसा सिरजनहार ॥ 5 ॥
दादू धरती को अम्बर करै, अम्बर धरती होइ।
निशि अँधियारी दिन करै, दिन को रजनी सोइ ॥ 6 ॥
मृतक काढ मसाण तैं, कहु कौन चलावै।
अविगत गति नहिं जाणिये, जग आन दिखावै ॥ 7 ॥
दादू गुप्त गुण परगट करै, परगट गुप्त समाइ।
पलक मांहि भानै घड़ै, ताकी लखी न जाइ ॥ 8 ॥
पोषपाल रक्षक
दादू सोई सही साबित हुआ, जा मस्तक कर देइ।
गरीब निवाजे देखतां, हरि अपना कर लेइ ॥ 9 ॥
सूक्ष्म मार्ग
दादू सब ही मारग सांइयाँ, आगै एक मुकाम।
सोई सन्मुख कर लिया, जाही सेती काम ॥ 10 ॥
पोष प्रतिपाल रक्षक
मीरां मुझ सौं महर कर, सिर पर दीया हाथ।
दादू कलियुग क्या करै, सांई मेरा साथ ॥ 11 ॥
ईश्वर समर्थाई
दादू समर्थ सब विधि सांइयाँ, ताकी मैं बलि जाऊँ।
अंतर एक जु सो बसै, औरां चित्त न लाऊँ ॥ 12 ॥
सूक्ष्म मार्ग
दादू मार्ग महर का, सुखी सहज सौं जाइ।
भवसागर तैं काढ कर, अपणे लिये बुलाइ ॥ 13 ॥
ईश्वर समर्थाई
दादू जे हम चिन्तवैं, सो कछु न होवै आइ।
सोई कर्त्ता सत्य है, कुछ औरै कर जाइ ॥ 14 ॥

  • 225 -

श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21

एकौं लेइ बुलाइ कर, एकौं देइ पठाइ।
दादू अद्भुत साहिबी, क्यों ही लखी न जाइ ॥ 15 ॥
ज्यों राखै त्यों रहेंगे, अपने बल नांही।
सबै तुम्हारे हाथ है, भाज कत जांही ॥ 16 ॥
दादू डोरी हरि के हाथ है, गल मांही मेरे।
बाजीगर का बांदरा, भावै तहाँ फेरे ॥ 17 ॥
ज्यों राखै त्यों रहेंगे, मेरा क्या सारा।
हुक्मी सेवक राम का, बन्दा बेचारा ॥ 18 ॥
साहिब राखै तो रहे, काया मांही जीव।
हुक्मी बन्दा उठ चले, जब ही बुलावे पीव ॥ 19 ॥
पति पहचान
खंड खंड प्रकाश है, जहाँ तहाँ भरपूर।
दादू कर्त्ता कर रह्या, अनहद बाजै तूर ॥ 20 ॥
ईश्वर समर्थाई
दादू दादू कहत हैं, आपै सब घट मांहि।
अपनी रुचि आपै कहैं, दादू तैं कुछ नांहि ॥ 21 ॥
दादू हम तैं हुआ न होइगा, ना हम करणे जोग।
ज्यों हरि भावै त्यों करै, दादू कहैं सब लोग ॥ 22 ॥
दादू दूजा क्यों कहै, सिर पर साहिब एक।
सो हम कौं क्यों बीसरै, जे जुग जाहिं अनेक ॥ 23 ॥
समर्थ साक्षीभूत
आप अकेला सब करै, औरों के सिर देइ।
दादू शोभा दास को, अपना नाम न लेइ ॥ 24 ॥
आप अकेला सब करै, घट में लहरि उठाइ।
दादू सिर दे जीव के, यों न्यारा ह्वै जाइ ॥ 25 ॥

  • 226 -

श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21
ईश्वर समर्थता
ज्यों यहु समझै त्यों कहो, यहु जीव अज्ञानी।
जेती बाबा तैं कही, इन इक न मानी ॥ 26 ॥
दादू परचा माँगें लोग सब, कहैं हमकौं कुछ दिखलाइ।
समर्थ मेरा सांइयाँ, ज्यों समझैं त्यों समझाइ ॥ 27 ॥
दादू तन मन लाइ कर, सेवा दृढ़ कर लेइ।
ऐसा समर्थ राम है, जे मांगै सो देइ ॥ 28 ॥
समर्थ साक्षीभूत
समर्थ सो सेरी समझाइनैं, कर अणकर्ता होइ।
घट घट व्यापक पूर सब, रहै निरंतर सोइ ॥ 29 ॥
रहै नियारा सब करै, काहू लिप्त न होइ।
आदि अंत भानै घड़ै, ऐसा समर्थ सोइ ॥ 30 ॥
कर्त्ता साक्षीभूत
श्रम नहीं सब कुछ करै, यौं कल धरी बनाइ।
कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥ 31 ॥
लिपै छिपै नहिं सब करै, गुण नहिं व्यापै कोइ।
दादू निश्चल एक रस, सहजैं सब कुछ होइ ॥ 32 ॥
बिन गुण व्यापै सब किया, समर्थ आपै आप।
निराकार न्यारा रहै, दादू पुन्य न पाप ॥ 33 ॥
ईश्वर समर्थाई
समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि।
सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥ 34 ॥
पैदा किया घाट घड़, आपै आप उपाइ।
हिकमत हुनर कारीगरी, दादू लखी न जाइ ॥ 35 ॥
यंत्र बजाया साज कर, कारीगर करतार।
पंचों का रस नाद है, दादू बोलणहार ॥ 36 ॥

  • 227 -

श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21
पंच ऊपना शब्द तैं, शब्द पंच सौं होइ।
सांई मेरे सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥ 37 ॥
है तो रती, नहीं तो नांहीं, सब कुछ उत्पति होइ।
हुक्मैं हाजिर सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥ 38 ॥
नहीं तहाँ तैं सब किया, आपै आप उपाइ।
निज तत न्यारा ना किया, दूजा आवै जाइ ॥ 39 ॥
नहीं तहाँ तैं सब किया, फिर नांहीं ह्वै जाइ।
दादू नांहीं होइ रहु, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥ 40 ॥
दादू खालिक खेलै खेल कर, बूझै बिरला कोइ।
लेकर सुखिया ना भया, देकर सुखिया होइ ॥ 41 ॥
देबे की सब भूख है, लेबे की कुछ नांहि।
सांई मेरे सब किया, समझि देख मन मांहि ॥ 42 ॥
कस्तूत कर्म
दादू जे साहिब सिरजै नहीं, तो आपै क्यों कर होइ।
जे आप ही ऊपजै, तो मर कर जीवै कोइ ॥ 43 ॥
कर्म फिरावै जीव को, कर्मों को करतार।
करतार को कोई नहीं, दादू फेरनहार ॥ 44 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य इक्कीसवां
समर्थता काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 21 ॥ साखी 44 ॥

  • 228 -

अथ शब्द का अंग २२
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
आत्म बोधक गुरु उपदेश शब्द की महिमा
दादू शब्दैं बँध्या सब रहै, शब्दैं ही सब जाइ ।
शब्दैं ही सब ऊपजै, शब्दैं सबै समाइ ॥ 2 ॥
दादू शब्दैं ही सचु पाइये, शब्दैं ही संतोंख ।
शब्दैं ही सुस्थिर भया, शब्दैं भागा शोक ॥ 3 ॥

  • 229 -

श्री दादूवाणी-शब्द का अंग 22
दादू शब्दैं ही सूक्ष्म भया, शब्दैं सहज समान ।
शब्दैं ही निर्गुण मिले, शब्दैं निर्मल ज्ञान ॥ 4 ॥
दादू शब्दैं ही मुक्ता भया, शब्दैं समझे प्राण ।
शब्दैं ही सूझे सबै, शब्दैं सुरझे जाण ॥ 5 ॥
सृष्टि क्रम
दादू ओंकार तैं ऊपजै, अरस परस संजोग ।
अंकुर बीज द्वै पाप पुण्य, इहि विधि जोग रु भोग ॥ 6 ॥
ओंकार तैं ऊपजै, विनशै बहुत विकार ।
भाव भक्ति लै थिर रहै, दादू आतम सार ॥ 7 ॥
पहली किया आप तैं, उत्पत्ति ओंकार ।
ओंकार तैं ऊपजै, पंच तत्त्व आकार ॥ 8 ॥
पंच तत्त्व तैं घट भया, बहु विधि सब विस्तार ।
दादू घट तैं ऊपजै, मैं तैं वर्ण विकार ॥ 9 ॥
एक शब्द सब कुछ किया, ऐसा समर्थ सोइ ।
आगे पीछे तो करै, जे बलहीना होइ ॥ 10 ॥
निरंजन निराकार है, ओंकार आकार ।
दादू सब रंग रूप सब, सब विधि सब विस्तार ॥ 11 ॥
आदि शब्द ओंकार है, बोलै सब घट माँहि ।
दादू माया विस्तरी, परम तत्त यहु नांहि ॥ 12 ॥
ईश्वर समर्थाई
पैदा किया घाट घड़, आपै आप उपाइ ।
हिक मत हुनर कारीगरी, दादू लखी न जाइ ॥ 13 ॥
यंत्र बजाया साज कर, कारीगर करतार ।
पंचों का रस नाद है, दादू बोलनहार ॥ 14 ॥

  • 230 -

श्री दादूवाणी-शब्द का अंग 22
पंच ऊपना शब्द तैं, शब्द पंच सौं होइ ।
सांई मेरे सब किया, बूझै विरला कोइ ॥ 15 ॥
दादू एक शब्द सौं ऊनवै, वर्षन लागै आइ ।
एक शब्द सौं बीखरै, आप आपको जाइ ॥ 16 ॥
दादू साधु शब्द सौं मिल रहै, मन राखै बिलमाइ ।
साधु शब्द बिन क्यों रहै, तब ही बीखर जाइ ॥ 17 ॥
दादू शब्द जरै सो मिल रहै, एक रस पूरा ।
कायर भाजै जीव ले, पग मांडै शूरा ॥ 18 ॥
शब्द विचारै करणी करै, राम नाम निज हिरदै धरै ।
काया मांहीं शोधै सार, दादू कहै लहै सो पार ॥ 19 ॥
दादू काहे कौड़ी खर्चिये, जे पैके सीझै काम ।
शब्दों कारज सिध भया, तो सुरम न दीजै राम ॥ 20 ॥
दादू राम हृदय रस भेलि कर, को साधु शब्द सुनाइ ।
जानो कर दीपक दिया, भ्रम तिमिर सब जाइ ॥ 21 ॥
दादू वाणी प्रेम की, कमल विकासै होहि ।
साधु शब्द माता कहैं, तिन शब्दों मोह्या मोहि ॥ 22 ॥
दादू हरि भुरकी वाणी साधु की, सो परियो मेरे शीश ।
छूटे माया मोह तैं, प्रेम भजन जगदीश ॥ 23 ॥
दादू भुरकी राम है, शब्द कहैं गुरु ज्ञान ।
तिन शब्दों मन मोहिया, उनमन लागा ध्यान ॥ 24 ॥
दादू वाणी ब्रह्म की, अनभै घट प्रकाश ।
राम अकेला रह गया, शब्द निरंजन पास ॥ 25 ॥
शब्दों माहिं राम धन, जे कोई लेइ विचार ।
दादू इस संसार में, कबहुं न आवे हार ॥ 26 ॥

  • 231 -

श्री दादूवाणी-शब्द का अंग 22

दादू राम रसायन भर धन्या, साधुन शब्द मंझार ।
कोई पारखि पीवै प्रीति सौं, समझै शब्द विचार ॥ 27 ॥
शब्द सरोवर सुभर भव्या, हरि जल निर्मल नीर ।
दादू पीवै प्रीति सौं, तिन के अख्रिल शरीर ॥ 28 ॥
शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया ।
आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥ 29 ॥
गुरुमुख कसौटी
कारज को सीझै नहीं, मीठा बोलै बीर ।
दादू साचे शब्द बिन, कटै न तन की पीर ॥ 30 ॥
शब्द
दादू गुण तजि निर्गुण बोलिये, तेता बोल अबोल ।
गुण गहि आपा बोलिये, तेता कहिये बोल ॥ 31 ॥
साचा शब्द कबीर का, मीठा लागै मोहि ।
दादू सुनतां परम सुख, केता आनन्द होहि ॥ 32 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
बाईसवां शब्द काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 22 ॥ साखी 32 ॥

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जीवत मृतक का अंग
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अथ जीवित मृतक का अंग २३
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ॥ 1 ॥
धरती मत आकाश का, चंद सूर का लेइ ।
दादू पानी पवन का, राम नाम कहि देइ ॥ 2 ॥
दादू धरती ह्वै रहै, तज कूड़ कपट अहंकार।
सांई कारण सिर सहै, ताको प्रत्यक्ष सिरजनहार ॥ 3 ॥
जीवित माटी मिल रहै, सांई सन्मुख होइ।
दादू पहली मर रहै, पीछे तो सब कोइ ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23
दीनता-गरीबी
दादू आपा गर्ब गुमान तज, मत मत्सर अहंकार ।
गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥ 5 ॥
मद मत्सर आपा नहीं, कैसा गर्व गुमान ।
सपनै ही समझै नहीं, दादू क्या अभिमान ॥ 6 ॥
झूठा गर्व गुमान तज, तज आपा अभिमान ।
दादू दीन गरीब है, पाया पद निर्वाण ॥ 7 ॥
जीवित मृतक यही निशानी, दुर्बल देही निर्मल वाणी ।
दादू भाव भक्ति दीनता अंग, प्रेम प्रीति सदा तिहिं संग ॥ 8 ॥
तब साहिब को सिजदा किया, जब सिर धऱ्या उतार ।
यों दादू जीवित मरै, हिर्स हवा को मार ॥ 9 ॥
दादू राव रंक सब मरेंगे, जीवै नाहीं कोइ ।
सोई कहिये जीवता, जे मरजीवा होइ ॥ 10 ॥
दादू मेरा वैरी मैं मुवा, मुझे न मारै कोइ ।
मैं ही मुझको मारता, मैं मरजीवा होइ ॥ 11 ॥
वैरी मारे मरि गये, चित तैं बिसरे नाहिं ।
दादू अजहूँ साल है, समझ देख मन मांहि ॥ 12 ॥
उभै असमाव
दादू तो तूं पावै पीव को, जे जीवित मृतक होइ ।
आप गँवाये पीव मिलै, जानत हैं सब कोइ ॥ 13 ॥
दादू तो तूं पावै पीव का, आपा कुछ न जान ।
आपा जिस तैं ऊपजै, सोई सहज पिछान ॥ 14 ॥
दादू तो तूं पावै पीव को, मैं मेरा सब खोइ ।
मैं मेरा सहजैं गया, तब निर्मल दर्शन होइ ॥ 15 ॥
मैं ही मेरे पोट सिर, मरिये ताके भार ।
दादू गुरु प्रसाद सौं, सिर तैं धरी उतार ॥ 16 ॥

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