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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 504 में से

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पृष्ठ 222

श्री दादूवाणी-पीव पहिचान का अंग 20
ना वह जामै ना मरै, ना आवै गर्भवास ।
दादू ऊंधे मुख नहीं, नरक कुंड दस मास ॥ 17 ॥
कृत्रिम नहीं सो ब्रह्म है, घटै बधै नहिं जाइ ।
पूरण निश्चल एक रस, जगत न नाचे आइ ॥ 18 ॥
उपजै विनशै गुण धरै, यहु माया का रूप ।
दादू देखत थिर नहीं, क्षण छांहीं क्षण धूप ॥ 19 ॥
जे नांही सो ऊपजै, है सो उपजै नांहि ।
अलख आदि अनादि है, उपजै माया मांहि ॥ 20 ॥
शिष्य जिज्ञासा
जे यहु कर्ता जीव था, संकट क्यों आया ?
कर्मों के वश क्यों भया, क्यों आप बंधाया ? 21 ॥
उत्तर जीव लक्षण
दादू कृत्रिम काल वश, बंध्या गुण मांही ।
उपजै विनशै देखतां, यहु कर्त्ता नांही ॥ 22 ॥
जाती नूर अल्लाह का, सिफाती अरवाह ।
सिफाती सिजदा करै, जाती बेपरवाह ॥ 23 ॥
खंड खंड निज ना भया, इकलस एकै नूर ।
ज्यों था त्यों ही तेज है, ज्योति रही भरपूर ॥ 24 ॥
परम तेज प्रकाश है, परम नूर निवास ।
परम ज्योति आनन्द में, हंसा दादू दास ॥ 25 ॥
परम तेज परापरं, परम ज्योति परमेश्वरं ।
स्वयं ब्रह्म सदई सदा, दादू अविचल स्थिरं ॥ 26 ॥
अविनाशी साहिब सत्य है, जे उपजै विनशै नांहि ।
जेता कहिये काल मुख, सो साहिब किस मांहि ॥ 27 ॥
सांई मेरा सत्य है, निरंजन निराकार ।
दादू विनशै देखतां, झूठा सब आकार ॥ 28 ॥

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