सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-पीव पहिचान का अंग 20
राम रटण छाड़ै नहीं, हरि लै लागा जाइ ।
बीचैं ही अटकै नहीं, कला कोटि दिखलाइ ॥ 29 ॥
उरैं ही अटकै नहीं, जहाँ राम तहँ जाइ ।
दादू पावै परम सुख, विलसै वस्तु अघाइ ॥ 30 ॥
दादू उरैं ही उरझे घणे, मूये गल दे पास ।
ऐन अंग जहाँ आप था, तहाँ गये निज दास ॥ 31 ॥
सेवा का सुख प्रेम रस, सेज सुहाग न देइ ।
दादू बाहे दास को, कहै दूजा सब लेइ ॥ 32 ॥
सुन्दरी विलाप
पर पुरषा सब परिहरे, सुन्दरि देखे जाग ।
अपना पीव पिछाण कर, दादू रहिये लाग ॥ 33 ॥
आन पुरुष हूँ बहिनड़ी, परम पुरुष भर्तार ।
हौं अबला समझूं नहीं, तूं जाणै कर्तार ॥ 34 ॥
लोहा माटी मिलि रह्या, दिन दिन काई खाइ ।
दादू पारस राम बिन, कतहूँ गया विलाइ ॥ 35 ॥
लोहा पारस परस कर, पलटै अपणा अंग ।
दादू कंचन ह्वै रहै, अपने सांई संग ॥ 36 ॥
दादू जिहिं परसे पलटै प्राणियाँ, सोई निज कर लेह ।
लोहा कंचन ह्वै गया, पारस का गुण येह ॥ 37 ॥
विचार परचै जिज्ञासु उपदेश
दहदिशि फिरै सो मन है, आवै जाय सो पवन ।
राखणहारा प्राण है, देखणहारा ब्रह्म ॥ 38 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-
सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-
ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम्
माहात्म्य बीसवां पीव पहिचान कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 20 ॥ साखी 38 ॥
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