सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15
संगति कुसंगति फल
दादू असाधु मिलै अन्तर पड़ै, भाव भक्ति रस जाइ।
साधु मिलै सुख ऊपजै, आनन्द अंग न माइ ॥ 68 ॥
दादू साधु संगति पाइये, राम अमीफल होइ।
संसारी संगति पाइये, विषफल देवै सोइ ॥ 69 ॥
दादू सभा संत की, सुमति उपजै आइ।
शाक्त की सभा बैसतां, ज्ञान काया तैं जाइ ॥ 70 ॥
जग जन विपरीत
दादू सब जग दीसै एकला, सेवक स्वामी दोइ।
जगत दुहागी राम बिन, साधु सुहागी सोइ ॥ 71 ॥
दादू साधु जन सुखिया भये, दुनिया को बहु द्वन्द्व।
दुनी दुखी हम देखतां, साधुन सदा आनन्द ॥ 72 ॥
दादू देखत हम सुखी, सांई के संग लाग।
यों सो सुखिया होयगा, जाके पूरे भाग ॥ 73 ॥
दादू मीठा पीवै राम रस, सो भी मीठा होइ।
सहजैं कड़वा मिट गया, दादू निर्विष सोइ ॥ 74 ॥
साध पारख लक्षण
दादू अन्तर एक अनंत सौं, सदा निरंतर प्रीत।
जिहिं प्राणी प्रीतम बसै, सो बैठा त्रिभुवन जीत ॥ 75 ॥
साधु महिमा महात्म
दादू मैं दासी तिहिं दास की, जिहिं संगि खेलै पीव।
बहुत भाँति कर वारणे, तापर दीजे जीव ॥ 76 ॥
भ्रम विध्वंसण
दादू लीला राजा राम की, खेलैं सब ही संत।
आपा पर एकै भया, छूटी सबै भरंत ॥ 77 ॥
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15
जग जन विपरीत
दादू आनंद सदा अडोल सौं, राम सनेही साध ।
प्रेमी प्रीतम को मिले, यहु सुख अगम अगाध ॥ 78 ॥
पुरुष प्रकाशिक
यहु घट दीपक साध का, ब्रह्म ज्योति प्रकाश ।
दादू पंखी संतजन, तहाँ परैं निज दास ॥ 79 ॥
घर वन मांहीं राखिये, दीपक ज्योति जगाइ ।
दादू प्राण पतंग सब, जहँ दीपक तहँ जाइ ॥ 80 ॥
घर वन मांहीं राखिये, दीपक जलता होइ ।
दादू प्राण पतंग सब, आइ मिलैं सब कोइ ॥ 81 ॥
घर वन मांहीं राखिये, दीपक प्रकट प्रकाश ।
दादू प्राण पतंग सब, आइ मिलैं उस पास ॥ 82 ॥
घर वन मांही राखिये, दीपक ज्योति सहेत ।
दादू प्राण पतंग सब, आइ मिलैं उस हेत ॥ 83 ॥
जिहिं घट प्रकट राम है, सो घट तज्या न जाइ ।
नैनहुँ मांही राखिये, दादू आप नशाइ ॥ 84 ॥
जिहिं घट दीपक राम का, तिहिं घट तिमिर न होइ ।
उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥ 85 ॥
साधु अबिहड़
कबहुँ न बिहड़ै सो भला, साधु दिढ मति होइ ।
दादू हीरा एक रस, बाँध गाँठड़ी सोइ ॥ 86 ॥
साधु पारख लक्षण
गरथ न बांधै गांठड़ी, नहीं नारी सौं नेह ।
मन इंद्री सुस्थिर करै, छाड़ सकल गुण देह ॥ 87 ॥
निराकार सौं मिल रहै, अखंड भक्ति कर लेह ।
दादू क्यों कर पाइये, उन चरणों की खेह ॥ 88 ॥
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15
समाचार सत पीव का, कोइ साधु कहेगा आइ ।
दादू शीतल आत्मा, सुख में रहे समाइ ॥ 89 ॥
साधु शब्द सुख वर्षहि, शीतल होइ शरीर ।
दादू अन्तर आत्मा, पीवे हरि जल नीर ॥ 90 ॥
साधु लक्षण
साधु सदा संयम रहै, मैला कदे न होइ ।
दादू पंक परसै नहीं, कर्म न लागै कोइ ॥ 91 ॥
साध सदा संयम रहै, मैला कदे न होइ ।
शून्य सरोवर हंसला, दादू विरला कोइ ॥ 92 ॥
साहिब का उनहार सब, सेवक मांही होइ ।
दादू सेवक साधु को, दूजा नांही कोइ ॥ 93 ॥
दादू जब लग नैन न देखिये, साध कहैं ते अंग ।
तब लग क्यों कर मानिये, साहिब का प्रसंग ॥ 94 ॥
दादू सोइ जन साधु सिद्ध सो, सोइ सकल सिरमौर ।
जिहिं के हिरदै हरि बसै, दूजा नाहीं और ॥ 95 ॥
दादू अवगुण छाड़ै गुण गहै, सोई शिरोमणि साध ।
गुण औगुण तैं रहित है, सो निज ब्रह्म अगाध ॥ 96 ॥
जग जन विपरीत
दादू सैन्धव फटिक पाषाण का, ऊपर एकै रंग ।
पानी मांहीं देखिये, न्यारा न्यारा अंग ॥ 97 ॥
दादू सैंधव के आपा नहीं, नीर खीर परसंग ।
आपा फटिक पाषाण के, मिलै न जल के संग ॥ 98 ॥
दादू सब जग फटिक पाषाण है, साधु सैंधव होइ ।
सैंधव एकै ह्वै रह्या, पानी पत्थर दोइ ॥ 99 ॥
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15
साधु परमार्था
को साधु जन उस देश का, आया इहि संसार।
दादू उसको पूछिये, प्रीतम के समाचार ॥ 100 ॥
दादू दत्त दरबार का, को साधु बांटै आइ।
तहाँ राम रस पाइये, जहाँ साधु तहँ जाइ ॥ 101 ॥
चौंप चरचा
दादू श्रोता स्नेही राम का, सो मुझ मिलवहु आणि।
तिस आगे हरि गुण कथूं, सुणत न करई काणि ॥ 102 ॥
साधु परमार्था
दादू सब ही मृतक समान हैं, जीया तब ही जाण।
दादू छांटा अमी का, को साधु बाहे आण ॥ 103 ॥
सबही मृतक ह्वै रहे, जीवैं कौन उपाइ।
दादू अमृत रामरस, को साधू सींचे आइ ॥ 104 ॥
सब ही मृतक देखिये, क्यों कर जीवैं सोइ।
दादू साधु प्रेम रस, आणि पिलावे कोइ ॥ 105 ॥
सब ही मृतक देखिये, किहिं विधि जीवैं जीव।
साधु सुधारस आणि करि, दादू बरसे पीव ॥ 106 ॥
हरि जल बरसै बाहिरा, सूखे काया खेत।
दादू हरिया होइगा, सींचणहार सुचेत ॥ 107 ॥
कुसंगति
गंगा यमुना सरस्वती, मिलैं जब सागर मांहि।
खारा पानी ह्वै गया, दादू मीठा नांहि ॥ 108 ॥
दादू राम न छाड़िये, गहिला तज संसार।
साधु संगति शोध ले, कुसंगति संग निवार ॥ 109 ॥
दादू कुसंगति सब परिहरै, मात पिता कुल कोइ।
सजन स्नेही बांधवा, भावै आपा होइ ॥ 110 ॥
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15
अज्ञान मूर्खः हितकारी, सज्जनो हि समो रिपुः ।
ज्ञात्वा(परि)त्यजंति ते, निरामयी मनोजितः ।। 111 ।।
कुसंगति केते गये, तिनका नांव न ठांव ।
दादू ते क्यों उब्बरैं, साधु नहीं जिस गाँव ।। 112 ।।
भाव भक्ति का भंग कर, बटपारे मारहिं बाट।
दादू द्वारा मुक्ति का, खोले जड़े कपाट ।। 113 ।।
सत्संग महिमा महात्म
साधु संगति अंतर पड़े, तो भागेगा किस ठौर ।
प्रेम भक्ति भावै नहीं, यहु मन का मत और ।। 114 ।।
दादू राम मिलन के कारणे, जे तूँ खरा उदास ।
साधु संगति शोध ले, राम उन्हीं के पास ।। 115 ।।
पुरुष प्रकाशिक संत महिमा
ब्रह्मा शंकर सेष मुनि, नारद ध्रुव शुकदेव ।
सकल साधु दादू सही, जे लागे हरि सेव ।। 116 ।।
साधु कंवल हरि वासना, संत भ्रमर संग आइ ।
दादू परिमल ले चले, मिले राम को जाइ ।। 117 ।।
साधु सज्जन
दादू सहजैं मेला होइगा, हम तुम हरि के दास ।
अंतरगति तो मिलि रहे, पुनि प्रकट प्रकाश ।। 118 ।।
दादू मम सिर मोटे भाग, साधों का दर्शन किया ।
कहा करै जम काल, राम रसायन भर पिया ।। 119 ।।
साधु समर्थता
दादू एता अविगत आप थैं, साधों का अधिकार ।
चौरासी लख जीव का, तन मन फेरि सँवार ।। 120 ।।
विष का अमृत कर लिया, पावक का पाणी ।
बाँका सूधा करि लिया, सो साध बिनाणी ।। 121 ।।
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15
दादू ऊरा पूरा कर लिया, खारा मीठा होइ ।
फूटा सारा कर लिया, साधु विवेकी सोइ ॥ 122 ॥
बंध्या मुक्ता कर लिया, उरझ्या सुरझ समान ।
बैरी मिंता कर लिया, दादू उत्तम ज्ञान ॥ 123 ॥
झूठा साचा कर लिया, काँचा कंचन सार ।
मैला निर्मल कर लिया, दादू ज्ञान विचार ॥ 124 ॥
अमिट पाप प्रचंड
दादू काया कर्म लगाइ कर, तीर्थ धोवै आइ ।
तीर्थ मांही कीजिए, सो कैसे कर जाइ ॥ 125 ॥
जहँ तिरिये तहँ डूबिये, मन में मैला होइ ।
जहाँ छूटे तहँ बंधिये, कपट न सीझे कोइ ॥ 126 ॥
सत्संग महिमा
दादू जब लग जीविये, सुमिरण संगति साध ।
दादू साधू राम बिन, दूजा सब अपराध ॥ 127 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
पन्द्रहवां साधु काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 15 ॥ साखी 127 ॥
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मध्य
का
अंग
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अथ मध्य का अंग १६
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
मध्य निष्पक्ष
दादू द्वै पख रहिता सहज सो, सुख दुख एक समान।
मरै न जीवै सहज सो, पूरा पद निर्वाण ॥ 2 ॥
सहज रूप मन का भया, जब द्वै द्वै मिटी तरंग।
ताता शीला सम भया, तब दादू एकै अंग ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16
सुख दुख मन मानै नहीं, राम रंग राता।
दादू दोनों छाड़ि सब, प्रेम रस माता ॥ 4 ॥
मति मोटी उस साधु की, द्वै पख रहित समान।
दादू आपा मेट कर, सेवा करै सुजान ॥ 5 ॥
कछु न कहावै आपको, काहू संग न जाइ।
दादू निरपख है रहै, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥ 6 ॥
सुख दुख मन मानै नहीं, आपा पर सम भाइ।
सो मन ! मन कर सेविये, सब पूरण ल्यौ लाइ ॥ 7 ॥
ना हम छाडैं ना गहैं, ऐसा ज्ञान विचार।
मध्य भाव सेवैं सदा, दादू मुक्ति द्वार ॥ 8 ॥
सहज शून्य मन राखिये, इन दोनों के मांहि।
लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥ 9 ॥
आपा मेटै मृत्तिका, आपा धरै आकास।
दादू जहाँ जहाँ द्वै नहीं, मध्य निरंतर वास ॥ 10 ॥
ध्येय परम स्थान निरूपण
नहिं मृतक नहिं जीवता, नहिं आवै नहिं जाइ।
नहिं सूता नहि जागता, नहिं भूखा नहिं खाइ ॥ 11 ॥
दादू इस आकार तैं, दूजा सूक्ष्म लोक।
तातैं आगे और है, तहँ वहाँ हर्ष न शोक ॥ 12 ॥
दादू हद छाड़ बेहद में, निर्भय निर्पख होइ।
लाग रहै उस एक सौं, जहाँ न दूजा कोइ ॥ 13 ॥
दादू दूजे अन्तर होत है, जनि आणै मन मांहि।
तहँ ले मन को राखिये, जहाँ कुछ दूजा नांहि ॥ 14 ॥
निराधार घर कीजिये, जहाँ नांहि धरणि आकास।
दादू निश्चल मन रहै, निर्गुण के विश्वास ॥ 15 ॥
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श्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16
मन चित मनसा आत्मा, सहज सुरति ता मांहि ।
दादू पंचों पूरि ले, जहँ धरती अंबर नांहि ॥ 16 ॥
अधर चाल कबीर की, आसंघी नहिं जाइ ।
दादू डाकै मृग ज्यों, उलट पड़े भुवि आइ ॥ 17 ॥
दादू रहणी कबीर की, कठिन विषम यहु चाल ।
अधर एक सौं मिल रह्या, जहाँ न झंपै काल ॥ 18 ॥
निराधार निज भक्ति कर, निराधार निज सार ।
निराधार निज नाम ले, निराधार निराकार ॥ 19 ॥
निराधार निज राम रस, को साधु पीवनहार ।
निराधार निर्मल रहै, दादू ज्ञान विचार ॥ 20 ॥
जब निराधार मन रह गया, आत्म के आनन्द ।
दादू पीवे रामरस, भेटे परमानन्द ॥ 21 ॥
माया
दुहुँ बिच राम अकेला आपै, आवण जाण न देहि ।
जहँ के तहँ सब राखै दादू, पार पहुँचे तेहि ॥ 22 ॥
मध्य निरपेक्ष
चलु दादू तहँ जाइये, जहँ मरै न जीवै कोइ ।
आवागमन भय को नहीं, सदा एक रस होइ ॥ 23 ॥
चलु दादू तहँ जाइये, जहँ चंद सूर नहिं जाइ ।
रात दिवस की गम नहीं, सहजैं रह्या समाइ ॥ 24 ॥
चलु दादू तहँ जाइये, माया मोह तैं दूर ।
सुख दुख को व्यापै नहीं, अविनासी घर पूर ॥ 25 ॥
चलु दादू तहँ जाइये, जहँ जम जोरा को नांहि ।
काल मीच लागै नहीं, मिल रहिये ता मांहि ॥ 26 ॥
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श्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16
एक देश हम देखिया, जहाँ ऋतु नहीं पलटै कोइ ।
हम दादू उस देश के, जहाँ सदा एक रस होइ ॥ 27 ॥
एक देश हम देखिया, जहाँ बस्ती ऊजड़ नाहिं ।
हम दादू उस देश के, सहज रूप ता मांहि ॥ 28 ॥
एक देश हम देखिया, नहिं नेड़े नहिं दूर ।
हम दादू उस देश के, रहे निरंतर पूर ॥ 29 ॥
एक देश हम देखिया, जहाँ निशदिन नाहीं घाम ।
हम दादू उस देश के, जहाँ निकट निरंजन राम ॥ 30 ॥
बारहमासी नीपजै, तहाँ किया परवेश ।
दादू सूखा ना पड़े, हम आये उस देश ॥ 31 ॥
जहाँ वेद कुरान की गम नहीं, तहाँ किया परवेश ।
तहँ कछु अचरज देखिया, यहु कुछ औरै देश ॥ 32 ॥
भ्रम विध्वंस
ना घर रह्या न वन गया, ना कुछ किया क्लेश ।
दादू मन ही मन मिल्या, सतगुरु के उपदेश ॥ 33 ॥
काहे दादू घर रहै, काहे वन-खंड जाइ ।
घर वन रहिता राम है, ताही सौं ल्यौ लाइ ॥ 34 ॥
दादू जिन प्राणी कर जानिया, घर वन एक समान ।
घर मांही वन ज्यों रहै, सोई साधु सुजान ॥ 35 ॥
सब जग मांही एकला, देह निरंतर वास ।
दादू कारण राम के, घर वन मांहि उदास ॥ 36 ॥
घर वन मांही सुख नहीं, सुख है सांई पास ।
दादू तासौं मन मिल्या, इनतैं भया उदास ॥ 37 ॥
ना घर भला न वन भला, जहाँ नहीं निज नांव ।
दादू उनमन मन रहै, भला तो सोई ठांव ॥ 38 ॥
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श्री दादूवाणी–मध्य का अंग 16
बैरागी वन में बसै, घरबारी घर मांहि।
राम निराला रह गया, दादू इनमें नांहि ॥ 39 ॥
दीन दुनी सदिकै करूं, टुक देखण दे दीदार।
तन मन भी छिन छिन करूं, भिश्त दोजग भी वार ॥ 40 ॥
दादू जीवन मरण का, मुझ पछतावा नांहि।
मुझ पछतावा पीव का, रह्या न नैनहुँ मांहि ॥ 41 ॥
स्वर्ग नरक संशय नहीं, जीवन मरण भय नांहि।
राम विमुख जे दिन गये, सो सालैं मन मांहि ॥ 42 ॥
स्वर्ग नरक सुख दुख तजे, जीवन मरण नशाइ।
दादू लोभी राम का, को आवै को जाइ ॥ 43 ॥
मध्य निष्पक्ष
दादू हिन्दू तुरक न होइबा, साहिब सेती काम।
षट् दर्शन के संग न जाइबा, निर्पख कहबा राम ॥ 44 ॥
षट् दर्शन दोन्यों नहीं, निरालंब निज बाट।
दादू एकै आसरे, लंघे औघट घाट ॥ 45 ॥
दादू ना हम हिन्दू होहिंगे, ना हम मुसलमान।
षट् दर्शन में हम नहीं, हम राते रहमान ॥ 46 ॥
जोगी जंगम सेवड़े, बौद्ध सन्यासी शेख।
षट् दर्शन दादू राम बिन, सबै कपट के भेख ॥ 47 ॥
दादू अल्लाह राम का, द्वै पख तैं न्यारा।
रहिता गुण आकार का, सो गुरु हमारा ॥ 48 ॥
उभय असमाव
दादू मेरा तेरा बावरे, मैं तैं की तज बान।
जिन यहु सब कुछ सिरजिया, करता ही का जान ॥ 49 ॥
- 201 -
श्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16
दादू करणी हिन्दू तुरक की, अपनी अपनी ठौर ।
दुहुं बिच मारग साधु का, यहु संतों की रह और ॥ 50 ॥
दादू हिन्दू तुरक का, द्वै पख पंथ निवार ।
संगति साचे साधु की, सांई को संभार ॥ 51 ॥
दादू हिन्दू लागे देहुरे, मुसलमान मसीति ।
हम लागे एक अलेख सौं, सदा निरंतर प्रीति ॥ 52 ॥
न तहाँ हिन्दू देवरा, न तहाँ तुरक मसीति ।
दादू आपै आप है, नहीं तहाँ रह रीति ॥ 53 ॥
यहु मसीत यहु देहुरा, सतगुरु दिया दिखाइ ।
भीतर सेवा बन्दगी, बाहिर काहे जाइ ॥ 54 ॥
दोनों हाथी ह्वै रहे, मिल रस पिया न जाइ ।
दादू आपा मेट कर, दोनों रहें समाइ ॥ 55 ॥
भयभीत भयानक ह्वै रहे, देख्या निर्पख अंग ।
दादू एकै ले रह्या, दूजा चढै न रंग ॥ 56 ॥
जानै बूझै साच है, सबको देखन धाइ ।
चाल नहीं संसार की, दादू गह्या न जाइ ॥ 57 ॥
दादू पख काहू के ना मिले, निर्पख निर्मल नांव ।
सांई सौं सन्मुख सदा, मुक्ता सब ही ठांव ॥ 58 ॥
दादू जब तैं हम निर्पख भये, सबै रिसाने लोक।
सतगुरु के परसाद तैं, मेरे हर्ष न शोक ॥ 59 ॥
निर्पख ह्वै कर पख गहै, नरक पड़ैगा सोइ ।
हम निर्पख लागे नाम सौं, कर्त्ता करै सो होइ ॥ 60 ॥
हरि भरोसा
दादू पख काहू के ना मिलैं, निष्कामी निर्पख साध ।
एक भरोसे राम के, खेलैं खेल अगाध ॥ 61 ॥
- 202 -
श्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16
मध्य
दादू पखा पखी संसार सब, निर्पख विरला कोइ ।
सोई निर्पख होइगा, जाके नाम निरंजन होइ ॥ 62 ॥
अपने अपने पंथ की, सब को कहै बढाइ ।
तातैं दादू एक सौं, अन्तरगति ल्यौ लाइ ॥ 63 ॥
दादू द्वै पख दूर कर, निर्पख निर्मल नांव ।
आपा मेटै हरि भजै, ताकी मैं बलि जांव ॥ 64 ॥
संजीवन
दादू तज संसार सब, रहै निराला होइ ।
अविनाशी के आसरे, काल न लागै कोइ ॥ 65 ॥
मत्सर ईर्ष्या
कलियुग कूकर कलमुँहा, उठ-उठ लागै धाइ ।
दादू क्यों करि छूटिये, कलियुग बड़ी बलाइ ॥ 66 ॥
संसार का त्याग
काला मुँह संसार का, नीले कीये पाँव ।
दादू तीन तलाक दे, भावै तीधर जाव ॥ 67 ॥
दादू भावहीन जे पृथ्वी, दया विहूणा देश ।
भक्ति नहीं भगवंत की, तहँ कैसा प्रवेश ॥ 68 ॥
जे बोलैं तो चुप कहैं, चुप तो कहैं पुकार ।
दादू क्यों कर छूटिये, ऐसा है संसार ॥ 69 ॥
न जाणूं, हाँजी, चुप गहि, मेट अग्नि की झाल ।
सदा सजीवन सुमिरिये, दादू बंचै काल ॥ 70 ॥
पंथ चलैं ते प्राणिया, तेता कुल व्यवहार ।
निर्पख साधु सो सही, जिनके एक अधार ॥ 71 ॥
दादू पंथों पड़ गये, बपुरे बारह बाट ।
इनके संग न जाइये, उलटा अविगत घाट ॥ 72 ॥
- 203 -
श्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16
आशय विश्राम
दादू जागे को आया कहैं, सूते को कहैं जाइ ।
आवन जाना झूठ है, जहाँ का तहाँ समाइ ॥ 73 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
सोलहवां मध्य का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 16 ॥ साखी 73 ॥
- 204 -
सारग्राही
का
अंग
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अथ सारग्राही का अंग १७
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।।
दादू साधु गुण गहै, औगुण तजै विकार ।
मानसरोवर हंस ज्यूं, छाड़ि नीर, गहि सार ।। 2 ।।
हंस गियानी सो भला, अन्तर राखे एक।
विष में अमृत काढ ले, दादू बड़ा विवेक ।। 3 ।।
पहली न्यारा मन करै, पीछे सहज शरीर ।
दादू हंस विचार सौं, न्यारा किया नीर ।। 4 ।।
- 205 -
श्री दादूवाणी-सारग्राही का अंग 17
आपै आप प्रकाशिया, निर्मल ज्ञान अनन्त ।
क्षीर नीर न्यारा किया, दादू भज भगवंत ॥ 5 ॥
क्षीर नीर का संत जन, न्याव नबेरैं आइ ।
दादू साधु हंस बिन, भेल सभेले जाइ ॥ 6 ॥
दादू मन हंसा मोती चुणै, कंकर दिया डार ।
सतगुरु कह समझाइया, पाया भेद विचार ॥ 7 ॥
दादू हंस मोती चुणै, मानसरोवर जाइ ।
बगुला छीलर बापुड़ा, चुण चुण मछली खाइ ॥ 8 ॥
दादू हंस मोती चुगैं, मानसरोवर न्हाइ ।
फिर फिर बैसैं बापुड़ा, काग करंकां आइ ॥ 9 ॥
दादू हंस परखिये, उत्तम करणी चाल ।
बगुला बैसे ध्यान धर, प्रत्यक्ष कहिये काल ॥ 10 ॥
उज्ज्वल करणी हंस है, मैली करणी काग ।
मध्यम करणी छाड़ि सब, दादू उत्तम भाग ॥ 11 ॥
दादू निर्मल करणी साधु की, मैली सब संसार ।
मैली मध्यम ह्वै गये, निर्मल सिरजनहार ॥ 12 ॥
दादू करणी ऊपर जाति है, दूजा सोच निवार ।
मैली मध्यम ह्वै गये, उज्ज्वल ऊँच विचार ॥ 13 ॥
उज्ज्वल करणी राम है, दादू दूजा धंध ।
का कहिये समझै नहीं, चारों लोचन अंध ॥ 14 ॥
दादू गऊ बच्छ का ज्ञान गहि, दूध रहै ल्यौ लाइ ।
सींग पूंछ पग परिहरै, स्तन हि लागै धाइ ॥ 15 ॥
दादू काम गाय के दूध सौं, हाड़ चाम सौं नांहि ।
इहिं विधि अमृत पीजिये, साधु के मुख मांहि ॥ 16 ॥
- 206 -
श्री दादूवाणी-सारग्राही का अंग 17
स्मरण नाम
दादू काम धणी के नाम सौं, लोगन सौं कुछ नाहिं।
लोगन सौं मन ऊपली, मन की मन ही मांहि ॥ 17 ॥
जाके हिरदै जैसी होइगी, सो तैसी ले जाइ।
दादू तू निर्दोष रह, नाम निरंतर गाइ ॥ 18 ॥
दादू साध सबै कर देखना, असाध न दीसै कोइ।
जिहिं के हिरदै हरि नहीं, तिहिं तन टोटा होइ ॥ 19 ॥
साधू संगति पाइये, तब द्वन्द्वर दूर नशाइ।
दादू बोहिथ बैस करि, डूँडे निकट न जाइ ॥ 20 ॥
जब परम पदार्थ पाइये, तब कंकर दिया डार।
दादू साचा सो मिले, तब कूड़ा काज निवार ॥ 21 ॥
जब जीवन-मूरी पाइये, तब मरबा कौन बिसाहि।
दादू अमृत छाड़ कर, कौन हलाहल खाहि ॥ 22 ॥
जब मानसरोवर पाइये, तब छीलर को छिटकाइ।
दादू हंसा हरि मिले, तब कागा गये बिलाइ ॥ 23 ॥
जहँ दिनकर तहँ निशि नहीं, निशि तहँ दिनकर नाहिं।
दादू ऐकै द्वै नहीं, साधुन के मत मांहि ॥ 24 ॥
दादू ऐकै घोड़े चढ चलै, दूजा कोतिल होइ।
दुहुँ घोड़ों चढ बैसतां, पार न पहुंता कोइ ॥ 25 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
सत्रहवां सारग्राही का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 17 ॥ साखी 25 ॥
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विचार
का
अंग
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अथ विचार का अंग १८
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ।। 1 ।।
ज्ञान परिचय
दादू जल में गगन, गगन में जल है, पुनि वै गगन निरालं ।
ब्रह्म जीव इहिं विधि रहै, ऐसा भेद विचारं ।। 2 ।।
ज्यों दर्पण में मुख देखिये, पानी में प्रतिबिम्ब ।
ऐसे आत्मराम है, दादू सब ही संग ।। 3 ।।
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श्री दादूवाणी-विचार का अंग 18
सांच
जब दर्पण मांहि देखिये, तब अपना सूझै आप।
दर्पण बिन सूझै नहीं, दादू पुन्य रु पाप ॥ 4 ॥
ज्ञान परिचय
जीयें तेल तिलनि में, जीयें गंध फूलनि।
जीयें माखणु खीर में, ईयें रब्ब रूहनि ॥ 5 ॥
ईयें रब्ब रूहनि में, जीयें रूह रगनि।
जीयें जेरो सूर मां, ठंडो चन्द्र बसंनि ॥ 6 ॥
दादू जिन यहु दिल मंदिर किया, दिल मंदिर में सोइ।
दिल मांही दिलदार है, और न दूजा कोइ ॥ 7 ॥
मीत तुम्हारा तुम्ह कनै, तुम ही लेहु पिछान।
दादू दूर न देखिये, प्रतिबिम्ब ज्यों जान ॥ 8 ॥
विरक्तता
दादू नाल कमल जल ऊपजै, क्यों जुदा जल मांहि?
चंद हि हित चित प्रीतड़ी, यो जल सेती नांहि ॥ 9 ॥
दादू एक विचार सौं, सब तैं न्यारा होइ।
मांहि है पर मन नहीं, सहज निरंजन सोइ ॥ 10 ॥
दादू गुण निर्गुण मन मिल रह्या, क्यों बेगर ह्वै जाहि।
जहँ मन नांही सो नहीं, जहाँ मन चेतन सो आहि ॥ 11 ॥
विचार
दादू सबही व्याधि की, औषधि एक विचार।
समझे तैं सुख पाइये, कोइ कुछ कहो गँवार ॥ 12 ॥
दादू इक निर्गुण इक गुणमयी, सब घट ये द्वै ज्ञान।
काया का माया मिले, आतम ब्रह्म समान ॥ 13 ॥
दादू कोटि अचारिन एक विचारी, तऊ न सरभर होइ।
आचारी सब जग भव्या, विचारी विरला कोइ ॥ 14 ॥
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श्री दादूवाणी-विचार का अंग 18
दादू घट में सुख आनन्द है, तब सब ठाहर होइ ।
घट में सुख आनन्द बिन, सुखी न देख्या कोइ ॥ 15 ॥
विरक्तता
काया लोक अनन्त सब, घट में भारी भीर ।
जहाँ जाइ तहाँ संग सब, दरिया पैली तीर ॥ 16 ॥
काया माया ह्वै रही, जोधा बहु बलवंत ।
दादू दुस्तर क्यों तिरै, काया लोक अनंत ॥ 17 ॥
मोटी माया तज गये, सूक्ष्म लिये जाइ ।
दादू को छूटै नहीं, माया बड़ी बलाइ ॥ 18 ॥
दादू सूक्ष्म मांहिले, तिनका कीजे त्याग ।
सब तज राता राम सौं, दादू यहु वैराग ॥ 19 ॥
गुणातीत सो दर्शनी, आपा धरै उठाइ ।
दादू निर्गुण राम गहि, डोरी लागा जाइ ॥ 20 ॥
पिंड मुक्ति सब को करै, प्राण मुक्ति नहीं होइ ।
प्राण मुक्ति सतगुरु करै, दादू विरला कोइ ॥ 21 ॥
शिष्य जिज्ञासा
दादू क्षुधा तृषा क्यों भूलिये, शीत तम क्यों जाइ ?
क्यों सब छूटैं देह गुण ? सतगुरु कहि समझाइ ॥ 22 ॥
उत्तर
मांही थैं मन काढ कर, ले राखै निज ठौर ।
दादू भूलै देह गुण, बिसर जाइ सब और ॥ 23 ॥
नाम भुलावै देह गुण, जीव दशा सब जाइ ।
दादू छाड़ै नाम को, तो फिर लागै आइ ॥ 24 ॥
दादू दिन दिन राता राम सौं, दिन दिन अधिक स्नेह ।
दिन दिन पीवै रामरस, दिन दिन दर्पण देह ॥ 25 ॥
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