सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-साधु का अंग 15
संगति कुसंगति फल
दादू असाधु मिलै अन्तर पड़ै, भाव भक्ति रस जाइ।
साधु मिलै सुख ऊपजै, आनन्द अंग न माइ ॥ 68 ॥
दादू साधु संगति पाइये, राम अमीफल होइ।
संसारी संगति पाइये, विषफल देवै सोइ ॥ 69 ॥
दादू सभा संत की, सुमति उपजै आइ।
शाक्त की सभा बैसतां, ज्ञान काया तैं जाइ ॥ 70 ॥
जग जन विपरीत
दादू सब जग दीसै एकला, सेवक स्वामी दोइ।
जगत दुहागी राम बिन, साधु सुहागी सोइ ॥ 71 ॥
दादू साधु जन सुखिया भये, दुनिया को बहु द्वन्द्व।
दुनी दुखी हम देखतां, साधुन सदा आनन्द ॥ 72 ॥
दादू देखत हम सुखी, सांई के संग लाग।
यों सो सुखिया होयगा, जाके पूरे भाग ॥ 73 ॥
दादू मीठा पीवै राम रस, सो भी मीठा होइ।
सहजैं कड़वा मिट गया, दादू निर्विष सोइ ॥ 74 ॥
साध पारख लक्षण
दादू अन्तर एक अनंत सौं, सदा निरंतर प्रीत।
जिहिं प्राणी प्रीतम बसै, सो बैठा त्रिभुवन जीत ॥ 75 ॥
साधु महिमा महात्म
दादू मैं दासी तिहिं दास की, जिहिं संगि खेलै पीव।
बहुत भाँति कर वारणे, तापर दीजे जीव ॥ 76 ॥
भ्रम विध्वंसण
दादू लीला राजा राम की, खेलैं सब ही संत।
आपा पर एकै भया, छूटी सबै भरंत ॥ 77 ॥
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