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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 504 में से

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पृष्ठ 194

श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15
साधु परमार्था
को साधु जन उस देश का, आया इहि संसार।
दादू उसको पूछिये, प्रीतम के समाचार ॥ 100 ॥
दादू दत्त दरबार का, को साधु बांटै आइ।
तहाँ राम रस पाइये, जहाँ साधु तहँ जाइ ॥ 101 ॥
चौंप चरचा
दादू श्रोता स्नेही राम का, सो मुझ मिलवहु आणि।
तिस आगे हरि गुण कथूं, सुणत न करई काणि ॥ 102 ॥
साधु परमार्था
दादू सब ही मृतक समान हैं, जीया तब ही जाण।
दादू छांटा अमी का, को साधु बाहे आण ॥ 103 ॥
सबही मृतक ह्वै रहे, जीवैं कौन उपाइ।
दादू अमृत रामरस, को साधू सींचे आइ ॥ 104 ॥
सब ही मृतक देखिये, क्यों कर जीवैं सोइ।
दादू साधु प्रेम रस, आणि पिलावे कोइ ॥ 105 ॥
सब ही मृतक देखिये, किहिं विधि जीवैं जीव।
साधु सुधारस आणि करि, दादू बरसे पीव ॥ 106 ॥
हरि जल बरसै बाहिरा, सूखे काया खेत।
दादू हरिया होइगा, सींचणहार सुचेत ॥ 107 ॥
कुसंगति
गंगा यमुना सरस्वती, मिलैं जब सागर मांहि।
खारा पानी ह्वै गया, दादू मीठा नांहि ॥ 108 ॥
दादू राम न छाड़िये, गहिला तज संसार।
साधु संगति शोध ले, कुसंगति संग निवार ॥ 109 ॥
दादू कुसंगति सब परिहरै, मात पिता कुल कोइ।
सजन स्नेही बांधवा, भावै आपा होइ ॥ 110 ॥

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