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सर्वकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 504 में से

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पृष्ठ 209

श्री दादूवाणी-विचार का अंग 18
सांच
जब दर्पण मांहि देखिये, तब अपना सूझै आप।
दर्पण बिन सूझै नहीं, दादू पुन्य रु पाप ॥ 4 ॥
ज्ञान परिचय
जीयें तेल तिलनि में, जीयें गंध फूलनि।
जीयें माखणु खीर में, ईयें रब्ब रूहनि ॥ 5 ॥
ईयें रब्ब रूहनि में, जीयें रूह रगनि।
जीयें जेरो सूर मां, ठंडो चन्द्र बसंनि ॥ 6 ॥
दादू जिन यहु दिल मंदिर किया, दिल मंदिर में सोइ।
दिल मांही दिलदार है, और न दूजा कोइ ॥ 7 ॥
मीत तुम्हारा तुम्ह कनै, तुम ही लेहु पिछान।
दादू दूर न देखिये, प्रतिबिम्ब ज्यों जान ॥ 8 ॥
विरक्तता
दादू नाल कमल जल ऊपजै, क्यों जुदा जल मांहि?
चंद हि हित चित प्रीतड़ी, यो जल सेती नांहि ॥ 9 ॥
दादू एक विचार सौं, सब तैं न्यारा होइ।
मांहि है पर मन नहीं, सहज निरंजन सोइ ॥ 10 ॥
दादू गुण निर्गुण मन मिल रह्या, क्यों बेगर ह्वै जाहि।
जहँ मन नांही सो नहीं, जहाँ मन चेतन सो आहि ॥ 11 ॥
विचार
दादू सबही व्याधि की, औषधि एक विचार।
समझे तैं सुख पाइये, कोइ कुछ कहो गँवार ॥ 12 ॥
दादू इक निर्गुण इक गुणमयी, सब घट ये द्वै ज्ञान।
काया का माया मिले, आतम ब्रह्म समान ॥ 13 ॥
दादू कोटि अचारिन एक विचारी, तऊ न सरभर होइ।
आचारी सब जग भव्या, विचारी विरला कोइ ॥ 14 ॥

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