सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-साधु का अंग 15
समाचार सत पीव का, कोइ साधु कहेगा आइ ।
दादू शीतल आत्मा, सुख में रहे समाइ ॥ 89 ॥
साधु शब्द सुख वर्षहि, शीतल होइ शरीर ।
दादू अन्तर आत्मा, पीवे हरि जल नीर ॥ 90 ॥
साधु लक्षण
साधु सदा संयम रहै, मैला कदे न होइ ।
दादू पंक परसै नहीं, कर्म न लागै कोइ ॥ 91 ॥
साध सदा संयम रहै, मैला कदे न होइ ।
शून्य सरोवर हंसला, दादू विरला कोइ ॥ 92 ॥
साहिब का उनहार सब, सेवक मांही होइ ।
दादू सेवक साधु को, दूजा नांही कोइ ॥ 93 ॥
दादू जब लग नैन न देखिये, साध कहैं ते अंग ।
तब लग क्यों कर मानिये, साहिब का प्रसंग ॥ 94 ॥
दादू सोइ जन साधु सिद्ध सो, सोइ सकल सिरमौर ।
जिहिं के हिरदै हरि बसै, दूजा नाहीं और ॥ 95 ॥
दादू अवगुण छाड़ै गुण गहै, सोई शिरोमणि साध ।
गुण औगुण तैं रहित है, सो निज ब्रह्म अगाध ॥ 96 ॥
जग जन विपरीत
दादू सैन्धव फटिक पाषाण का, ऊपर एकै रंग ।
पानी मांहीं देखिये, न्यारा न्यारा अंग ॥ 97 ॥
दादू सैंधव के आपा नहीं, नीर खीर परसंग ।
आपा फटिक पाषाण के, मिलै न जल के संग ॥ 98 ॥
दादू सब जग फटिक पाषाण है, साधु सैंधव होइ ।
सैंधव एकै ह्वै रह्या, पानी पत्थर दोइ ॥ 99 ॥
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