सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16
एक देश हम देखिया, जहाँ ऋतु नहीं पलटै कोइ ।
हम दादू उस देश के, जहाँ सदा एक रस होइ ॥ 27 ॥
एक देश हम देखिया, जहाँ बस्ती ऊजड़ नाहिं ।
हम दादू उस देश के, सहज रूप ता मांहि ॥ 28 ॥
एक देश हम देखिया, नहिं नेड़े नहिं दूर ।
हम दादू उस देश के, रहे निरंतर पूर ॥ 29 ॥
एक देश हम देखिया, जहाँ निशदिन नाहीं घाम ।
हम दादू उस देश के, जहाँ निकट निरंजन राम ॥ 30 ॥
बारहमासी नीपजै, तहाँ किया परवेश ।
दादू सूखा ना पड़े, हम आये उस देश ॥ 31 ॥
जहाँ वेद कुरान की गम नहीं, तहाँ किया परवेश ।
तहँ कछु अचरज देखिया, यहु कुछ औरै देश ॥ 32 ॥
भ्रम विध्वंस
ना घर रह्या न वन गया, ना कुछ किया क्लेश ।
दादू मन ही मन मिल्या, सतगुरु के उपदेश ॥ 33 ॥
काहे दादू घर रहै, काहे वन-खंड जाइ ।
घर वन रहिता राम है, ताही सौं ल्यौ लाइ ॥ 34 ॥
दादू जिन प्राणी कर जानिया, घर वन एक समान ।
घर मांही वन ज्यों रहै, सोई साधु सुजान ॥ 35 ॥
सब जग मांही एकला, देह निरंतर वास ।
दादू कारण राम के, घर वन मांहि उदास ॥ 36 ॥
घर वन मांही सुख नहीं, सुख है सांई पास ।
दादू तासौं मन मिल्या, इनतैं भया उदास ॥ 37 ॥
ना घर भला न वन भला, जहाँ नहीं निज नांव ।
दादू उनमन मन रहै, भला तो सोई ठांव ॥ 38 ॥
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