सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16
सुख दुख मन मानै नहीं, राम रंग राता।
दादू दोनों छाड़ि सब, प्रेम रस माता ॥ 4 ॥
मति मोटी उस साधु की, द्वै पख रहित समान।
दादू आपा मेट कर, सेवा करै सुजान ॥ 5 ॥
कछु न कहावै आपको, काहू संग न जाइ।
दादू निरपख है रहै, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥ 6 ॥
सुख दुख मन मानै नहीं, आपा पर सम भाइ।
सो मन ! मन कर सेविये, सब पूरण ल्यौ लाइ ॥ 7 ॥
ना हम छाडैं ना गहैं, ऐसा ज्ञान विचार।
मध्य भाव सेवैं सदा, दादू मुक्ति द्वार ॥ 8 ॥
सहज शून्य मन राखिये, इन दोनों के मांहि।
लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥ 9 ॥
आपा मेटै मृत्तिका, आपा धरै आकास।
दादू जहाँ जहाँ द्वै नहीं, मध्य निरंतर वास ॥ 10 ॥
ध्येय परम स्थान निरूपण
नहिं मृतक नहिं जीवता, नहिं आवै नहिं जाइ।
नहिं सूता नहि जागता, नहिं भूखा नहिं खाइ ॥ 11 ॥
दादू इस आकार तैं, दूजा सूक्ष्म लोक।
तातैं आगे और है, तहँ वहाँ हर्ष न शोक ॥ 12 ॥
दादू हद छाड़ बेहद में, निर्भय निर्पख होइ।
लाग रहै उस एक सौं, जहाँ न दूजा कोइ ॥ 13 ॥
दादू दूजे अन्तर होत है, जनि आणै मन मांहि।
तहँ ले मन को राखिये, जहाँ कुछ दूजा नांहि ॥ 14 ॥
निराधार घर कीजिये, जहाँ नांहि धरणि आकास।
दादू निश्चल मन रहै, निर्गुण के विश्वास ॥ 15 ॥
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