सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-सारग्राही का अंग 17
स्मरण नाम
दादू काम धणी के नाम सौं, लोगन सौं कुछ नाहिं।
लोगन सौं मन ऊपली, मन की मन ही मांहि ॥ 17 ॥
जाके हिरदै जैसी होइगी, सो तैसी ले जाइ।
दादू तू निर्दोष रह, नाम निरंतर गाइ ॥ 18 ॥
दादू साध सबै कर देखना, असाध न दीसै कोइ।
जिहिं के हिरदै हरि नहीं, तिहिं तन टोटा होइ ॥ 19 ॥
साधू संगति पाइये, तब द्वन्द्वर दूर नशाइ।
दादू बोहिथ बैस करि, डूँडे निकट न जाइ ॥ 20 ॥
जब परम पदार्थ पाइये, तब कंकर दिया डार।
दादू साचा सो मिले, तब कूड़ा काज निवार ॥ 21 ॥
जब जीवन-मूरी पाइये, तब मरबा कौन बिसाहि।
दादू अमृत छाड़ कर, कौन हलाहल खाहि ॥ 22 ॥
जब मानसरोवर पाइये, तब छीलर को छिटकाइ।
दादू हंसा हरि मिले, तब कागा गये बिलाइ ॥ 23 ॥
जहँ दिनकर तहँ निशि नहीं, निशि तहँ दिनकर नाहिं।
दादू ऐकै द्वै नहीं, साधुन के मत मांहि ॥ 24 ॥
दादू ऐकै घोड़े चढ चलै, दूजा कोतिल होइ।
दुहुँ घोड़ों चढ बैसतां, पार न पहुंता कोइ ॥ 25 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
सत्रहवां सारग्राही का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 17 ॥ साखी 25 ॥
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