सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-विचार का अंग 18
दादू घट में सुख आनन्द है, तब सब ठाहर होइ ।
घट में सुख आनन्द बिन, सुखी न देख्या कोइ ॥ 15 ॥
विरक्तता
काया लोक अनन्त सब, घट में भारी भीर ।
जहाँ जाइ तहाँ संग सब, दरिया पैली तीर ॥ 16 ॥
काया माया ह्वै रही, जोधा बहु बलवंत ।
दादू दुस्तर क्यों तिरै, काया लोक अनंत ॥ 17 ॥
मोटी माया तज गये, सूक्ष्म लिये जाइ ।
दादू को छूटै नहीं, माया बड़ी बलाइ ॥ 18 ॥
दादू सूक्ष्म मांहिले, तिनका कीजे त्याग ।
सब तज राता राम सौं, दादू यहु वैराग ॥ 19 ॥
गुणातीत सो दर्शनी, आपा धरै उठाइ ।
दादू निर्गुण राम गहि, डोरी लागा जाइ ॥ 20 ॥
पिंड मुक्ति सब को करै, प्राण मुक्ति नहीं होइ ।
प्राण मुक्ति सतगुरु करै, दादू विरला कोइ ॥ 21 ॥
शिष्य जिज्ञासा
दादू क्षुधा तृषा क्यों भूलिये, शीत तम क्यों जाइ ?
क्यों सब छूटैं देह गुण ? सतगुरु कहि समझाइ ॥ 22 ॥
उत्तर
मांही थैं मन काढ कर, ले राखै निज ठौर ।
दादू भूलै देह गुण, बिसर जाइ सब और ॥ 23 ॥
नाम भुलावै देह गुण, जीव दशा सब जाइ ।
दादू छाड़ै नाम को, तो फिर लागै आइ ॥ 24 ॥
दादू दिन दिन राता राम सौं, दिन दिन अधिक स्नेह ।
दिन दिन पीवै रामरस, दिन दिन दर्पण देह ॥ 25 ॥
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