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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 504 में से

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पृष्ठ 192

श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15
जग जन विपरीत
दादू आनंद सदा अडोल सौं, राम सनेही साध ।
प्रेमी प्रीतम को मिले, यहु सुख अगम अगाध ॥ 78 ॥
पुरुष प्रकाशिक
यहु घट दीपक साध का, ब्रह्म ज्योति प्रकाश ।
दादू पंखी संतजन, तहाँ परैं निज दास ॥ 79 ॥
घर वन मांहीं राखिये, दीपक ज्योति जगाइ ।
दादू प्राण पतंग सब, जहँ दीपक तहँ जाइ ॥ 80 ॥
घर वन मांहीं राखिये, दीपक जलता होइ ।
दादू प्राण पतंग सब, आइ मिलैं सब कोइ ॥ 81 ॥
घर वन मांहीं राखिये, दीपक प्रकट प्रकाश ।
दादू प्राण पतंग सब, आइ मिलैं उस पास ॥ 82 ॥
घर वन मांही राखिये, दीपक ज्योति सहेत ।
दादू प्राण पतंग सब, आइ मिलैं उस हेत ॥ 83 ॥
जिहिं घट प्रकट राम है, सो घट तज्या न जाइ ।
नैनहुँ मांही राखिये, दादू आप नशाइ ॥ 84 ॥
जिहिं घट दीपक राम का, तिहिं घट तिमिर न होइ ।
उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥ 85 ॥
साधु अबिहड़
कबहुँ न बिहड़ै सो भला, साधु दिढ मति होइ ।
दादू हीरा एक रस, बाँध गाँठड़ी सोइ ॥ 86 ॥
साधु पारख लक्षण
गरथ न बांधै गांठड़ी, नहीं नारी सौं नेह ।
मन इंद्री सुस्थिर करै, छाड़ सकल गुण देह ॥ 87 ॥
निराकार सौं मिल रहै, अखंड भक्ति कर लेह ।
दादू क्यों कर पाइये, उन चरणों की खेह ॥ 88 ॥

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