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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

अथ मन का अंग १०
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ॥ 1 ॥
दादू यहु मन बरजि बावरे, घट में राखि घेरि ।
मन हस्ती माता बहै, अंकुश दे दे फेरि ॥ 2 ॥
हस्ती छूटा मन फिरे, क्यों ही बँध्या न जाइ ।
बहुत महावत पच गये, दादू कछु न वशाइ ॥ 3 ॥
जहाँ थैं मन उठ चलै, फेरि तहाँ ही राखि ।
तहँ दादू लै लीन कर, साध कहैं गुरु साखि ॥ 4 ॥

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२. साखी भाग (मध्यम): माया-विवेक, मन, चित्त-शुद्धि, विश्वास व नाम-माहात्म्य

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
थोरे थोरे हठ किये, रहेगा ल्यौ लाइ।
जब लागा उनमनि सौं, तब मन कहीं न जाइ ॥ 5 ॥
आड़ा दे दे राम को, दादू राखै मन।
साखी दे सुस्थिर करै, सोई साधू जन ॥ 6 ॥
सोई शूर जे मन गहै, निमख न चलने देइ।
जब ही दादू पग भरै, तब ही पकड़ि लेइ ॥ 7 ॥
जेती लहर समंद की, ते ते मनहि मनोरथ मार।
वैसे सब संतोंष कर, गहि आत्म एक विचार ॥ 8 ॥
दादू जे मुख मांहीं बोलतां, श्रवणहुँ सुनतां आइ।
नैनहुँ माँहैं देखतां, सो अंतर उरझाइ ॥ 9 ॥
दादू चुम्बक देख कर, लोहा लागै आइ।
यों मन गुण इन्द्री एक सौं, दादू लीजै लाइ ॥ 10 ॥
मन का आसन जे जीव जानै, तौ ठौर ठौर सब सूझै।
पंचों आनि एक घर राखै, तब अगम निगम सब बूझै ॥ 11 ॥
बैठे सदा एक रस पीवै, निर्वैरी कत जूझै।
आत्माराम मिलै जब दादू, तब अंग न लागै दूजै ॥ 12 ॥
जब लग यहु मन थिर नहीं, तब लग परस न होइ।
दादू मनवा थिर भया, सहज मिलैगा सोइ ॥ 13 ॥
दादू बिन अवलम्बन क्यों रहै, मन चंचल चल जाइ।
सुस्थिर मनवा तो रहै, सुमिरण सेती लाइ ॥ 14 ॥
सतगुरु चरण शरण चलि जांहीं, नित प्रति रहिये तिनकी छांहीं।
मन स्थिर करि लीजै नाम, दादू कहै तहाँ ही राम ॥ 15 ॥
हरि सुमिरण सौं हेत कर, तब मन निश्चल होइ।
दादू बेध्या प्रेम रस, बीष न चालै सोइ ॥ 16 ॥

  • 131 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
जब अंतर उरझ्या एक सौं, तब थाके सकल उपाइ।
दादू निश्चल थिर भया, तब चलि कहीं न जाइ ॥ 17 ॥
दादू कौवा बोहित बैस कर, मंझि समंदाँ जाइ।
उड़ि उड़ि थाका देख तब, निश्चल बैठा आइ ॥ 18 ॥
यहु मन कागद की गुडी, उड़ी चढ़ी आकास।
दादू भीगे प्रेम जल, तब आइ रहे हम पास ॥ 19 ॥
दादू खीला गार का, निश्चल थिर न रहाइ।
दादू पग नहीं साँच के, भ्रमै दहदिशि जाइ ॥ 20 ॥
तब सुख आनन्द आत्मा, जे मन थिर मेरा होइ।
दादू निश्चल राम सौं, जे कर जाने कोइ ॥ 21 ॥
मन निर्मल थिर होत है, राम नाम आनंद।
दादू दर्शन पाइये, पूरण परमानन्द ॥ 22 ॥
विषय विरक्ति
दादू यों फूटे थैं सारा भया, संधे संधि मिलाइ।
बाहुड़ विषय न भूँचिये, तो कबहुँ फूट न जाइ ॥ 23 ॥
दादू यहु मन भूला सो गली, नरक जाणै के घाट।
अब मन अविगत नाथ सों, गुरु दिखाई बाट ॥ 24 ॥
दादू मन सुध साबित आपणा, निश्चल होवे हाथ।
तो इहाँ ही आनन्द है, सदा निरंजन साथ ॥ 25 ॥
जब मन लागै राम सौं, तब अनत काहे को जाइ।
दादू पानी लौन ज्यों, ऐसैं रहै समाइ ॥ 26 ॥
ज्यों जल पैसे दूध में, ज्यों पानी में लौन।
ऐसैं आत्माराम सौं, मन हठ साधै कौन ॥ 27 ॥
मन का मस्तक मूंडिये, काम क्रोध के केश।
दादू विषय विकार सब, सतगुरु के उपदेश ॥ 28 ॥

  • 132 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
करुणा
सो कुछ हम थैं ना भया, जा पर रीझे राम ।
दादू इस संसार में, हम आये बेकाम ॥ 29 ॥
क्या मुँह ले हँस बोलिये, दादू दीजे रोइ ।
जन्म अमोलक आपका, चले अकारथ खोइ ॥ 30 ॥
जा कारण जग जीजिये, सो पद हिरदै नाहिं।
दादू हरि की भक्ति बिना, ध्रिक् जीवन कलि मांहि ॥ 31 ॥
किया मन का भावता, मेटी आज्ञाकार ।
क्या ले मुख दिखलाइये, दादू उस भरतार ॥ 32 ॥
इन्द्री स्वारथ सब किया, मन माँगे सो दीन्ह ।
जा कारण जग सिरजिया, सो दादू कछु न कीन्ह ॥ 33 ॥
किया था इस काम कौं, सेवा कारण साज ।
दादू भूला बंदगी, सज्या न एकौ काज ॥ 34 ॥
दादू विषै विकार सौं, जब लग मन राता ।
तब लग चित्त न आवई, त्रिभुवनपति दाता ॥ 35 ॥
दादू का जाणूँ कब होइगा, हरि सुमिरण इकतार ।
का जाणूँ कब छाड़ि है, यह मन विषय विकार ॥ 36 ॥
मन प्रबोध
बादि हि जन्म गँवाइया, किया बहुत विकार ।
यहु मन सुस्थिर ना भया, जहाँ दादू निज सार ॥ 37 ॥
विषय अतृप्ति
दादू जनि विष पीवै बावरे, दिन दिन बाढै रोग ।
देखत ही मर जाइगा, तज विषया रस भोग ॥ 38 ॥
आपा पर सब दूर कर, राम नाम रस लाग ।
दादू औसर जात है, जाग सके तो जाग ॥ 39 ॥

  • 133 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
मन हरि भावनि
दादू सब कुछ विलसतां, खातां पीतां होइ।
दादू मन का भावता, कहि समझावै कोइ ॥ 40 ॥
दादू मन का भावता, मेरी कहै बलाइ।
साच राम का भावता, दादू कहै सुणि आइ ॥ 41 ॥
दादू ये सब मन का भावता, जे कुछ कीजै आन।
मन गहि राखै एक सौं, दादू साधु सुजान ॥ 42 ॥
जे कुछ भावै राम को, सो तत कह समझाइ।
दादू मन का भावता, सबको कहि बनाइ ॥ 43 ॥
चाणक उपदेश
पैंडे पग चालै नहीं, होइ रह्या गलियार।
राम रथ निबहै नहीं, खाबे को हुशियार ॥ 44 ॥
पर प्रबोध
दादू का परमोधै आन को, आपण बहिया जात।
औरों को अमृत कहै, आपण ही विष खात ॥ 45 ॥
दादू पंचों ये परमोध ले, इन्हीं को उपदेश।
यहु मन अपणा हाथ कर, तो चेला सब देश ॥ 46 ॥
दादू पंचों का मुख मूल है, मुख का मनवां होइ।
यहु मन राखै जतन कर, साधु कहावै सोइ ॥ 47 ॥
दादू जब लग मन के दोइ गुण, तब लग निपना नांहि।
द्वै गुण मन के मिट गये, तब निपनां मिल मांहि ॥ 48 ॥
काचा पाका जब लगै, तब लग अंतर होइ।
काचा पाका दूर कर, दादू एकै सोइ ॥ 49 ॥
मध्य निष्पक्ष
सहज रूप मन का भया, तब द्वै द्वै मिटी तरंग।
ताता शीला सम भया, तब दादू एकै अंग ॥ 50 ॥

  • 134 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10

मन
दादू बहुरूपी मन जब लगै, तब लग माया रंग।
जब मन लागा राम सौं, तब दादू एकै अंग ॥ 51 ॥
हीरा मन पर राखिये, तब दूजा चढै न रंग।
दादू यों मन थिर भया, अविनाशी के संग ॥ 52 ॥
सुख दुख सब झांई पड़ै, तब लग काचा मन।
दादू कुछ व्यापै नहीं, तब मन भया रतन ॥ 53 ॥
दादू पाका मन डोलै नहीं, निश्चल रहै समाइ।
काचा मन दह दिशि फिरै, चंचल चहुँ दिशि जाइ ॥ 54 ॥
विरक्तता
सीप सुधा रस ले रहै, पीवै न खारा नीर।
मांहैं मोती नीपजै, दादू बंद शरीर ॥ 55 ॥
मन
दादू मन पंगुल भया, सब गुण गये बिलाइ।
है काया नौ-जोबनी, मन बूढ़ा है जाइ ॥ 56 ॥
दादू कच्छप अपने कर लिये, मन इन्द्री निज ठौर।
नाम निरंजन लाग रहु, प्राणी परिहर और ॥ 57 ॥
जाचक
मन इन्द्री अंधा किया, घट में लहर उठाइ।
साँई सतगुरु छोड़ कर, देख दिवाना जाइ ॥ 58 ॥
दादू कहै राम बिना मन रंक है, जाचै तीनों लोक।
जब मन लागा राम सौं, तब भागे दालिद्र दोष ॥ 59 ॥
इन्द्री के आधीन मन, जीव जंत सब जाचै।
तिणे तिणे के आगे दादू, तिहुं लोक फिर नाचै ॥ 60 ॥
इंद्री अपने वश करै, सो काहे जाचन जाइ।
दादू सुस्थिर आत्मा, आसन बैसै आइ ॥ 61 ॥

  • 135 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
मन मनसा दोनों मिले, तब जीव किया भांड।
पंचों का फेन्या फिरै, माया नचावै रांड ॥ 62 ॥
दादू नकटी आगे नकटा नाचे, नकटी ताल बजावे।
नकटी आगे नकटा गावे, नकटी नकटा भावे ॥ 63 ॥
आन लगन व्यभिचार
पांचों इंद्री भूत हैं, मनवा क्षेत्रपाल।
मनसा देवी पूजिये, दादू तीनों काल ॥ 64 ॥
जीवत लूटै जगत सब, मृतक लूटैं देव।
दादू कहाँ पुकारिये, कर कर मूये सेव ॥ 65 ॥
मन
अग्नि धूम ज्यों नीकलै, देखत सबै बिलाइ।
त्यों मन बिछुटा राम सौं, दह दिश बीखर जाइ ॥ 66 ॥
घर छाड़े जब का गया, मन बहुरि न आया।
दादू अग्नि के धूम ज्यों, खुर खोज न पाया ॥ 67 ॥
सब काहू के होत हैं, तन मन पसरैं जाइ।
ऐसा कोई एक है, उलटा मांहिं समाइ ॥ 68 ॥
क्यों करि उलटा आनिये, पसर गया मन फेरि।
दादू डोरी सहज की, यों आनै घर घेरि ॥ 69 ॥
दादू साधु शब्द सौं मिलि रहै, मन राखै बिलमाइ।
साधु शब्द बिन क्यों रहै, तब ही बीखर जाइ ॥ 70 ॥
चंचल चहुँ दिशि जात है, गुरु बाइक सौं बंध।
दादू संगति साधु की, पारब्रह्म सौं संध ॥ 71 ॥
एक निरंजन नाम सौं, कै साधु संगति मांहि।
दादू मन बिलमाइये, दूजा कोई नांहि ॥ 72 ॥

  • 136 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
तन में मन आवै नहीं, निशदिन बाहर जाइ।
दादू मेरा जीव दुखी, रहै नहीं ल्यौ लाइ ॥ 73 ॥
तन में मन आवै नहीं, चंचल चहुँ दिशि जाइ।
दादू मेरा जीव दुखी, रहै न राम समाइ ॥ 74 ॥
कोटि यत्न कर कर मुये, यहु मन दह दिशि जाइ।
राम नाम रोक्या रहै, नाहीं आन उपाइ ॥ 75 ॥
यहु मन बहु बकबाद सौं, बाय भूत है जाइ।
दादू बहुत न बोलिये, सहजैं रहै समाइ ॥ 76 ॥
स्मरण नाम चितावणी
भूला भौंदू फेर मन, मूरख मुग्ध गँवार।
सुमिर सनेही आपणा, आतम का आधार ॥ 77 ॥
मन माणिक मूरख राखि रे, जण जण हाथ न देहु।
दादू पारिख जौंहरी, राम साधु दोइ लेहु ॥ 78 ॥
दादू माज्यां बिन मानै नहीं, यहु मन हरि की आन।
ज्ञान खड्ग गुरुदेव का, ता संग सदा सुजान ॥ 79 ॥
मन
मन मृगा मारै सदा, ताका मीठा मांस।
दादू खाइबे को हिल्या, तातैं आन उदास ॥ 80 ॥
कह्या हमारा मान मन, पापी परिहर काम।
विषयों का संग छाड़ दे, दादू कह रे राम ॥ 81 ॥
केता कहि समझाइया, मानै नहीं निलज्ज।
मूरख मन समझै नहीं, कीये काज अकज्ज ॥ 82 ॥
सांच
मन ही मंजन कीजिये, दादू दरपण देह।
मांहीं मूरति देखिये, इहि औसर कर लेह ॥ 83 ॥

  • 137 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
आन लगन-व्यभिचार
तब ही कारा होत है, हरि बिन चितवत आन ।
क्या कहिये समझै नहीं, दादू सिखवत ज्ञान ॥ 84 ॥
साच
दादू पाणी धोवैं बावरे, मन का मैल न जाइ ।
मन निर्मल तब होइगा, जब हरि के गुण गाइ ॥ 85 ॥
दादू ध्यान धरे क्या होत है, जो मन नहीं निर्मल होइ ।
तो बग सब ही उद्धरैं, जे इहि विधि सीझै कोइ ॥ 86 ॥
दादू ध्यान धरे क्या होत है, जे मन का मैल न जाइ ।
बग मीनी का ध्यान धर, पसू बिचारे खाइ ॥ 87 ॥
दादू काले थैं धोला भया, दिल दरिया में धोइ ।
मालिक सेती मिलि रह्या, सहजैं निर्मल होइ ॥ 88 ॥
दादू जिसका दर्पण ऊजला, सो दर्शन देखै मांहि ।
जिस की मैली आरसी, सो मुख देखै नांहि ॥ 89 ॥
दादू निर्मल शुद्ध मन, हरि रंग राता होइ ।
दादू कंचन कर लिया, काच कहै नहीं कोइ ॥ 90 ॥
यहु मन अपना थिर नहीं, कर नहीं जानै कोइ ।
दादू निर्मल देव की, सेवा क्यों कर होइ ॥ 91 ॥
दादू यहु मन तीनों लोक में, अरस परस सब होइ ।
देही की रक्षा करैं, हम जनि भीटै कोइ ॥ 92 ॥
दादू देह जतन कर राखिये, मन राख्या नहीं जाइ ।
उत्तम मध्यम वासना, भला बुरा सब खाइ ॥ 93 ॥
दादू हाडौं मुख भव्या, चाम रह्या लिपटाय ।
मांहीं जिभ्या मांस की, ताही सेती खाइ ॥ 94 ॥
दादू नौवों द्वारे नरक के, निशदिन बहै बलाइ ।
शुचि कहाँ लौं कीजिये, राम सुमरि गुण गाइ ॥ 95 ॥

  • 138 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
प्राणी तन मन मिल रह्या, इंद्री सकल विकार ।
दादू ब्रह्मा शूद्र धर, कहाँ रहै आचार ॥ 96 ॥
मन की चपलता
दादू जीवै पलक में, मरतां कल्प बिहाइ ।
दादू यहु मन मसखरा, जनि कोई पतियाइ ॥ 97 ॥
दादू मूवां मन हम जीवित देख्या, जैसे मरघट भूत ।
मूवां पीछे उठ उठ लागै, ऐसा मेरा पूत ॥ 98 ॥
निश्चल करतां जुग गये, चंचल तब ही होहि ।
दादू पसरै पलक में, यहु मन मारै मोहि ॥ 99 ॥
दादू यहु मन मींडका, जल सौं जीवै सोइ ।
दादू यहु मन रिंद है, जनि रु पतीजै कोइ ॥ 100 ॥
मांही सूक्ष्म है रहै, बाहरि पसारै अंग ।
पवन लाग पौढ़ा भया, काला नाग भुवंग ॥ 101 ॥
आशय विश्राम
सपना तब लग देखिये, जब लग चंचल होइ ।
जब निश्चल लागा नाम सौं, तब सपना नांही कोइ ॥ 102 ॥
जागत जहाँ जहाँ मन रहै, सोवत तहँ तहँ जाइ ।
दादू जे जे मन बसै, सोइ सोइ देखै आइ ॥ 103 ॥
दादू जे जे चित बसै, सोई सोई आवै चीति ।
बाहर भीतर देखिये, जाही सेती प्रीति ॥ 104 ॥
सावण हरिया देखिये, मन चित ध्यान लगाइ ।
दादू केते जुग गये, तो भी हऱ्या न जाइ ॥ 105 ॥
जिसकी सुरति जहाँ रहै, तिसका तहँ विश्राम ।
भावै माया मोह में, भावै आतम राम ॥ 106 ॥
जहाँ मन राखै जीवतां, मरतां तिस घर जाइ ।
दादू वासा प्राण का, जहाँ पहली रह्या समाइ ॥ 107 ॥

  • 139 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
जहाँ सुरति तहँ जीव है, जहाँ नांही तहँ नांहि।
गुण निर्गुण जहाँ राखिये, दादू घर वन मांहि ॥ 108 ॥
जहाँ सुरति तहँ जीव है, आदि अन्त इस्थान।
माया ब्रह्म जहाँ राखिये, दादू तहँ विश्राम ॥ 109 ॥
जहाँ सुरति तहँ जीव है, जीवन मरण जिस ठौर।
विष अमृत तहँ राखिये, दादू नाहीं और ॥ 110 ॥
जहाँ सुरति तहँ जीव है, जहाँ जाणै तहँ जाइ।
गम अगम जहाँ राखिये, दादू तहाँ समाइ ॥ 111 ॥
मन मनसा का भाव है, अन्त फलेगा सोइ।
जब दादू बाणक बण्या, तब आशय आसण होइ ॥ 112 ॥
जप तप करणी कर गये, स्वर्ग पहुँचे जाइ।
दादू मन की वासना, नरक पड़े फिर आइ ॥ 113 ॥
पाका काचा ह्वै गया, जीत्या हारे डाव।
अंत काल गाफिल भया, दादू फिसले पांव ॥ 114 ॥
दादू यहु मन पंगुल पंच दिन, सब काहू का होइ।
दादू उतर आकाश तैं, धरती आया सोइ ॥ 115 ॥
ऐसा कोई एक मन, मरै सो जीवै नाहिं।
दादू ऐसे बहुत हैं, फिर आवै कलि माहिं ॥ 116 ॥
देखा देखी सब चले, पार न पहुँच्या जाइ।
दादू आसन पहल के, फिर फिर बैठे आइ ॥ 117 ॥
जग जन विपरीत
बरतन एकै भांति सब, दादू संत असंत।
भिन्न भाव अन्तर घणां, मनसा तहाँ गच्छन्त ॥ 118 ॥
यहु मन मारै मोमिनां, यहु मन मारै मीर।
यहु मन मारै साधकाँ, यहु मन मारै पीर ॥ 119 ॥

  • 140 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
दादू मन मारे मुनिवर मुये, सुर नर किये संहार।
ब्रह्मा विष्णु महेश सब, राखै सिरजनहार ॥ 120 ॥
मन बाहे मुनिवर बड़े, ब्रह्मा विष्णु महेश।
सिद्ध साधक योगी यति, दादू देश विदेश ॥ 121 ॥
मनमुखी मान बड़ाई
पूजा मान बड़ाइयां, आदर मांगै मन।
राम गहै, सब परिहरै, सोई साधु जन ॥ 122 ॥
जहाँ जहाँ आदर पाइये, तहाँ तहाँ जीव जाइ।
बिनआदरदीजे राम रस, छाड़ि हलाहल खाइ ॥ 123 ॥
करणी बिना कथनी
करणी किरका को नहिं, कथनी अनंत अपार।
दादू यों क्यों पाइये, रे मन मूढ गँवार ॥ 124 ॥
जाया माया मोहनी
दादू मन मृतक भया, इंद्री अपने हाथ।
तो भी कदे न कीजिये, कनक कामिनी साथ ॥ 125 ॥
मन
अब मन निर्भय घर नहीं, भय में बैठा आइ।
निर्भय संग थैं बीछुट्या, तब कायर है जाइ ॥ 126 ॥
जब मन मृतक है रहे, इंद्री बल भागा।
काया के सब गुण तजे, निरंजन लागा ॥ 127 ॥
आदि अंत मधि एक रस, टूटे नहीं धागा।
दादू एकै रहि गया, तब जाणी जागा ॥ 128 ॥
दादू मन के शीश मुख, हस्त पांव है जीव।
श्रवण नेत्र रसना रटै, दादू पाया पीव ॥ 129 ॥
जहँ के नवाये सब नवैं, सोई सिर कर जाण।
जहँ के बुलाये बोलिये, सोई मुख परमाण ॥ 130 ॥

  • 141 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
जहाँ के सुणाये सब सुणैं, सोई श्रवण सयाण ।
जहाँ के दिखाये देखिये, सोई नैन सुजाण ॥ 131 ॥
दादू मन ही सौं मल ऊपजै, मन ही सौं मल धोइ ।
सीख चली गुरु साध की, तो तूँ निर्मल होइ ॥ 132 ॥
दादू मन ही माया ऊपजै, मन ही माया जाइ ।
मन ही राता राम सौं, मन ही रह्या समाइ ॥ 133 ॥
दादू मन ही मरणा ऊपजै, मन ही मरणा खाइ ।
मन अविनासी ह्वै रह्या, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥ 134 ॥
मन ही सन्मुख नूर है, मन ही सन्मुख तेज ।
मन ही सन्मुख ज्योति है, मन ही सन्मुख सेज ॥ 135 ॥
मन ही सौं मन थिर भया, मन ही सौं मन लाइ ।
मन ही सौं मन मिल रह्या, दादू अनत न जाइ ॥ 136 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
दसवां मन का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 10 ॥ साखी 136 ॥

  • 142 -

अथ सूक्ष्म जन्म का अंग ११
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
दादू चौरासी लख जीव की, प्रकृति घट मांहि।
अनेक जन्म दिन के करै, कोई जाणै नांहि ॥ 2 ॥
अनेक जन्म दिन के करै
दादू जेते गुण व्यापैं जीव को, ते ते ही अवतार।
आवागमन यहु दूर कर, समर्थ सिरजनहार ॥ 3 ॥

  • 143 -

श्री दादूवाणी-सूक्ष्म जन्म का अंग 11
सब गुण सब ही जीव के, दादू व्यापैं आइ।
घट मांहि जामैं मरै, कोइ न जाणै ताहि ॥ 4 ॥
जीव जन्म जाणै नहीं, पलक पलक में होइ।
चौरासी लख भोगवै, दादू लखै न कोइ ॥ 5 ॥
अनेक रूप दिन के करै, यहु मन आवै जाइ।
आवागमन मन का मिटै, तब दादू रहै समाइ ॥ 6 ॥
निशिवासर यहु मन चलै, सूक्ष्म जीव संहार।
दादू मन थिर कीजिये, आतम लेहु उबारि ॥ 7 ॥
कबहुँ पावक कबहुँ पाणी, धर अम्बर गुण बाइ।
कबहुँ कुंजर कबहुँ कीड़ी, नर पशुवा ह्वै जाइ ॥ 8 ॥
करणी बिना कथनी
शूकर स्वान सियाल सिंह, सर्प रहैं घट मांहि।
कुंजर कीड़ी जीव सब, पांडे जाणै नांहि ॥ 9 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
ग्यारहवां सूक्ष्म जन्म का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 11 ॥ साखी 9 ॥

  • 144 -

माया का अंग
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माया क अंग ११
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।।
साहिब है पर हम नहीं, सब जग आवै जाइ ।
दादू सपना देखिये, जागत गया बिलाइ ।। 2 ।।
दादू माया का सुख पंच दिन, गर्व्यों कहा गँवार ।
सपने पायो राज धन, जात न लागे बार ।। 3 ।।
दादू सपने सूता प्राणिया, किये भोग विलास ।
जागत झूठा ह्रै गया, ताकी कैसी आस ।। 4 ।।

  • 145 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12

यों माया का सुख मन करै, सेजां सुंदरी पास ।
अंत काल आया गया, दादू होहु उदास ॥ 5 ॥
जे नांही सो देखिये, सूता सपने माँहि ।
दादू झूठा है गया, जागे तो कुछ नांहि ॥ 6 ॥
यहु सब माया मृग जल, झूठा झिलमिल होइ ।
दादू चिलका देखि कर, सत कर जाना सोइ ॥ 7 ॥
झूठा झिलमिल मृग जल, पाणी कर लीया ।
दादू जग प्यासा मरै, पसु प्राणी पीया ॥ 8 ॥
पति पहचान
छलावा छल जायगा, सपना बाजी सोइ ।
दादू देख न भूलिये, यहु निज रूप न होइ ॥ 9 ॥
चितावणी
सपने सब कुछ देखिये, जागे तो कुछ नांहि ।
ऐसा यहु संसार है, समझ देखि मन माँहि ॥ 10 ॥
दादू ज्यों कुछ सपने देखिये, तैसा यहु संसार ।
ऐसा आपा जानिये, फूल्यो कहा गँवार ॥ 11 ॥
दादू जतन जतन करि राखिये, दिढ़ गहि आतम मूल ।
दूजा दृष्टि न देखिये, सब ही सैंबल फूल ॥ 12 ॥
दादू नैनहुँ भर नहिं देखिये, सब माया का रूप ।
तहँ ले नैना राखिये, जहाँ है तत्त्व अनूप ॥ 13 ॥
हस्ती हय बर धन देख कर, फूल्यो अंग न माइ ।
भेरि दमामा एक दिन, सब ही छाड़े जाइ ॥ 14 ॥
दादू माया बिहड़ै देखतां, काया संग न जाइ ।
कृत्रिम बिहड़ै बावरे, अजरावर ल्यौ लाइ ॥ 15 ॥

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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
दादू माया का बल देख कर, आया अति अहंकार।
अन्ध भया सूझै नहीं, का करि है सिरजनहार ॥ 16 ॥
विरक्तता
मन मनसा माया रती, पंच तत्व प्रकाश।
चौदह तीनों लोक सब, दादू होहु उदास ॥ 17 ॥
माया देखे मन खुशी, हिरदै होइ विकास।
दादू यहु गति जीव की, अंत न पूगै आस ॥ 18 ॥
मन की मूठि न माँडिये, माया के नीसाण।
पीछे ही पछिताहुगे, दादू खूटे बाण ॥ 19 ॥
शिश्न स्वाद
कुछ खातां कुछ खेलतां, कुछ सोवत दिन जाइ।
कुछ विषिया रस विलसतां, दादू गये विलाइ ॥ 20 ॥
संगति कुसंगति
माखन मन पाहण भया, माया रस पीया।
पाहण मन माखन भया, राम रस लीया ॥ 21 ॥
दादू माया सौं मन बिगड़या, ज्यों कांजी करि दुग्ध।
है कोई संसार में, मन करि देवे शुद्ध ॥ 22 ॥
गंदी सौं गंदा भया, यों गंदा सब कोइ।
दादू लागै खूब सौं, तो खूब सरीखा होइ ॥ 23 ॥
दादू माया सौं मन रत भया, विषय रस माता।
दादू साचा छाड़ कर, झूठे रंग राता ॥ 24 ॥
माया के संग जे गये, ते बहुरि न आये।
दादू माया डाकिनी, इन केते खाये ॥ 25 ॥
दादू माया मोट विकार की, कोइ न सकै डार।
बहि बहि मूये बापुरे, गये बहुत पचि हार ॥ 26 ॥

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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
दादू रूप राग गुण अनुसरे, जहाँ माया तहँ जाइ ।
विद्या अक्षर पंडिता, तहाँ रहे घर छाइ ॥ 27 ॥
साधु न कोई पग भरै, कबहुँ राज दुवार ।
दादू उलटा आप में, बैठा ब्रह्म विचार ॥ 28 ॥
आशय-विश्राम
दादू अपणे अपणे घर गये, आपा अंग विचार ।
सहकामी माया मिले, निहकामी ब्रह्म संभार ॥ 29 ॥
माया
दादू माया मगन जु हो रहे, हमसे जीव अपार ।
माया माहीं ले रही, डूबे काली धार ॥ 30 ॥
शिश्न स्वाद
दादू विषय के कारणै रूप राते रहैं,
नैन नापाक यों कीन्ह भाई ।
बदी की बात सुनत सारा दिन,
श्रवण नापाक यों कीन्ह जाई ॥ 31 ॥
स्वाद के कारणै लुब्धि लागी रहे,
जिभ्या नापाक यों कीन्ह खाई ।
भोग के कारणै भूख लागी रहे,
अंग नापाक यों कीन्ह लाई ॥ 32 ॥
दादू नगरी चैन तब, जब इक राजी होइ ।
द्वै राजी दुख द्वन्द्व में, सुखी न बैसे कोइ ॥ 33 ॥
इक राजी आनन्द है, नगरी निश्चल वास ।
राजा प्रजा सुखी बसै, दादू जोति प्रकाश ॥ 34 ॥
शिश्न स्वाद
जैसे कुंजर काम वश, आप बंधाणा आइ ।
ऐसे दादू हम भये, क्यों कर निकस्या जाइ ॥ 35 ॥

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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
जैसे मर्कट जीभ रस, आप बंधाणा अंध।
ऐसे दादू हम भये, क्यों कर छूटै फंध ॥ 36 ॥
ज्यों सूवा सुख कारणै, बंध्या मूरख माँहि।
ऐसे दादू हम भये, क्यों ही निकसै नाहि ॥ 37 ॥
जैसे अंध अज्ञान गृह, बंध्या मूरख स्वाद।
ऐसैं दादू हम भये, जन्म गँवाया बाद ॥ 38 ॥
दादू बूड रह्या रे बापुरे, माया गृह के कूप।
मोह्या कनक अरु कामिनी, नाना विधि के रूप ॥ 39 ॥
शिश्न स्वाद
दादू स्वाद लागि संसार सब, देखत परलै जाइ।
इन्द्री स्वारथ साच तजि, सबै बंधाणै आइ ॥ 40 ॥
विष सुख माँहैं रम रहे, माया हित चित लाइ।
सोई संतजन ऊबरे, स्वाद छाड़ि गुण गाइ ॥ 41 ॥
आसक्तता मोह
दादू झूठी काया झूठ घर, झूठा यहु परिवार।
झूठी माया देखकर, फूल्यो कहा गँवार ॥ 42 ॥
दादू झूठा संसार, झूठा परिवार, झूठा घर बार,
झूठा नर नार, तहाँ मन माने।
झूठा कुल जात, झूठा पितु मात, झूठा बंधु भ्रात,
झूठा तन गात, सत्य कर जाने।
झूठा सब धंध, झूठा सब फंध, झूठा सब अंध,
झूठा जाचंध, कहा मग छाने।
दादू भाग, झूठ सब त्याग, जाग रे जाग, देख दीवाने ॥ 43 ॥
दादू झूठे तन के कारणै, कीये बहुत विकार।
गृह दारा धन संपदा, पूत कुटुम्ब परिवार ॥ 44 ॥

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