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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 504 में से

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पृष्ठ 141

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
दादू मन मारे मुनिवर मुये, सुर नर किये संहार।
ब्रह्मा विष्णु महेश सब, राखै सिरजनहार ॥ 120 ॥
मन बाहे मुनिवर बड़े, ब्रह्मा विष्णु महेश।
सिद्ध साधक योगी यति, दादू देश विदेश ॥ 121 ॥
मनमुखी मान बड़ाई
पूजा मान बड़ाइयां, आदर मांगै मन।
राम गहै, सब परिहरै, सोई साधु जन ॥ 122 ॥
जहाँ जहाँ आदर पाइये, तहाँ तहाँ जीव जाइ।
बिनआदरदीजे राम रस, छाड़ि हलाहल खाइ ॥ 123 ॥
करणी बिना कथनी
करणी किरका को नहिं, कथनी अनंत अपार।
दादू यों क्यों पाइये, रे मन मूढ गँवार ॥ 124 ॥
जाया माया मोहनी
दादू मन मृतक भया, इंद्री अपने हाथ।
तो भी कदे न कीजिये, कनक कामिनी साथ ॥ 125 ॥
मन
अब मन निर्भय घर नहीं, भय में बैठा आइ।
निर्भय संग थैं बीछुट्या, तब कायर है जाइ ॥ 126 ॥
जब मन मृतक है रहे, इंद्री बल भागा।
काया के सब गुण तजे, निरंजन लागा ॥ 127 ॥
आदि अंत मधि एक रस, टूटे नहीं धागा।
दादू एकै रहि गया, तब जाणी जागा ॥ 128 ॥
दादू मन के शीश मुख, हस्त पांव है जीव।
श्रवण नेत्र रसना रटै, दादू पाया पीव ॥ 129 ॥
जहँ के नवाये सब नवैं, सोई सिर कर जाण।
जहँ के बुलाये बोलिये, सोई मुख परमाण ॥ 130 ॥

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