सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-मन का अंग 10
जहाँ सुरति तहँ जीव है, जहाँ नांही तहँ नांहि।
गुण निर्गुण जहाँ राखिये, दादू घर वन मांहि ॥ 108 ॥
जहाँ सुरति तहँ जीव है, आदि अन्त इस्थान।
माया ब्रह्म जहाँ राखिये, दादू तहँ विश्राम ॥ 109 ॥
जहाँ सुरति तहँ जीव है, जीवन मरण जिस ठौर।
विष अमृत तहँ राखिये, दादू नाहीं और ॥ 110 ॥
जहाँ सुरति तहँ जीव है, जहाँ जाणै तहँ जाइ।
गम अगम जहाँ राखिये, दादू तहाँ समाइ ॥ 111 ॥
मन मनसा का भाव है, अन्त फलेगा सोइ।
जब दादू बाणक बण्या, तब आशय आसण होइ ॥ 112 ॥
जप तप करणी कर गये, स्वर्ग पहुँचे जाइ।
दादू मन की वासना, नरक पड़े फिर आइ ॥ 113 ॥
पाका काचा ह्वै गया, जीत्या हारे डाव।
अंत काल गाफिल भया, दादू फिसले पांव ॥ 114 ॥
दादू यहु मन पंगुल पंच दिन, सब काहू का होइ।
दादू उतर आकाश तैं, धरती आया सोइ ॥ 115 ॥
ऐसा कोई एक मन, मरै सो जीवै नाहिं।
दादू ऐसे बहुत हैं, फिर आवै कलि माहिं ॥ 116 ॥
देखा देखी सब चले, पार न पहुँच्या जाइ।
दादू आसन पहल के, फिर फिर बैठे आइ ॥ 117 ॥
जग जन विपरीत
बरतन एकै भांति सब, दादू संत असंत।
भिन्न भाव अन्तर घणां, मनसा तहाँ गच्छन्त ॥ 118 ॥
यहु मन मारै मोमिनां, यहु मन मारै मीर।
यहु मन मारै साधकाँ, यहु मन मारै पीर ॥ 119 ॥
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