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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

चन्द्रशेखर आजाद 61
तपाक से कहा।
कार्यव्यस्त नवयुवक ने दृष्टि ऊपर उठाकर देखा। पण्डितजी के रूप
में उसे भव्य हृष्टपुष्टाकारी जोशीले नवयुवक के दर्शन हुए।
इसके बाद इन दोनों का परस्पर परिचय हुआ। दोनों के विचार
समान थे। दोनों एक-दूसरे से प्रभावित हुए। उनकी यह पहली मुलाकात
जीवन भर की मित्रता में बदल गई। यह एक ऐतिहासिक मुलाकात थी।
मातृभूमि के दो दीवानों का एक अटूट मिलन था, जिन्होंने भावी इतिहास
में भारत की स्वतन्त्रता के लिए कन्धे-से-कन्धा मिलाकर कार्य किया और
एक नये इतिहास की रचना की। वीर चन्द्रशेखर आजाद के इस जीवन
का उत्तरार्द्ध वस्तुतः भगतसिंह के मिलने के बाद ही प्रारम्भ हुआ।
नया दल हिन्दुस्तान समाजवादी गणतन्त्र सेना '

62 चन्द्रशेखर आजाद
करने बंगाल गए, तो ये लोग उनका यहाँ रात में रहने का प्रबन्ध भी नहीं
कर पाए थे। अतः इनसे सहयोग की आशा छोड़ दी गई।
नये दल के गठन के लिए 8 सितम्बर, 1928 को फिरोजशाह कोटला
के किले के खण्डहरों में क्रान्तिकारियो की एक बैठक हुई (यह तिथि
विभिन्न पुस्तकों में अलग-अलग है, फिर भी अधिकतर पुस्तकों में यही
तिथि है।) इसमें बंगाल को छोड़कर उत्तरी भारत के सभी राज्यों के
प्रतिनिधियों ने भाग लिया। भगतसिंह एवं सुखदेव पंजाब राज्य के प्रति-
निधि थे, कुन्दनलाल राजस्थान के, शिव वर्मा, ब्रह्मदत्त मिश्र, जयदेव,
विजयकुमार सिन्हा तथा सुरेन्द्र पाण्डे संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) के और
फणीन्द्रनाथ घोष एवं मनमोहन बनर्जी बिहार राज्य के प्रतिनिधि थे।
कुछ अज्ञात अपरिहार्य कारणों से चन्द्रशेखर आजाद इस बैठक में नहीं आ
सके, किन्तु भगतसिंह और शिव वर्मा से उन्होंने पहले ही कह दिया था कि
बैठक में बहुमत से जो भी निर्णय लिए जाएँगे, वे उन्हें मान्य होंगे।
अभी तक विभिन्न राज्यों के क्रान्तिकारी दलों के अपने अलग-अलग
नाम थे। अतः सभी प्रान्तों के दलों को मिलाकर एक अखिल भारतीय नया
दल बनाया गया। इस नये संगठन का नाम 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट
रिपब्लिकन आर्मी' अर्थात् 'हिन्दुस्तान समाजवादी गणतान्त्रिक सेना' रखा
गया। दल के सभी सदस्य नए थे। यों तो चन्द्रशेखर आजाद भी युवक ही
थे, किन्तु इससे पूर्व वह 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' मे राम-
प्रसाद बिस्मिल आदि के साथ कार्य कर चुके थे, जिससे उन्हें हथियारों
को चलाने आदि का अच्छा अनुभव था, जबकि अन्य नये लोग इस मामले
में अनुभवहीन थे, अतः 'हिन्दुस्तान समाजवादी गणतन्त्र सेना' का प्रधान
सेनापति-कमाण्डर इन चीफ उन्हीं को बनाया गया।
नये दल की केन्द्रीय समिति :
इस नये संगठन की एक केन्द्रीय समिति बनायी गई, जिसमें प्रत्येक
राज्य के प्रतिनिधि थे, जिनके नाम निम्नलिखित हैं।
1 भगतसिंह (पंजाब)
2 चन्द्रशेखर आजाद (संयुक्त प्रान्त

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3 सुखदेव (पंजाब)
4. शिव वर्मा (संयुक्त प्रान्त)
5 विजय कुमार (संयुक्त प्रान्त)
6 फणीन्द्रनाथ घोष (बिहार)
7 कुन्दन लाल (राजस्थान)
नये दल के गठन में यह स्पष्ट कर दिया गया कि दल पर किसी एक
व्यक्ति का नियन्त्रण नहीं रहेगा। दल की सभी सम्पत्ति केन्द्रीय समिति के
अधिकार में रहेगी। जो भी कार्य किया जाएगा, उस पर पहले केन्द्रीय
समिति विचार करेगी। सभी निर्णय बहुमत के आधार पर किए जाएँगे।
इस नये दल के नाम में समाजवादी शब्द विशेष अभिप्राय से जोड़ा
गया। जो इस बात का सूचक था कि यह दल मार्क्सवाद के समाजवादी
सिद्धान्तों पर आधारित समाज की स्थापना करने के लिए प्रयत्नशील रहेगा
और शोषण को मिटाएगा।
इस बैठक में इन बातों पर भी विचार हुआ कि दल सशस्त्र क्रान्ति
द्वारा भारत की स्वतन्त्रता के लिए काम करेगा, जिसके लिए धन की
आवश्यकता अनिवार्य रूप से होगी। क्योंकि यह एक गुप्त आन्दोलन था,
अतः चन्दे से धन संचय करना सम्भव नहीं था। इस समस्या के निराकरण
के लिए डकैतियाँ डालना तय हुआ, साथ ही यह भी निश्चित हुआ कि
डकैतियाँ जहाँ तक हो सरकारी बैंकों, खजानों या डाकघरों में डाली
जाएँ। जनता में डकैतियाँ डालने से दल उसकी सहानुभूति से वंचित हो
सकता है। अतः केवल आपात काल के लिए व्यक्तिगत डकैतियाँ डाली जा सकती हैं।

64 चन्द्रशेखर आज़ाद
कर्ता प्रतिनिधि बनाया गया।
इस प्रकार चन्द्रशेखर आज़ाद को इस नये संगठन 'हिन्दुस्तान समाज-
वादी गणतन्त्र सेना' का अध्यक्ष बनने का गौरव प्राप्त हुआ। यों देखा जाए
तो इस संगठन के उद्देश्यों तथा पूर्व संगठन 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसो-
सिएशन' के उद्देश्यों में कोई विशेष अन्तर नहीं था, किन्तु पूर्व दल के नाम
से उसके उद्देश्यों का परिचय नहीं मिलता था। इस सम्बन्ध में मन्मथनाथ
गुप्त लिखते हैं—
“काकोरी युग में समिति का नाम हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन
था। यह नाम कम अर्थव्यंजक समझा गया, यानी यह समझा गया कि इस
नाम से दल का उद्देश्य पूर्णरूप से व्यक्त नहीं होता। इसलिए इसको और
स्पष्ट करना चाहिए, तदनुसार दल का नाम 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन
सोशलिस्ट आर्मी' यानी हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना रखा
गया। संक्षेप में ऐसा इसलिए हुआ कि साधनों में विकास न होकर क्रान्ति-
कारी आन्दोलन के ध्येय में ही विकास होता रहा। उसी के अनुसार यह
नाम बदल दिया गया। यह परिवर्तन सूचित करता है कि दल के ध्येय में
और अधिक विकास हुआ। दल ने समाजवाद और मजदूर वर्ग के अधि-
नायकत्व को अपना ध्येय घोषित किया।
पुलिस से आँखमिचौनी :
काकोरी काण्ड के बाद फरार हो जाने पर आज़ाद लगभग दो वर्ष से
अपनी माँ से भी नहीं मिल पाए थे। उनके पिताजी का देहावसान हो चुका
था। वृद्धा माँ भी कानपुर में आकर रहने लगी थी। एकमात्र पुत्र
के वियोग में वह तड़प रही थी। उन्हें मालूम हो चुका था कि आज़ाद
किसी डकैती के बाद फरार हो गए थे। उनके अन्य कई साथी या तो
फाँसी की सजा पा चुके थे या उन्हें लम्बी-लम्बी कैद की सजाएं मिल चुकी
थी। पकड़े जाने पर आज़ाद के लिए भी सजा निश्चित थी। एक दिन
आज़ाद अपनी माँ से मिलने जा पहुँचे। इतने लम्बे समय बाद माँ-बेटे
मिले थे। अभी कुछ ही देर हुई थी कि भगतसिंह तथा सुखदेव भी वहाँ
पहुँच गए। भगतसिंह ने बताया कि उनके बारे में पुलिस को पता चल

चन्द्रशेखर आजाद
गया था। अतः भाग चला जाए, किन्तु आजाद का तो काम ही खतरा से
खेलना था। भरा हुआ रिवाल्वर सदा उनके पास रहता था। वह पुलिस
का सामना करने को तैयार हो गये। इस पर भगतसिंह ने उन्हें समझाया
कि इस प्रकार का साहस उन्हें विपत्ति में डाल देगा; अतः सब भाग खड़े
हुए।
इसी प्रकार एक बार यह कानपुर में 'प्रताप' के सम्पादक श्रीयुत
गणेशशंकर विद्यार्थीजी के पास बैठे हुए थे। तभी उनको पता लगा कि
पुलिस को उनकी यहाँ उपस्थिति के विषय में पता चल गया था। अतः
आजाद और उनका एक साथी अपनी माँ के निवास-स्थान पर चले गए।
वहीं भोजन करने के बाद दोनों साथी सो गए। इतने में आजाद के
विद्यार्थीजी के पास से निकलते ही एक पुलिस अधिकारी अपने दल-बल के
साथ यहाँ पहुँच गया। आजाद वहाँ से पहले ही जा चुके थे। किसी ने
पुलिस को बता दिया कि आजाद अपनी माँ के पास चले गए थे। पुलिस
का दल वहाँ पहुँच गया। दरवाजा अन्दर से बन्द था। पुलिस को बाहर
आया देख दोनों साथी जाग पड़े। आजाद सामना करने को तैयार हो
गये।
दोनों साथियों ने अपनी-अपनी पिस्तोलें निकाल लीं। पुलिस लगातार
दरवाजा खटखटाए जा रही थी। पुलिस अधिकारी ने दरवाजा न खुलते
देख दरवाजा तोड़ने का आदेश दे दिया। दरवाजा तोड़ा जाने लगा। एक
किवाड़ के टूटते ही आजाद और उनका साथी पुलिस पर गोलियाँ चलाने
लगे। जवाब में पुलिस भी गोली चलाने लगी, किंतु दोनों साथी ओट में
स्वयं को बचाते रहे। कई पुलिस वाले घायल हो गए। पुलिस अधिकारी
क्रोधित हो गया। उसने अपने सिपाहियों को अन्दर प्रवेश करने का
आदेश दे दिया। दरवाजा टूट चुका था। बीसियों पुलिसवाले अपने हथिया-
रों को ताने अन्दर आने को तैयार हो गए। इधर आजाद और उनके
साथी की पिस्तोलें खाली हो चुकी थीं। पुलिसवाले अन्दर घुसते, इससे
पहले ही दोनों साथी मकान की छत पर चले गए, वहाँ से दूसरी छत पर
कूद पड़े। उस मकान को पुलिस ने घेर लिया। पुलिस गोलियाँ चलाने
लगी, दोनों क्रान्तिकारियों ने इसका जवाब छत पर रखी ईंटों से दिया।

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और सतर्कता का वर्णन किया कि अभी हमें इस विचार को छोड़ना पड़ेगा,
इस समाचार ने भगतसिंह के सारे ख्वाब तोड़ दिए। बहुत कोशिशों के
बाद बिस्मिल की लिखी एक गजल हाथ लगी।" ...
' बिस्मिल काकोरी काण्ड के नेता थे, अतः फाँसी की सजा सुना दिये जाने
के बाद भी उन पर पुलिस का पहरा सबसे अधिक कठोर था। उनके द्वारा
बाहर भेजी जानेवाली तथा उनके पास आनेवाली चीजो पर कड़ी निग-
रानी रखी जाती थी; उनके द्वारा लिखी गई इस गजल को शायद जेल के
अधिकारियों ने एक साधारण गजल समझ लिया था; इसमें छिपे गूढ़ '
को वे नहीं समझ पाए थे। यह गजल निम्नलिखित है—
मिट गया जब मिटने वाला
फिर सलाम आया तो क्या।
दिल की बरबादी के बाद
उनका पयाम आया तो क्या॥
मिट गई सारी उम्मीदें
मिट गए सारे खयाल।
उस घड़ी गर नामबर
लेकर पयाम आया तो क्या॥
ऐ दिले नादान मिट जा
अब तू कूचे यार में।
फिर मेरी नाकामियों के
बाद काम आया तो क्या॥
काश अपनी जिन्दगी में
हम वो मंजर देखते।
बरसरे तुरबत कोई
महशर खराम आया तो क्या॥

चन्द्रशेखर आजाद
आखिरी शब दीद के
काबिल थी बिस्मिल की तड़प ।
सुबह दम कोई अगर
बाला ए बाम आया तो क्या ॥
गजल की इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि इनके माध्यम से बिस्मिल ने
अपने साथियों के पास संदेश भिजवाया था कि इस काण्ड में फांसी की
सजा पाये वीरों को मुक्त कराने के लिए शीघ्र प्रयत्न करें। अन्यथा फांसी
हो जाने पर उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी। यह प्रयत्न 1927 के आरम्भ
में किये गए थे।

78 चन्द्रशेखर आज़ाद
माननी ही पड़ेगी। तुमने मेरा जो अपमान किया है, उसका उत्तर मैं दे
दूंगा। इसके बाद तुम कभी मुझसे बात न करना।"
भगतसिंह के साथ बम डालने में बटुकेश्वरदत्त को उनका साथी
बनाया गया।
आज़ाद का नाम इसके लिए किसी ने भी प्रस्तुत नहीं किया, क्योंकि
सभी सदस्यों के मत में दल के भविष्य के लिए उनका इस प्रकार के कार्यों
में भाग न लेना ही उचित था।
केन्द्रीय असेम्बली में दो बिल पेश किये गए थे—जन सुरक्षा बिल
तथा औद्योगिक विवाद बिल। प्रथम बिल का उद्देश्य राजनीतिक आन्दो-
लनों को कुचलना तथा दूसरे बिल का मज़दूरों को हड़ताल के अधिकार से
वंचित करना था। अतः ये बिल विवाद का विषय बन चुके थे। जनता को
विश्वास था कि यदि असेम्बली ने इन बिलों को अस्वीकार भी कर दिया
तो सरकार वाइसराय के विशेष अधिकार से इन्हें पास कर देगी।
8 अप्रैल, 1929 को असेम्बली में इन दोनों बिलों पर निर्णय सुनाया
जाना था। अतः भगतसिंह एवं बटुकेश्वरदत्त के लिए असेम्बली के एक
मनोनीत सदस्य की सिफारिश पर पास बनाये गए। दोनों ने खाकी क़मीज़
और नेकर पहनी थी। जयदेव कपूर उन्हें असेम्बली में उचित स्थान पर
बैठा आये, जहाँ से बम फेंकने में किसी प्रकार की असुविधा न हो और
किसी को चोट भी न लगे।

चन्द्रशेखर आजाद 79
पहले ही दूसरा बम फेंका गया। इससे लोगों के होश-हवास गुम हो गए।
सर जार्ज शूस्टर मेज के नीचे जा छिपा। इस हड़बड़ी में टकरा जाने से
उसे मामूली चोट भी आई। पूरा हाल नीले धुएँ से भर गया। दोनों ने
'इन्कलाब ज़िन्दाबाद' तथा 'साम्राज्यवाद का नाश हो' के नारे लगाए
तथा पर्चे फेंके, जिनमें लिखा था—
"बहरों को सुनाने के लिए ऊँची आवाज की जरूरत होती है। फ्रांस
के अराजकतावादी शहीद वेलां के ऐसे ही अवसर पर कहे गए इन अमर
शब्दों से क्या हम अपने काम का औचित्य सिद्ध कर सकते हैं।
शासन सुधार के नाम पर ब्रिटिश शासन द्वारा पिछले दस वर्षों से
हमारे देश का जो अपमान किया गया है, हम उस निन्दनीय कहानी को
दुहराना नहीं चाहते। भारतीय राष्ट्रीय नेताओं के साथ किये गए अपमानों
का भी उल्लेख नहीं करना चाहते जो इस असेम्बली द्वारा किये गए हैं, जिसे
पार्लियामेण्ट कहा जाता है।
हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि कुछ लोग साइमन कमीशन के
नाम पर जो जूठे टुकड़े मिलने की सम्भावना है, उनकी आशा लगाए हुए
हैं और मिलने वाली भावी हड्डियों के बँटवारे के लिए झगड़ा तक कर
रहे हैं। इसी समय सरकार भी भारतीय जनता पर दमनकारी कानून
लादती जा रही है, जैसे जनसुरक्षा बिल तथा औद्योगिक विवाद बिल।
इसी के साथ उसने प्रेस सिडीशन बिल को असेम्बली के अगले अधिवेशन
के लिए सुरक्षित रख लिया है। श्रमिक नेता जो खुले रूप में अपना कार्य
कर रहे थे, उनकी अन्धाधुन्ध गिरफ्तारियों से यह स्पष्ट हो जाता है कि
सरकार का क्या रुख है।
इन भयंकर उत्तेजक परिस्थितियों में 'हिन्दुस्तान समाजवादी
प्रजातान्त्रिक सेना' ने पूर्ण गम्भीरता के साथ अपना दायित्व अनुभव करते
हुए अपनी सेना को यह कार्य करने का आदेश दिया है, जिससे कानून का
यह अपमानजनक मजाक खत्म हो। विदेशी सरकार की शोषक नौकर-
शाही चाहे जो करे, किन्तु उसका नंगा रूप जनता के सामने लाना नितान्त
आवश्यक है।
जनता के चुने हुए प्रतिनिधि अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जायें

20 चन्द्रशेखर आजाद
और जनता को आने वाली क्रान्ति के लिए तैयार करें। सरकार को यह
जान लेना चाहिए कि जन सुरक्षा बिल और औद्योगिक विवाद बिल
सानाजी की नृशंस हत्या का असहाय भारतीय जनता की ओर से विरोध
करते हुए हम इस बात पर जोर देना चाहते हैं, जिसे कि इतिहास ने अनेक
बार दुहराया है कि व्यक्ति की हत्या कर देना आसान है, लेकिन तुम
विचारों की हत्या नहीं कर सकते। बड़े-बड़े साम्राज्य नष्ट हो गए, किन्तु
विचार जीवित रहे। फ्रांस के बूर्वा और रूस के जार नष्ट हो गए, जबकि
क्रान्तिकारी विजय की सफलता के साथ आगे बढ़ते गए।
हम मनुष्य के जीवन को पवित्र मानते हैं। हम ऐसे उज्ज्वल भविष्य
में विश्वास रखते हैं, जिसमें प्रत्येक मनुष्य पूर्ण शान्ति और स्वतन्त्रता का
उपभोग करेगा। हम मानवरक्त बहाने के लिए अपनी मजबूरी पर दुःखी
हैं। परन्तु क्रान्ति के लिए मनुष्यों का बलिदान आवश्यक है। इन्कलाब
जिन्दाबाद।"
यह पर्चा दल के कमाण्डर इन चीफ की ओर से लिखा हुआ था, इसमें
हस्ताक्षरों की जगह बलराज लिखा हुआ था।
[

भगत सिंह से मिलन, HSRA की स्थापना एवं लाला लाजपतराय का प्रतिशोध

चन्द्रशेखर आजाद 81
स्वयं गिरफ्तार करवाया। इसके बाद न्याय का दीर्घ नाटक खेला गया,
जिसकी परिणति अन्ततः भगतसिंह, राजगुरु एवं बटुकेश्वरदत्त को फांसी
तथा अन्य कई क्रान्तिकारियों को विभिन्न प्रकार के कैद की सजाओं में
हुई, इसका वर्णन आगे यथास्थान किया जाएगा।
वायसराय की गाड़ी को उड़ाने की योजना.
असेम्बली बम काण्ड में भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त की गिरफ्तारी
के बाद उन पर साण्डर्स की हत्या का भी मामला चल चुका था और उनके
दल के कई सदस्य इस हत्याकाण्ड के सिलसिले में गिरफ्तार किये जा चुके
थे। अतः दल एक प्रकार से छिन्न-भिन्न-सा हो चुका था। फिर भी आजाद
इस दल के सेनापति थे; और एक योग्य, साहसी एवं कर्मठ सेनापति के
सभी गुण उनमें विद्यमान थे। इसके साथ ही भगवतीचरण वोहरा, उनकी
धर्मपत्नी दुर्गादेवी, सुशीला दीदी, श्री यशपाल आदि योग्य क्रान्तिकारी
उनके साथ थे। अतः दल का कार्य निरन्तर चलता रहा।
इसी कार्यक्रम के अन्तर्गत वायसराय की विशेष रेलगाड़ी को बम से
उड़ा देने की योजना बनाई गई। पहले इसके लिए 27 अक्तूबर, 1929 का
दिन नियत किया गया। परन्तु बाद में कुछ अनिवार्य कारणों से उस दिन
यह काम न हो सका। फिर इसके लिए 23 दिसम्बर, 1929 का दिन
निश्चित किया गया।

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चन्द्रशेखर आजाद
साथ सड़ता हुआ मारा गया।
इन गिरफ्तार व्यक्तियों को मुकदमे में विभिन्न प्रकार की सजाएँ
मिलीं। गुलाबसिंह, जहांगीरलाल तथा अमरीकसिंह को पहले फाँसी की
सजा सुनाई दी, किन्तु बाद में अमरीकसिंह छोड़ दिया गया तथा शेष दोनों
को कालापानी और शेष अभियुक्तों को अनेक प्रकार की कैद की सजा
सुनाई गई।

82 चन्द्रशेखर आजाद

के पीछे का तीसरा डिब्बा उड़ गया।
इस घटना से फिर तहलका मच गया। पुलिस पहले ही सतर्क थी;
अब और भी अधिक बौखला उठी, उसने अपने प्रयत्न पहले से भी तेज कर
दिये।
कांग्रेस के सन् 1930 के लाहौर अधिवेशन में प्रथम बार एक ओर
भारत के लिए पूर्ण स्वराज्य की मांग की गई, वहीं दूसरी ओर इस घटना
की निन्दा की गई। इसके मुख्य अंश इस प्रकार हैं—
"यह कांग्रेस वाइसराय की ट्रेन पर बम विस्फोट के कृत्य की निन्दा
करती है और अपना यह निश्चय फिर प्रकट करती है कि इस प्रकार के
कार्य न केवल कांग्रेस के उद्देश्यो के प्रतिकूल हैं, अपितु उनसे राष्ट्रीय हित
की हानि होती है। यह कांग्रेस महामहिम वाइसराय, श्रीमती इर्विन तथा
गरीब नौकरों सहित उनके साथियों का इस बात के लिए अभिनन्दन करती
है कि वे सौभाग्य से बाल-बाल बच गए।"
वाइसराय की ट्रेन को बम से उड़ाने का प्रयत्न असफल हो जाने के बाद
भी चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में दल क्रियाशील बना रहा। इसके बाद
भी कई जगह बम विस्फोट हुए, डकैती तथा हत्या की योजनाएँ बनीं, किन्तु
इन सभी योजनाओं में कोई विशेष सफलता नहीं मिली। पुलिस इस दल के
सदस्यों की गिरफ्तारी के लिए हाथ धोकर पीछे पड़ी थी। अगस्त, 1930
में इस दल के चार सदस्य—रूपचन्द, इन्द्रपाल, जहांगीर लाल तथा कुन्दन
लाल गिरफ्तार कर लिये गए। इसके बाद कुछ और सदस्य पकड़ लिये
गए; कुल छब्बीस सदस्यों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, किन्तु दल के
अध्यक्ष चन्द्रशेखर आजाद, यशपाल, सुशीला दीदी, दुर्गा भाभी, हंसराज
तथा प्रकाशवती आदि पुलिस की पकड़ में नहीं आ सके। अतः उन्हें फरार
घोषित कर दिया गया।
सुखदेवराज भी पुलिस की पकड़ में नहीं आये थे। सभी फरार अभि-
युक्तों की खोज में पुलिस के मुखबिर घूमने लगे थे। एक दिन पुलिस को
सूचना मिली कि सुखदेवराज किसी अन्य युवक के साथ लाहौर के शाली-
मार पार्क में हैं। अतः पुलिस ने घेरा डाल दिया। यहाँ सुखदेवराज का तो
.......रार नामक एक युवक गोली से पुलिस के

चन्द्रशेखर आजाद
माद लड़ता हुआ मारा गया ।
इन गिरफ्तार व्यक्तियों को मुकदमे में विभिन्न प्रकार की सजाएं,
मिलीं। गुलाबसिंह, जहाँगीरलाल तथा अमरीकसिंह को पहले फाँसी की
सजा सुनाई दी, किन्तु बाद में अमरीकसिंह छोड़ दिया गया तथा शेष दोनों
को कालापानी और शेष अभियुक्तों को अनेक प्रकार की कैद की सजा
सुनाई गई।

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86 चन्द्रशेखर आजाद
कहा कि उन्होंने हमें बम फेंकते हुए देखा, उन्हें यह सफेद झूठ बोलने में
कोई झिझक नहीं आई। हम आशा करते हैं कि जिन लोगों का ध्येय न्याय
की शुद्धता तथा निष्पक्षता की रक्षा करना है, वे इन तथ्यों से स्वयं निष्कर्ष
निकाल लेंगे।
प्रथम प्रश्न के उत्तरार्द्ध का उत्तर कुछ विस्तार से देना होगा, जिससे
कि हम उन प्रयोजनों और परिस्थितियों को एक पूर्ण और सुलझे रूप में
स्पष्ट कर सकें, जिनके फलस्वरूप यह घटना हुई, जिसने अब ऐतिहासिक
रूप ले लिया है। जेल में हमसे कुछ पुलिस के अधिकारियों ने मुलाकात की,
उनमें से कुछ ने जब हमें यह बताया कि विचाराधीन इस घटना के पश्चात्
दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए लार्ड इरविन ने
यह कहा कि हम लोगों ने बम फेंककर किसी व्यक्ति पर नहीं, अपितु स्वयं
एक संविधान पर आक्रमण किया है, तब हमें प्रतीत हुआ कि इस घटना के
महत्त्व का सही मूल्यांकन नहीं किया गया है।
मानवमात्र के प्रति हमारा प्रेम किसी से कम नहीं है। अतः किसी व्यक्ति
के प्रति विद्वेष रखने का प्रश्न ही नहीं उठता। इसके विपरीत हमारी दृष्टि
में मानव-जीवन इतना पवित्र है कि उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा
सकता।
हमारा लक्ष्य उस संस्था के प्रति अपना व्यावहारिक प्रतिरोध प्रकट
करना था, जिसने अपने आरम्भ से ही न केवल अपनी निरुपयोगिता का,
अपितु हानिकारक दूरगामी शक्ति का भी नग्न प्रदर्शन किया है। हमने
जितना अधिक चिन्तन किया है, हम उतने ही अधिक इस नतीजे पर पहुंचे
हैं कि इस संस्था (असेम्बली) के अस्तित्व का उद्देश्य दुनिया के सामने
भारत की गरीबी तथा असहायता का प्रदर्शन करना है तथा यह एक

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88 चन्द्रशेखर आजाद
सदस्य स्व० श्री सी० आर० दास के उन शब्दों से प्रेरणा ली है, जो उन्होंने
अपने पुत्र को एक पत्र में लिखे थे; जिनका तात्पर्य था कि इंग्लैंड को उसके
दुःस्वप्न से जगाने के लिए बम की आवश्यकता है और हमने उन लोगों की
ओर से असेम्बली के फर्श पर बम फेंका है, जिनके पास अपनी हृदयविदारक
वेदना की अभिव्यक्ति के लिए अन्य कोई राह नहीं रह गई थी। हमारा
एकमात्र उद्देश्य था कि हम बहरों को अपनी आवाज सुनाएँ और समय की
चेतावनी उन लोगों तक पहुँचाएँ, जो उनकी अनदेखी कर रहे हैं।***हमने
उन लोगों को चेतावनी दी है, जो सामने आनेवाली परिस्थिति की चिन्ता
किए बिना सरपट दौड़े चले जा रहे हैं।
पिछले खण्डों में हमने काल्पनिक अहिंसा शब्द का प्रयोग किया है।
हम उसकी व्याख्या करना चाहते हैं। हमारी दृष्टि से बल का प्रयोग तब
अन्यायपूर्ण होता है, जब उसका प्रयोग आक्रमण की रीति से किया जाए
और हमारे दृष्टिकोण में यह हिंसा है। किन्तु जब बलप्रयोग किसी विशेष
उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाए, तो यह नैतिक दृष्टि से न्यायसंगत है।
शक्ति के प्रयोग का पूर्णतया बहिष्कार एक कोरी काल्पनिक भ्रान्ति है।
इस देश में एक नया आन्दोलन उठ खड़ा हुआ है, जिसकी पूर्व सूचना हम
दे चुके हैं। यह आन्दोलन गुरु गोविन्दसिंह, शिवाजी, कमाल पाशा एवं
रज़ा खां, वाशिंगटन एवं गैरी बाल्डी और लायफेते एवं लेनिन के कार्यों
से प्रेरणा ग्रहण करता है।
हमें ऐसा लगा कि विदेशी सरकार और भारत के सार्वजनिक नेताओं
ने इस आन्दोलन से आँखें मूँद ली हैं तथा उनके कानों में इसकी आवाज
नहीं पड़ी है। अतः हमें यह कर्तव्य लगा कि ऐसे स्थानों पर चेतावनी दी
जाए, जहाँ हमारी आवाज अनसुनी न रह सके।***हमारे मन में उन लोगों
के प्रति कोई व्यक्तिगत द्वेष या बैर नहीं था, जिनको इस घटना के दौरान
मामूली चोटें आई हैं।***हमने जान-बूझकर असेम्बली में बम फेंका। तथ्य
स्वयं स्पष्ट है। हमारा अनुरोध है कि हमारे प्रयोजन को हमारे कार्य के
परिणाम से ही आंका जाना चाहिए, न कि काल्पनिक परिस्थितियों एवं
पूर्वाग्रहों के आधार पर। सरकारी विशेषज्ञ द्वारा दिए गए प्रमाणों के बाव-
जूद यह सत्य है कि हमने असेम्बली भवन में जो बम फेंके, उनसे एक