भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पहला मराठा युद्ध २६६
जो डाइरेक्टरों और गवरनर जनरल के पत्रों से बिलकुल
साफ़ हैं—
(१) अंग्रेज़ जानते थे कि यदि दक्खिन की तीन मुख्य
शक्तियाँ निज़ाम, हैदरअली और पेशवा आपस में मिल गईं तो
दक्खिनी भारत से अंग्रेज़ों के अस्तित्व को आसानी से मिटा देंगी,
इसलिए जिस तरह हो इन तीनों को एक दूसरे से लड़ाए रखना
ज़रुरी था।
(२) इनमें मराठे सब से अधिक महत्वाकांक्षी और साम्राज्य-
प्रेमी थे। इसलिए उन्हें घरेलू झगड़ों में इस तरह फँसाए रखना
ज़रूरी था कि जिससे बंगाल और उत्तरीय भारत के अन्दर
अंग्रेज़ों के बढ़ते हुए प्रभाव में हस्तक्षेप करने का उन्हें अवकाश न
मिल सके।
(३) भारत के पच्छिमी तट पर आहिस्ता आहिस्ता अपने
पैर फैलाने के लिए साष्टी का टापू, बसईं का इलाक़ा और कुछ
थोड़ा सा गुजरात प्रान्त का भाग कम्पनी को अपने अधीन कर
लेना ज़रूरी था।
कम्पनी के डाइरेक्टरों ने बम्बई के गवरनर और वहाँ की
कौंसिल के नाम १८ मार्च सन् १७६८ के एक
[हाशिया: साष्टी और बसईं] पत्र में लिखा कि—"हम आप से जितने ज़ोर
[हाशिया: पर अंग्रेज़ों] के साथ हो सकता है उतने ज़ोर के साथ
[हाशिया: के दांत] सिफ़ारिश करते हैं कि आपको जब जब मौक़ा
मिल सके, आप इन स्थानों (साष्टी और बसईं) को प्राप्त करने के
२७० भारत में अंगरेज़ी राज
यत्न करते रहें। इसमें हम अपना बहुत बड़ा लाभ समझते हैं।'*
इसके बाद ३१ मार्च सन् १७६६ के डाइरेक्टरों के पत्र में फिर यह
वाक्य आता है—"साष्टी और बसई और उनके साथ के इलाक़े,
सूरत प्रान्त का मराठा भाग × × × ये चीज़ें हैं, जिन्हें आपको
अपनी तमाम सन्धियों में, पत्र व्यवहार में और लड़ाइयों में अपनी
नज़र के सामने रखना चाहिए, जिन्हें प्राप करने के लिए हमेशा
मौक़े की ताक में रहना चाहिए।"†
इतिहास लेखक मिल लिखता है कि—"इसी मनोरथ को
अधिक लगन के साथ सिद्ध करने और पेशवा माधोराव से बातचीत
करने के लिए डाइरेक्टरों ने हिदायतें देकर मिस्टर मॉस्टिन को
भारत भेजा।"‡
सन् १७७२ में डाइरेक्टरों का विशेष दूत मॉस्टिन भारत पहुँचा
- "We recommend to you, in the strongest manner, to use your
endeavours, upon every occasion that may offer, to obtain these places,
which we should esteem a valuable acquisition."—Directors' letter to the
President and Council of Bombay, dated 18th March, 1768.
† "Salsette and Bassein, with their dependencies, and the Marhatta's
portion of the Surat Provinces . . . . These are the objects you are to
have in view, in all treaties, negotiations, and military operations,--and that
you must be ever watchful, to obtain." -Directors' letter, dated 31st March,
‡ "In more earnest prosecution of the same design, Mr. Mostyn arrived
from England, in 1772, with instructions from the Court of Directors, that
he should be sent immediately to negotiate with Madho Rao the Peshwa
. . . . for the cession of the island and peninsula of Salsette and Bassein.
. . . ."-Mill, vol. iii, pp. 423, 24.
पहला मराठा युद्ध २७१
और तुरन्त उसे बम्बई की कौन्सिल का वक़ील बनाकर पेशवा के
दरबार में भेज दिया गया ।
मराठों, हैदर और इतिहास लेखक ग्राण्ट डफ़ स्पष्ट शब्दों में
निज़ाम में फूट लिखता है—"बम्बई की गवरमेण्ट ने मि०
डालने के प्रयत्न मॉस्टिन को इस उद्देश से पूना भेजा कि वह
× × × मराठों को घर ही घर में एक दूसरे से लड़ा कर या जिस
तरीक़े से हो सके इस बात की कोशिश करे कि मराठे हैदर के
साथ या निज़ाम के साथ मिलने न पावें ।"*
गंगा के उत्तर में कुछ इलाक़ों पर उस समय तक मराठों का
क़ब्ज़ा हो चुका था और मिल के इतिहास से पता चलता है कि
सन् १७७३ में यदि आपसी घरेलू झगड़े मराठों को बाहर जाने से
न रोकते, तो वे इलाहाबाद, कड़ा, अवध और रुहेलखण्ड पर हमला
करने वाले थे ।†
इस तरह कम्पनी की उस समय की नीति के तीनों पहलू महत्व
पूर्ण और साफ़ थे ।
मॉस्टिन ने पूना पहुँच कर बड़ी होशियारी के साथ अपना
काम शुरू किया । स्वार्थान्ध राघोबा से उसे इस
नाना फडनवीस काम में पूरी मदद मिली । किन्तु पेशवा दरबार
की दूरदर्शिता में उस समय एक और दूरदर्शी नीतिज्ञ मौजूद था,
- "Mr. Mostyn was sent to Poona by the Bombay Government, for the
purpose of . . . using every endeavour, by fomenting domestic dissen-
sions or otherwise, to prevent the Marhattas from joining Hyder or Nizam
Ally."—Grant Duff's History of the Marhattas, p. 340.
† Mill's History of British India, p. 221.
२७२ भारत में अंगरेज़ी राज
जो राघोबा की स्वार्थपरता और अंगरेज़ों की चालों दोनों को ख़ूब
समझता था। यह नीतिज्ञ सुप्रसिद्ध नाना फड़नवीस था। सन् १८५०
में नाना की मृत्यु के बरसों बाद उसकी योग्यता को स्वीकार करते
हुए जे० सलीवन नामक अंगरेज़ ने कर्नल ब्रिग्स के नाम एक पत्र
में लिखा कि—"नाना फड़नवीस और उस जैसे आदमी हमें
दीजिये। उस योग्यता के भारतवासियों के मुक़ाबले में भारत के
शासकों की हैसियत से हम अत्यन्त तुच्छ और बौने मालूम
होते हैं!!!"*
इतिहास लेखक टॉरेन्स अंगरेज़ों की ओर नाना फड़नवीस
की नीति के विषय में लिखता है :—
[पार्श्व-शीर्षक: नाना फड़नवीस और अंगरेज़] "नाना फड़नवीस अंगरेज़ों के प्रति आदर प्रकट
करता था, उनकी तारीफ़ करता था, किन्तु उनके राज-
नैतिक आलिङ्गन से पीछे हटता था और चाहे कोई कैसी भी आपत्ति क्यों न
सामने खड़ी हो, वह अंगरेज़ों से स्थायी सैनिक सहायता स्वीकार करने से
सदा इनकार करता रहा।"†
नाना की यह नीति ही उस समय के भारतीय शासकों के लिए
एक मात्र कुशल नीति हो सकती थी। इसीलिए राघोबा और
अंगरेज़ों के बीच जो सन्धि हो चुकी थी, नाना फड़नवीस उसके
ख़िलाफ़ था। पेशवा माधोराव भी नाना के प्रभाव में था। ऐसी
- "Give us Nana Fadnavis and such like. What poor pigmies we are
as Indian Administrators when compared with natives of that stamp!!!"—
J. Sullivan's letter to colonel Briggs 1850.
† Torrens' Empire in Asia, p. 221.
पहला मराठा युद्ध २७३
सूरत में मॉस्टिन की चालें कुछ दिनों तक न चल सकीं। इतिहास
लेखक मिल लिखता है कि थोड़े दिनों की बातचीत के बाद मॉस्टिन
ने देख लिया कि साष्टी और बसई इतनी आसानी से न मिल
सकेंगे।
फिर भी मॉस्टिन के प्रयत्न जारी रहे। सब से पहले उसने
राघोबा और नाना फड़नवीस को एक दूसरे से
अंगरेज़ दूत मॉस्टिन फोड़ने की कोशिश की। पेशवा माधोराव बालिग़
की करतूतें हो गया था। तब भी राघोबा मॉस्टिन के कहने
में आकर उसे नाना के प्रभाव से हटाकर अपने प्रभाव में रखने की
चेष्टा करता रहा। धीरे धीरे माधोराव और राघोबा में अनबन इतनी
बढ़ गई कि एक बार माधोराव ने विवश होकर अपने चचा राघोबा
को क़ैद कर दिया। शीघ्र ही राघोबा फिर छोड़ दिया गया। इतने
में १८ नवम्बर सन् १७७२ को २८ साल की अल्प आयु में माधो
राव की मृत्यु हो गई। माधोराव की मृत्यु मराठा साम्राज्य के लिए
बड़े दुर्भाग्य की घटना थी। इस नौजवान पेशवा की मौत का ज़िक्र
करते हुए ग्राण्ट डफ़ लिखता है :—
“दूर दूर तक फैले हुए मराठा साम्राज्य के उस वृक्ष को, जिसे कुछ
हानि पहले ही पहुँच चुकी थी, जो जड़ नीचे से रस पहुँचाती थी वह तने
से कटकर अलग हो गई। उस साम्राज्य का पानीपत के मैदान से भी
इतना धक्का न पहुँचा था जितना इस सुयोग्य शासक की अकाल मृत्यु से
पहुंचा। माधोराव युद्ध विद्या में तो अत्यन्त चतुर था ही, नरेश की हैसियत
१८
२७४ भारत में अंगरेज़ी राज
से भी उसका चरित्र उसके पूर्वाधिकारियों से कहीं अधिक प्रशंसा और आदर
के योग्य था।”*
पेशवा माधोराव की अचानक मृत्यु के सम्बन्ध में कम्पनी के
दूत मॉस्टिन पर सन्देह होना, ख़ास कर मॉस्टिन की अन्य करतूतों
को देखते हुए, बिलकुल स्वाभाविक है; किन्तु इन गुप्त पापों का
ठीक भेद इतने समय के बाद खुल सकना अत्यन्त कठिन है।
माधोराव के कोई बच्चा न था। मरने से पहले उसने अपने
भाई नारायनराव को पेशवा की मसनद के लिए नियुक्त कर दिया
और अपने चचा राघोबा से प्रार्थना की कि आप नारायनराव की
रक्षा और सहायता कीजियेगा।
राघोबा के लिए अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने और मॉस्टिन
के लिए राघोबा द्वारा अपने मालिकों की इच्छा
पेशवा नारायनराव को सफल बनाने, दोनों का अब ख़ासा सुन्दर
की हत्या अवसर था। ३० अगस्त सन् १७७३ को राघोबा
ने अपने भतीजे नारायनराव पेशवा को मरवा डाला। मॉस्टिन ने
बड़े उल्लास के साथ बम्बई की अंगरेज़ कौन्सिल को इस घटना की
सूचना दी।
नारायनराव की हत्या का भेद उसी समय पूरी तरह खुल गया।
जिन आदमियों ने नारायनराव को मारा वे राघोबा के आदमी थे।
पूछ ताछ होने पर राघोबा ने बयान किया कि जो मराठी पत्र मैंने
- Grant Duff's History of the Marhattas, p. 352.
पेशवा नारायण राव
[ चित्रशाला प्रेस पूना की कृपा द्वारा ]
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पहला मराठा युद्ध २७५
अपने उन आदमियों के नाम भेजा था, जिन्होंने नारायनराव को
क़त्ल किया, उसमें शब्द 'धरावे' था जिसका अर्थ 'पकड़ना' है और
मेरा मतलब केवल नारायनराव को गिरफ़्तार कराने का था, किन्तु
बाद में बीच ही में किसी ने कहीं पर 'धरावे' शब्द को बदल कर
'मारावे' कर दिया। इसमें भी कोई सन्देह नहीं हो सकता कि इस
हत्याकांड में मॉस्टिन का पूरा हाथ था। सर हेनरी लारेन्स लिखता
है—"बाद में राघोबा ने नारायनराव को मार डाला × × × और
अंगरेज़ सरकार ने उसका साथ दिया। अंगरेज़ों के भारतीय
इतिहास का यह एक अत्यन्त पापमय अध्याय है।"*
उधर बम्बई की कौन्सिल ने नारायनराव की मृत्यु का समाचार
पाकर इस मौक़े को अपनी इच्छा पूर्ति के लिए ग़नीमत समझा।
३० अगस्त को पूना में पेशवा नारायनराव की हत्या हुई और
१७ सितम्बर को बम्बई की कौन्सिल ने मॉस्टिन को पत्र लिखा
कि—"इस अवसर पर साष्टी और बसई प्राप्त करने में जितनी
चीजें हमें मदद दे सकें, उन्हें तुम खूब परिश्रम के साथ बढ़ाना
और चाहे कुछ भी क्यों न हो, पूना छोड़ कर कहीं न जाना।"+
नारायनराव की मृत्यु के बाद राघोबा ने अपने आपको पेशवा
- "Raghoba afterwards murdered Narain Rao. and was
supported by the British Government. A very evil chapter in Anglo Indian
History."—Calcutta Review, vol. ii, p. 430.
+" . . . to improve diligently every circumstance favourable
to the accomplishment of that event (the possession of Salsette and Bassein),
and on no account whatever to leave the Marhatta Capital."—Mill, vol. iii,
p. 425.
२७६ भारत में अंगरेज़ी राज
एलान कर दिया। मॉस्टिन और उसके साथियों ने राघोबा को
पेशवा बनने में पूरी सहायता दी। पेशवा
विद्रोही राघोबा नारायनराव के स्वभाव की प्रशंसा करते हुए
और अंगरेज़ ग्रॉन्ट डफ़ अन्त में लिखता है कि—"सिवाय
उसके शत्रुओं के बाक़ी सब उससे प्रेम करते थे।"* किन्तु अंगरेज़ों
ने अब नारायनराव की ख़ूब बुराई और राघोबा की तारीफ़ें करनी
शुरू कर दीं।
पूना के अधिकांश दरबारी और वहाँ की प्रजा सब राघोबा के
विरुद्ध थे। राघोबा हर तरह से मॉस्टिन के हाथों की कठपुतली
था। मॉस्टिन ने अब उसे समझा बुझाकर निज़ाम और हैदरअली
के साथ उसका बाज़ाब्ता युद्ध छिड़वा दिया और इस युद्ध के
लिए उसे सेना सहित पूना से रवाना कर दिया। किन्तु इस लड़ाई
में राघोबा को सिवाय कष्ट और अपमान के और कुछ न मिला।
नाना फड़नवीस और उसके साथियों ने, जो अच्छी तरह देख
रहे थे कि राघोबा विदेशियों के हाथों में खेल कर मराठा साम्राज्य
की जड़ें खोखली कर रहा है, राघोबा की इस ग़ैर मौजूदगी में
अपना बल और बढ़ा लिया, यहाँ तक कि राघोबा को पूना लौटने
का साहस न हो सका। वह जान बचा कर गुजरात की ओर
भाग गया।
इसी बीच पूना में १८ अप्रैल सन् १७७४ को पेशवा नारायनराव
*"...... all but his enemies loved him."—Grant Duff, History of
पेशवा नारायण राव की हत्या
चित्रकार—म० व० धुरन्धर
पेशवा नारायण राव ने घबरा कर अपने चचा राघोबा की शरण ली। राघोबा भीतर से
इस षड्यन्त्र में शामिल था। नारायण राव के एक मात्र विश्वस्त अनुचर ने अपने स्वामी के शरीर
से चिपट कर अपने टुकड़े टुकड़े करवा दिये। उसके बाद नारायण राव अपने चचा की गोद में
मार डाला गया।
[ द० ब० पारसनीस कृत "इतिहास संग्रह" ]
पेशवा नारायणराव की हत्या
[ चित्रकार— म० व० धुरन्धर ]
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पहला मराठा युद्ध २७७
की विधवा स्त्री के, जो अपने पति की हत्या के समय गर्भवती थी,
[पूना में दूसरे पेशवा] एक पुत्र हुआ। पूना दरबार ने एक मत से इस
[की नियुक्ति] बालक के पेशवा नियुक्त होने का एलान कर
दिया। प्रजा ने मसनद नशीनी की खुशियाँ मनाईं।
किन्तु अंगरेज़ों का हित राघोबा ही को पेशवा बनाने में था।
उन्होंने राघोबा को अपने पास सूरत बुलवा
[पहले मराठा युद्ध] लिया। सूरत में ६ मार्च सन् १७७५ को राघोबा
[की जड़] और अंगरेज़ों में एक सन्धि हो गई, जिसमें
राघोबा ने साष्टी, बसई' और सूरत प्रान्त का एक भाग कम्पनी के
नाम लिख दिया और बम्बई की अंगरेज़ कौन्सिल ने इसके बदले
में राघोबा को कम्पनी की सेना सहित पूना भेजने और पेशवा की
मसनद पर बैठाने का वादा किया। यह नाजायज़ सन्धि ही पहले
मराठा युद्ध की जड़ थी।
कर्नल कीटिंग के अधीन कम्पनी की सेना और राघोबा की
सेना दोनों मिल कर राघोबा को ज़बरदस्ती
[अंगरेज़ों की] पेशवा की मसनद पर बैठाने की ग़रज़ से पूना
[पहली हार] की ओर बढ़ीं। उधर पूना दरबार ने सेनापति
हरिपन्त फड़के के अधीन एक सेना राघोबा की बग़ावत को दमन
करने के लिए गुजरात की ओर रवाना कर दी। १८ मई सन् १७७५
को आरास नामक स्थान पर दोनों ओर की सेनाओं में घमासान
संग्राम हुआ, जिसमें राघोबा और उसके मददगारों की हार हुई।
अंगरेज़ों की बहुत सी सेना और अनेक अंगरेज़ अफ़सर मारे गए।
२७८ भारत में अंग्रेज़ी राज
किन्तु बरसात सर पर थी, इसलिए बाग़ियों का पीछा करके
उनका सर्वनाश किए बिना ही हरिपन्त फड़के को अपनी सेना
सहित पूना लौट आना पड़ा।
नतीजा यह हुआ कि राघोबा और अंगरेज़ों को गुजरात में
अपनी साज़िशों के पक्का करने का अब और अच्छा मौक़ा मिला।
भारतीय नरेशों की आपसी ईर्ष्या की वजह से इस तरह की
साज़िशों के लिए मैदान उन दिनों भारत के
[पार्श्व-शीर्षक: अंगरेज़ों और] प्रायः हर प्रान्त में मिल सकता था। सन् १७६८
[पार्श्व-शीर्षक: गायकवाड़ में] में गुजरात के अन्दर महाराजा दमनाजी गायक
[पार्श्व-शीर्षक: सन्धि] वाड़ की मृत्यु हुई। तीन रानियों से उसके चार बेटे
थे—सयाजी, गोविन्दराव, मानिकजी और फ़तहसिंह। कई साल से
सयाजी और गोविन्दराव में गद्दी के लिए लड़ाइयाँ हो रही थीं।
फ़तहसिंह चारों में सबसे चलता हुआ और सयाजी के पक्ष में था।
करनल कीटिंग्ज जब राघोबा की सहायता के लिए सेना लेकर
बम्बई से गुजरात आया, उसने गोविन्दराव के विरुद्ध सयाजी
के साथ सन्धि करने की कोशिश की। २२ अप्रैल सन् १७७५ को
उसका एक दूत लैफ़्टिनेन्ट जॉर्ज लवीबॉण्ड बातचीत के लिए
फ़तहसिंह के पास पहुँचा। नौजवान फ़तहसिंह ने अंगरेज़ों के साथ
सन्धि करने से इनकार कर दिया और तिरस्कार के साथ
लवीबॉण्ड को अपने यहाँ से निकाल दिया।
बम्बई की कौन्सिल ने जब यह समाचार सुना तो फ़ौरन अपने
खुर्राट दूत मॉस्टिन को कीटिंग्ज की मदद के लिए पूना से गुजरात
पहला मराठा युद्ध २७६
भेजा। इस समय तक फड़के की विजयी सेना पूना वापस पहुँच
चुकी थी। मॉस्टिन अब पूना सं गुजरात चला आया और वहाँ पर
उसने अपनी चालों का जाल बिछाना शुरू किया। अन्त में अंगरेज़ों
और फ़तहसिंह गायकवाड़ के बीच सन्धि हो गई।
इस सन्धि के अनुसार भड़ोच, चिखली, वड़ियाव और कोरल
के तीनों परगने, जिनकी आमदनी कई लाख रुपए सालाना थी,
बिना किसी तरह की लड़ाई के कम्पनी को मिल गए और सयाजी
राव गायकवाड़ अंगरेज़ों की मदद् सं बड़ोदा की गद्दी पर बैठ
गया। गायकवाड़ का राज कुल अभी तक पेशवा को अपना
अधिराज मानता था, किन्तु अब से वह सदा के लिए मराठा
मराडल से फूट कर अलग हो गया और गुजरात में अंगरेज़ों के पैर
जम गए।
सूरत की सन्धि के अनुसार अंगरेज़ों ने साष्टी और बसई
दोनों पर क़ब्ज़ा कर लिया। किन्तु सूरत की सन्धि को पेशवा
सरकार ने स्वीकार न किया था और बाग़ी राघोबा को पेशवा
की मसनद पर बैठाने का निष्फल प्रयत्न कर अंगरेज़ पूना सरकार
को अपना दुशमन बना चुके थे।
अंगरेज़ों के सामने उस समय वास्तव में एक कठिन समस्या
थी। राघोबा के पेशवा बन सकने की सम्भावना बहुत ही कम थी
और बाग़ी राघोबा को मदद देने के बाद पूना सरकार से बातचीत
करने का उन्हें अब कोई मुंह न था। उनके गुप्तचर मॉस्टिन का
अब फिर पूना में घुस सकना तक नामुमकिन मालूम होता था।
२४० भारत में अंगरेज़ी राज
वारन हेस्टिंग्स को इस समय एक ख़ासी अच्छी तरकीब
[वारन हेस्टिंग्स की] सूझी। उसने सीधे कलकत्ते से अपने एक विशेष
[दोरुखी चालें] दूत कर्नल अपटन को पूना दरबार के पास भेजा
और यह रुख़ लिया कि बम्बई की कौन्सिल ने
राघोबा के साथ जो सन्धि की है और उसे जो कुछ मदद दी है,
वह मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ और मेरी इजाज़त के बिना दी गई है,
इसलिए वह सन्धि नाजायज़ है और अंगरेज़ सरकार न बाग़ी
राघोबा का साथ देना चाहती है और न पेशवा सरकार से लड़ना
चाहती है।
वारन हेस्टिंग्स ने बम्बई सरकार को हुकुम दिया कि पेशवा
दरबार से युद्ध फ़ौरन बन्द किया जावे और कर्नल कीटिङ्ग और
उसकी सेना को वापस बुला लिया जावे। बम्बई सरकार ने आज्ञा
पाते ही कीटिङ्ग और उसकी रही सही सेना को सूरत वापस बुला
लिया। पेशवा दरबार के मन्त्री उस समय पुरन्धर में थे, इसलिए
कर्नल अपटन २८ दिसम्बर सन् १७७५ को पुरन्धर पहुँचा।
सखाराम बापू उस समय पेशवा का प्रधान मन्त्री था। कर्नल
अपटन के पूना जाने का उद्देश ज़ाहिरा यह था कि बम्बई कौन्सिल
के समस्त कार्यों को नाजायज़ बताकर उनके लिए कम्पनी की ओर
से दुख प्रदर्शित करे और पेशवा दरबार के साथ कम्पनी की मित्रता
और वफ़ादारी प्रकट करे। किन्तु कर्नल अपटन के पास वारन
हेस्टिंग्स के दस्तख़ती दोहरे पत्र मौजूद थे। एक सखाराम बापू के
नाम जिसका आशय ऊपर दिया जा चुका है और दूसरा बाग़ी
पहला मराठा युद्ध २८१
राघोबा के नाम, जिसमें वारन हेस्टिंग्स ने राघोबा के प्रति मित्रता
प्रकट करते हुए बम्बई कौन्सिल की समस्त काररवाई का समर्थन
किया। अपटन को हिदायत कर दी गई थी कि यह दूसरा
पत्र केवल उस सूरत में उपयोग करना, जब कि इस बीच किसी
सबब से राघोबा के पक्ष की जीत हो चुकी हो। साथ ही हेस्टिंग्स
ने जो पत्र सखाराम बापू के नाम भेजा, उसमें भी अपनी मित्रता
प्रकट करते हुए पेशवा दरबार से प्रार्थना की कि साष्टी और बसई
अंगरेज़ों ही के पास रहने दिए जायें।
पेशवा दरबार के मन्त्री, जिनमें सखाराम बापू और नाना
[मराठों को] फ़ड़नवीस जैसे नीतिज्ञ मौजूद थे, मामले को खूब
[सन्देह] समझते थे। करनल अपटन ने वारन हेस्टिंग्स
के नाम २ फ़रवरी सन् १७७६ के पत्र में लिखा—
"वे मुझसे हज़ार बार पूछते हैं कि 'आप बराबर इतनी वफ़ादारी की
क़समें क्यों खाते हैं ? बम्बई गवरमेण्ट की छेड़ी हुई लड़ाई को तो आप लोग
बुरा कहते हैं और उस लड़ाई द्वारा जो इलाके आपको मिल गए हैं उन्हें
अपने पास रखने के लिए इतने इच्छुक हैं, यह सब मामला क्या है ?'" *
पेशवा दरबार ने इस बात पर ज़िद की कि अंगरेज़ फ़ौरन
साष्टी और बसई खाली कर दें। मजबूर होकर अपटन ने ७ फ़रवरी
- "They ask me a thousand times, why we make such professions of
honor? How disapprove the war entered into by the Bombay-Government,
when we are so desirous of availing ourselves of the advantages of it?"—
Colonel Upton to warren Hastings, 2nd Feb. 1776.
२८२ भारत में अंगरेज़ी राज
सन् १७७६ को वारन हेस्टिंग्स को लिख दिया कि—"पूना दरबार
हमारी शर्तों पर राज़ी नहीं होता।"
वारन हेस्टिंग्स ने जब देख लिया कि सुलह से काम नहीं चल
हेस्टिंग्स की युद्ध सकता, तो अपटन के पूना रहते हुए फ़ौरन एक
की तय्यारी बहुत बड़े पैमाने पर जंग की तैयारियाँ शुरू कर
दीं। कलकत्ते और मद्रास दोनों स्थानों पर पूना
भेजने के लिए सेनाएँ जमा की जाने लगीं। भोंसले, सींधिया और
होलकर, तीनों को हेस्टिंग्स ने अपनी ओर फोड़ने की कोशिशें शुरू
कीं। हैदरअली और निज़ाम से भी उसने गुप्त पत्र व्यवहार शुरू
किया, और यह कोशिश की कि यदि हैदरअली और निज़ाम पेशवा
दरबार के ख़िलाफ़ अंगरेज़ों को मदद न भी दें तो कम से कम
तटस्थ रहें।
पूना दरबार को इन सब बातों की ख़बर मिलती रही। इतिहास
से पता नहीं चलता कि और कौन कौन सी बातें थीं, जिनसे डर
कर या मजबूर होकर अन्त में नाना फड़नवीस जैसे नीतिज्ञों ने
अपने विचार बदल दिए। कर्नल अपटन जिस समय निराश
होकर पुरन्धर से बंगाल लौटने को तैयार हुआ, कहा जाता है कि
पेशवा के मन्त्रियों ने उसे रोक लिया।
३ जून सन् १७७६ को पुरन्धर में पेशवा दरबार और कम्पनी
पुरन्धर की सन्धि के दरमियान एक नई सन्धि हुई, जिसमें सूरत
वाली नाजायज़ सन्धि को रद्द क़रार दिया
गया, अंगरेज़ों ने वादा किया कि हम फिर कभी राघोबा को
पहला मराठा युद्ध २८३
सहायता न देंगे, बसई' का क़िला पूना दरबार को लौटा देंगे और
इस दरबार के साथ सदा मित्रता क़ायम रक्खेंगे। पूना दरबार ने
राघोबा के गुज़ारे के लिए प्रबन्ध कर दिया और "दोस्ताना क़ायम
रखने के लिए" कम्पनी को साष्टी का टापू, भड़ौच शहर की माल-
गुज़ारी और उसके आस पास तीन लाख रुपए सालाना का
इलाक़ा बतौर जागीर दे दिया। यह भी तय हुआ कि कम्पनी का
एक वकील पेशवा के दरबार में रहा करे। पूना दरबार को
निस्सन्देह यह आशा थी कि इस उदारता के बाद हम इन विदेशी
व्यापारियों के साथ अमन से रह सकेंगे, किन्तु उनकी यह आशा
झूठी निकली। पूना के चतुर ब्राह्मण भी कूट नीति में इन विदेशियों
से टक्कर न ले सके। वास्तव में दोनों के नैतिक आदर्शों में बहुत
बड़ा अन्तर था। ज्योंही कम्पनी के डाइरेक्टरों को इस नई सन्धि
की सूचना मिली, उन्होंने फ़ौरन वारन हेस्टिंग्स को लिखा :-
"हम चाहते हैं कि राघोबा के साथ जो सन्धि हुई थी, उसके अनुसार
कम्पनी को जितना इलाक़ा मिला था, उस सबको हर हालत में अपने क़ब्ज़े
में रक्खा जावे और हम आपको आज्ञा देते हैं कि जो उपाय उसे क़ायम रखने
और उसकी रक्षा करने के लिए ज़रूरी हों, आप तुरन्त कर डालें।"*
बम्बई कौंसिल, कलकत्ता कौंसिल और कम्पनी के डाइरेक्टर,
- "We approve, under every circumstance, of the keeping of all the
territories and possessions ceded to the Company by the treaty concluded
with Raghoba; and direct that you forthwith adopt such measures as may
be necessary for their preservation and defence." Court of Directors to the
Government of Bengal, Mill, p. 436.