भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपहला मराठा युद्ध २६६
जो डाइरेक्टरों और गवरनर जनरल के पत्रों से बिलकुल
साफ़ हैं—
(१) अंग्रेज़ जानते थे कि यदि दक्खिन की तीन मुख्य
शक्तियाँ निज़ाम, हैदरअली और पेशवा आपस में मिल गईं तो
दक्खिनी भारत से अंग्रेज़ों के अस्तित्व को आसानी से मिटा देंगी,
इसलिए जिस तरह हो इन तीनों को एक दूसरे से लड़ाए रखना
ज़रुरी था।
(२) इनमें मराठे सब से अधिक महत्वाकांक्षी और साम्राज्य-
प्रेमी थे। इसलिए उन्हें घरेलू झगड़ों में इस तरह फँसाए रखना
ज़रूरी था कि जिससे बंगाल और उत्तरीय भारत के अन्दर
अंग्रेज़ों के बढ़ते हुए प्रभाव में हस्तक्षेप करने का उन्हें अवकाश न
मिल सके।
(३) भारत के पच्छिमी तट पर आहिस्ता आहिस्ता अपने
पैर फैलाने के लिए साष्टी का टापू, बसईं का इलाक़ा और कुछ
थोड़ा सा गुजरात प्रान्त का भाग कम्पनी को अपने अधीन कर
लेना ज़रूरी था।
कम्पनी के डाइरेक्टरों ने बम्बई के गवरनर और वहाँ की
कौंसिल के नाम १८ मार्च सन् १७६८ के एक
[हाशिया: साष्टी और बसईं] पत्र में लिखा कि—"हम आप से जितने ज़ोर
[हाशिया: पर अंग्रेज़ों] के साथ हो सकता है उतने ज़ोर के साथ
[हाशिया: के दांत] सिफ़ारिश करते हैं कि आपको जब जब मौक़ा
मिल सके, आप इन स्थानों (साष्टी और बसईं) को प्राप्त करने के