सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

पहला मराठा युद्ध २६५
अयोग्य वंशज सतारा के क़िले के अन्दर पेशवा की सेना की
हिफ़ाज़त में अभी तक अपनी नाम मात्र की गद्दी क़ायम रक्खे हुए
थे। किन्तु सारा शासन प्रबन्ध पेशवा के योग्य और प्रबल हाथों में
था। पेशवा के अलावा मराठा साम्राज्य के चार मुख्य स्तम्भ यानी
'महाराष्ट्र मण्डल' के चार मुख्य सदस्य, सींधिया, होलकर, गाय-
कवाड़ और भोंसला थे। ये चारों चार बड़े बड़े राज्यों के स्वतंत्र
शासक थे, किन्तु सब पेशवा को अपना अधिराज मानते थे। उसे
बराबर ख़िराज देते थे और हर लड़ाई में आज्ञा मिलने पर अपनी
सेनाओं सहित पेशवा की सहायता के लिए हाज़िर हो जाते थे।
पहले पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने दिल्ली सम्राट फ़र्रुख़सीयर के
दरबार में हाज़िर होकर प्रसिद्ध देशहितैषी भाइयों सय्यद अब्दुल्ला
और सय्यद हुसेनअली की मदद से सम्राट से मराठा राज के लिए
'स्वराज' का परवाना हासिल किया। सम्राट ने फ़रमान जारी कर
दिया कि इस मराठा 'स्वराज' के अलावा दक्खिन के सूबेदार के बाक़ी
तमाम इलाक़ों पर भी मराठों को 'चौथ' मिला करे। पेशवा ने सम्राट
की वफ़ादारी की क़सम खाई और अपनी सेना द्वारा साम्राज्य की
रक्षा करते रहने का वादा किया। वास्तव में यह 'चौथ' इसी उद्देश
से दी गई थी कि उससे पेशवा मुग़ल साम्राज्य के तमाम दक्खिनी
इलाक़े की हिफ़ाजत के लिए सेना रख सके। इसके बाद हर पेशवा
और उसके मातहत समस्त मराठा नरेश कम से कम नाम के लिए
दिल्ली के सम्राट को सारे भारत का सम्राट और अपना महाराजा-
धिराज मानते थे। रघुनाथ राव ने दिल्ली सम्राट ही के नाम पर

२६६ भारत में अंग्रेज़ी राज
अफ़ग़ानों से पंजाब विजय किया और जिस मराठा सरदार को
वहाँ की हुकूमत सौंपी उसे 'दिल्ली' सम्राट का एक सूबेदार कहकर
नियुक्त किया। फिर भी दिल्ली दरबार की निर्बलता के सबब
मराठों की उस समय की सत्ता वास्तव में स्वाधीन सत्ता थी। और
पेशवा ही हिन्दोस्तान के उत्तर से दक्खिन और पूरब से पश्चिम
तक यानी अटक से करनाटक और बंगाल की सरहद से खम्भात
की खाड़ी तक फैले हुए इस विशाल मराठा साम्राज्य का क्रियात्मक
सम्राट था।
किन्तु यह मराठा साम्राज्य चन्द रोज़ भी अपने पूरे वैभव को
क़ायम न रख सका। मालूम होता है कि साम्राज्य
मराठा साम्राज्य के साथ ही साथ मराठा सरदारों में एक दूसरे
की अवनति से ईर्षा और प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी। वे श्रीहीन
किन्तु निरपराध और राष्ट्रोपयोगी दिल्ली सम्राट को भी तख़्त से
उतार कर उसकी जगह लेने के चक्कर में पड़ गए। उनमें से कुछ
अपने या अपने कुलों के लाभ के लिए अपने देशवासियों, यहाँ तक
कि स्वयं पेशवा के ख़िलाफ़ विदेशियों से मेल करने में भी न झिझके।
एक पिछले अध्याय में लिखा जा चुका है कि इस तरह के भीतरी
दोषों के कारण ही मराठों की सत्ता को पहला धक्का सन् १७६१ में
पहुँचा, जबकि पानीपत के ऐतिहासिक मैदान में अहमदशाह
अब्दाली की सेना ने मराठों की संयुक्त सेना को हरा कर उन्हें उत्तरीय
भारत से सदा के लिए निकाल बाहर किया। उसी समय
से दिल्ली के सम्राट पर से मराठों का प्रभाव उठ गया और उस

पहला मराठा युद्ध २६७
समय से ही धीरे धीरे गायकवाड़, भोंसला, होलकर और
सींधिया एक एक कर पेशवा की अधीनता से अपने तईं स्वाधीन
समझने लगे ।
पानीपत के कुछ सप्ताह बाद बालाजी बाजीराव की मृत्यु हो गई।
बालाजी का नाबालिग बेटा माधोराव पेशवा की मसनद पर बैठा
और माधोराव का चाचा रघुनाथ राव, जिसे इतिहास में अधिकतर
राघोबा कहा जाता है और जिनकी सेना ने अफ़ग़ानों से पंजाब
विजय किया था, अपने भतीजे पेशवा का संरक्षक नियुक्त हुआ।
राघोबा अत्यन्त वीर, किन्तु अदूरदर्शी था। वह महत्वाकांक्षी भी
था और महत्वाकांक्षा ने उसकी नीतिज्ञता पर और भी परदा डाल
दिया था। इसीलिए जब अंगरेज़ों ने अपने मतलब के लिए मराठों
की सत्ता को नष्ट करने का विचार किया, तो राघोबा आसानी से
उनके हाथों में खेल गया।
कम्पनी की सत्ता उन दिनों भारत में बढ़ती जा रही थी।
[हाशिया: दक्खिन में कम्पनी] मराठों जैसी प्रबल भारतीय शक्ति के अस्तित्व को
[हाशिया: की नीति] अंगरेज़ अपनी उन्नति के लिए हितकर न समझ
सकते थे। एक न एक दिन इन दोनों शक्तियों का
एक दूसरे से टकरा जाना अनिवार्य था।
प्रसिद्ध इतिहास लेखक ग्राण्ट डफ़ लिखता है कि उस
समय—
“कम्पनी के डाइरेक्टर इस बात के लिए इच्छुक थे कि मराठों की बढ़ती
हुई सत्ता को किसी तरह धक्का पहुँचे, और यदि देश की दूसरी शक्तियाँ

२६८ भारत में अंगरेज़ी राज
मिलकर मराठों पर हमला करतीं तो यह देखकर उन्हें बहुत बड़ा सन्तोष
होता।"*
इसी इच्छा को पूरा करने के लिए अंगरेज़ों ने राघोबा को
बहकाना शुरू किया कि दक्खिन का सूबेदार निज़ामुलमुल्क मराठों
पर हमला करने वाला है।
राघोबा की अदूरदर्शिता से पेशवा माधोराव और बम्बई के
अंगरेज़ गवरनर इन दोनों के बीच यह सन्धि हो गई कि यदि
निज़ाम मराठों पर हमला करे, तो अंगरेज़ सेना और सामान से
मराठों की मदद करेंगे और इस मदद के बदले में पच्छिमी तट पर
साष्टी (Salsette) का टापू और बसईं (Bassein) का क़िला
दोनों पेशवा की ओर से अंगरेज़ों को दे दिए जावेंगे।
न निज़ाम ने मराठों पर हमला किया, न मराठों को अंगरेज़ों
की मदद की ज़रूरत हुई, और न साष्टी और बसईं उस समय
अंगरेज़ों के हवाले किए गए, फिर भी इस सन्धि के समय से ही
अंगरेज़ों की पेशवा दरबार के अन्दर पहुँच हो गई। उन्हें मराठों की
भीतरी कमज़ोरियों का पता लगने लगा और मराठा साम्राज्य के
अन्दर अपनी साज़िशों के फैलाने का मौक़ा मिलने लगा।
दक्खिनी भारत के सम्बन्ध में इस समय कम्पनी की नीति के
तीन मुख्य पहलू थे, दूसरे शब्दों में उनकी तीन मुख्य इच्छाएँ थीं,

  • "The Court of Directors, were desirous of seeing the Marhattas
    checked in their progress, and would have beheld combinations of the other
    native powers against them with abundant satisfaction."--History of the
    Marhattas, by Grant Duff.

पहला मराठा युद्ध २६६
जो डाइरेक्टरों और गवरनर जनरल के पत्रों से बिलकुल
साफ़ हैं—
(१) अंग्रेज़ जानते थे कि यदि दक्खिन की तीन मुख्य
शक्तियाँ निज़ाम, हैदरअली और पेशवा आपस में मिल गईं तो
दक्खिनी भारत से अंग्रेज़ों के अस्तित्व को आसानी से मिटा देंगी,
इसलिए जिस तरह हो इन तीनों को एक दूसरे से लड़ाए रखना
ज़रुरी था।
(२) इनमें मराठे सब से अधिक महत्वाकांक्षी और साम्राज्य-
प्रेमी थे। इसलिए उन्हें घरेलू झगड़ों में इस तरह फँसाए रखना
ज़रूरी था कि जिससे बंगाल और उत्तरीय भारत के अन्दर
अंग्रेज़ों के बढ़ते हुए प्रभाव में हस्तक्षेप करने का उन्हें अवकाश न
मिल सके।
(३) भारत के पच्छिमी तट पर आहिस्ता आहिस्ता अपने
पैर फैलाने के लिए साष्टी का टापू, बसईं का इलाक़ा और कुछ
थोड़ा सा गुजरात प्रान्त का भाग कम्पनी को अपने अधीन कर
लेना ज़रूरी था।
कम्पनी के डाइरेक्टरों ने बम्बई के गवरनर और वहाँ की
कौंसिल के नाम १८ मार्च सन् १७६८ के एक
[हाशिया: साष्टी और बसईं] पत्र में लिखा कि—"हम आप से जितने ज़ोर
[हाशिया: पर अंग्रेज़ों] के साथ हो सकता है उतने ज़ोर के साथ
[हाशिया: के दांत] सिफ़ारिश करते हैं कि आपको जब जब मौक़ा
मिल सके, आप इन स्थानों (साष्टी और बसईं) को प्राप्त करने के

२७० भारत में अंगरेज़ी राज
यत्न करते रहें। इसमें हम अपना बहुत बड़ा लाभ समझते हैं।'*
इसके बाद ३१ मार्च सन् १७६६ के डाइरेक्टरों के पत्र में फिर यह
वाक्य आता है—"साष्टी और बसई और उनके साथ के इलाक़े,
सूरत प्रान्त का मराठा भाग × × × ये चीज़ें हैं, जिन्हें आपको
अपनी तमाम सन्धियों में, पत्र व्यवहार में और लड़ाइयों में अपनी
नज़र के सामने रखना चाहिए, जिन्हें प्राप करने के लिए हमेशा
मौक़े की ताक में रहना चाहिए।"†
इतिहास लेखक मिल लिखता है कि—"इसी मनोरथ को
अधिक लगन के साथ सिद्ध करने और पेशवा माधोराव से बातचीत
करने के लिए डाइरेक्टरों ने हिदायतें देकर मिस्टर मॉस्टिन को
भारत भेजा।"‡
सन् १७७२ में डाइरेक्टरों का विशेष दूत मॉस्टिन भारत पहुँचा

  • "We recommend to you, in the strongest manner, to use your
    endeavours, upon every occasion that may offer, to obtain these places,
    which we should esteem a valuable acquisition."—Directors' letter to the
    President and Council of Bombay, dated 18th March, 1768.
    † "Salsette and Bassein, with their dependencies, and the Marhatta's
    portion of the Surat Provinces . . . . These are the objects you are to
    have in view, in all treaties, negotiations, and military operations,--and that
    you must be ever watchful, to obtain." -Directors' letter, dated 31st March,

‡ "In more earnest prosecution of the same design, Mr. Mostyn arrived
from England, in 1772, with instructions from the Court of Directors, that
he should be sent immediately to negotiate with Madho Rao the Peshwa
. . . . for the cession of the island and peninsula of Salsette and Bassein.
. . . ."-Mill, vol. iii, pp. 423, 24.

पहला मराठा युद्ध २७१
और तुरन्त उसे बम्बई की कौन्सिल का वक़ील बनाकर पेशवा के
दरबार में भेज दिया गया ।
मराठों, हैदर और इतिहास लेखक ग्राण्ट डफ़ स्पष्ट शब्दों में
निज़ाम में फूट लिखता है—"बम्बई की गवरमेण्ट ने मि०
डालने के प्रयत्न मॉस्टिन को इस उद्देश से पूना भेजा कि वह
× × × मराठों को घर ही घर में एक दूसरे से लड़ा कर या जिस
तरीक़े से हो सके इस बात की कोशिश करे कि मराठे हैदर के
साथ या निज़ाम के साथ मिलने न पावें ।"*
गंगा के उत्तर में कुछ इलाक़ों पर उस समय तक मराठों का
क़ब्ज़ा हो चुका था और मिल के इतिहास से पता चलता है कि
सन् १७७३ में यदि आपसी घरेलू झगड़े मराठों को बाहर जाने से
न रोकते, तो वे इलाहाबाद, कड़ा, अवध और रुहेलखण्ड पर हमला
करने वाले थे ।†
इस तरह कम्पनी की उस समय की नीति के तीनों पहलू महत्व
पूर्ण और साफ़ थे ।
मॉस्टिन ने पूना पहुँच कर बड़ी होशियारी के साथ अपना
काम शुरू किया । स्वार्थान्ध राघोबा से उसे इस
नाना फडनवीस काम में पूरी मदद मिली । किन्तु पेशवा दरबार
की दूरदर्शिता में उस समय एक और दूरदर्शी नीतिज्ञ मौजूद था,

  • "Mr. Mostyn was sent to Poona by the Bombay Government, for the
    purpose of . . . using every endeavour, by fomenting domestic dissen-
    sions or otherwise, to prevent the Marhattas from joining Hyder or Nizam
    Ally."—Grant Duff's History of the Marhattas, p. 340.
    † Mill's History of British India, p. 221.

२७२ भारत में अंगरेज़ी राज
जो राघोबा की स्वार्थपरता और अंगरेज़ों की चालों दोनों को ख़ूब
समझता था। यह नीतिज्ञ सुप्रसिद्ध नाना फड़नवीस था। सन् १८५०
में नाना की मृत्यु के बरसों बाद उसकी योग्यता को स्वीकार करते
हुए जे० सलीवन नामक अंगरेज़ ने कर्नल ब्रिग्स के नाम एक पत्र
में लिखा कि—"नाना फड़नवीस और उस जैसे आदमी हमें
दीजिये। उस योग्यता के भारतवासियों के मुक़ाबले में भारत के
शासकों की हैसियत से हम अत्यन्त तुच्छ और बौने मालूम
होते हैं!!!"*
इतिहास लेखक टॉरेन्स अंगरेज़ों की ओर नाना फड़नवीस
की नीति के विषय में लिखता है :—
[पार्श्व-शीर्षक: नाना फड़नवीस और अंगरेज़] "नाना फड़नवीस अंगरेज़ों के प्रति आदर प्रकट
करता था, उनकी तारीफ़ करता था, किन्तु उनके राज-
नैतिक आलिङ्गन से पीछे हटता था और चाहे कोई कैसी भी आपत्ति क्यों न
सामने खड़ी हो, वह अंगरेज़ों से स्थायी सैनिक सहायता स्वीकार करने से
सदा इनकार करता रहा।"†
नाना की यह नीति ही उस समय के भारतीय शासकों के लिए
एक मात्र कुशल नीति हो सकती थी। इसीलिए राघोबा और
अंगरेज़ों के बीच जो सन्धि हो चुकी थी, नाना फड़नवीस उसके
ख़िलाफ़ था। पेशवा माधोराव भी नाना के प्रभाव में था। ऐसी

  • "Give us Nana Fadnavis and such like. What poor pigmies we are
    as Indian Administrators when compared with natives of that stamp!!!"—
    J. Sullivan's letter to colonel Briggs 1850.
    † Torrens' Empire in Asia, p. 221.

पहला मराठा युद्ध २७३
सूरत में मॉस्टिन की चालें कुछ दिनों तक न चल सकीं। इतिहास
लेखक मिल लिखता है कि थोड़े दिनों की बातचीत के बाद मॉस्टिन
ने देख लिया कि साष्टी और बसई इतनी आसानी से न मिल
सकेंगे।
फिर भी मॉस्टिन के प्रयत्न जारी रहे। सब से पहले उसने
राघोबा और नाना फड़नवीस को एक दूसरे से
अंगरेज़ दूत मॉस्टिन फोड़ने की कोशिश की। पेशवा माधोराव बालिग़
की करतूतें हो गया था। तब भी राघोबा मॉस्टिन के कहने
में आकर उसे नाना के प्रभाव से हटाकर अपने प्रभाव में रखने की
चेष्टा करता रहा। धीरे धीरे माधोराव और राघोबा में अनबन इतनी
बढ़ गई कि एक बार माधोराव ने विवश होकर अपने चचा राघोबा
को क़ैद कर दिया। शीघ्र ही राघोबा फिर छोड़ दिया गया। इतने
में १८ नवम्बर सन् १७७२ को २८ साल की अल्प आयु में माधो
राव की मृत्यु हो गई। माधोराव की मृत्यु मराठा साम्राज्य के लिए
बड़े दुर्भाग्य की घटना थी। इस नौजवान पेशवा की मौत का ज़िक्र
करते हुए ग्राण्ट डफ़ लिखता है :—
“दूर दूर तक फैले हुए मराठा साम्राज्य के उस वृक्ष को, जिसे कुछ
हानि पहले ही पहुँच चुकी थी, जो जड़ नीचे से रस पहुँचाती थी वह तने
से कटकर अलग हो गई। उस साम्राज्य का पानीपत के मैदान से भी
इतना धक्का न पहुँचा था जितना इस सुयोग्य शासक की अकाल मृत्यु से
पहुंचा। माधोराव युद्ध विद्या में तो अत्यन्त चतुर था ही, नरेश की हैसियत
१८

२७४ भारत में अंगरेज़ी राज
से भी उसका चरित्र उसके पूर्वाधिकारियों से कहीं अधिक प्रशंसा और आदर
के योग्य था।”*
पेशवा माधोराव की अचानक मृत्यु के सम्बन्ध में कम्पनी के
दूत मॉस्टिन पर सन्देह होना, ख़ास कर मॉस्टिन की अन्य करतूतों
को देखते हुए, बिलकुल स्वाभाविक है; किन्तु इन गुप्त पापों का
ठीक भेद इतने समय के बाद खुल सकना अत्यन्त कठिन है।
माधोराव के कोई बच्चा न था। मरने से पहले उसने अपने
भाई नारायनराव को पेशवा की मसनद के लिए नियुक्त कर दिया
और अपने चचा राघोबा से प्रार्थना की कि आप नारायनराव की
रक्षा और सहायता कीजियेगा।
राघोबा के लिए अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने और मॉस्टिन
के लिए राघोबा द्वारा अपने मालिकों की इच्छा
पेशवा नारायनराव को सफल बनाने, दोनों का अब ख़ासा सुन्दर
की हत्या अवसर था। ३० अगस्त सन् १७७३ को राघोबा
ने अपने भतीजे नारायनराव पेशवा को मरवा डाला। मॉस्टिन ने
बड़े उल्लास के साथ बम्बई की अंगरेज़ कौन्सिल को इस घटना की
सूचना दी।
नारायनराव की हत्या का भेद उसी समय पूरी तरह खुल गया।
जिन आदमियों ने नारायनराव को मारा वे राघोबा के आदमी थे।
पूछ ताछ होने पर राघोबा ने बयान किया कि जो मराठी पत्र मैंने

  • Grant Duff's History of the Marhattas, p. 352.

पेशवा नारायण राव
[ चित्रशाला प्रेस पूना की कृपा द्वारा ]

This page is blank and contains no text to transcribe.

पहला मराठा युद्ध २७५
अपने उन आदमियों के नाम भेजा था, जिन्होंने नारायनराव को
क़त्ल किया, उसमें शब्द 'धरावे' था जिसका अर्थ 'पकड़ना' है और
मेरा मतलब केवल नारायनराव को गिरफ़्तार कराने का था, किन्तु
बाद में बीच ही में किसी ने कहीं पर 'धरावे' शब्द को बदल कर
'मारावे' कर दिया। इसमें भी कोई सन्देह नहीं हो सकता कि इस
हत्याकांड में मॉस्टिन का पूरा हाथ था। सर हेनरी लारेन्स लिखता
है—"बाद में राघोबा ने नारायनराव को मार डाला × × × और
अंगरेज़ सरकार ने उसका साथ दिया। अंगरेज़ों के भारतीय
इतिहास का यह एक अत्यन्त पापमय अध्याय है।"*
उधर बम्बई की कौन्सिल ने नारायनराव की मृत्यु का समाचार
पाकर इस मौक़े को अपनी इच्छा पूर्ति के लिए ग़नीमत समझा।
३० अगस्त को पूना में पेशवा नारायनराव की हत्या हुई और
१७ सितम्बर को बम्बई की कौन्सिल ने मॉस्टिन को पत्र लिखा
कि—"इस अवसर पर साष्टी और बसई प्राप्त करने में जितनी
चीजें हमें मदद दे सकें, उन्हें तुम खूब परिश्रम के साथ बढ़ाना
और चाहे कुछ भी क्यों न हो, पूना छोड़ कर कहीं न जाना।"+
नारायनराव की मृत्यु के बाद राघोबा ने अपने आपको पेशवा

  • "Raghoba afterwards murdered Narain Rao. and was
    supported by the British Government. A very evil chapter in Anglo Indian
    History."—Calcutta Review, vol. ii, p. 430.
    +" . . . to improve diligently every circumstance favourable
    to the accomplishment of that event (the possession of Salsette and Bassein),
    and on no account whatever to leave the Marhatta Capital."—Mill, vol. iii,
    p. 425.

२७६ भारत में अंगरेज़ी राज
एलान कर दिया। मॉस्टिन और उसके साथियों ने राघोबा को
पेशवा बनने में पूरी सहायता दी। पेशवा
विद्रोही राघोबा नारायनराव के स्वभाव की प्रशंसा करते हुए
और अंगरेज़ ग्रॉन्ट डफ़ अन्त में लिखता है कि—"सिवाय
उसके शत्रुओं के बाक़ी सब उससे प्रेम करते थे।"* किन्तु अंगरेज़ों
ने अब नारायनराव की ख़ूब बुराई और राघोबा की तारीफ़ें करनी
शुरू कर दीं।
पूना के अधिकांश दरबारी और वहाँ की प्रजा सब राघोबा के
विरुद्ध थे। राघोबा हर तरह से मॉस्टिन के हाथों की कठपुतली
था। मॉस्टिन ने अब उसे समझा बुझाकर निज़ाम और हैदरअली
के साथ उसका बाज़ाब्ता युद्ध छिड़वा दिया और इस युद्ध के
लिए उसे सेना सहित पूना से रवाना कर दिया। किन्तु इस लड़ाई
में राघोबा को सिवाय कष्ट और अपमान के और कुछ न मिला।
नाना फड़नवीस और उसके साथियों ने, जो अच्छी तरह देख
रहे थे कि राघोबा विदेशियों के हाथों में खेल कर मराठा साम्राज्य
की जड़ें खोखली कर रहा है, राघोबा की इस ग़ैर मौजूदगी में
अपना बल और बढ़ा लिया, यहाँ तक कि राघोबा को पूना लौटने
का साहस न हो सका। वह जान बचा कर गुजरात की ओर
भाग गया।
इसी बीच पूना में १८ अप्रैल सन् १७७४ को पेशवा नारायनराव
*"...... all but his enemies loved him."—Grant Duff, History of

पेशवा नारायण राव की हत्या
चित्रकार—म० व० धुरन्धर
पेशवा नारायण राव ने घबरा कर अपने चचा राघोबा की शरण ली। राघोबा भीतर से
इस षड्यन्त्र में शामिल था। नारायण राव के एक मात्र विश्वस्त अनुचर ने अपने स्वामी के शरीर
से चिपट कर अपने टुकड़े टुकड़े करवा दिये। उसके बाद नारायण राव अपने चचा की गोद में
मार डाला गया।
[ द० ब० पारसनीस कृत "इतिहास संग्रह" ]

पेशवा नारायणराव की हत्या
[ चित्रकार— म० व० धुरन्धर ]

This page is blank and contains no text to transcribe.

पहला मराठा युद्ध २७७
की विधवा स्त्री के, जो अपने पति की हत्या के समय गर्भवती थी,
[पूना में दूसरे पेशवा] एक पुत्र हुआ। पूना दरबार ने एक मत से इस
[की नियुक्ति] बालक के पेशवा नियुक्त होने का एलान कर
दिया। प्रजा ने मसनद नशीनी की खुशियाँ मनाईं।
किन्तु अंगरेज़ों का हित राघोबा ही को पेशवा बनाने में था।
उन्होंने राघोबा को अपने पास सूरत बुलवा
[पहले मराठा युद्ध] लिया। सूरत में ६ मार्च सन् १७७५ को राघोबा
[की जड़] और अंगरेज़ों में एक सन्धि हो गई, जिसमें
राघोबा ने साष्टी, बसई' और सूरत प्रान्त का एक भाग कम्पनी के
नाम लिख दिया और बम्बई की अंगरेज़ कौन्सिल ने इसके बदले
में राघोबा को कम्पनी की सेना सहित पूना भेजने और पेशवा की
मसनद पर बैठाने का वादा किया। यह नाजायज़ सन्धि ही पहले
मराठा युद्ध की जड़ थी।
कर्नल कीटिंग के अधीन कम्पनी की सेना और राघोबा की
सेना दोनों मिल कर राघोबा को ज़बरदस्ती
[अंगरेज़ों की] पेशवा की मसनद पर बैठाने की ग़रज़ से पूना
[पहली हार] की ओर बढ़ीं। उधर पूना दरबार ने सेनापति
हरिपन्त फड़के के अधीन एक सेना राघोबा की बग़ावत को दमन
करने के लिए गुजरात की ओर रवाना कर दी। १८ मई सन् १७७५
को आरास नामक स्थान पर दोनों ओर की सेनाओं में घमासान
संग्राम हुआ, जिसमें राघोबा और उसके मददगारों की हार हुई।
अंगरेज़ों की बहुत सी सेना और अनेक अंगरेज़ अफ़सर मारे गए।

२७८ भारत में अंग्रेज़ी राज
किन्तु बरसात सर पर थी, इसलिए बाग़ियों का पीछा करके
उनका सर्वनाश किए बिना ही हरिपन्त फड़के को अपनी सेना
सहित पूना लौट आना पड़ा।
नतीजा यह हुआ कि राघोबा और अंगरेज़ों को गुजरात में
अपनी साज़िशों के पक्का करने का अब और अच्छा मौक़ा मिला।
भारतीय नरेशों की आपसी ईर्ष्या की वजह से इस तरह की
साज़िशों के लिए मैदान उन दिनों भारत के
[पार्श्व-शीर्षक: अंगरेज़ों और] प्रायः हर प्रान्त में मिल सकता था। सन् १७६८
[पार्श्व-शीर्षक: गायकवाड़ में] में गुजरात के अन्दर महाराजा दमनाजी गायक
[पार्श्व-शीर्षक: सन्धि] वाड़ की मृत्यु हुई। तीन रानियों से उसके चार बेटे
थे—सयाजी, गोविन्दराव, मानिकजी और फ़तहसिंह। कई साल से
सयाजी और गोविन्दराव में गद्दी के लिए लड़ाइयाँ हो रही थीं।
फ़तहसिंह चारों में सबसे चलता हुआ और सयाजी के पक्ष में था।
करनल कीटिंग्ज जब राघोबा की सहायता के लिए सेना लेकर
बम्बई से गुजरात आया, उसने गोविन्दराव के विरुद्ध सयाजी
के साथ सन्धि करने की कोशिश की। २२ अप्रैल सन् १७७५ को
उसका एक दूत लैफ़्टिनेन्ट जॉर्ज लवीबॉण्ड बातचीत के लिए
फ़तहसिंह के पास पहुँचा। नौजवान फ़तहसिंह ने अंगरेज़ों के साथ
सन्धि करने से इनकार कर दिया और तिरस्कार के साथ
लवीबॉण्ड को अपने यहाँ से निकाल दिया।
बम्बई की कौन्सिल ने जब यह समाचार सुना तो फ़ौरन अपने
खुर्राट दूत मॉस्टिन को कीटिंग्ज की मदद के लिए पूना से गुजरात

पहला मराठा युद्ध २७६

भेजा। इस समय तक फड़के की विजयी सेना पूना वापस पहुँच
चुकी थी। मॉस्टिन अब पूना सं गुजरात चला आया और वहाँ पर
उसने अपनी चालों का जाल बिछाना शुरू किया। अन्त में अंगरेज़ों
और फ़तहसिंह गायकवाड़ के बीच सन्धि हो गई।
इस सन्धि के अनुसार भड़ोच, चिखली, वड़ियाव और कोरल
के तीनों परगने, जिनकी आमदनी कई लाख रुपए सालाना थी,
बिना किसी तरह की लड़ाई के कम्पनी को मिल गए और सयाजी
राव गायकवाड़ अंगरेज़ों की मदद् सं बड़ोदा की गद्दी पर बैठ
गया। गायकवाड़ का राज कुल अभी तक पेशवा को अपना
अधिराज मानता था, किन्तु अब से वह सदा के लिए मराठा
मराडल से फूट कर अलग हो गया और गुजरात में अंगरेज़ों के पैर
जम गए।
सूरत की सन्धि के अनुसार अंगरेज़ों ने साष्टी और बसई
दोनों पर क़ब्ज़ा कर लिया। किन्तु सूरत की सन्धि को पेशवा
सरकार ने स्वीकार न किया था और बाग़ी राघोबा को पेशवा
की मसनद पर बैठाने का निष्फल प्रयत्न कर अंगरेज़ पूना सरकार
को अपना दुशमन बना चुके थे।
अंगरेज़ों के सामने उस समय वास्तव में एक कठिन समस्या
थी। राघोबा के पेशवा बन सकने की सम्भावना बहुत ही कम थी
और बाग़ी राघोबा को मदद देने के बाद पूना सरकार से बातचीत
करने का उन्हें अब कोई मुंह न था। उनके गुप्तचर मॉस्टिन का
अब फिर पूना में घुस सकना तक नामुमकिन मालूम होता था।