भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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अफ़ग़ानों से पंजाब विजय किया और जिस मराठा सरदार को
वहाँ की हुकूमत सौंपी उसे 'दिल्ली' सम्राट का एक सूबेदार कहकर
नियुक्त किया। फिर भी दिल्ली दरबार की निर्बलता के सबब
मराठों की उस समय की सत्ता वास्तव में स्वाधीन सत्ता थी। और
पेशवा ही हिन्दोस्तान के उत्तर से दक्खिन और पूरब से पश्चिम
तक यानी अटक से करनाटक और बंगाल की सरहद से खम्भात
की खाड़ी तक फैले हुए इस विशाल मराठा साम्राज्य का क्रियात्मक
सम्राट था।
किन्तु यह मराठा साम्राज्य चन्द रोज़ भी अपने पूरे वैभव को
क़ायम न रख सका। मालूम होता है कि साम्राज्य
मराठा साम्राज्य के साथ ही साथ मराठा सरदारों में एक दूसरे
की अवनति से ईर्षा और प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी। वे श्रीहीन
किन्तु निरपराध और राष्ट्रोपयोगी दिल्ली सम्राट को भी तख़्त से
उतार कर उसकी जगह लेने के चक्कर में पड़ गए। उनमें से कुछ
अपने या अपने कुलों के लाभ के लिए अपने देशवासियों, यहाँ तक
कि स्वयं पेशवा के ख़िलाफ़ विदेशियों से मेल करने में भी न झिझके।
एक पिछले अध्याय में लिखा जा चुका है कि इस तरह के भीतरी
दोषों के कारण ही मराठों की सत्ता को पहला धक्का सन् १७६१ में
पहुँचा, जबकि पानीपत के ऐतिहासिक मैदान में अहमदशाह
अब्दाली की सेना ने मराठों की संयुक्त सेना को हरा कर उन्हें उत्तरीय
भारत से सदा के लिए निकाल बाहर किया। उसी समय
से दिल्ली के सम्राट पर से मराठों का प्रभाव उठ गया और उस