भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपहला मराठा युद्ध २६५
अयोग्य वंशज सतारा के क़िले के अन्दर पेशवा की सेना की
हिफ़ाज़त में अभी तक अपनी नाम मात्र की गद्दी क़ायम रक्खे हुए
थे। किन्तु सारा शासन प्रबन्ध पेशवा के योग्य और प्रबल हाथों में
था। पेशवा के अलावा मराठा साम्राज्य के चार मुख्य स्तम्भ यानी
'महाराष्ट्र मण्डल' के चार मुख्य सदस्य, सींधिया, होलकर, गाय-
कवाड़ और भोंसला थे। ये चारों चार बड़े बड़े राज्यों के स्वतंत्र
शासक थे, किन्तु सब पेशवा को अपना अधिराज मानते थे। उसे
बराबर ख़िराज देते थे और हर लड़ाई में आज्ञा मिलने पर अपनी
सेनाओं सहित पेशवा की सहायता के लिए हाज़िर हो जाते थे।
पहले पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने दिल्ली सम्राट फ़र्रुख़सीयर के
दरबार में हाज़िर होकर प्रसिद्ध देशहितैषी भाइयों सय्यद अब्दुल्ला
और सय्यद हुसेनअली की मदद से सम्राट से मराठा राज के लिए
'स्वराज' का परवाना हासिल किया। सम्राट ने फ़रमान जारी कर
दिया कि इस मराठा 'स्वराज' के अलावा दक्खिन के सूबेदार के बाक़ी
तमाम इलाक़ों पर भी मराठों को 'चौथ' मिला करे। पेशवा ने सम्राट
की वफ़ादारी की क़सम खाई और अपनी सेना द्वारा साम्राज्य की
रक्षा करते रहने का वादा किया। वास्तव में यह 'चौथ' इसी उद्देश
से दी गई थी कि उससे पेशवा मुग़ल साम्राज्य के तमाम दक्खिनी
इलाक़े की हिफ़ाजत के लिए सेना रख सके। इसके बाद हर पेशवा
और उसके मातहत समस्त मराठा नरेश कम से कम नाम के लिए
दिल्ली के सम्राट को सारे भारत का सम्राट और अपना महाराजा-
धिराज मानते थे। रघुनाथ राव ने दिल्ली सम्राट ही के नाम पर