भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ भारत में अंगरेज़ी राज
मिलकर मराठों पर हमला करतीं तो यह देखकर उन्हें बहुत बड़ा सन्तोष
होता।"*
इसी इच्छा को पूरा करने के लिए अंगरेज़ों ने राघोबा को
बहकाना शुरू किया कि दक्खिन का सूबेदार निज़ामुलमुल्क मराठों
पर हमला करने वाला है।
राघोबा की अदूरदर्शिता से पेशवा माधोराव और बम्बई के
अंगरेज़ गवरनर इन दोनों के बीच यह सन्धि हो गई कि यदि
निज़ाम मराठों पर हमला करे, तो अंगरेज़ सेना और सामान से
मराठों की मदद करेंगे और इस मदद के बदले में पच्छिमी तट पर
साष्टी (Salsette) का टापू और बसईं (Bassein) का क़िला
दोनों पेशवा की ओर से अंगरेज़ों को दे दिए जावेंगे।
न निज़ाम ने मराठों पर हमला किया, न मराठों को अंगरेज़ों
की मदद की ज़रूरत हुई, और न साष्टी और बसईं उस समय
अंगरेज़ों के हवाले किए गए, फिर भी इस सन्धि के समय से ही
अंगरेज़ों की पेशवा दरबार के अन्दर पहुँच हो गई। उन्हें मराठों की
भीतरी कमज़ोरियों का पता लगने लगा और मराठा साम्राज्य के
अन्दर अपनी साज़िशों के फैलाने का मौक़ा मिलने लगा।
दक्खिनी भारत के सम्बन्ध में इस समय कम्पनी की नीति के
तीन मुख्य पहलू थे, दूसरे शब्दों में उनकी तीन मुख्य इच्छाएँ थीं,
- "The Court of Directors, were desirous of seeing the Marhattas
checked in their progress, and would have beheld combinations of the other
native powers against them with abundant satisfaction."--History of the
Marhattas, by Grant Duff.