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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पर मत भूलो हे राजाओ! कि तुम्हारे कृत्यों और अकृत्यों का कड़ा हिसाब
लिया जायेगा, और नया जन्म पायी हुई जनता तुम्हारे साथ तुम्हारे ही ढंग से हिसाब
चुकता करने में नहीं चूकेगी। हर कोई जो जनता के साथ सक्रिय रूप से
विश्वासघात करेगा, अपने पुरखों का तिरस्कार करेगा, और माँ के ख़िलाफ़
जाकर अपने खून को गन्दा करेगा...उसे कुचल कर धूल और गर्द में मिला दिया
जायेगा...। क्या तुम्हें हमारे इस कठोर संकल्प पर शुबहा है? अगर है, तो सुन लो
नाम धींगरा¹ का और चुप कर जाओ। उस शहीद का नाम लेकर कहते हैं कि अरे
भारतीय राजाओ, इन शब्दों पर गम्भीरता से और गहराई से सोचो। जैसी मर्ज़ी हो
करो, लेकिन तुम वही पाओगे जो बोओगे। चुन लो कि तुम राष्ट्र के संस्थापकों में
पहला बनोगे या राष्ट्र के अत्याचारियों में आख़िरी।
पृष्ठ 196, इण्डियन अनरेस्ट
“तय करो, ओ भारतीय शासको”²
अछूत :
राजनीतिक दृष्टिकोण से भारतीय आबादी के लाखों-लाख लोगों का अपने
शासकों की आस्था के अनुरूप धर्मान्तरण ऐसी सम्भावनाओं के द्वार खोल देगा कि
मैं उनका विस्तारपूर्वक वर्णन करने की ज़रूरत नहीं महसूस करता।
पृष्ठ 184³

  1. मदनलाल धींगरा : लन्दन में ‘इण्डियन होमरूल सोसायटी’ तथा ‘इण्डिया हाउस ग्रुप’
    से जुड़े युवा क्रान्तिकारी। इसकी स्थापना क्रान्तिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लाला हरदयाल,
    सावरकर और धींगरा जैसे देशभक्त युवाओं को साथ लेकर की थी। मदनलाल धींगरा ने
    बंग-भंग और उसके बाद देश में चले आन्दोलन पर बर्बर दमन के विरोध में सर विलियम
    कर्जन वायली की लन्दन में 1 जुलाई 1909 को गोली मार कर हत्या कर दी। उन्हें बाद में
    फाँसी दे दी गयी।
  2. “तय करो, ओ भारतीय शासको” शीर्षक यह परचा राष्ट्रवादी क्रान्तिकारियों ने भारत
    के रजवाड़ों/रियासतों के शासकों के नाम भेजा था। एक शासक ने इसे शिरोल को दिया था
    जिसने इसके दो हिस्से अपनी पुस्तक इण्डियन अनरेस्ट में शामिल किये।
  3. शिरोल, इण्डियन अनरेस्ट, अध्याय ‘दलित जातियाँ’ से
    672 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

पृष्ठ 280 (137)
हत्या नॉय यज्ञ¹
सोने की मुद्रा पाने के लालच में मानव वेषधारी कुछ देशी नरपिशाचों, भारत
के कलंक - पुलिस - ने वारीन्द्र घोष² आदि उन महान सपूतों को गिरफ़्तार कर
लिया, जो अपने निजी हितों का बलिदान करके और बम बनाने जैसे 'यज्ञ' के
पवित्र अनुष्ठान को पूरा करने में अपने जीवन को समर्पित करके, अपने देश की
आज़ादी के लिए काम कर रहे थे। इन नरपिशाचों में सबसे बड़ा नरपिशाच, आशुतोष
विश्वास³ इन बहादुर सपूतों को फाँसी के तख्ते पर पहुँचाने का रास्ता साफ़ करने
लगा। लेकिन शाबास चारू⁴! (आशुतोष विश्वास को ख़त्म करने वाले) तुम्हारे
माँ-बाप सर्वपूज्य हैं। तुमने उनका गौरव बढ़ाया, सर्वोच्च साहस का परिचय दिया,
जो इस क्षणभंगुर जीवन की परवाह न करते हुए, उस नरपिशाच की इस दुनिया
से छुट्टी कर दी। अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए जब गोरों ने, छल-बल से भारत को
भारतीयों (मूल पाठ में मुहम्मदनों – स.) से, उचक्कों की तरह झपट लिया था।
और वह कमीना शम्स-उल-आलम⁵, जिसने उस आलमगीर पादशा⁶ का रास्ता

  1. हत्या नहीं यज्ञ : यह पूरा अवतरण शिरोल की पुस्तक इण्डियन अनरेस्ट (मैकमिलन एण्ड
    कम्पनी, लन्दन से 1910 में प्रकाशित) के टिप्पणियों वाले हिस्से से लिया गया है। इसमें “द
    रिमूवल ऑफ़ इनफार्मर्स” (भेदियों का सफाया) शीर्षक के अन्तर्गत लिखा गया है कि
    “शम्स-उल-आलम की हत्या के तुरन्त बाद निम्नलिखित अपील” क्रान्तिकारियों द्वारा कलकत्ते
    में जारी की गयी :
    ‘हत्या नॉय यज्ञ’ (हत्या नहीं यज्ञ)
    नक़द इनाम : एक यूरोपीय या दो भेदियों का सिर काटने पर
    50वाँ अंक, कलकत्ता, रविवार चैत्र अष्टमी 1316)
  2. वारीन्द्र घोष : अरविन्दो घोष के छोटे भाई और क्रान्तिकारियों के मानिकतला ग्रुप के
    एक नेता, जो अलीपुर षड्यन्त्र केस (मई 1909) के अभियुक्त थे; वे ‘युगान्तर’ नामक
    क्रान्तिकारी पत्र भी प्रकाशित करते थे।
  3. आशुतोष विश्वास : क्रान्तिकारियों को सज़ा दिलाने के लिए तमाम गलत तरीक़े अपनाने
    वाला अंग्रेज़परस्त एक सरकारी वकील जिसे अलीपुर पुलिस कोर्ट से बाहर क्रान्तिकारी चारु
    चन्द्र गुहा ने गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया।
  4. चारुचन्द्र गुहा : एक वीर तरुण जिसने दायें हाथ की हथेली जन्म से ही नहीं होने के
    बावजूद देशद्रोही सरकारी वकील आशुतोष विश्वास को गोली मार दी। उसे 10 मार्च 1909
    को अलीपुर सेन्ट्रल जेल में फाँसी दे दी गयी।
  5. शम्स-उल-आलम : ब्रिटिश पुलिस का सी.आई.डी. इंस्पेक्टर जो क्रान्तिकारियों की
    सुराग़रशी करता था। उसे वीरेन्द्रनाथ दत्त ने 24 जनवरी, 1910 को गोली से उड़ा दिया; इस
    नौजवान क्रान्तिकारी को 21 फ़रवरी 1910 को फाँसी दे दी गयी।
  6. आलमगीर पादशा : मुगल बादशाह औरंगजेब
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 673

अपनाया, जिसने सोने की मुद्रा पाने की लालच में पूर्वजों के नाम को कलंकित
किया – आज उस दुराचारी को तुमने भारत की इस पवित्र धरती से मिटा दिया
है। नरेन गोसाईं¹ से लेकर तलित चक्रवर्ती तक सभी उस कमीने जालसाज़
शम्स-उल-आलम की जालसाज़ियों और यातना के फलस्वरूप सरकारी गवाह बन
गये थे। अगर तुमने नरपिशाचों के इस मददगार की छुट्टी नहीं कर दी होती, तो
क्या भारत के लिए कोई उम्मीद बची रह जाती?
कई लोग यह चीख़-पुकार मचा रहे हैं कि विद्रोह करना महापाप है। लेकिन
विद्रोह है क्या? क्या भारत में कोई ऐसी चीज़ है, जिसके ख़िलाफ़ विद्रोह किया
जाए? क्या एक फिरंगी को भारत का राजा माना जा सकता है, जिसके स्पर्शमात्र
से, जिसकी महज परछाईं पड़ जाने से ही हिन्दू अपना शुद्धिकरण करने के लिए
बाध्य हो जाते हैं?
ये महज पश्चिमी लुटेरे हैं जो भारत को लूट रहे हैं...। उन्हें निकाल बाहर करो,
हे भारत के सपूतों! वे तुम्हें जहाँ कहीं भी मिलें, उन पर और उनके साथी जासूसों
और खुफ़िया एजेण्टों पर कोई रहम मत करो। पिछले वर्ष, अकेले बंगाल में ही 19
लाख लोग बुखार, चेचक, हैजा, प्लेग और दूसरी बीमारियों से मर गये। तुम
अपनेआप को भाग्यशाली समझो कि तुम बच गये, लेकिन याद रखो कि कल तुम
भी प्लेग और हैजा की चपेट में आ सकते हो। क्या तुम्हारे लिए बेहतर नहीं होगा
कि तुम बहादुरों की मौत मरो?
जब ईश्वर का यही विधान है, तो ज़रा सोचो, कि क्या इस शुभ बेला में भारत
के हरेक सपूत का कर्तव्य नहीं है कि वह इन गोरे दुश्मनों का संहार करे? [पृष्ठ
282 (138) पर जारी]² अपनेआप को प्लेग और हैजा से मत मरने दो, ऐसा करके
भारत माँ की पवित्र धरती को दूषित मत करो। पुण्य और पाप में फ़र्क़ करने के
लिए हमारे शास्त्र हमारे मार्गदर्शक हैं। हमारे शास्त्र बार-बार हमें बताते हैं कि इन
गोरे कमीनों और उनके सहयोगियों एवं सहअपराधियों को क़त्ल करना अश्वमेध
यज्ञ के बराबर है। आओ, सब के सब आओ। आओ हम सब मिलकर इस बलिवेदी
पर अपनी यज्ञाहुति अर्पित करें, और प्रार्थना करें कि इस यज्ञ में सारे गोरे साँप
इसकी ज्वाला में वैसे ही भस्म हो जायें जैसे जनमेजय यज्ञ में साँप नष्ट हो गये
थे। याद रखो, यह हत्या नहीं, यज्ञ है।
(पृष्ठ 342, नोट्स) आइ.यू.³

  1. पूरा नाम नरेन्द्रनाथ गोसाई : मुज़फ़्फ़रपुर बम काण्ड में (जिसके लिए खुदीराम बोस को
    फाँसी दे दी गयी) ब्रिटिश सरकार का मुख़बिर, जिसे 31 अगस्त 1908 को कनाई लाल दत्त
    और सत्येन्द्र नाथ दत्त ने मार डाला।
  2. नोटबुक पृष्ठ संख्या 281 नहीं है, पर पृष्ठ (137) के बाद पृष्ठ (138) का क्रम ठीक
    है।
  3. शिरोल की पुस्तक इण्डियन अनरेस्ट
    674 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

“भारत में कुल मतदाता 62,00,000 अर्थात भारत की कुल आबादी का 2¾
प्रतिशत हैं जिसमें वे क्षेत्र शामिल नहीं, जिन पर 1919 का क़ानून नहीं लागू होता
था।”
194
आइ.ओ.एन.¹
पृष्ठ 283 (140)²
इण्डिया ओल्ड एण्ड न्यू : शिरोल वी.
“ब्रिटिश लोग यह जान लें कि यदि वे न्याय नहीं करना चाहते, तो यह प्रत्येक
भारतीय का परम कर्त्तव्य बन जायेगा कि इस साम्राज्य को नष्ट कर दे।”
महात्माजी³ (नागपुर कांग्रेस)
देहात और शहर का सवाल
कुछ सरकारी बुद्धिमत्ता इस रूप में दिखायी गयी थी कि भौगोलिक स्थिति
पर बिना ध्यान दिये, दूर-दराज के शहरों को एक निर्वाचन क्षेत्र में रख दिया गया
था, ताकि ऐसे शहरी व्यक्तियों को, जोकि (सरकार के) न चाहते हुए भी अधिक
विकसित राजनीतिक दृष्टिकोण पा चुके थे, उन देहाती निर्वाचन क्षेत्रों से उम्मीदवार
बनने से रोका जा सके, जिनमें यदि उपर्युक्त व्यवस्था न की गयी होती तो कई
एक छोटे शहर भी स्वाभाविक तौर पर शामिल हो जाते। यह एक आख़िरी कोशिश
थी जो इस विश्वास पर आधारित थी कि पंजाब की आबादी को बकरियों और
भेड़ों के रूप में विभाजित किया जा सकता था, जिसमें बकरियाँ ‘विश्वासघाती’
शहरी लोग तथा भेड़ें ‘विश्वासपात्र’ किसान समुदाय के लोग माने गये थे।⁴
खालसा कालेज 1892 में स्थापित हुआ⁵

  1. शिरोल की पुस्तक इण्डिया ओल्ड एण्ड न्यू
  2. नोटबुक पृष्ठ 282 के बाद पृष्ठ 283 का क्रम तो ठीक है पर (138) के बाद (139) नहीं,
    बल्कि (140) दिया गया है।
  3. महात्मा गाँधी; शिरोल की पुस्तक इण्डिया ओल्ड एण्ड न्यू से उद्धृत
  4. इण्डिया ओल्ड एण्ड न्यू से ही उद्धृत
  5. मूल में, पेज के नीचे की ओर हाशिये पर तिरछा लिखा हुआ
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 675

पृष्ठ 284 (141)
भारत जैसा मैंने इसे जाना$^1$
एक ‘महात्मा’ का रास्ता सचमुच कठिन है, और यह आश्चर्यजनक नहीं है
कि गाँधी ने हाल ही में इस उपाधि को – और इसकी ज़िम्मेदारियों को त्याग देने
की कोशिश की है। भारत में उनका प्रभाव निरन्तर घटता जा रहा है, फिर भी उनका
संन्यासी का बाना और महान नैतिक सच्चाइयों के रूप में उनके द्वारा अत्यन्त
कुशलता से निरूपित किये जाने वाले अस्पष्ट और अव्यावहारिक तोलस्तोय मार्का
सिद्धान्त बहुतेरे लोगों को सार्थक लगने का भ्रम देते हैं तथा भावुक इंग्लैण्ड के
दुर्बल मन वाले तथा फ़्रांस के कुछ तर्कशील लोग भी इसी भ्रम में हैं, जो पूर्व से
एक नयी रोशनी की उम्मीद लगाये हुए हैं। पृष्ठ 65
भेदिया$^2$ :
आयरिश षड्यन्त्रों में जो घृणित लेकिन उपयोगी वर्ग आमतौर पर (भेदियों
की – स.) आपूर्ति किया करता था, वह जड़मूल से क्यों सूख गया, इसके मुख्य
कारणों में से मैं समझता हूँ एक तो यही रहा है कि सत्ताधारी अपने भेदिये को
छिपाने और बचाने में असफल रहे (जैसे जेम्स कैरी के मामले में, जबकि उसी
ने क्रान्तिकारियों के अभेद्य गिरोह का रहस्योद्घाटन किया था और उसी के साक्ष्य
पर ब्रैडी, फिट्ज़हरबर्ट और मुलेन को फीनिक्स पार्क की दो हत्याओं, अर्थात चीफ़
सेक्रेटरी और अण्डरसेक्रेटरी की हत्याओं के बदले फाँसी पर चढ़ा दिया गया। उस
भेदिये की एक नौजवान क्रान्तिकारी ओ'डॉनैल ने, डरबन में, दिन-दहाड़े गोली
मारकर हत्या कर दी।$^3$) गो कि हत्या करने वाला पकड़ा गया। महायुद्ध से पहले

  1. सर माइकेल ओ'ड्वायर (1885-1823) की पुस्तक इण्डिया ऐज़ आई निउ इट से
    उद्धृत, जो 1925/28 में लन्दन से प्रकाशित हुई। 1988 में मित्तल पब्लिकेशंस, दिल्ली से
    पुनर्मुद्रित। ओ'ड्वायर प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान पंजाब का लेफ्टिनेण्ट गवर्नर था, उसने पंजाब
    से बड़े पैमाने पर नौजवानों की ज़बरन सेना में भरती करायी, लोगों को युद्ध के लिए सरकार
    को ऋण देने पर बाध्य किया और राजनीतिक नेताओं को क्रूरतापूर्वक प्रताड़ित किया।
    जलियाँवाला बाग़ काण्ड का उसने समर्थन किया। बाद में, ऊधमसिंह ने लन्दन में उसकी हत्या
    कर दी।
  2. इस हिस्से में ओ'ड्वायर ने आयरलैण्ड के क्रान्तिकारियों द्वारा ब्रिटिश सरकार के भेदियों
    के सफाये का उदाहरण देते हुए पंजाब में खुद उसके द्वारा क्रान्तिकारियों के विरुद्ध अपनाये
    तरीक़ों की चर्चा की है।
  3. जब आयरिश क्रान्तिकारियों ने फीनिक्स पार्क में चीफ़ और अण्डरसेक्रेटरियों की हत्या
    कर दी, तब उन्हें पकड़वाने और फाँसी चढ़वाने में जेम्स कैरी ने मुखबिर की भूमिका निभायी,
    हालाँकि उसकी भी पैट्रिक ओ'डोनेल नामक क्रान्तिकारी ने गोली मारकर हत्या कर दी, जिससे
    भारत के क्रान्तिकारियों को भारी मनोबल प्राप्त हुआ।
    676 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

और उसके दौरान, पंजाब के लेफ़्टीनेण्ट गवर्नर के रूप में, मेरा कई क्रान्तिकारी
षड्यन्त्रों से पाला पड़ा, जिनका पर्दाफ़ाश करने में भेदियों की जाति ने एक बड़ी
भूमिका अदा की, और हमारी सतर्कता इतनी मुकम्मल रही कि एक भी मामले
में किसी भी भेदिये पर कोई आँच नहीं आयी।¹
पृष्ठ 285 (142)
मैं समझ सकता हूँ कि अपनी नीचताभरी चालबाज़ी, असामान्य अहम्मन्यता,
दुरभिसन्धि रचने की अपनी जन्मजात रुझान, और अरुचिकर तथ्यों पर पर्दा डालने
की क्षमता से पूरी तरह लैस भारतीय षड्यन्त्रकारी कैसे इस माहौल में आराम से
काम करते थे।
पृष्ठ 187
इण्डिया ऐज़ आइ निउ इट²
आर्यसमाज :
वास्तव में आर्यसमाज पश्चिमी प्रभाव के विरुद्ध एक राष्ट्रवादी पुनर्जागरण है।
यह इस सम्प्रदाय के संस्थापक दयानन्द के आधिकारिक ग्रन्थ, सत्यार्थ प्रकाश में
अपने अनुयायियों का आह्वान करता है कि वे वेदों की ओर लौटें और आर्यों के
काल्पनिक स्वर्णिम अतीत में स्वर्णिम भविष्य की तलाश करें। सत्यार्थ प्रकाश
गैर-हिन्दू शासन के विरुद्ध दलीलें भी देता है, और कुछ वर्ष पहले, इस सम्प्रदाय
के एक अग्रणी मुखपत्र ने तो दयानन्द को ही स्वराज के सिद्धान्त का असली
प्रवर्त्तक होने का दावा भी किया।
लेकिन 1907 में जब कुछ शरारती लोगों ने आर्य समाज के विरुद्ध अफ़वाहें
फैलाना शुरू किया, तब इस सम्प्रदाय ने अपने पुराने धर्म सिद्धान्त को दोहराते हुए
इस आशय का एक प्रस्ताव प्रकाशित करने की बुद्धिमत्ता दिखायी कि इस संगठन
का किसी भी क़िस्म के राजनीतिक निकाय या किसी भी क़िस्म के राजनीतिक
आन्दोलन से कोई सम्बन्ध नहीं है। अब यदि एक निकाय के रूप में समाज द्वारा
चरमपन्थी राजनीति से सम्बन्ध-विच्छेद के इस दावे को मान भी लिया जाये, तब
भी कट्टर हिन्दुओं के लिए यह बात ग़ौरतलब होनी ही चाहिए कि भले ही, आर्य
समाज में पंजाब की हिन्दू आबादी के 5 प्रतिशत से अधिक लोग शामिल नहीं हैं,
फिर भी 1907 से लेकर आज तक हिन्दुओं की एक बड़ी आबादी जो राजद्रोह

  1. ओ'ड्वायर की पुस्तक इण्डिया ऐज़ आई निउ इट से
  2. ओ'ड्वायर की पुस्तक
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 677

और दूसरे राजनीतिक अभियोगों के तहत दण्डित होती रही है, वह इस समाज की
ही सदस्य रही है।
पृष्ठ 184, वही
पृष्ठ 286 (143)
भारत के बारे में सांख्यिकीय आँकड़े :
इंग्लैण्ड और वेल्स में 4/5 आबादी शहरों में रहती है।
शहरी जीवन का मानक वहाँ से ⎫ भारत (ब्रिटिश)
शुरू होता है जब 1000 लोग ⎪ कुल
एक साथ रहने लगते हैं। केवल ⎪ 244,000,000
तभी नगरपालिका की ओर से ⎬ में से
जलनिकास, रोशनी और पानी की ⎪ 226,000,000 लोग
आपूर्ति की व्यवस्था की जा ⎪ गांवों में रहते हैं।
सकती है। ⎭
इंग्लैण्ड – सामान्य समयों में
मुहैया करता है 58 % (आबादी का – स.) उद्योग को
8 % कृषि को
भारत देता है 71 % कृषि को
12 % उद्योग को
5 % व्यापार को
2 % घरेलू सेवाओं को
1)% स्वतन्त्र पेशों को
1)% सेना समेत, सरकारी सेवा को।
— पूरे भारत में 31 करोड़ 50 लाख लोगों में से 22 करोड़ 60 लाख लोग भूमि
पर आश्रित हैं।
— उनमें से 20 करोड़ 80 लाख लोग सीधे कृषि पर जीते या आश्रित हैं।
(मॉण्टफ़ोर्ड रिपोर्ट)¹

  1. मॉण्टफ़ोर्ड रिपोर्ट : भारतीय संवैधानिक सुधारों पर तैयार की गयी रिपोर्ट। इसे मॉण्टफ़ोर्ड
    रिपोर्ट इसलिए कहा गया कि इसे सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट, मॉण्टेग्यू, और गवर्नर जनरल चेम्सफ़ोर्ड ने
    मिलकर तैयार किया था। यह रिपोर्ट 8 जुलाई 1918 को प्रस्तुत की गयी।
    678 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

पृष्ठ 288 (144)
कुल क्षेत्रफल - 1,800,000 वर्ग मील
ग्रेट ब्रिटेन से 20 गुना बड़ा

  • 700,000 वर्गमील या 1/3 से अधिक राज्यों के अधीन है। भारतीय
    राज्यों की संख्या 600 है।
  • बर्मा फ़्रांस से बड़ा है। मद्रास और बम्बई (प्रान्त), अलग-अलग इटली
    से बड़े हैं।
    भारत की कुल जनसंख्या (1921 की जनगणना) -
    318, 942, 000
    अर्थात कुल मानवजाति का 1/5
  • 247,000,000 आबादी ब्रिटिश भारत में और
    71,900,000 राज्यों में है।
    25 लाख लोग अंग्रेज़ी पढ़ना जानते हैं - प्रति एक हज़ार पुरुषों में से 16
    और प्रति हज़ार स्त्रियों में से 2
    देशी भाषाओं की कुल संख्या 222 है
    गाँवों की कुल संख्या 500,000¹
    पृष्ठ 288 (145 )
    स्वेज नहर 1869 में खुली।
    उस समय भारत का कुल निर्यात था :
    रु. 80 करोड़ = £ 80,000,000
    1926-27 और उसके पहले के दो वर्षों में इसका औसत था :
    रु. 350 करोड़, अर्थात लगभग £ 262,500,000
  1. उपरोक्त सभी आँकड़ों का स्रोत सम्भवतः मॉण्टफ़ोर्ड रिपोर्ट
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 679

कुल जनसंख्या = 31 करोड़ 90 लाख
जिसमें से 3 करोड़ 20 लाख 50 हज़ार अर्थात 10.2 प्रतिशत लोग
क़स्बों और शहरों (शहरी क्षेत्र) में रहते हैं,
जबकि इंग्लैण्ड में यह 79 % है।¹
और काम का सबसे कठिन हिस्सा होगा झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वालों के
दिमाग़ में कुछ बेहतरी की इच्छा को बिठाना।
पृष्ठ 22
साइमन रिपोर्ट²

  1. आंकड़ों का स्रोत अस्पष्ट
  2. साइमन रिपोर्ट : रिपोर्ट ऑफ़ द इण्डियन स्टैट्यूटरी कमीशन (साइमन कमीशन) (लन्दन,

680 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

<u>पृष्ठ 304¹</u>
भगतसिंह
के लघु हस्ताक्षर
दिनांक 12.9.1929

  1. नोटबुक में पृष्ठ 289 से पृष्ठ 303 तक कुछ नहीं अंकित है। नोटबुक के प्रथम पृष्ठ पर
    नोटबुक में पृष्ठों की संख्या 404 अंकित है। परन्तु पृष्ठ 305 से लेकर पृष्ठ 404 तक के पन्नों
    का कोई अता-पता नहीं है। कुल 304 पृष्ठ उपलब्ध हैं जिन पर रबर की मुहर से नम्बर डाले
    गये हैं। ये नम्बर कब और किसने डाले यह स्पष्ट नहीं है। शेष 100 पृष्ठ क्या हुए? वे ग़ायब
    हो गये या किसी अन्य काम के लिए इस्तेमाल किये गये, यह भी स्पष्ट नहीं है।
    भगतसिंह ने कुल 145 पृष्ठों पर नोट्स लिये हैं जिनमें बीच-बीच में ख़ाली पृष्ठ हैं।
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 681

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परिशिष्ट
भगतसिंह की जेल नोटबुक : एक महान
विचारयात्रा का दुर्लभ साक्ष्य
एल. वी. मित्रोखिन
अक्टूबर, 1967 में एक वयोवृद्ध भारतीय क्रान्तिकारी विजय कुमार सिन्हा से मेरी
भेंट हुई। 1929 में अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें उस मुक़दमे में सज़ा दिलवायी थी, जो
इतिहास में लाहौर षड्यन्त्र केस के नाम से जाना जाता है। उन दिनों की घटनाओं
को याद करते हुए श्री सिन्हा ने महान भारतीय क्रान्तिकारी भगतसिंह के बारे में
बताया, जो फाँसी के तख़्ते पर चढ़ने से कुछ घण्टे पहले तक लेनिन की जीवनी
पढ़ते रहे थे।
कैसा अनुपम इच्छा-बल था उस वीर का! उन अकथनीय परिस्थितियों में,
फाँसी से पहले एक पुस्तक पढ़ना! परन्तु लेनिन के व्यक्तित्व का प्रभाव इतना
प्रबल था कि सुदूर औपनिवेशिक भारत में मृत्युदण्ड प्राप्त क़ैदी उनके जीवन का
वर्णन करने वाली पंक्तियों को यों पढ़ते थे, मानो जीवनदायी स्रोत से घूँट भर रहे
हों।
...सुबह का वक़्त था। इस दिन भगतसिंह तेईस वर्ष, पाँच महीने और छब्बीस
दिन के हुए थे। लाहौर का एक अख़बार देखते हुए भगतसिंह की नज़र हाल ही
में छपी लेनिन की जीवनी के बारे में एक लेख पर पड़ी।
लेनिन पर एक किताब...वह हर हालत में उसे पढ़ना चाहते थे। भगतसिंह जानते
थे कि औपनिवेशिक “न्यायालय” अपना फ़ैसला सुना चुका है और उन्हें फाँसी
मिलकर रहेगी। ये ऐसे क्षण होते हैं, जब आदमी की सबसे बड़ी इच्छा होती है कि
अपने प्रियजनों के अन्तिम दर्शन पा ले।
‘युगदृष्टा भगतसिंह और उनके मृत्युंजय पुरखे’ पुस्तक में भगतसिंह की
भतीजी वीरेन्द्र सिन्धु ने उनके अन्तिम दिनों का वर्णन इस प्रकार किया है। वह
लिखती हैं : “भगतसिंह के लिए लेनिन से अधिक क़रीबी और कौन था? वह
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 683

अपनी मृत्यु से पहले उनसे मिलने को उत्सुक थे और उनके लिए लेनिन की
जीवनी पढ़ने का अर्थ लेनिन से मिलना था।"
एक विलक्षण क्रान्तिकारी और भारत के राष्ट्रीय नायक भगतसिंह का जीवन,
जिन्हें ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों ने 1931 में फाँसी दे दी, एक वीर का
जीवन था। भारत के अलावा उनके बारे में सोवियत संघ और दूसरे देशों में भी
पुस्तकें लिखी गयी हैं।¹ मेरी 'लेनिन के बारे में भारत' में एक पूरा अध्याय 'वह
पुस्तक, जो भगतसिंह ने पढ़ी' इस वीर के जेल के जीवन को समर्पित है।²
और अब दस साल बाद मुझे नये दस्तावेज़ों के होने का पता चला, जो
भगतसिंह के भाई कुलबीर सिंह ने कृपापूर्वक मुझे दिखाये। उनका सारा परिवार
अपने रिश्तेदार से, जिसे नेहरू ने भारतीय लोगों के स्वतन्त्रता संग्राम का प्रतीक
कहा, सम्बन्धित सभी दस्तावेज़ जमा करता और सँभालकर रखता है। इन दस्तावेज़ों
से इस बात पर नया प्रकाश पड़ता है कि किस प्रकार भगतसिंह एक आतंकवादी
से विकसित होते हुए एक आस्थावान मार्क्सवादी बने। इनसे उनके साथियों पर
भगतसिंह के प्रभाव तथा उनके विचारधारात्मक विकास में भगतसिंह की भूमिका
का पता चलता है।
ये दस्तावेज़ हैं भगतसिंह की जेल डायरी, उन्होंने जो पुस्तकें पढ़ीं, उनके
सारांश और उद्धरण। इनके अस्तित्व का ज्ञान भारतीय पत्र-पत्रिकाओं से हुआ। 1968
में भारतीय इतिहासकार जी. देवल ने 'पीपुल्स पाथ' पत्रिका के लिए 'शहीद
भगतसिंह' लेख लिखा, जिसमें उन्होंने 200 पृष्ठों की एक कापी का ज़िक्र किया
और बताया कि उसमें अनेक विषयों पर भगतसिंह के नोट हैं, जिनसे उनकी रुचि
की व्यापकता का पता चलता है। कापी में पूँजीवाद, समाजवाद, राज्य की उत्पत्ति,
कम्युनिज़्म, धर्म, समाजविज्ञान, भारत, फ्रांस की क्रान्ति, मार्क्सवाद, सरकार के
रूपों, परिवार और अन्तरराष्ट्रीयतावाद पर नोट हैं। देवल ने ये नोट पढ़े और इस बात
पर ज़ोर दिया कि इन्हें प्रकाशित किया जाना चाहिए, हालाँकि उनकी यह इच्छा
अभी तक साकार नहीं हो पायी है।
यह कापी, जिसके बारे में श्री देवल ने लिखा, क्रान्तिकारी के दूसरे काग़ज़ात
के साथ जेल अधिकारियों ने 23 मार्च, 1931 को भगतसिंह को फाँसी देने के बाद
उनके परिवारवालों को सौंप दी और अब फरीदाबाद में रह रहे उनके भाई कुलबीर
सिंह के पास है।
इन दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता की न केवल इस तथ्य से पुष्टि होती है कि
वे क्रान्तिकारी के परिवार में सुरक्षित रखे गये हैं; कापी के पृष्ठ भगतसिंह की छोटे
अक्षरों की लिखायी से भरे हुए हैं, वह अंग्रेज़ी में लिखते थे, कहीं-कहीं उर्दू का
भी इस्तेमाल उन्होंने किया। पृष्ठ 68 पर तिथि अंकित है : 12.7.1930 और
हस्ताक्षर हैं : 'भगतसिंह'।
684 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

ये दस्तावेज़ युवा क्रान्तिकारी के समृद्ध आत्मिक जीवन पर, आत्म शिक्षा के
लिए उनके घोर परिश्रम तथा जेल में क़ैद के दौरान उनकी विचारधारात्मक खोज
पर प्रकाश डालते हैं। इन काग़ज़ों को सरसरी तौर पर देखने पर भी यह पता चलता
है कि इनका लेखक प्रखर बुद्धि का धनी व्यक्ति था, जो सोचने के आदतन ढंग
को त्यागने में सफल रहा और जिसने प्रगतिशील पश्चिमी चिन्तकों के विचारों को
आत्मसात किया। इन नोटों में मार्क्सवाद में भगतसिंह की रुचि ही शायद सबसे
अधिक महत्त्वपूर्ण है। उनके दृष्टिकोणों के इस पहलू को ही भारत और दूसरे देशों
के बुर्जुआ इतिहासकार छिपाने का यत्न करते हैं। अमेरिकी इतिहासकारों जी. डी.
ओवरस्ट्रीट और एम. विण्डमिलर का दावा है कि “ज़्यादातर इस सम्बन्ध के
आधार पर ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भगतसिंह को पार्टी का हीरो दिखाने की
कोशिश की है।”³
भगतसिंह के नोट, जो उन्होंने संक्षिप्त, सारगर्भित शीर्षकों के साथ लिखे,
उनकी व्यक्तिगत भावनाओं को भी प्रतिबिम्बित करते हैं। वह आज़ादी के लिए
तड़प रहे थे, इसीलिए उन्होंने बायरन, व्हिटमैन और वर्ड्सवर्थ की स्वतन्त्रता के
विषय पर पंक्तियाँ अपनी कापी में उतारीं। उन्होंने इब्सन के नाटक, दोस्तोयेव्स्की
का ‘अपराध और दण्ड’ और ह्यूगो का ‘पददलित’ उपन्यास पढ़े। रूसी
क्रान्तिकारी वेरा फ़िग्नर तथा रूसी विद्वान और क्रान्तिकारी न. मोरोज़ोव की
रचनाओं से जेल जीवन की कठिनाइयों के जो उद्धरण उतारे, वे उनकी
मनोभावनाओं के अनुरूप थे। उमर ख़य्याम की पंक्तियाँ भी थीं, जो यह दिखाती
हैं कि किस प्रकार भगतसिंह ने जीवन और मृत्यु के प्रश्नों पर मनन किया, जबकि
वे औपनिवेशिक अदालत के फ़ैसले की प्रतीक्षा कर रहे थे। भगतसिंह ने अपने को
मुक़दमे के लिए तैयार करने के उद्देश्य से क़ानून का भी अध्ययन किया।
जेल में पुस्तकें भगतसिंह की चिन्ता का प्रमुख विषय थीं। जुलाई, 1930 में
उन्होंने अपने मित्र जयदेव गुप्ता को लिखा : “कृपया लाहौर के द्वारकादास
पुस्तकालय के लाइब्रेरियन से पूछना कि बोर्स्टल जेल में क़ैदियों को किताबें भेजी
गयी हैं या नहीं। उन्हें किताबों की बहुत तंगी है। उन्होंने सुखदेव के भाई जयदेव
के हाथ सूची भेजी थी, मगर किताबें उन्हें नहीं मिलीं। अगर सूची खो गयी है, तो
ज़रा लाला फ़िरोज़चंद से विनती करना कि उसके बदले अपनी पसन्द से कुछ
रोचक पुस्तकें भेज दें। इस इतवार को उन्हें किताबें मिल जानी चाहिए थीं। कृपया
*विनती करना कि किताबें ज़रूर भेज दें।”*⁴
16 सितम्बर, 1930 को उन्होंने दुखी मन से अपने भाई कुलबीर सिंह को
लिखा कि फ़ैसला सुनाये जाने तक उनसे मिलने कोई नहीं आ सकता : “इसलिए
मेरी विनती है कि तुम ख़ान साहब के दफ़्तर जाना और वहाँ से मेरी किताबें और
दूसरी जो चीजें मैंने वहाँ छोड़ी हैं, ले लेना। मुझे लाइब्रेरी की पुस्तकों की बड़ी
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 685

चिन्ता है। फ़िलहाल मेरे लिए कोई किताबें लाने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि मेरे
पास अभी कुछ हैं। अच्छा हो, अगर तुम लाइब्रेरी से उन किताबों की सूची माँग
लो, जो मैंने वहाँ से निकलवायी थीं।”
क्रान्तिकारी जे. सान्याल ने, जो कुछ समय तक भगतसिंह के साथ जेल में
रहे थे, इस बात पर ज़ोर दिया है कि वह बड़े ध्यान से पढ़ने के लिए पुस्तकें चुनते
थे, डिकेंस, सिंक्लेयर, वाइल्ड और गोर्की उन्हें अधिक पसन्द थे।⁵
जेल में उन्होंने जिस राजनीतिक और वैज्ञानिक साहित्य की माँग की, उससे
उनकी रुचियों का पता चलता है। जुलाई, 1930 में उन्होंने दूसरे इण्टरनेशनल का
पतन और “वामपन्थी” कम्युनिज़्म (“वामपन्थी” कम्युनिज़्म : एक बचकाना
मर्ज – प्रत्यक्षतः ये दोनों पुस्तकें लेनिन की थीं), प. क्रोपोत्किन की ‘परस्पर
सहायता’ तथा मार्क्स की ‘फ़्रांस में गृहयुद्ध’ रचनाएँ मँगवायीं।
भगतसिंह के कुछ नोट उनकी जीवनी का आदर्शवाक्य हो सकते हैं। उदाहरण
के लिए, अमेरिकी समाजवादी यूजीन वी. डेब्स का निम्न कथन : “जब तक
निम्न वर्ग है, मैं उसमें हूँ। जब तक कोई अपराधी तत्त्व है, मैं उसमें हूँ। जब तक
कोई जेल में है, मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ” (भगतसिंह की डायरी का पृष्ठ 21। आगे
उनकी डायरी की पंक्तियों के बाद उसका पृष्ठ इंगित किया गया है)। पृष्ठ 29
पर उन्होंने लिखा : “निरर्थक घृणा की ख़ातिर नहीं, सम्मान, यश और आत्मश्लाघा
की ख़ातिर नहीं, बल्कि अपने ध्येय की कीर्ति की ख़ातिर तुमने ऐसा कुछ किया
है, जो कभी भुलाया नहीं जायेगा।”
स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष और दूसरों के लिए आत्मबलिदान के विचार हम
उनकी डायरी के हर पृष्ठ पर पाते हैं। पृष्ठ 23 पर भगतसिंह ने टॉमस जैफ़रसन⁵
के ये प्रसिद्ध शब्द लिखे : “आज़़ादी के बिरवे को समय-समय पर देशभक्तों और
तानाशाहों के ख़ून से ताज़ा किया जाना चाहिए। यह क़ुदरती खाद है।” इतिहास,
दर्शन और अर्थशास्त्र के विभिन्न विद्वानों की पुस्तकों से जो उद्धरण भगतसिंह ने
अपनी डायरी में उतारे, वे अत्यन्त रोचक हैं। कहना न होगा कि जेल के हालात
में वह कोई सुव्यवस्थित अध्ययन नहीं कर सकते थे, उनके लिए तो बाहर से
किताबें पाना तक मुश्किल था। उनके नोट पढ़ते हुए एक बात की ओर ध्यान जाता
है : उन्होंने ठेठ भारतीय समस्याओं की ओर कहीं कम ध्यान दिया। केवल कुछेक
बार ही लाला लाजपत राय, बिपिनचन्द्र पाल और मदन मोहन मालवीय जैसे
स्वतन्त्रता सेनानियों का उल्लेख किया। एक ब्रिटिश लेखक की पुस्तक में से उन्होंने
महात्मा गाँधी का केवल एक उद्धरण उतारा। वर्षों तक अंग्रेज़ों द्वारा भारत के शोषण
की विधियों का विश्लेषण और औपनिवेशिक राज्यतन्त्र के निरंकुश उपायों का
भण्डाफोड़ भारतीय देशभक्तों के अध्ययन का परम्परागत विषय रहा था। भगतसिंह
ने केवल दो-तीन बार इसका ज़िक्र किया है, शायद यह मानते हुए कि इस विषय
686 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, कि औपनिवेशिक दासता से उनके देश को मुक्त
कराने की आवश्यकता सबके लिए स्पष्ट और प्रमाणित बात हो गयी है। उस समय
उनका ध्यान समाज के विकास की आम समस्याओं में अधिक था, सो वह
भारतीय चिन्तकों की अपेक्षा पश्चिमी चिन्तकों की ओर अधिक उन्मुख हुए। जहाँ
उनके पूर्ववर्ती – राष्ट्रीय क्रान्तिकारी – भारत को ही विश्व के अन्तरविरोधों का
केन्द्र मानते थे, वहीं भगतसिंह संकीर्ण राष्ट्रीयतावादी पूर्वाग्रहों से पूरी तरह ऊपर उठ
गये थे और यह मानते थे कि भारत की समस्याएँ विश्व के विकास की परिधि
में ही हल की जा सकती हैं।
जिन लेखकों के उद्धरण भगतसिंह ने अपनी डायरी में उतारे, उनके प्रति उनके
रुख में पूरी सुसंगति है। शुरू में वह 18वीं सदी की अमेरिकी और फ़्रांसीसी
क्रान्तियों तथा विचारकों के प्रति भारतीय क्रान्तिकारियों का परम्परागत लगाव दर्शाते
हैं। उन्होंने रूसो⁷, टॉमस पेन⁸, टॉमस जैफरसन और पैट्रिक हेनरी⁹ के स्वतन्त्रता
तथा मानव के जन्मसिद्ध अधिकारों पर विचार नोट किये। पृष्ठ 16 पर उन्होंने
पैट्रिक हेनरी का निम्न भावपूर्ण कथन नोट किया : “क्या ज़िन्दगी इतनी प्यारी और
चैन इतना मीठा है कि बेड़ियों और दासता की क़ीमत पर उन्हें ख़रीदा जाये। क्षमा
करो, सर्वशक्तिमान प्रभु! मैं नहीं जानता कि वे क्या रास्ता अपनायेंगे, मुझे तो बस:
‘स्वतन्त्रता या मौत’ दो।”
तानाशाही की भर्त्सना करने के लिए भगतसिंह दर्शन की रचनाओं का ही नहीं,
ललित साहित्य का भी सहारा लेते हैं। मार्क ट्वेन के निम्न शब्द उन्होंने अपनी
डायरी में उतारे : “हम इस बात को भयानक मानते हैं कि लोगों की गरदनें उड़ायी
जाती हैं, लेकिन हमें यह देखना नहीं सिखाया गया है कि ज़िन्दगीभर लम्बी वह
मौत कितनी भयानक है, जो ग़रीबी और तानाशाही पूरी आबादी पर लादती है।”
पूँजीवादी विकास के नियमों को समझने के भगतसिंह के प्रयासों को प्रदर्शित
करती भी बहुत सारी सामग्री है। उन्होंने इस विषय को गम्भीरता से लिया और
सांख्यिक सामग्रियों का अध्ययन किया। ज्वलन्त सामाजिक अन्तरविरोधों को दिखाते
आँकड़ों की ओर उन्होंने सबसे पहले ध्यान दिया। विभिन्न लेखकों से जो उद्धरण
उन्होंने लिये, वे संक्षिप्त, किन्तु प्रभावोत्पादक हैं। उदाहरण के लिए, वह लिखते हैं
कि ब्रिटेन की आबादी का नौवाँ हिस्सा वहाँ के आधे उत्पाद को हथियाता है और
इस उत्पाद का केवल सातवाँ हिस्सा दो तिहाई आबादी के हिस्से में आता है; कि
अमेरिका की आबादी का एक प्रतिशत से कम अंश वह धनिक वर्ग है, जिसके पास
67 अरब डालर तक की सम्पत्ति है, जबकि 70 प्रतिशत आबादी सर्वहाराओं की है,
जो राष्ट्रीय उत्पाद के केवल चार प्रतिशत पर दावा कर सकती है।
बहुत से उद्धरण यह दिखाते हैं कि श्रमिकों के प्रति उनके मन में गहरी
सद्भावना थी और पूँजीवादी व्यवस्था के प्रति उनका रुख आलोचनात्मक था।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 687

उदाहरणतः, फूरिये का एक उद्धरण उन्होंने नोट किया और उसका शीर्षक रखा
: 'सबके ख़िलाफ़ अकेला' : “वर्तमान सामाजिक व्यवस्था एक बेहूदा कार्यतन्त्र
है, जिसमें समग्र के अंश एक-दूसरे के विपरीत हैं और समग्र के ख़िलाफ़ काम
करते हैं। हम देखते हैं कि समाज में प्रत्येक वर्ग अपने स्वार्थ के कारण दूसरे वर्गों
का अहित चाहता है, हर तरह से व्यक्तिगत हित को जन कल्याण के ख़िलाफ़
रखता है” (और आगे यह लिखते हैं कि डॉक्टर का स्वार्थ यह है कि समाज में
ज़्यादा से ज़्यादा रोग हों, वकील ज़्यादा से ज़्यादा मुक़दमे चाहता है, वास्तुकार और
बढ़ई चाहते हैं कि मकान जलें, इत्यादि)। इसी भावना में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के
जापानी विद्यार्थियों के समक्ष उस भाषण का उद्धरण है, जिसमें ठाकुर ने जापान
में पैसे के पीछे दौड़ को “मानवजाति के लिए भयानक ख़तरा” बताया, जो “शक्ति
के आदर्श को परिष्कार के ऊपर रखती है”।
ये सभी उद्धरण दिखाते हैं कि भगतसिंह पूँजीवाद को अस्वीकार करते हैं।
इसीलिए उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला : “सवाल यह नहीं है कि वर्तमान सभ्यता
को बदला जाना चाहिए या नहीं, बल्कि यह कि उसे कैसे बदला जायेगा।”
भगतसिंह ने पूँजीवाद की आलोचना सामाजिक और राजकीय, दोनों
व्यवस्थाओं के प्रसंग में की। पृष्ठ 46 पर लेनिन का नाम पहली बार आया है। यहाँ
भगतसिंह ने अमेरिकी समाजवादी मॉरिस हिलक्विट की पुस्तक 'मार्क्स से लेनिन
तक' से बुर्जुआ लोकतन्त्र के सीमित स्वरूप पर उद्धरण लिया : “पूँजीवाद में
लोकतन्त्र एक सार्विक अमूर्त लोकतन्त्र नहीं था, बल्कि विशिष्ट बुर्जुआ लोकतन्त्र,
या जैसाकि लेनिन ने इसे कहा था, बुर्जुआ वर्ग के लिए लोकतन्त्र।” आगे वह
लिखते हैं : “लोकतन्त्र सिद्धान्ततः राजनीतिक और क़ानूनी समानता की व्यवस्था
है, किन्तु ठोस और व्यावहारिक रूप में यह झूठ है, क्योंकि जब तक आर्थिक सत्ता
में भारी असमानता है, तब तक कोई समानता नहीं हो सकती, न राजनीति में और
न ही क़ानून के सामने।...पूँजीवादी शासन में लोकतन्त्र की सारी मशीनरी शासक
अल्पमत को श्रमिक बहुमत की यातनाओं के जरिये सत्ता में बनाये रखने के लिए
काम करती है।”
भगतसिंह ने बुर्जुआ व्यवस्था की विचारधारात्मक संरचना की ओर भी ध्यान
दिया और इस सिलसिले में बुर्जुआ समाज में धर्म की भूमिका में रुचि ली। अपने
लिए वह धर्म का प्रश्न हल कर चुके थे, इस समय तक वह एक पक्के
निरीश्वरवादी बन चुके थे। लेकिन उन्होंने भारतीय समाज में धर्म की भूमिका और
स्थान को तथा अपने साथियों, राष्ट्रीय क्रान्तिकारियों की विचारधारा पर इसके
प्रभाव को समझना चाहा।
'धर्म – स्थापित व्यवस्था का समर्थक : 'दासता' शीर्षक से उन्होंने
अमेरिका के प्रेसबिटेरियन चर्च की महासभा (1835) के प्रस्ताव का यह उद्धरण
688 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

नोट किया कि “दासता को बाइबिल के पुराने और नये धर्मग्रन्थों में मान्यता प्राप्त
है और ईश्वर की सत्ता उसकी निन्दा नहीं करती।” भगतसिंह आगे लिखते हैं कि
उसी वर्ष चार्ल्सटन बैपटिस्ट एसोसिएशन ने “अपने दासों के समय का उपयोग
करने के मालिकों के अधिकार” की पुष्टि की। इस सिलसिले में भगतसिंह ने इस
बात पर ज़ोर दिया कि धर्म ने “पूँजीवाद का समर्थन” किया है।
धर्म की उत्पत्ति के कारणों और उसके मर्म को समझने की चेष्टा में वह मार्क्स
की ओर उन्मुख हुए। पृष्ठ 40 पर हम मार्क्स की रचना ‘हेगेल के न्याय-दर्शन
की समालोचना का प्रयास’ से ‘धर्म के बारे में मार्क्स के विचार’ शीर्षक का
एक उद्धरण पाते हैं : “...मनुष्य धर्म की रचना करता है, धर्म मनुष्य की रचना नहीं
करता।...मनुष्य का अर्थ है मनुष्य का संसार, राज्य, समाज। यह राज्य, यह समाज
धर्म को, एक विकृत विश्वदृष्टिकोण को जन्म देते हैं, क्योंकि वे स्वयं एक विकृत
संसार हैं। धर्म इस संसार का सामान्य सिद्धान्त, उसका सार-संग्रह, सुबोध रूप में
उसका तर्क है।...धर्म के विरुद्ध संघर्ष परोक्ष रूप से उस संसार के विरुद्ध संघर्ष
है, जिसका आध्यात्मिक सन्तोष धर्म है।.. धर्म जनता के लिए अफ़ीम है।”
उल्लेखनीय है कि पृष्ठ 192 पर भगतसिंह ने अन्तिम वाक्य दोहराया है।
सो, अपने नोटों में भगतसिंह ने पूँजीवाद के उन्मूलन के पक्ष में ठोस तर्क पेश
किये। मार्क्सवाद-लेनिनवाद के संस्थापकों की भाँति वह भी यही मानते थे कि
भावी समाज केवल समाजवादी समाज ही हो सकता है। उनके नोटों में भावी समाज
का कोई विस्तृत विवरण तो नहीं है, किन्तु कुछ विचार यह दिखाते हैं कि वह
समाजवाद की धारणा का वैज्ञानिक अर्थ लगाते थे। उन्होंने भावी समाज के
दक्षिणपन्थी सामाजिक-जनवादियों के आदर्श को अस्वीकार किया तथा पूँजीवाद
के स्थान पर समाजवाद लाने की समस्या के प्रति सामाजिक-सुधारवादी रुख को
भी। उन्होंने पश्चिम के दक्षिणपन्थी समाजवादियों की भर्त्सना की और आर.
मैकडोनाल्ड को “ब्रिटिश लेबर पार्टी का साम्राज्यवादी नेता” कहा (पृष्ठ 13)।
पृष्ठ 52 पर दूसरे इण्टरनेशनल के नेताओं द्वारा मज़दूर वर्ग के ध्येय से की गयी
ग़द्दारी के बारे में हिलक्विट की पुस्तक से एक उद्धरण है।
जेल में वह पूरी तरह पूँजीवादी व्यवस्था का तख़्ता पलटने तथा सारी
मानवजाति के हित में अर्थव्यवस्था और सारी प्राकृतिक सम्पदा पर नियन्त्रण
स्थापित करने की ओर लक्षित विश्व समाजवादी क्रान्ति के विचार में तल्लीन रहे।
पृष्ठ 190 पर उन्होंने लिखा : “समाजवादी व्यवस्था : प्रत्येक से उसकी योग्यता
के अनुसार, प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार।” भगतसिंह समाजवाद में
संक्रमण को सर्वहारा के संघर्ष के साथ जोड़ते थे, जो भावी समाज में शासक वर्ग
बनेगा। पृष्ठ 69 पर ‘कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र’ का एक उद्धरण है :
“...मज़दूर वर्ग की क्रान्ति का पहला क़दम सर्वहारा वर्ग को उठाकर शासक वर्ग
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 689

के आसन पर बैठाना और जनवाद के लिए होने वाली लड़ाई को जीतना है।
“सर्वहारा वर्ग अपना राजनीतिक प्रभुत्व पूँजीपति वर्ग से धीरे-धीरे कर सारी
पूँजी छीनने के लिए, उत्पादन के सारे औज़ारों को राज्य, अर्थात शासक वर्ग के रूप
में संगठित सर्वहारा वर्ग, के हाथों में केन्द्रीकृत करने के लिए तथा समग्र उत्पादक
शक्तियों में यथाशीघ्र वृद्धि के लिए इस्तेमाल करेगा।”¹⁰
भगतसिंह ने यह भी इंगित किया कि यदि सर्वहारा का पथप्रदर्शन उसका
हरावल दस्ता, उसकी पार्टी, जो सर्वहारा क्रान्ति का अनिवार्य उपकरण है, न कर
रही हो, तो कोई क्रान्ति नहीं हो सकती। उन्होंने सर्वहारा गीत ‘इण्टरनेशनल’ के
शब्द अपनी डायरी में उतारे।
यह तर्कसंगत ही था कि भगतसिंह क्रान्ति के आरम्भ के नाते सशस्त्र विद्रोह
के प्रश्न पर पहुँचे। ऐसा विद्रोह भारतीय क्रान्तिकारियों की अनेक पीढ़ियों का लक्ष्य
रहा था, परन्तु वे इसे ला पाने में सफल नहीं रहे थे। यही कारण है कि भगतसिंह
ने इस विषय पर मार्क्सवादी रचनाओं में ख़ास दिलचस्पी ली। उन्होंने एंगेल्स की
रचना ‘जर्मनी में क्रान्ति तथा प्रतिक्रान्ति’ से लम्बे उद्धरण उतारे, हालाँकि ऐसा
उन्होंने मूल रचना से नहीं, बल्कि एक अन्य पुस्तक से किया था और इसीलिए
वह इस भ्रम में रहे कि वह मार्क्स को उद्धृत कर रहे हैं : “पहली चीज़ – विद्रोह
से तब तक खिलवाड़ न करें, जब तक आप उस खेल के परिणामों का सामना
करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं होते। विद्रोह तो एक ऐसा कलन है, जिसके
परिमाण सर्वथा अनिश्चित होते हैं, जिनका मूल्य रोज़ बदल सकता है। मुक़ाबले
में खड़ी शक्तियों को संगठन, अनुशासन तथा परम्परागत प्रतिष्ठा के सारे लाभ
उपलब्ध होते हैं। यदि विद्रोही अपने दुश्मनों के ख़िलाफ़ और बड़ी ताक़त मैदान
में नहीं उतारेंगे, तो वे हार जायेंगे और बरबाद हो जायेंगे। दूसरी चीज़ – एक बार
विद्रोह शुरू होने पर अधिकतम दृढ़संकल्प के साथ काम करने तथा प्रहार करने
की ज़रूरत होती है। प्रतिरक्षा की स्थिति प्रत्येक सशस्त्र विद्रोह की मौत हुआ करती
है; अपने शत्रु से मुक़ाबला होने से पहले ही मैदान हाथ से निकल जाता है।” ¹¹
इस उद्धरण में प्रत्येक शब्द विद्रोह के प्रश्न पर भगतसिंह के साथियों के सतही
रुख़ के ख़िलाफ़ तथा कुछ हद तक क्रान्तिकारी गतिविधियों के आरम्भ में स्वयं
भगतसिंह के दृष्टिकोण के ख़िलाफ़ चेतावनी देता है।
काफ़ी लम्बे समय तक भारतीय क्रान्तिकारियों ने न तो भावी स्वतन्त्र भारत
में सत्ता के स्वरूप पर और न ही उसकी सरकार की सामाजिक-आर्थिक नीति के
प्रश्न पर विचार किया। वे यह सोचते थे कि स्वतन्त्रता ही एक “रामबाण” होगी।
मार्क्सवादी साहित्य से प्रभावित होकर भगतसिंह ने इन सभी प्रश्नों में गहरी
दिलचस्पी ली। उनके कुछ नोट यह दिखाते हैं कि उन्होंने सर्वहारा अधिनायकत्व
के विचार को स्वीकार कर लिया था। शुरू में उन्होंने एंगेल्स का यह कथन नोट
690 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

किया कि विजयी सर्वहारा को वर्ग-शत्रु को कुचलने के लिए अधिनायकत्व की
ज़रूरत है और इसलिए एक “स्वतन्त्र लोक राज्य” की बात करना बेतुका है (पृष्ठ
62)। इसके आगे उन्होंने लेनिन की परिभाषा जोड़ी : “अधिनायकत्व प्रत्यक्ष रूप
से हिंसा पर आधारित और किसी भी क़ानून से न बँधी हुई सत्ता है।
“सर्वहारा वर्ग का क्रान्तिकारी अधिनायकत्व सर्वहारा वर्ग द्वारा बुर्जुआ वर्ग के
विरुद्ध हिंसा द्वारा हासिल की जाने वाली और बरक़रार रखी जाने वाली सत्ता है,
किसी भी क़ानून से न बँधी हुई सत्ता है।” 12
भगतसिंह के नोटों में सर्वहारा अधिनायकत्व के सार पर संशोधनवादी रुखों की
आलोचना हम पाते हैं। उन्होंने लेनिन की रचना ‘सर्वहारा क्रान्ति और गद्दार
काउट्स्की’ से लम्बे उद्धरण उतारे और लेनिन के इस विचार पर ख़ास ध्यान दिया
कि बुर्जुआ निन्दक “शुद्ध लोकतन्त्र” के नारे का सहारा लेकर सोवियत सरकार
पर अत्याचार का आरोप लगाते हैं : “परन्तु अब चूँकि श्रमिक तथा शोषित वर्गों
ने साम्राज्यवादी युद्ध के कारण विदेशों के अपने भाइयों से कटे रहकर भी इतिहास
में पहली बार स्वयं अपनी सोवियतों की स्थापना कर ली है, उन जन समूहों को
राजनीतिक निर्माण के काम में जुटा दिया है, जिनका बुर्जुआ वर्ग उत्पीड़न करता
था, जिन्हें वह कुचलता था और जिन्हें मतिमूढ़ बनाता था, अब चूँकि उन्होंने स्वयं
एक नये, सर्वहारा राज्य का निर्माण करना आरम्भ कर दिया है, भीषण संघर्ष की
ज्वाला के बीच, गृहयुद्ध की ज्वाला के बीच शोषकों से मुक्त राज्य के बुनियादी
सिद्धान्तों की रूपरेखा तैयार करनी शुरू कर दी है – इसलिए सारे लुच्चे बुर्जुआ
जन, ख़ून चूसने वालों का पूरा गिरोह ‘मनमानेपन’ का शोर मचाने लगा है और
काउट्स्की भी उन्हीं के स्वर को प्रतिध्वनित कर रहे हैं!” 13
सर्वहारा अधिनायकत्व को नये समाज के निर्माण का उपकरण मानते हुए
भगतसिंह ने ऐसे समाज की स्थापना के पथों की ओर बहुत ध्यान दिया। इस
सिलसिले में वह सोवियत रूस के अनुभव और वहाँ कुछ समय पहले हुए
क्रान्तिकारी पुनर्गठन की ओर निरन्तर उन्मुख होने लगे। डायरी के पृष्ठ 36 पर
पहली बार “बोल्शेविक रूस” का ज़िक्र आया है। इसके आगे हाशियों पर विभिन्न
लेखकों द्वारा रूस पर लिखी गयी पुस्तकों की सूची है : रेने फुलोप-मिलर की
‘बोल्शेविज़्म का चेहरा और दिमाग़’, एम. ओ'हारा की ‘रशिया’, लैंसलो लोटन
की ‘रूसी क्रान्ति’, एण्टन कार्लग्रीन की ‘बोल्शेविक रूस’ और ‘मार्क्स, लेनिन
तथा क्रान्ति का विज्ञान’ (पृष्ठ 191)। इस सूची में रूस पर वे सभी पुस्तकें नहीं
हैं, जिनमें भगतसिंह ने जेल में दिलचस्पी दिखायी थी। जे. सान्याल के अनुसार
भगतसिंह ने जॉन रीड की ‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी’, गोर्की की ‘माँ’
और स. स्तेप्याक-क्राव्चींस्की की ‘रूसी लोकतन्त्र का जन्म' भी पढ़ी थीं। 14
जे. सान्याल आगे लिखते हैं : “हालाँकि समाजवाद उनका विशेष विषय था,
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 691