भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 697, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिया कि विजयी सर्वहारा को वर्ग-शत्रु को कुचलने के लिए अधिनायकत्व की
ज़रूरत है और इसलिए एक “स्वतन्त्र लोक राज्य” की बात करना बेतुका है (पृष्ठ
62)। इसके आगे उन्होंने लेनिन की परिभाषा जोड़ी : “अधिनायकत्व प्रत्यक्ष रूप
से हिंसा पर आधारित और किसी भी क़ानून से न बँधी हुई सत्ता है।
“सर्वहारा वर्ग का क्रान्तिकारी अधिनायकत्व सर्वहारा वर्ग द्वारा बुर्जुआ वर्ग के
विरुद्ध हिंसा द्वारा हासिल की जाने वाली और बरक़रार रखी जाने वाली सत्ता है,
किसी भी क़ानून से न बँधी हुई सत्ता है।” 12
भगतसिंह के नोटों में सर्वहारा अधिनायकत्व के सार पर संशोधनवादी रुखों की
आलोचना हम पाते हैं। उन्होंने लेनिन की रचना ‘सर्वहारा क्रान्ति और गद्दार
काउट्स्की’ से लम्बे उद्धरण उतारे और लेनिन के इस विचार पर ख़ास ध्यान दिया
कि बुर्जुआ निन्दक “शुद्ध लोकतन्त्र” के नारे का सहारा लेकर सोवियत सरकार
पर अत्याचार का आरोप लगाते हैं : “परन्तु अब चूँकि श्रमिक तथा शोषित वर्गों
ने साम्राज्यवादी युद्ध के कारण विदेशों के अपने भाइयों से कटे रहकर भी इतिहास
में पहली बार स्वयं अपनी सोवियतों की स्थापना कर ली है, उन जन समूहों को
राजनीतिक निर्माण के काम में जुटा दिया है, जिनका बुर्जुआ वर्ग उत्पीड़न करता
था, जिन्हें वह कुचलता था और जिन्हें मतिमूढ़ बनाता था, अब चूँकि उन्होंने स्वयं
एक नये, सर्वहारा राज्य का निर्माण करना आरम्भ कर दिया है, भीषण संघर्ष की
ज्वाला के बीच, गृहयुद्ध की ज्वाला के बीच शोषकों से मुक्त राज्य के बुनियादी
सिद्धान्तों की रूपरेखा तैयार करनी शुरू कर दी है – इसलिए सारे लुच्चे बुर्जुआ
जन, ख़ून चूसने वालों का पूरा गिरोह ‘मनमानेपन’ का शोर मचाने लगा है और
काउट्स्की भी उन्हीं के स्वर को प्रतिध्वनित कर रहे हैं!” 13
सर्वहारा अधिनायकत्व को नये समाज के निर्माण का उपकरण मानते हुए
भगतसिंह ने ऐसे समाज की स्थापना के पथों की ओर बहुत ध्यान दिया। इस
सिलसिले में वह सोवियत रूस के अनुभव और वहाँ कुछ समय पहले हुए
क्रान्तिकारी पुनर्गठन की ओर निरन्तर उन्मुख होने लगे। डायरी के पृष्ठ 36 पर
पहली बार “बोल्शेविक रूस” का ज़िक्र आया है। इसके आगे हाशियों पर विभिन्न
लेखकों द्वारा रूस पर लिखी गयी पुस्तकों की सूची है : रेने फुलोप-मिलर की
‘बोल्शेविज़्म का चेहरा और दिमाग़’, एम. ओ'हारा की ‘रशिया’, लैंसलो लोटन
की ‘रूसी क्रान्ति’, एण्टन कार्लग्रीन की ‘बोल्शेविक रूस’ और ‘मार्क्स, लेनिन
तथा क्रान्ति का विज्ञान’ (पृष्ठ 191)। इस सूची में रूस पर वे सभी पुस्तकें नहीं
हैं, जिनमें भगतसिंह ने जेल में दिलचस्पी दिखायी थी। जे. सान्याल के अनुसार
भगतसिंह ने जॉन रीड की ‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी’, गोर्की की ‘माँ’
और स. स्तेप्याक-क्राव्चींस्की की ‘रूसी लोकतन्त्र का जन्म' भी पढ़ी थीं। 14
जे. सान्याल आगे लिखते हैं : “हालाँकि समाजवाद उनका विशेष विषय था,
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 691