भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 693, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंपर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, कि औपनिवेशिक दासता से उनके देश को मुक्त
कराने की आवश्यकता सबके लिए स्पष्ट और प्रमाणित बात हो गयी है। उस समय
उनका ध्यान समाज के विकास की आम समस्याओं में अधिक था, सो वह
भारतीय चिन्तकों की अपेक्षा पश्चिमी चिन्तकों की ओर अधिक उन्मुख हुए। जहाँ
उनके पूर्ववर्ती – राष्ट्रीय क्रान्तिकारी – भारत को ही विश्व के अन्तरविरोधों का
केन्द्र मानते थे, वहीं भगतसिंह संकीर्ण राष्ट्रीयतावादी पूर्वाग्रहों से पूरी तरह ऊपर उठ
गये थे और यह मानते थे कि भारत की समस्याएँ विश्व के विकास की परिधि
में ही हल की जा सकती हैं।
जिन लेखकों के उद्धरण भगतसिंह ने अपनी डायरी में उतारे, उनके प्रति उनके
रुख में पूरी सुसंगति है। शुरू में वह 18वीं सदी की अमेरिकी और फ़्रांसीसी
क्रान्तियों तथा विचारकों के प्रति भारतीय क्रान्तिकारियों का परम्परागत लगाव दर्शाते
हैं। उन्होंने रूसो⁷, टॉमस पेन⁸, टॉमस जैफरसन और पैट्रिक हेनरी⁹ के स्वतन्त्रता
तथा मानव के जन्मसिद्ध अधिकारों पर विचार नोट किये। पृष्ठ 16 पर उन्होंने
पैट्रिक हेनरी का निम्न भावपूर्ण कथन नोट किया : “क्या ज़िन्दगी इतनी प्यारी और
चैन इतना मीठा है कि बेड़ियों और दासता की क़ीमत पर उन्हें ख़रीदा जाये। क्षमा
करो, सर्वशक्तिमान प्रभु! मैं नहीं जानता कि वे क्या रास्ता अपनायेंगे, मुझे तो बस:
‘स्वतन्त्रता या मौत’ दो।”
तानाशाही की भर्त्सना करने के लिए भगतसिंह दर्शन की रचनाओं का ही नहीं,
ललित साहित्य का भी सहारा लेते हैं। मार्क ट्वेन के निम्न शब्द उन्होंने अपनी
डायरी में उतारे : “हम इस बात को भयानक मानते हैं कि लोगों की गरदनें उड़ायी
जाती हैं, लेकिन हमें यह देखना नहीं सिखाया गया है कि ज़िन्दगीभर लम्बी वह
मौत कितनी भयानक है, जो ग़रीबी और तानाशाही पूरी आबादी पर लादती है।”
पूँजीवादी विकास के नियमों को समझने के भगतसिंह के प्रयासों को प्रदर्शित
करती भी बहुत सारी सामग्री है। उन्होंने इस विषय को गम्भीरता से लिया और
सांख्यिक सामग्रियों का अध्ययन किया। ज्वलन्त सामाजिक अन्तरविरोधों को दिखाते
आँकड़ों की ओर उन्होंने सबसे पहले ध्यान दिया। विभिन्न लेखकों से जो उद्धरण
उन्होंने लिये, वे संक्षिप्त, किन्तु प्रभावोत्पादक हैं। उदाहरण के लिए, वह लिखते हैं
कि ब्रिटेन की आबादी का नौवाँ हिस्सा वहाँ के आधे उत्पाद को हथियाता है और
इस उत्पाद का केवल सातवाँ हिस्सा दो तिहाई आबादी के हिस्से में आता है; कि
अमेरिका की आबादी का एक प्रतिशत से कम अंश वह धनिक वर्ग है, जिसके पास
67 अरब डालर तक की सम्पत्ति है, जबकि 70 प्रतिशत आबादी सर्वहाराओं की है,
जो राष्ट्रीय उत्पाद के केवल चार प्रतिशत पर दावा कर सकती है।
बहुत से उद्धरण यह दिखाते हैं कि श्रमिकों के प्रति उनके मन में गहरी
सद्भावना थी और पूँजीवादी व्यवस्था के प्रति उनका रुख आलोचनात्मक था।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 687