भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 692, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंचिन्ता है। फ़िलहाल मेरे लिए कोई किताबें लाने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि मेरे
पास अभी कुछ हैं। अच्छा हो, अगर तुम लाइब्रेरी से उन किताबों की सूची माँग
लो, जो मैंने वहाँ से निकलवायी थीं।”
क्रान्तिकारी जे. सान्याल ने, जो कुछ समय तक भगतसिंह के साथ जेल में
रहे थे, इस बात पर ज़ोर दिया है कि वह बड़े ध्यान से पढ़ने के लिए पुस्तकें चुनते
थे, डिकेंस, सिंक्लेयर, वाइल्ड और गोर्की उन्हें अधिक पसन्द थे।⁵
जेल में उन्होंने जिस राजनीतिक और वैज्ञानिक साहित्य की माँग की, उससे
उनकी रुचियों का पता चलता है। जुलाई, 1930 में उन्होंने दूसरे इण्टरनेशनल का
पतन और “वामपन्थी” कम्युनिज़्म (“वामपन्थी” कम्युनिज़्म : एक बचकाना
मर्ज – प्रत्यक्षतः ये दोनों पुस्तकें लेनिन की थीं), प. क्रोपोत्किन की ‘परस्पर
सहायता’ तथा मार्क्स की ‘फ़्रांस में गृहयुद्ध’ रचनाएँ मँगवायीं।
भगतसिंह के कुछ नोट उनकी जीवनी का आदर्शवाक्य हो सकते हैं। उदाहरण
के लिए, अमेरिकी समाजवादी यूजीन वी. डेब्स का निम्न कथन : “जब तक
निम्न वर्ग है, मैं उसमें हूँ। जब तक कोई अपराधी तत्त्व है, मैं उसमें हूँ। जब तक
कोई जेल में है, मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ” (भगतसिंह की डायरी का पृष्ठ 21। आगे
उनकी डायरी की पंक्तियों के बाद उसका पृष्ठ इंगित किया गया है)। पृष्ठ 29
पर उन्होंने लिखा : “निरर्थक घृणा की ख़ातिर नहीं, सम्मान, यश और आत्मश्लाघा
की ख़ातिर नहीं, बल्कि अपने ध्येय की कीर्ति की ख़ातिर तुमने ऐसा कुछ किया
है, जो कभी भुलाया नहीं जायेगा।”
स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष और दूसरों के लिए आत्मबलिदान के विचार हम
उनकी डायरी के हर पृष्ठ पर पाते हैं। पृष्ठ 23 पर भगतसिंह ने टॉमस जैफ़रसन⁵
के ये प्रसिद्ध शब्द लिखे : “आज़़ादी के बिरवे को समय-समय पर देशभक्तों और
तानाशाहों के ख़ून से ताज़ा किया जाना चाहिए। यह क़ुदरती खाद है।” इतिहास,
दर्शन और अर्थशास्त्र के विभिन्न विद्वानों की पुस्तकों से जो उद्धरण भगतसिंह ने
अपनी डायरी में उतारे, वे अत्यन्त रोचक हैं। कहना न होगा कि जेल के हालात
में वह कोई सुव्यवस्थित अध्ययन नहीं कर सकते थे, उनके लिए तो बाहर से
किताबें पाना तक मुश्किल था। उनके नोट पढ़ते हुए एक बात की ओर ध्यान जाता
है : उन्होंने ठेठ भारतीय समस्याओं की ओर कहीं कम ध्यान दिया। केवल कुछेक
बार ही लाला लाजपत राय, बिपिनचन्द्र पाल और मदन मोहन मालवीय जैसे
स्वतन्त्रता सेनानियों का उल्लेख किया। एक ब्रिटिश लेखक की पुस्तक में से उन्होंने
महात्मा गाँधी का केवल एक उद्धरण उतारा। वर्षों तक अंग्रेज़ों द्वारा भारत के शोषण
की विधियों का विश्लेषण और औपनिवेशिक राज्यतन्त्र के निरंकुश उपायों का
भण्डाफोड़ भारतीय देशभक्तों के अध्ययन का परम्परागत विषय रहा था। भगतसिंह
ने केवल दो-तीन बार इसका ज़िक्र किया है, शायद यह मानते हुए कि इस विषय
686 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़