भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 694, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंउदाहरणतः, फूरिये का एक उद्धरण उन्होंने नोट किया और उसका शीर्षक रखा
: 'सबके ख़िलाफ़ अकेला' : “वर्तमान सामाजिक व्यवस्था एक बेहूदा कार्यतन्त्र
है, जिसमें समग्र के अंश एक-दूसरे के विपरीत हैं और समग्र के ख़िलाफ़ काम
करते हैं। हम देखते हैं कि समाज में प्रत्येक वर्ग अपने स्वार्थ के कारण दूसरे वर्गों
का अहित चाहता है, हर तरह से व्यक्तिगत हित को जन कल्याण के ख़िलाफ़
रखता है” (और आगे यह लिखते हैं कि डॉक्टर का स्वार्थ यह है कि समाज में
ज़्यादा से ज़्यादा रोग हों, वकील ज़्यादा से ज़्यादा मुक़दमे चाहता है, वास्तुकार और
बढ़ई चाहते हैं कि मकान जलें, इत्यादि)। इसी भावना में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के
जापानी विद्यार्थियों के समक्ष उस भाषण का उद्धरण है, जिसमें ठाकुर ने जापान
में पैसे के पीछे दौड़ को “मानवजाति के लिए भयानक ख़तरा” बताया, जो “शक्ति
के आदर्श को परिष्कार के ऊपर रखती है”।
ये सभी उद्धरण दिखाते हैं कि भगतसिंह पूँजीवाद को अस्वीकार करते हैं।
इसीलिए उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला : “सवाल यह नहीं है कि वर्तमान सभ्यता
को बदला जाना चाहिए या नहीं, बल्कि यह कि उसे कैसे बदला जायेगा।”
भगतसिंह ने पूँजीवाद की आलोचना सामाजिक और राजकीय, दोनों
व्यवस्थाओं के प्रसंग में की। पृष्ठ 46 पर लेनिन का नाम पहली बार आया है। यहाँ
भगतसिंह ने अमेरिकी समाजवादी मॉरिस हिलक्विट की पुस्तक 'मार्क्स से लेनिन
तक' से बुर्जुआ लोकतन्त्र के सीमित स्वरूप पर उद्धरण लिया : “पूँजीवाद में
लोकतन्त्र एक सार्विक अमूर्त लोकतन्त्र नहीं था, बल्कि विशिष्ट बुर्जुआ लोकतन्त्र,
या जैसाकि लेनिन ने इसे कहा था, बुर्जुआ वर्ग के लिए लोकतन्त्र।” आगे वह
लिखते हैं : “लोकतन्त्र सिद्धान्ततः राजनीतिक और क़ानूनी समानता की व्यवस्था
है, किन्तु ठोस और व्यावहारिक रूप में यह झूठ है, क्योंकि जब तक आर्थिक सत्ता
में भारी असमानता है, तब तक कोई समानता नहीं हो सकती, न राजनीति में और
न ही क़ानून के सामने।...पूँजीवादी शासन में लोकतन्त्र की सारी मशीनरी शासक
अल्पमत को श्रमिक बहुमत की यातनाओं के जरिये सत्ता में बनाये रखने के लिए
काम करती है।”
भगतसिंह ने बुर्जुआ व्यवस्था की विचारधारात्मक संरचना की ओर भी ध्यान
दिया और इस सिलसिले में बुर्जुआ समाज में धर्म की भूमिका में रुचि ली। अपने
लिए वह धर्म का प्रश्न हल कर चुके थे, इस समय तक वह एक पक्के
निरीश्वरवादी बन चुके थे। लेकिन उन्होंने भारतीय समाज में धर्म की भूमिका और
स्थान को तथा अपने साथियों, राष्ट्रीय क्रान्तिकारियों की विचारधारा पर इसके
प्रभाव को समझना चाहा।
'धर्म – स्थापित व्यवस्था का समर्थक : 'दासता' शीर्षक से उन्होंने
अमेरिका के प्रेसबिटेरियन चर्च की महासभा (1835) के प्रस्ताव का यह उद्धरण
688 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़