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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 691, कुल 788 में से

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पृष्ठ 691

ये दस्तावेज़ युवा क्रान्तिकारी के समृद्ध आत्मिक जीवन पर, आत्म शिक्षा के
लिए उनके घोर परिश्रम तथा जेल में क़ैद के दौरान उनकी विचारधारात्मक खोज
पर प्रकाश डालते हैं। इन काग़ज़ों को सरसरी तौर पर देखने पर भी यह पता चलता
है कि इनका लेखक प्रखर बुद्धि का धनी व्यक्ति था, जो सोचने के आदतन ढंग
को त्यागने में सफल रहा और जिसने प्रगतिशील पश्चिमी चिन्तकों के विचारों को
आत्मसात किया। इन नोटों में मार्क्सवाद में भगतसिंह की रुचि ही शायद सबसे
अधिक महत्त्वपूर्ण है। उनके दृष्टिकोणों के इस पहलू को ही भारत और दूसरे देशों
के बुर्जुआ इतिहासकार छिपाने का यत्न करते हैं। अमेरिकी इतिहासकारों जी. डी.
ओवरस्ट्रीट और एम. विण्डमिलर का दावा है कि “ज़्यादातर इस सम्बन्ध के
आधार पर ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भगतसिंह को पार्टी का हीरो दिखाने की
कोशिश की है।”³
भगतसिंह के नोट, जो उन्होंने संक्षिप्त, सारगर्भित शीर्षकों के साथ लिखे,
उनकी व्यक्तिगत भावनाओं को भी प्रतिबिम्बित करते हैं। वह आज़ादी के लिए
तड़प रहे थे, इसीलिए उन्होंने बायरन, व्हिटमैन और वर्ड्सवर्थ की स्वतन्त्रता के
विषय पर पंक्तियाँ अपनी कापी में उतारीं। उन्होंने इब्सन के नाटक, दोस्तोयेव्स्की
का ‘अपराध और दण्ड’ और ह्यूगो का ‘पददलित’ उपन्यास पढ़े। रूसी
क्रान्तिकारी वेरा फ़िग्नर तथा रूसी विद्वान और क्रान्तिकारी न. मोरोज़ोव की
रचनाओं से जेल जीवन की कठिनाइयों के जो उद्धरण उतारे, वे उनकी
मनोभावनाओं के अनुरूप थे। उमर ख़य्याम की पंक्तियाँ भी थीं, जो यह दिखाती
हैं कि किस प्रकार भगतसिंह ने जीवन और मृत्यु के प्रश्नों पर मनन किया, जबकि
वे औपनिवेशिक अदालत के फ़ैसले की प्रतीक्षा कर रहे थे। भगतसिंह ने अपने को
मुक़दमे के लिए तैयार करने के उद्देश्य से क़ानून का भी अध्ययन किया।
जेल में पुस्तकें भगतसिंह की चिन्ता का प्रमुख विषय थीं। जुलाई, 1930 में
उन्होंने अपने मित्र जयदेव गुप्ता को लिखा : “कृपया लाहौर के द्वारकादास
पुस्तकालय के लाइब्रेरियन से पूछना कि बोर्स्टल जेल में क़ैदियों को किताबें भेजी
गयी हैं या नहीं। उन्हें किताबों की बहुत तंगी है। उन्होंने सुखदेव के भाई जयदेव
के हाथ सूची भेजी थी, मगर किताबें उन्हें नहीं मिलीं। अगर सूची खो गयी है, तो
ज़रा लाला फ़िरोज़चंद से विनती करना कि उसके बदले अपनी पसन्द से कुछ
रोचक पुस्तकें भेज दें। इस इतवार को उन्हें किताबें मिल जानी चाहिए थीं। कृपया
*विनती करना कि किताबें ज़रूर भेज दें।”*⁴
16 सितम्बर, 1930 को उन्होंने दुखी मन से अपने भाई कुलबीर सिंह को
लिखा कि फ़ैसला सुनाये जाने तक उनसे मिलने कोई नहीं आ सकता : “इसलिए
मेरी विनती है कि तुम ख़ान साहब के दफ़्तर जाना और वहाँ से मेरी किताबें और
दूसरी जो चीजें मैंने वहाँ छोड़ी हैं, ले लेना। मुझे लाइब्रेरी की पुस्तकों की बड़ी
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 685