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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

परिशिष्ट : एक
दि रिवोल्यूशनरी
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का यह घोषणापत्र दिसम्बर 1924 के
आसपास शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा लिखा गया था। 31 दिसम्बर 1924 की रात और
1 जनवरी 1924 के बीच इसे उत्तर भारत के लगभग सभी प्रमुख शहरों में वितरित
किया गया था। — स.
हर इन्सान को निःशुल्क                      हरेक इन्सान को वास्तविक
न्याय चाहे वह                                समान अवसर, चाहे वह
ऊँच हो या नीच                                ऊँच हो या नीच
अमीर हो या ग़रीब                           अमीर हो ग़रीब
रिवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ़ इण्डिया का मुखपत्र
पहली जनवरी, 1925
भाग 1
( हर एक ईमानदार हिन्दुस्तानी को इसे पूरा पढ़ना चाहिए और अपने दोस्तों
के बीच बाँटना चाहिए )
भारतीय क्रान्तिकारी पार्टी का घोषणापत्र
“नये तारे के जन्म के लिए उथल-पुथल ज़रूरी है।” और जीवन पीड़ा और व्यथा
के साथ जन्म लेता है। हिन्दुस्तान का भी एक नया जन्म हो रहा है और यह उस
उथल-पुथल और पीड़ा के दौर से गुज़र रहा है जिससे बचा नहीं जा सकता है।
हिन्दुस्तानी जन अपनी नियत भूमिका अदा करेंगे और तब सारे अनुमान बेकार सिद्ध
होंगे, सीधे-सादे और कमज़ोर लोगों से होशियारों और ताक़तवरों के हाथ-पैर फूल
जायेंगे, विशाल साम्राज्य चकनाचूर हो जायेंगे और नये राष्ट्रों का उदय होगा जो
अपनी शान और महिमा से मानवता को स्तब्ध कर देंगे।
यह नयी शक्ति, जो दुनिया की जड़ों तक को हिला रही है, यह नया जोश
परिशिष्ट / 499

जो पर्दे के पीछे चमत्कार कर रहा है, हिन्दुस्तान के युवा रक्त में भी प्रकट हो रहा
है और एक आन्दोलन को आकार दे रहा है। इस आन्दोलन से बुद्धिमान और विद्वान
नफ़रत करते और इसकी उपेक्षा करते हैं और इसे चन्द सिरफिरे लोगों के पागलपन
भरे सपने कहा जाता है। यह अनोखा आन्दोलन नौजवान हिन्दुस्तान का क्रान्तिकारी
आन्दोलन है। इस क्रान्तिकारी आन्दोलन ने नाजुक लोगों के होश उड़ा दिए हैं और
बलवान तथा स्वस्थ को प्रेरित किया है। इसने दुनियाभर और ज्ञानी लोगों को हैरान
कर दिया है। जिस तरह आने वाले बसन्त को रोका नहीं जा सकता है उसी तरह
से इस आन्दोलन को कभी कुचला नहीं जा सकता। जब तक यह उस मिशन को
पूरा नहीं कर लेता जिसके लिए उसने जन्म लिया है, तब तक यह मर नहीं सकता।
अत्याचारी इसे दबायेंगे। अविश्वासी इस पर ताने कसेंगे और सम्भ्रान्त इसकी निन्दा
करेंगे, लेकिन विचारों और सपनों को कभी भी तलवार से हराया नहीं जा सकता
और जो उदात्त संवेग इसके अस्तित्व की गहराई से पैदा हो गया है, उसको कभी
न तो अनदेखा किया जा सकता है और न ही हँसी में उड़ाया जा सकता है।
क्रान्तिकारी आन्दोलन उस नए जीवन की अभिव्यक्ति है जो राष्ट्र में जन्म ले
चुका है। इस जीवन की निन्दा अपनी खुद की समझ की निन्दा करना है।
बीस साल का बेरहम दमन इसको कुचल नहीं पाया है। विख्यात जन-नेताओं
द्वारा की गयी कठोर निन्दाएँ इसके बढ़ाव को रोक नहीं पायी हैं। क्रान्तिकारी पार्टी
की सम्भावनाएँ जितनी उज्ज्वल आज हैं उतनी पहले कभी नहीं थीं। भविष्य
सुनिश्चित है।
विदेशी शासकों के दमनकारी उपायों की निन्दा करने के लिए किसी भी
भारतीय को इस क्रान्तिकारी पार्टी के अस्तित्व से इन्कार नहीं करना चाहिए।
विदेशियों को भारत पर राज करने का कोई अधिकार नहीं है और इसलिए उनकी
निन्दा करनी चाहिए और उनको निकाल बाहर करना चाहिए। बात यह नहीं कि
उन्होंने हिंसा अथवा अपराध की कोई ख़ास कार्रवाई की है, विदेशी राज के कुछ
स्वाभाविक परिणाम होते हैं। इस विदेशी राज को ख़त्म कर दिया जाना ज़रूरी है।
भारत पर राज करने का उनका कोई औचित्य नहीं है सिवा तलवार के और इसलिए
क्रान्तिकारी पार्टी ने तलवार उठा ली है। लेकिन क्रान्तिकारी पार्टी की तलवार पर
विचारों की धार है।
राजनीति के क्षेत्र में क्रान्तिकारी पार्टी का फ़ौरी उद्देश्य संगठित एवं सशस्त्र
क्रान्ति के द्वारा भारत के मुक्त प्रान्तों के संघीय गणतन्त्र की स्थापना करना है। इस
गणतन्त्र के संविधान को ऐसे समय अन्तिम रूप दिया और घोषित किया जायेगा
जब भारत के प्रतिनिधियों के पास अपने फ़ैसले को अमल में लाने की शक्ति होगी।
अलबत्ता, इस गणतन्त्र का मूलभूत सिद्धान्त सार्विक मताधिकार और ऐसी समस्त
व्यवस्थाओं का उन्मूलन होगा जोकि मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को सम्भव बनाती
500 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

हैं। अर्थात रेलवे और परिवहन के दूसरे साधनों, खानों और इस्पात एवं जलयानों के
विनिर्माण जैसे दूसरी तरह के बड़े-बड़े उद्योगों आदि का राष्ट्रीयकरण कर दिया
जायेगा। इस गणतन्त्र में निर्वाचकों के पास अपने प्रतिनिधियों को ज़रूरत पड़ने पर
वापस बुलाने का अधिकार होगा, ऐसा नहीं होने पर जनतन्त्र मखौल बनकर रह
जायेगा। इस गणतन्त्र में विधायिका के पास कार्यपालिका को नियन्त्रित करने और
आवश्यकता उत्पन्न होने पर उसे बदल देने का अधिकार होगा।
क्रान्तिकारी पार्टी राष्ट्रीय नहीं अपितु इन अर्थों में अन्तरराष्ट्रीय है कि उसका
अन्तिम उद्देश्य विभिन्न राष्ट्रों के भाँति-भाँति के हितों का सम्मान और उनकी
गारण्टी के द्वारा दुनिया में मेल-मिलाप क़ायम करना है। इसका मक़सद विभिन्न
राष्ट्रों और राज्यों के बीच प्रतियोगिता नहीं वरन सहयोग है और इस लिहाज़ से यह
गौरवशाली अतीत के महान भारतीय ऋषियों और आधुनिक युग के बोल्शेविक रूस
के पदचिह्नों का अनुसरण करती है। भारतीय क्रान्तिकारियों के लिए मानवता की
भलाई बेकार के एवं खोखले शब्द नहीं हैं। लेकिन कमज़ोर कायर और शक्तिहीन
अपनी या मानवता की कोई भलाई नहीं कर सकते।
साम्प्रदायिक प्रश्न के सम्बन्ध में क्रान्तिकारी पार्टी का विचार है कि विभिन्न
समुदायों को उनकी माँग के अनुसार अधिकार प्रदान कर दिये जायें बशर्ते कि वे
दूसरे समुदायों के हितों से न टकराते हों और निकट भविष्य में वे अन्ततोगत्वा
विभिन्न समुदायों के बीच दिली और जैविक एकता की ओर ले जाते हों।
आर्थिक एवं सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में पार्टी यथासम्भव बड़े से बड़े पैमाने
पर सहयोग की भावना को बढ़ावा देगी। निजी एवं असंगठित कारोबारी उपक्रमों
की बजाय पार्टी सहकारी यूनियन को तरजीह देती है।
आत्मिक क्षेत्र में पार्टी का उद्देश्य सत्य की स्थापना करना और इस बात का
प्रचार-प्रसार करना है कि दुनिया माया-मोह नहीं है जिसे कि दरकिनार कर दिया
जाये और जिससे नफ़रत की जाये, वरन यह एक ही आत्मा की अभिव्यक्ति है
जोकि समस्त शक्ति, समस्त ज्ञान और समस्त सौन्दर्य का सर्वोपरि स्रोत है।
क्रान्तिकारी पार्टी के पास अपनी स्वयं की नीति और अपना स्वयं का कार्यक्रम
है। सुस्पष्ट कारणों से यह अपनी समस्त गोपनीय बातों को प्रकट नहीं कर सकती।
परन्तु जब यह बिल्कुल निश्चित हो जायेगा कि सरकार हमारे अपने लोगों से ज़्यादा
जानती है तो जनसाधारण को भी बेहिचक उसकी योजना और तौर-तरीक़ों के बारे
में जानकारी दे दी जायेगी।
यह क्रान्तिकारी पार्टी कांग्रेस और उसके विभिन्न दलों के साथ सम्भव होने
पर सहयोग और आवश्यकता पड़ने पर विलगाव की नीति का अनुसरण करती है।
अलबत्ता यह पार्टी इस देश में समस्त संवैधानिक आन्दोलन को नफ़रत और उपेक्षा
की नज़र से देखती है। यह कहना हास्यास्पद है कि भारत की मुक्ति संवैधानिक
परिशिष्ट / 501

उपायों के जरिये हासिल की जा सकती है जहाँ पर कि किसी संविधान का
अस्तित्व ही नहीं है। यह कहना आत्मप्रवंचना है कि भारत की राजनीतिक स्वतन्त्रता
को शान्तिपूर्ण एवं वैध तरीक़ों से हासिल किया जा सकता है। जब दुश्मन अपनी
सुविधा के अनुसार शान्ति को भंग कर देने के लिए कटिबद्ध है तो “वैध” की
सुन्दर उक्ति उस समय अपना समस्त आकर्षण और महत्त्व गँवा बैठती है जब हम
अपने से हर क़ीमत पर शान्ति बनाये रखने की प्रतिज्ञा करते हैं।
हमारे जन-नेता दो-टूक शब्दों में यह कहने में हिचकिचाते हैं कि भारत
विदेशी नियन्त्रण से मुक्त पूर्ण स्वायत्तता चाहता है। सम्भवतः वे इस तथ्य से
अनजान हैं कि महान आदर्शों की प्रेरणा के जरिये राष्ट्र जन्म लेते हैं। यह
आत्मिक आदर्श को, जोकि पूर्ण स्वायत्तता की भावना को स्वीकार करने से
हिचकिचाता है, शायद ही आत्मिक कहा जा सकता हो; हालाँकि बहुत सम्भव है
कि एक नज़र में वे बेहद उदात्त जान पड़े। अब समय आ गया है कि
बेलाग-लपेट ढंग से सच कहा जाये और राष्ट्र के सम्मुख ऐसे आदर्श रखे जायें
जिन्हें वास्तव में आदर्श कहा जा सकता है।
हमारा आदर्श संगठित तरीक़े से मानवता की सेवा करना है। भारत इस आदर्श
को मूर्त रूप प्रदान नहीं कर सकता क्योंकि वह बन्धन या गुलामी की अवस्था में
बना हुआ है। भारत के ब्रिटिश भारत बने रहने तक इस आदर्श को कदापि प्राप्त
नहीं किया जा सकता। भारत अपने आदर्श को मूर्त रूप दे सके इसके लिए उसका
पृथक और स्वतन्त्र अस्तित्व बहुत ज़रूरी है। इस स्वतन्त्रता को कभी भी शान्तिपूर्ण
एवं संवैधानिक तरीक़ों से हासिल नहीं किया जा सकता। कोई बच्चा भी इस बात
को समझ सकता है कि ब्रिटिश भारत का शासन चलाने वाले क़ानून भारतीयों द्वारा
नहीं बनाये जाते और न ही उनके ऊपर उनका कोई नियन्त्रण ही हो सकता है।
ब्रिटिश भारत को कभी भी ब्रिटिश क़ानून और संविधान के जरिये कभी भी युक्त
प्रान्तों के संघीय गणतन्त्र में रूपान्तरित नहीं किया जा सकता। भारत के युवाओं,
अपने भ्रमों को दूर भगाओ और मज़बूत हृदय से वास्तविकता का सामना करो और
संघर्ष कठिनाइयों एवं कुर्बानियों से बचो नहीं। जो होना है वह होकर रहेगा। अब
और गुमराह नहीं होना है। आप शान्तिपूर्ण एवं वैध तरीक़े से शान्ति हासिल नहीं
कर सकते। महान अंग्रेज़ लेखक श्री रॉबर्ट्सन ये स्मरणीय शब्द भारत के बुद्धिमान
लोगों को और भी ज़्यादा समझदार बनाने का काम कर सकते हैं :
“सुधार का आन्दोलन और कार्यक्रम मुख्यतया आयरिश और प्रोटेस्टेण्ट नेताओं
की उपलब्धि था; जिनके आगे ब्रिटिश वक्तव्य ने यह घातक रहस्य उजागर किया
कि इंग्लैण्ड को धकियाया तो जा सकता है लेकिन उसे तर्क व विवेक से न्याय
एवं उदारता के पक्ष में नहीं खड़ा किया जा सकता” इंग्लिश अण्डर हैनोवेरियंस,
पृष्ठ 197)।
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भारतीय जन-नेताओं को अभी भी इस घातक रहस्य की जानकारी नहीं या
फिर वे जानबूझकर मूर्ख बने हुए हैं।
भारत के समझदार लोगों का कहना है कि इस बात की आशा पालना बेतुका
है कि भारत को हथियारों की ताक़त से आज़ाद कराया जा सकता है, हालाँकि वे
यह भूल जाते हैं कि यह मान लेना उतना ही या उससे भी ज़्यादा बेतुका है कि
मुट्ठीभर अंग्रेज़ों ने हथियारों के दम पर समूची मानव जाति के पाँचवें हिस्से को
अपने अधीन बनाकर रखा है। आगे आने वाली पीढ़ी बहुत सम्भव है कि इस तथ्य
की प्रामाणिकता पर सन्देह करे कि मुट्ठीभर अंग्रेज़ों ने भारत के ऊपर एक शताब्दी
तक शासन भी किया है; यह बात इतनी तो अकल्पनीय है।
आतंकवाद और अराजकतावाद के बारे में कुछ शब्द और। आज ये शब्द भारत
में सर्वाधिक क्षतिकारक भूमिका अदा कर रहे हैं। इन शब्दों को निरपवाद रूप से
क्रान्ति का सन्दर्भ आने पर ग़लत ढंग से प्रयुक्त किया जाता है क्योंकि इन नामों
की आड़ में क्रान्तिकारियों की भर्त्सना करना बहुत सुविधाजनक होता है। भारतीय
क्रान्तिकारी न तो आतंकवादी हैं और न ही अराजकतावादी। इस देश में अराजकता
फैलाना कभी भी उनका उद्देश्य नहीं रहा है और यही कारण है कि उन्हें कभी भी
अराजकतावादी नहीं कहा जा सकता। आतंकवाद कभी भी उनका लक्ष्य नहीं रहा
और उन्हें आतंकवादी नहीं कहा जा सकता। वे यह नहीं मानते कि अकेला
आतंकवाद ही आज़ादी दिला सकता है और वे आतंकवाद के लिए आतंकवाद नहीं
चाहते, हालाँकि यह सम्भव है कि वे समय-समय पर प्रतिकार के बहुत ही प्रभावी
साधन के रूप में इस तरीक़े को काम में ले आयें। मौजूदा सरकार का अस्तित्व
सिर्फ़ इसलिए क़ायम है कि विदेशी लोग भारतीय जनता को आतंकित करने में
सफल रहे हैं। भारतीय जनता अपने अंग्रेज़ मालिकों से प्रेम नहीं करती, वह नहीं
चाहती है कि वे यहाँ बने रहें, लेकिन वह अंग्रेज़ों के साथ सहयोग सिर्फ़ इसलिए
करती है कि वह उनसे बुरी तरह से डरी हुई है और यही वह डर है जोकि भारतीयों
को क्रान्तिकारियों के साथ सहयोग करने से रोकता है, ऐसा नहीं है कि वे उन्हें
प्यार नहीं करते।
सरकारी आतंकवाद का जवाब प्रति आतंकवाद से दिया जाना तय है। हमारे
समाज के प्रत्येक संस्तर में पूरी तरह से बेचारगी की भावना व्याप्त है और समाज
में समुचित जज़्बे की बहाली के लिए आतंकवाद प्रभावी उपाय है, जिसके बग़ैर
प्रगति मुश्किल होगी। इसके अलावा अंग्रेज़ मालिकों और उनके किराये के टट्टुओं
को कभी भी निर्बाध ढंग से मनमानी करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। उनके
रास्ते में हरसम्भव कठिनाई और प्रतिरोध खड़ा करना होगा। आतंकवाद का
अन्तरराष्ट्रीय प्रभाव भी होता है, क्योंकि इंग्लैण्ड के उत्कट शत्रु आतंकवाद और
क्रान्तिकारी प्रदर्शनों के जरिये फ़ौरन भारत की ओर उन्मुख होते हैं, और क्रान्तिकारी
परिशिष्ट / 503

पार्टी वर्तमान आन्दोलन में इस उग्र अभियान में शामिल होने से जानबूझकर खुद
को बचाये हुए है, इसका कारण बस यह है कि पार्टी निर्णायक प्रहार करने के लिए
इन्तज़ार कर रही है।
यह स्थिति तो तब है जबकि विदेशी सरकार के एजेण्टों ने उसकी माताओं
एवं बहिनों की मर्यादा भंग करके उकसावे की बड़ी-बड़ी कार्रवाइयाँ की हैं।
अलबत्ता, समय आने पर पार्टी आतंकवाद के बेतहाशा अभियान में शामिल होने से
हिचकिचायेगी नहीं, ऐसा होने पर ऐसे प्रत्येक अधिकारी और व्यक्ति का जीवन
असहय बना दिया जायेगा, जोकि विदेशी शासकों की किसी भी रूप में मदद करेंगे
फिर वे चाहे भारतीय हों या यूरोपीय, ऊपरी दर्जे के हों या निचले दर्जे के। लेकिन
उस स्थिति में भी पार्टी कभी भी यह नहीं भूलेगी कि आतंकवाद लक्ष्य नहीं है
और वे निरन्तर ऐसे निस्स्वार्थ एवं समर्पित कार्यकर्ताओं के दल संगठित करने की
कोशिश करते रहेंगे जोकि अपने देश की राजनीतिक एवं सामाजिक मुक्ति के लिए
अपनी पूरी ऊर्जा झोंक देंगे।
वे सदैव यह याद रखेंगे कि राष्ट्र-निर्माण के लिए हज़ारों ऐसे गुमनाम
स्त्री-पुरुषों के आत्मबलिदान की आवश्यकता पड़ती है जोकि अपने खुद के आराम
या स्वार्थ अपने स्वयं के जीवन या अपने प्रियजनों के जीवन के मुक़ाबले अपने
देश के विचार की अधिक परवाह करते हैं।
ह. वी.के.
अध्यक्ष, केन्द्रीय परिषद
भारत की क्रान्तिकारी पार्टी
504 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

परिशिष्ट : दो
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का संविधान
1925 की फ़ाइल न. 375, गृह विभाग (राजनीतिक), भारत सरकार
(एनएआई)।
1924 के आख़िर में शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा तैयार किया गया। इसे पीले
काग़ज़ पर मुद्रित किया गया था और यही कारण है कि इसका उल्लेख आमतौर
पर 'येलो पेपर' के नाम से किया जाता है। – स.
नाम : एसोसिएशन का नाम हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन होगा।
उद्देश्य : एसोसिएशन का उद्देश्य संगठित एवं सशस्त्र क्रान्ति के द्वारा भारत
के संयुक्त प्रान्तों का संघबद्ध गणतन्त्र स्थापित करना होगा।
गणतन्त्र के संविधान का अन्तिम स्वरूप का निर्धारण और घोषणा जन
प्रतिनिधियों के द्वारा उस समय की जायेगी जबकि वे अपने फ़ैसलों को क्रियान्वित
करने की स्थिति में होंगे। गणतन्त्र का मूलभूत सिद्धान्त सार्विक मताधिकार और
ऐसी समस्त व्यवस्थाओं का उन्मूलन होगा जोकि किसी भी प्रकार के मनुष्य द्वारा
मनुष्य के शोषण को सम्भव बनाती हैं।
संविधान : संचालन समिति/एसोसिएशन की संचालन समिति भारत के प्रत्येक
प्रान्त के प्रतिनिधियों से मिलकर बनी केन्द्रीय परिषद होगी। केन्द्रीय परिषद के
फ़ैसलों को पूरा अधिकार प्राप्त होगा।
केन्द्रीय परिषद का प्रमुख कार्य विभिन्न प्रान्तों की गतिविधियों पर निगरानी
रखना, उनके बीच तालमेल और समन्वय क़ायम करना होगा, जिसके बारे में उसे
पूरी जानकारी होगी। भारत के बाहर दूसरे देशों में किये जाने वाले कामों को सीधे
केन्द्रीय परिषद की देखरेख में किया जायेगा।
प्रान्तीय संगठन : एक समिति होगी जोकि प्रत्येक प्रान्त में एसोसिएशन के
पाँच भिन्न-भिन्न विभागों का प्रतिनिधित्व करने वाले पाँच लोगों से मिलकर बनी
होगी, जोकि प्रान्त में एसोसिएशन की समस्त गतिविधियों का नियमन करेगी।
समिति के समस्त फ़ैसले सर्वानुमति से लिये जायेंगे।
विभाग – प्रत्येक प्रान्तीय संगठन में निम्नलिखित विभाग होंगे :
परिशिष्ट / 505

  1. प्रचार
  2. लोगों को जुटाना
  3. निधियों की व्यवस्था करना और आतंकवाद
  4. अस्त्र-शस्त्र एवं गोला-बारूद का संग्रह एवं भण्डारण
  5. विदेशी सम्बन्ध
  6. प्रचार का काम इस प्रकार से किया जायेगा :
    (ए) खुले एवं गुप्त प्रेस के द्वारा (बी) व्यक्तिगत वार्तालाप के जरिये (सी)
    सार्वजनिक मंचों के जरिये (डी) संगठित कथाओं की व्यवस्था के जरिये और
    (ई) मैजिक लैण्टर्न स्लाइड्स के जरिये।
  7. लोगों को जुटाने का काम विभिन्न ज़िलों के प्रभारी संगठनकर्ताओं द्वारा
    किया जायेगा।
  8. निधियों की व्यवस्था करने का काम आमतौर पर स्वैच्छिक चन्दे के उपाय
    को काम में लाकर किया जायेगा और यदा-कदा ज़बरन उगाही के उपाय को काम
    में लाया जायेगा। विदेशी सरकार के एजेण्ट या एजेण्टों द्वारा दमन के अतीव मामलों
    में एसोसिएशन का यह कर्त्तव्य होगा कि वह जिस भी रूप में ठीक समझे उसका
    प्रतिकार करे।
  9. एसोसिएशन के हर सदस्य को शस्त्र सज्जित करने के लिए समस्त प्रयास
    किये जायेंगे; लेकिन इस तरह के सभी हथियारों को विभिन्न केन्द्रों पर रखा जायेगा
    और उनका उपयोग केवल प्रान्तीय समिति के दिशा-निर्देशों के अनुसार ही किया
    जायेगा।
    ज़िला संगठनकर्ता या विभाग के प्रभारी अधिकारी की जानकारी और अनुमति
    के बग़ैर एक भी हथियार ज़िले के किसी भी स्थान से हटाया या उपयोग में नहीं
    लाया जायेगा।
  10. विदेशी सम्बन्ध। विभाग केन्द्रीय समिति से मिलने वाले सीधे आदेशों के
    तहत अपने काम को पूरा करेगा।
    ज़िला संगठनकर्ता - उसके कर्त्तव्य
    ज़िला संगठनकर्ता अपने ज़िले के सदस्यों का अकेला प्रभारी होगा। वह अपने
    ज़िले के प्रत्येक हिस्से में अपने एसोसिएशन की शाखाएँ खोलने की कोशिश करेगा।
    भरती का काम प्रभावी तरीक़े से चलाने के लिए उसे अपने ज़िले के विभिन्न
    सार्वजनिक निकायों और संस्थाओं के साथ सम्पर्क बनाये रखना होगा। ज़िला
    संगठनकर्ताओं को हर प्रकार से प्रान्तीय समिति के अधीन रखा जायेगा जोकि
    समस्त गतिविधियों की निगरानी और निर्देशन करेगी।
    ज़िला संगठनकर्ता यह सुनिश्चित करेगा कि सदस्यगण अलग-अलग समूहों में
    506 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

विभाजित हों और विभिन्न समूहों को एक-दूसरे के बारे में जानकारी न हो। जहाँ
तक सम्भव है कि किसी भी प्रान्त के ज़िला संगठनकर्ता एक-दूसरे की
गतिविधियों से अवगत न हों, उन्हें एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से या नाम से भी
नहीं जानना चाहिए। कोई भी ज़िला संगठनकर्ता अपने से बड़े अधिकारी को सूचना
दिये बग़ैर अपनी जगह को नहीं छोड़ेगा।
ज़िला संगठनकर्ता की योग्यताएँ

  1. उसके पास अलग-अलग मिजाज के लोगों को दिशा-निर्देश देने और उनसे
    काम लेने की कुशलता और योग्यता होनी चाहिए।
  2. उसके पास अपनी मातृभूमि के विशेष सन्दर्भ में सम-सामयिक राजनीतिक,
    सामाजिक और आर्थिक समस्याओं को समझने की क्षमता होनी चाहिए।
  3. उसे भारत द्वारा विकसित की गयी सभ्यता-विशेष के विशिष्ट सन्दर्भ में
    भारत के इतिहास की मूल भावना को आत्मसात करने में सक्षम होना चाहिए।
  4. स्वतन्त्र भारत के जीवन लक्ष्य और मंज़िल को लेकर उसे अवश्य ही
    आस्थावान होना चाहिए, जोकि मनुष्य की आत्मिक एवं भौतिक दोनों प्रकार की
    गतिविधियों के विभिन्न क्षेत्रों में सामंजस्य क़ायम करती है। उसे अवश्य ही साहसी
    और आत्मबलिदान के जज़्बे से परिपूर्ण होना चाहिए जिसके बिना उसके समस्त
    देदीप्यमान गुणों का कोई मोल नहीं होगा।
    प्रान्तीय परिषद और केन्द्रीय परिषद
    प्रान्तीय समिति और केन्द्रीय समिति के सदस्यों को यह सुनिश्चित करना होगा
    कि उसके एसोसिएशन के प्रत्येक सदस्य को अपनी व्यक्तिगत योग्यताओं को
    विकसित करने और उसे काम में लाने की पूरी स्वतन्त्रता और विपुल अवसर मिले,
    इसके बग़ैर एसोसिएशन विघटित होने की ओर प्रवृत्त होगा।
    कार्यक्रम
    एसोसिएशन की समस्त गतिविधियों को दो हिस्सों - सार्वजनिक एवं निजी - में
    बाँटा जायेगा।
    सार्वजनिक :
  5. क्लबों, पुस्तकालयों, सेवा समितियों आदि की शक्ल में एसोसिएशनों की
    स्थापना करना।
  6. मज़दूरों और किसानों का संगठन बनाना। विभिन्न फ़ैक्टरियों, रेलवे और
    कोयला क्षेत्रों में मज़दूरों को संगठित और नियन्त्रित करने के लिए एसोसिएशन की
    परिशिष्ट / 507

तरफ़ से उपयुक्त व्यक्तियों को लगाया जाना चाहिए और उनके दिलो-दिमाग़ में
इस बात को बैठा देना होगा कि वे क्रान्ति के लिए नहीं हैं वरन यह कि क्रान्ति
उनके लिए है। इसी प्रकार से किसानों को भी संगठित करना होगा।
3. स्वतन्त्र भारतीय गणतन्त्र के विचार को प्रचारित करने के लिए प्रत्येक प्रान्त
में साप्ताहिक अख़बार शुरू करने होंगे।
4. समसामयिक घटनाक्रम और विदेशों में प्रचलित विचारों के प्रवाह से
जनसाधारण को अवगत कराने के लिए पुस्तिकाओं और परचों का प्रकाशन।
5. कांग्रेस और दूसरी सार्वजनिक गतिविधियों को जहाँ तक हो सके प्रभावित
करना और उसे अपने उपयोग में लाना।
निजी :
(ए) गुप्त प्रेस की स्थापना करना और उसके जरिये ऐसे साहित्य को प्रकाशित
करना जिसे कि आसानी से खुले में न प्रकाशित किया जा सकता हो।
(बी) इस प्रकार के साहित्य को प्रसारित करना।
(सी) देश के प्रत्येक भाग में ज़िलेवार ढंग से इस एसोसिएशन की शाखाएँ
स्थापित करना।
(डी) जिस भी तरीक़े से सम्भव हो पैसों की व्यवस्था करना।
(ई) उपयुक्त लोगों को दूसरे देशों में भेजना जहाँ पर वे सैनिक या वैज्ञानिक
प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हों ताकि वे खुले विद्रोह के समय पर सेनाओं एवं आयुध
फ़ैक्टरियों की कमान सँभालने के लिए सैन्य या वैज्ञानिक विशेषज्ञ हासिल कर
सकें।
(एफ़) हथियारों एवं गोला-बारूद का आयात करना और इसके अलावा जहाँ
तक सम्भव हो उनका देश के भीतर ही निर्माण करना।
(जी) भारत के बाहर के भारतीय क्रान्तिकारियों के साथ निकट सम्पर्क बनाये
रखना और उनके साथ सहयोग करना।
(एच) एसोसिएशन के सदस्यों को मौजूदा सेना में सूचीबद्ध करना।
(आई) कभी-कभार के प्रतिकारी उपायों और प्रचार के द्वारा अपने ध्येय के
प्रति जनता की हमदर्दी हासिल करना और इस प्रकार हमदर्दों के दल का निर्माण
करना।
सभी सदस्यों को प्रत्येक प्रान्त के विभिन्न ज़िलों के प्रभारी संगठनकर्ताओं द्वारा
भरती किया जायेगा। प्रत्येक सदस्य को अपना पूरा समय एसोसिएशन के कामों को
देने और ज़रूरत पड़ने पर अपनी जान को जोखिम में डालने के लिए तैयार रहना
होगा।
उसे ज़िला संगठनकर्ता के आदेशों का अक्षरशः पालन करना होगा।
508 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

उसे अपनी स्वयं की पहलक़दमी का विकास करना चाहिए और यह याद
रखना चाहिए कि एसोसिएशन की सफलता उसके एक-एक सदस्यों की सूझबूझ,
पहलक़दमी और दायित्वबोध पर काफ़ी कुछ निर्भर करती है।
उसका व्यवहार इस प्रकार का होना चाहिए कि जोकि उसे ध्येय के बारे में
पूर्वाग्रह न क़ायम करे जिसके लिए उसका एसोसिएशन लगा हुआ है और इस
संगठन को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नुक़सान पहुँचाने वाले व्यवहार से दूर रहना
चाहिए।
ज़िला संगठनकर्ता की सहमति के बग़ैर इस एसोसिएशन का कोई भी सदस्य
किसी भी दूसरे संगठन से सम्बन्ध नहीं रख सकेगा।
कोई भी सदस्य ज़िला संगठनकर्ता को बताये बग़ैर अपनी जगह को नहीं
छोड़ेगा।
प्रत्येक सदस्य को इस बात की भरसक कोशिश करनी होगी कि वह पुलिस
या जनता की निगाह में क्रान्तिकारी जमात से सम्बन्ध रखने के लिए सन्देह के घेरे
में न आ जाये।
प्रत्येक सदस्य को यह याद रखना होगा कि उसका अपना व्यवहार और
ग़लतियाँ समूचे संगठन को विनष्ट करने की ओर ले जा सकती हैं।
कोई भी सदस्य जहाँ तक उसके सार्वजनिक जीवन का सम्बन्ध है, ज़िला
संगठनकर्ता से कुछ भी नहीं छिपायेगा।
ग़द्दारी करने वाले सदस्यों को निष्कासन या मौत के द्वारा दण्डित किया जायेगा।
दण्ड देने का अधिकार पूरी तरह से “प्रा. स.” के पास होगा।
परिशिष्ट / 509

परिशिष्ट : तीन
गाँधीजी के नाम
शचीन्द्रनाथ सान्याल का खुला पत्र
मैं समझता हूँ कि यह मेरा दायित्व है कि मैं आपको उस वादे की याद दिलाऊँ
जिसे कि आपने कुछ समय पहले किया था कि जब क्रान्तिकारी एक बार फिर
अपनी चुप्पी तोड़कर भारतीय राजनीति के क्षेत्र में दाखि़ल होंगे तो आप राजनीति
के क्षेत्र से संन्यास ले लेंगे।। अहिंसावादी असहयोग आन्दोलन का प्रयोग अब ख़त्म
हो चुका है। आप अपने प्रयोग के लिए पूरा एक साल चाहते थे, लेकिन प्रयोग अगर
पाँच नहीं तो कम से कम पूरे चार सालों तक चला, और क्या अभी भी आप यह
कहना चाहते हैं कि यह काफ़ी लम्बे समय तक नहीं चला है?
आप वर्तमान युग के महानतम व्यक्तित्वों में से एक हैं और आपके प्रत्यक्ष
मार्गदर्शन एवं प्रेरणा के तहत आपके कार्यक्रम को वास्तव में एक या दूसरे कारण
से देश के सर्वश्रेष्ठ लोगों द्वारा आगे बढ़ाया गया। हज़ारों नौजवानों, हमारे देश के
युवाओं ने आपके कल्ट (व्यक्ति-पूजा) को अपने समूचे उत्साह से गले लगाया।
व्यवहार में समूचे राष्ट्र ने आपके आह्वान का उत्तर दिया। यह कहना ग़लत नहीं
होगा कि जनता की यह प्रतिक्रिया चमत्कारिक नहीं तो असाधारण अवश्य थी।
इससे अधिक आप क्या चाहते? आपके अनुयायियों में बलिदान और ईमानदारी
की कमी न थी, सर्वाधिक स्वार्थी पेशेवर लोगों ने अपने पेशों का त्याग कर
दिया, देश के युवाओं ने अपनी समस्त सांसारिक सम्भावनाओं का त्याग करके
आपके झण्डे तले एकत्रित शक्तियों में शामिल हो गये, रुपये-पैसे की आमद नहीं
होने से हज़ारों परिवार कंगाल हो गये। पैसे की कमी न थी। आप एक करोड़
रुपया चाहते थे और आपको उससे अधिक मिला जितना कि आप चाहते थे।
वस्तुतः अगर मैं कहूँ कि आपके आह्वान का प्रत्युत्तर स्वयं आपकी उम्मीद से भी
अधिक था तो सम्भवतः मैं बहुत ग़लत नहीं होऊँगा। मैं यह कहना चाहूँगा कि
भारत ने अपनी योग्यता के अनुसार भरसक आपका अनुसरण किया और मैं
समझता हूँ कि इस बात से शायद ही इन्कार किया जा सके और अभी भी आप
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यह कहना चाहते हैं कि प्रयोग पर्याप्त समय तक नहीं चला?
दरअसल, आपका कार्यक्रम विफल रहा है जिसमें भारतीयों की कोई ग़लती
नहीं है। आपके पास देश के लिए केवल एक कार्यक्रम है लेकिन आप विजयी
लक्ष्य तक राष्ट्र को नहीं ले जा सकते। यह कहना कि अहिंसक असहयोग इसलिए
विफल रहा कि लोग पर्याप्त मात्रा में अहिंसक नहीं थे, वकील की भाँति तर्क
करना है न कि पैग़म्बर की भाँति। लोग उससे अधिक अहिंसक नहीं हो सकते
जितना कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान रहे हैं। मैं यह कहना चाहूँगा कि वे उस
हद तक अहिंसक थे, जहाँ से कायरता की बू आती है। आप सम्भवतः यह कहेंगे
कि यह वह अहिंसा, कायरों की अहिंसा नहीं थी जोकि आपका अभीष्ट थी।
बल्कि आपके कार्यक्रम में वह बात ही नहीं थी जोकि कायरों को नायकों में
रूपान्तरित कर पाती या जो नायकों के समूहों के बीच से कायरों का पता लगाकर
अन्ततोगत्वा उन्हें ख़ारिज कर देती। इसमें जनता की कोई ग़लती नहीं थी। और यह
कहना कि असहयोग आन्दोलन में शामिल लोगों की बहुसंख्या नायकों की नहीं
वरन कायरों की थी, ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ना है। यह कहना राष्ट्र के पौरुष
के साथ खिलवाड़ करने जैसा कहीं अधिक है। भारतीय कायर नहीं हैं। उनकी
बहादुरी की तुलना हमेशा ही विश्व के सर्वश्रेष्ठ नायकों की बहादुरी के साथ की
जा सकेगी। इस बात से इन्कार करना इतिहास से इन्कार करना है। जब मैं भारतीयों
की वीरता की बात करता हूँ तो मेरा मतलब गौरवशाली अतीत की जाज्वल्यमान
वीरता से ही नहीं होता वरन मैं उस वीरता को भी शामिल करता हूँ जोकि स्वयं
को वर्तमान में प्रकट कर रही है क्योंकि भारत में अभी भी मुरदे नहीं बसते।
भारत को गुरु गोबिन्द सिंह या गुरु रामदास और शिवाजी जैसे नेता की तरह
असली नेता की आवश्यकता है। भारत को एक कृष्ण की आवश्यकता है जोकि
उचित आदर्श प्रदान कर सके; जिसका अनुसरण अकेले भारत ही नहीं वरन सारी
मानवता द्वारा इस मानवता के विविध मिज़ाजों एवं क्षमताओं वाले सभी सदस्यों द्वारा
किया जाना वाला हो।
अहिंसक असहयोग आन्दोलन इसलिए नहीं विफल हुआ कि यत्र-तत्र दबी हुई
भावनाएँ फूट पड़ीं वरन इसलिए विफल हुआ कि आन्दोलन के पास उचित आदर्श
का अभाव था। आपके द्वारा बताया जाने वाला आदर्श भारतीय संस्कृति एवं
परम्पराओं के अनुरूप नहीं है। उसमें नक़ल की बू आती है। अहिंसा का आपका
दर्शन, कम से कम वह दर्शन जिसे आप लोगों को स्वीकार करने के लिए कहते
हैं, हताशा से उपजा हुआ दर्शन है। यह भारतीय ऋषियों की अहिंसा की भावना
नहीं है। यह टॉलस्टायवाद और बौद्ध-धर्म का अपूर्ण भौतिक मिश्रण है न कि पूरब
और पश्चिम का रासायनिक मिश्रण। आपने कांग्रेसों एवं सम्मेलनों की पश्चिमी
पद्धति को अपनाया और देश-काल से निरपेक्ष रहकर अहिंसा की भावना को
परिशिष्ट / 511

स्वीकार करने के लिए समूचे राष्ट्र को तैयार करने की कोशिश की। लेकिन यह
भावना भारतीयों के लिए में व्यक्तिगत साधना का मामला था। और सर्वोपरि तौर
पर भारत के अन्तिम राजनीतिक लक्ष्य की बाबत आपकी समझ साफ़ नहीं थी और
भी अस्पष्ट बनी हुई है। यह दुखद स्थिति है। स्वतन्त्रता का आपका विचार भारतीय
आदर्शों से मेल नहीं खाता है। भारत सर्वम परवशम दुखम् सर्वमत्वमसम सुखम और
इस आदेश की हिमायत करता है कि व्यक्ति का अस्तित्व पूर्णतया मानवता के
उद्देश्य के लिए होता है और मानवता के जरिये ईश्वर की सेवा होती है,
जगताथितमच, कृष्णमा च। वह अहिंसा जिसका भारत उपदेश देता है अहिंसा के
लिए अहिंसा नहीं है, वरन मानवता की भलाई के लिए अहिंसा है और जब मानवता
की भलाई हिंसा और रक्त-पात की माँग करेगी तो भारत ख़ून बहाने से उसी प्रकार
नहीं हिचकिचायेगा जिस प्रकार से शल्यक्रिया से ख़ून बहाने की आवश्यकता
उत्पन्न कर देती है। आदर्श भारतीय के लिए हिंसा या अहिंसा का एक जैसा महत्त्व
होता है, बशर्ते कि उनसे अन्ततोगत्वा मानवता की भलाई होती हो। विनाशाय च
दुष्कृताम् व्यर्थ में ही नहीं कहा गया है।
अतएव मेरे विचार में आपके द्वारा राष्ट्र के सम्मुख रखा गया आदर्श या आपके
द्वारा उसके सामने प्रस्तुत किया गया कार्रवाई का कार्यक्रम न तो भारतीय संस्कृति
के अनुरूप है और न ही राजनीतिक कार्यक्रम के तौर पर अमल में लाने योग्य।
यह सोचना बस अकल्पनीय और अबोधगम्य है कि आप अभी भी
थोड़ी-बहुत यह आशा पाले हुए हैं कि इंग्लैण्ड अपनी स्वयं की इच्छा से न्यायपूर्ण
और उदार हो सकता है – यह इंग्लैण्ड 'जोकि आत्मरक्षा के वैध उपाय के तौर
पर जलियाँवाला बाग़ नरसंहार' में यक़ीन करता है,' यह जिसने इंग्लैण्ड ओडायर
– नायर मामले की सुनवाई की और बर्बरता के पक्ष में फ़ैसला सुनाया। अगर आप
के मन में ब्रिटिश सरकार की सद्बुद्धि में लेशमात्र भी आस्था बची हुई है तो
आपके अनुसार किसी कार्यक्रम की आवश्यकता ही आख़िर क्या है? अगर ब्रिटिश
सरकार को होश में लाने के लिए किसी आन्दोलन की आवश्यकता है, तो फिर
ब्रिटिश सरकार की ईमानदारी और नेक इरादों की बात क्यों की जाये? मुझे लगता
है कि आपके भीतर का पैग़म्बर मर चुका है और आप एक बार फिर कमज़ोर
मामले की पैरवी करने वाले वकील हैं; या सम्भवतः आप हमेशा से भाष्यकार रहे
हैं – केवल अर्द्ध-सत्यों के – ज़ोरदार व्याख्याकार। दुनिया के दूसरे स्वतन्त्र राष्ट्रों
के साथ गठजोड़ या महासंघ में समप्रभु स्वतन्त्र भारतीय गणतन्त्र एक बात है और
इस साम्राज्यवादी ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासित भारत पूर्णतया दूसरी बात है।
ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर बने रहने की आपकी भावना बहुतेरी भयंकर भूलों में से
एक की याद दिलाती है, कि आपने मिथ्या औचित्य की वर्तमान ज़रूरतों के साथ
बेशक़ीमती आदर्श का समझौता किया है, और यही वह कारण है कि आप देश
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के युवाओं की कल्पनाशीलता आकृष्ट करने में विफल रहे हैं – ये वे युवा हैं जो
दिलेरी दिखा सकते थे और जो अभी भी आपकी इच्छाओं के ख़िलाफ़ जाने की
दिलेरी दिखा रहे हैं। हालाँकि वे बेहिचक इस बात को स्वीकार करते हैं कि आप
आधुनिक युग की महानतम शख़्सियतों में से एक हैं। ये भारतीय क्रान्तिकारी हैं।
उन्होंने अब और अधिक ख़ामोश नहीं रहने का फ़ैसला किया है, अतएव वे आपसे
राजनीति के क्षेत्र से अवकाश लेने का अनुरोध करते हैं, अथवा राजनीतिक
आन्दोलन को इस प्रकार से निर्देशित करें जिससे कि क्रान्तिकारी आन्दोलन को
उससे मदद हासिल हो न कि उसके मार्ग में रुकावट पैदा हो। अभी तक उन लोगों
ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आपके अनुरोध को स्वीकार करते हुए अपनी गतिविधियों
को स्थगित रखा है पर अब वे आगे बढ़ चुके हैं। वास्तव में उन लोगों ने अपनी
ओर से आपको अपने कार्यक्रम को अमल में लाने में भरसक सहायता प्रदान की
है। लेकिन अब प्रयोग ख़त्म हो चुका है, लिहाज़ा क्रान्तिकारी लोग अपने वादे से
आज़ाद हैं। वस्तुतः उन्होंने केवल सालभर के लिए चुप रहने का वादा किया था,
इससे अधिक समय के लिए नहीं।
आगे, मैं इस बात का उल्लेख करना चाहूँगा कि जब आपने 39वीं कांग्रेस में
अपने हालिया अध्यक्षीय सम्बोधन में क्रान्तिकारियों पर दोषारोपण किया था तो
आपने कई पहलुओं से उनका ग़लत मूल्यांकन किया था। आपने कहा कि
क्रान्तिकारी भारत की प्रगति में बाधा डाल रहे हैं। मुझे नहीं पता कि ‘प्रगति’ शब्द
से आपका मतलब क्या है। अगर आपका मतलब राजनीतिक प्रगति से है तो क्या
आप इससे इन्कार कर सकते हैं कि भारत द्वारा पहले ही हासिल की जा चुकी
प्रत्येक राजनीतिक प्रगति, फिर वह चाहे मामूली ही क्यों न हो, मुख्यतया
क्रान्तिकारी पार्टी की क़ुर्बानियों एवं प्रयत्नों के द्वारा हासिल हुई है? क्या आपको
इससे इन्कार है कि बंगाल का विभाजन बंगाल के क्रान्तिकारियों के प्रयासों से रद्द
हुआ? क्या आपको इस बात में सन्देह है कि मोर्ले-मिण्टो सुधार भारतीय
क्रान्तिकारी आन्दोलन का फल है, जैसाकि मोण्टफ़ोर्ड सुधार को अमल में लाने
में अगर पूरी तरह नहीं तो मुख्य भूमिका अवश्य थी? अगर आप इन प्रश्नों का
सकारात्मक उत्तर देते हैं तो मुझे बहुत अधिक हैरानी नहीं होगी लेकिन मैं आपको
यक़ीन दिला सकता हूँ कि ब्रिटिश सरकार को इस आन्दोलन के सम्भावनासम्पन्न
होने का अहसास है। यहाँ तक कि स्वर्गीय मोंशेग्यू ने एक जाने-माने भारतीय से
यह बात कही थी कि महज युवा भारतीय क्रान्तिकारियों की गतिविधियों के चलते
ही उन्होंने भारत आने की जहमत उठाई और अपने प्राणों को जोखिम में डाला।
अगर आप यह कहते हैं कि ये सुधार सच्ची प्रगति के सूचक नहीं हैं तो मैं
यह कहना चाहूँगा कि इस क्रान्तिकारी आन्दोलन ने भारत की नैतिक उन्नति में कोई
कम प्रगति नहीं हासिल की है। भारतीय मौत को लेकर दयनीय रूप से भयभीत
परिशिष्ट / 513

रहते हैं और इस क्रान्तिकारी पार्टी ने एक बार फिर भारतीयों को उदात्त ध्येय के
लिए मरने में निहित भव्यता और सौन्दर्य का अहसास कराया। क्रान्तिकारियों ने एक
बार फिर यह प्रदर्शित किया कि मृत्यु का भी कुछ आकर्षण होता है और वह हमेशा
भयावह चीज़ नहीं होती। अपने स्वयं के विश्वासों और आस्था के लिए मरना, इस
चेतना के साथ मौत को गले लगाना कि इस तरह से मरकर वह ईश्वर और राष्ट्र
की सेवा कर रहा है, ऐसे ध्येय के लिए जिस के न्यायोचित और वैध होने का
हमें ईमानदारी के साथ विश्वास होता है, मौत को स्वीकार करना या जान को उस
समय जोखिम में डालना जबकि मौत की पूरी सम्भावना हो क्या यह कोई नैतिक
प्रगति नहीं है?
यहाँ तक कि विपरीत परिस्थितियों और क्षणिक विफलताओं में भी अपने प्यारे
आदर्श को नहीं छोड़ना – क्षणिक उत्तेजनाओं और किसी आकर्षक व्यक्तित्व के
प्रकटतः उदात्त सिद्धान्तों के बहकावे में नहीं आना, लम्बी क़ैद बा-मशक़्क़त से विचलित
नहीं होना, सालों–साल अपनी अन्तरात्मा के प्रति सच्चे बने रहना – यह उद्देश्य की
दृढ़ता, चरित्र की यह मज़बूती उस सच्ची नैतिक प्रगति का सूचक नहीं है, जिसे
भारत ने हासिल किया है? और क्या यह क्रान्तिकारी आदर्शों का स्पष्ट परिणाम
नहीं है?
आपने क्रान्तिकारियों से कहा है, “हो सकता है कि आपको अपने जीवन की
परवाह न हो लेकिन आप अपने उन देशवासियों की अनदेखी नहीं कर सकते
जिनकी शहीद की मौत मरने की कोई इच्छा नहीं है।” अलबत्ता, क्रान्तिकारी इस
वाक्य के अर्थ को समझने में दुखद रूप से विफल रहे हैं। क्या आपके कहने का
मतलब यह है कि क्या क्रान्तिकारी उन 70 लोगों की मौत के लिए ज़िम्मेदार हैं
जिन्हें कि चौरी–चौरा मुक़दमे में फाँसी की सज़ा सुनायी गयी? क्या आपके कहने
का मतलब यह है कि जलियाँवाला बाग और गुजराँवाला में बमबारी और मासूमों
की हत्या के लिए क्रान्तिकारी ज़िम्मेदार हैं? क्या क्रान्तिकारियों ने पिछले बीस वर्षों
में अपने संघर्ष के दौरान या मौजूदा समय में भूखे–नंगे लोगों से कभी क्रान्तिकारी
संघर्ष में भाग लेने के लिए कहा है? सम्भवतः अधिकतर वर्तमान नेताओं के
मुक़ाबले क्रान्तिकारियों को जन–मनोविज्ञान का अधिक ज्ञान है। और यही वजह
थी कि उन्होंने तब तक अवाम को अपने साथ कभी नहीं लेना चाहा जब तक वे
अपनी स्वयं की शक्ति को लेकर आश्वस्त नहीं हो गये। उनका हमेशा से विश्वास
रहा है कि उत्तर भारत की जनता किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार है और
उनका यह सोचना भी सही है कि उत्तर भारत की जनता अत्यन्त घनीभूत
विस्फोटक पदार्थ है जिसके साथ सँभालकर पेश आना चाहिए। जनता की भावनाओं
का ग़लत आकलन तो आप और आपके सहयोगियों ने किया था जो उन्हें सत्याग्रह
आन्दोलन में घसीट ले गये। भीतर और बाहर से हज़ारो उत्पीड़न झेल रहे लोगों का
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गुस्सा भड़क उठना स्वाभाविक ही था, और आपको इसकी क़ीमत चुकानी ही थी।
लेकिन क्या आप ऐसा कोई उदाहरण दे सकते हैं जहाँ क्रान्तिकारियों ने अनिच्छुक
लोगों को मौत की घाटी में धकेला हो?
लेकिन अगर इस वाक्य से आपका यह मतलब है कि क्रान्तिकारियों की
गतिविधियों के कारण निर्दोष लोगों को सताया, क़ैद किया और मारा जा रहा है,
तो मैं बेहिचक और ईमानदारी से स्वीकार करूँगा कि जहाँ तक मेरी जानकारी है,
ऐसे एक भी व्यक्ति को फाँसी नहीं दी गयी जो किसी क्रान्तिकारी कार्रवाई से
निर्दोष था; और गिरफ़्तारियों तथा यातनाओं के बारे में मैं कह सकता हूँ कि निर्दोष
स्त्री-पुरुषों को वास्तव में क़ैद किया गया और यातनाएँ दी गयीं। लेकिन क्या
विदेशी सरकार द्वारा किये गये अत्याचार के लिए क्रान्तिकारी पार्टी को दोषी ठहराया
जा सकता है? विदेशी सरकार राष्ट्र में पौरुष की हर अभिव्यक्ति को कुचल देने
पर आमादा है। लेकिन इस तरह कुचलने के दौरान सरकार भयंकर भूलें करेगी और
वीरों के साथ ही कायरों को भी क़ैद में डालेगी और यातनाएँ देगी। लेकिन क्या
कायरों के दुखों के लिए देश के वीर जन ज़िम्मेदार हैं? इतना ही नहीं, इन दुखों
को शहीद की मौत नहीं कहा जा सकता।
अन्त में, मैं ब्रिटिश सरकार की शक्ति के बारे में आपकी टिप्पणियों के बारे
कुछ कहना चाहूँगा। आपने क्रान्तिकारियों से कहा है, “आप जिन्हें गद्दी से हटाना
चाहते हैं वे आपसे बेहतर ढंग से हथियारबन्द हैं और आपसे बहुत अधिक अच्छी
तरह संगठित हैं।” लेकिन क्या यह शर्मनाक नहीं है कि मुट्ठीभर अंग्रेज़ हिन्दुस्तान
पर राज कर रहे हैं, हिन्दुस्तानी जनता की स्वतन्त्र इच्छा से नहीं बल्कि तलवार के
बल पर?और अगर अंग्रेज़ बेहतर ढंग से हथियारबन्द और संगठित हो सकते हैं तो
हिन्दुस्तानी और भी बेहतर ढंग से हथियारबन्द और संगठित क्यों नहीं हो सकते –
वे हिन्दुस्तानी जो उच्च आत्मिक भावना से ओत-प्रोत हैं? हिन्दुस्तानी भी उसी तरह
मनुष्य हैं जिस तरह अंग्रेज़ हैं। फिर भला कौन-सा कारण हिन्दुस्तानियों को इतना
लाचार बना देता है कि वे अपने अंग्रेज़ स्वामियों से बेहतर हथियारबन्द और संगठित
नहीं हो सकते? किस तर्क से आप उन क्षमताओं की अनदेखी कर सकते हैं जिनमें
क्रान्तिकारियों को पूरा भरोसा है? और इस लाचारगी तथा हताशा से जन्मी अहिंसा
की भावना शक्तिशाली की अहिंसा, भारतीय ऋषियों की अहिंसा कभी नहीं हो
सकती। यह सीधे-सीधे तमस है, और कुछ नहीं।
मुझे क्षमा करें महात्माजी, यदि मैंने आपके दर्शन और सिद्धान्तों की आलोचना
करने में कुछ कड़े शब्दों का प्रयोग किया हो। आपने क्रान्तिकारियों की बहुत
असहानुभूतिपूर्वक आलोचना की है और आप यहाँ तक चले गये कि उन्हें देश का
शत्रु तक बता डाला। केवल इसलिए कि वे आपके विचारों और तरीक़ों से मतभेद
रखते हैं। आप उन्हें सहिष्णुता की सीख देते हैं लेकिन क्रान्तिकारियों की आलोचना
परिशिष्ट / 515

करने में आप स्वयं अत्यन्त असहिष्णु रहे हैं। क्रान्तिकारियों ने मातृभूमि की सेवा
के लिए अपना सबकुछ दाँव पर लगा दिया है, और यदि आप उनकी सहायता नहीं
कर सकते, तो कम से उनके प्रति असहिष्णु तो न बनें।
516 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

परिशिष्ट : चार
शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी का पत्र
भगतसिंह काकोरी के शहीद राजेन्द्र लाहिड़ी से इतने प्रभावित हुए कि अपने
सबसे छोटे भाई, जिसका जन्म 1927 में हुआ, का नाम उन्होंने राजेन्द्र रखा। इसका
एक कारण यह था कि राजेन्द्र लाहिड़ी वैचारिक स्तर पर अपने साथियों से आगे
थे। यह पत्र भगतसिंह की टिप्पणी सहित अक्टूबर, 1927 में ‘किरती’ में छपा। –
स.
मैं फिर जन्म लूँगा
काकोरी षड्यन्त्र केस में जिन चार भाइयों को फाँसी की सज़ा हुई है उनके
नाम ये हैं – 1. रामप्रसाद 2. राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी 3. रोशन सिंह 4. अशफ़ाक़उल्ला
खान।
इनमें से राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी, एम.ए. कक्षा का छात्र था। वह बनारस हिन्दू
विश्वविद्यालय में पढ़ता था। वह 1925 में पकड़ा गया था। इसकी अपील व रहम
की दरख्वास्त की गयी थी, लेकिन वे सब नामंजूर हो गयीं।
इस बहादुर भाई ने निम्न पत्र अपने बड़े भाई को लिखा है।
मेरे प्रिय भाई!
आज मुझे सुपरिण्टेण्डेण्ट ने बताया कि वायसराय ने मेरी रहम की
दरख़्वास्त नामंज़ूर कर दी है। जेल के नियमों के अनुसार मुझे एक सप्ताह
के भीतर फाँसी पर चढ़ाया जायेगा। तुम्हें मेरे लिए अफ़सोस नहीं करना
चाहिए क्योंकि मैं अपना पुराना शरीर छोड़कर नया जन्म धारण कर रहा हूँ।
आपको यहाँ आकर मुलाक़ात करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि कुछ दिन
पहले ही आप मुलाक़ात कर चुके हो। जब मैं लखनऊ में था तो बहिन ने
परिशिष्ट / 517

दो बार मुलाक़ात की थी। सभी को मेरी ओर से प्रणाम और लड़कों को
प्यार।
आपका प्रिय
राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी
इस पत्र ने हमें फिर करतार सिंह सराभा और भाई पिंगले आदि का समय याद
दिला दिया है और हमारे पुराने घावों को हरा कर दिया है।
518 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़