भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
और लम्बी भूख-हड़ताल के अतिरिक्त भगतसिंह ने अपना सारा समय गहन
अध्ययन और लेखन में ख़र्च किया। जेल नोटबुक के प्रकाश में आने के बाद
यह स्पष्ट हो गया है कि इस अध्ययन का दायरा आश्चर्यजनक रूप से व्यापक
था, लेकिन इसमें भी क्रान्तियों के इतिहास, महत्त्वपूर्ण मार्क्सवादी क्लासिक्स
और दर्शन का उन्होंने सर्वाधिक गहन अध्ययन किया। नोटबुक के नोट्स बताते
हैं कि यह अध्ययन कितना डूबकर किया गया था। गौरतलब है कि 23 मार्च
1931 तक जारी गहन अध्ययन इस सिलसिले की अवधि मात्र डेढ़ वर्ष की ही
थी। इस छोटे से समय में गहन अध्ययन के ज़रिये भगतसिंह ने जो वैचारिक
परिपक्वता अर्जित की, वह किसी युगान्तरकारी महान ऐतिहासिक प्रतिभा के ही
बूते की बात थी। मात्र 17 से 23 वर्ष की उम्र के बीच फैली यह अल्पावधि
विचार-यात्रा इतिहास की एक मिसाल है। औपनिवेशिक भारत के पिछड़े
सांस्कृतिक-शैक्षिक परिवेश की सीमाओं को देखते हुए, भगतसिंह की इस
युगद्रष्टा प्रतिभा की तुलना यदि युवा लेनिन की प्रतिभा से की जाये तो कोई
अतिशयोक्ति नहीं होगी। चमनलाल ने ‘भगतसिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज़’ की
प्रस्तावना में उनकी तुलना मात्र चौबीस वर्ष की आयु जीने वाले रूस के
क्रान्तिकारी जनवादी चिन्तक दोब्रोल्यूबोव से ठीक ही की है।
अध्ययन और चिन्तन की इस अतिसंक्षिप्त, सघन-सान्द्र और तीव्र वेगवाही
अवधि को देखते हुए यह स्वाभाविक ही है कि भगतसिंह के चिन्तन में प्रायः कुछ
अन्तरविरोध और चिन्तन की हर अग्रवर्ती मंज़िल में पूर्ववर्ती मंज़िल की कुछ
प्रभाव-छायाएँ देखने को मिलती हैं। इसलिए इन दस्तावेज़ों का अध्ययन करते समय
चिन्तन की मुख्य दिशा, मूल निष्पत्तियों और विश्लेषण-पद्धति पर ध्यान देना सबसे
ज़रूरी है। भगतसिंह को अपनी स्थापनाओं को सुव्यवस्थित और विस्तारित करने
का अवसर नहीं मिला, लेकिन साम्राज्यवाद के बारे में, भारतीय पूँजीपति वर्ग और
कांग्रेस के बारे में, सर्वहारा वर्ग की क्रान्तिकारी पार्टी के निर्माण की आवश्यकता
के बारे में और क्रान्ति की तैयारी के बारे में उनके जो निष्कर्ष थे, उन्हें इतिहास
ने सही सिद्ध किया। जीवन के अन्तिम काल में लिखे गये लेख ‘मैं नास्तिक क्यों
हूँ?’ (अक्टूबर 1930) और अन्तिम ऐतिहासिक दस्तावेज़ ‘क्रान्तिकारी कार्यक्रम
का मसविदा’ (2 फ़रवरी 1931) में भगतसिंह का चिन्तन अपनी परिपक्वता के
शिखर-बिन्दु पर पहुँचा हुआ दिखायी देता है।
एच.एस.आर.ए. के क्रान्तिकारियों के अब तक प्रकाशित कुल 105 दस्तावेज़ों
में से 72 भगतसिंह का लेखन हैं और शेष 33 भगवतीचरण वोहरा, सुखदेव,
बटुकेश्वर दत्त, महावीर सिंह आदि का लेखन हैं। इससे भी यह स्पष्ट है कि
एक विचारक और सिद्धान्तकार के रूप में, अपने साथियों के बीच भगतसिंह
की ही भूमिका नेतृत्वकारी थी। यूँ तो सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, शिव वर्मा,
30 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
विजयकुमार सिन्हा आदि भी मेधावी और अध्ययनशील युवा थे, लेकिन चिन्तन
के क्षेत्र में भगवतीचरण वोहरा भगतसिंह के सर्वाधिक क़रीबी थे। उल्लेखनीय
है कि भगतसिंह से गहन विचार-विमर्श के बाद नौजवान भारत सभा और
एच.एस.आर.ए. का घोषणापत्र भगवतीचरण वोहरा ने ही तैयार किया था। वह
भगतसिंह की विचार-यात्रा के अनन्य सहयात्री थे।
भगतसिंह और उनके साथियों की राजनीतिक-वैचारिक समझ 1917 की
रूसी सर्वहारा क्रान्ति के प्रखर रक्तिम आलोक से आलोकित हुई थी। 'युगान्तर'
और 'अनुशीलन' से लेकर 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' तक के मध्यवर्गीय
अराजकतावादी क्रान्तिकारी आन्दोलन के विकासक्रम की गहराई से जाँच-पड़ताल
करने, मज़दूरों-किसानों को संगठित करने की महत्ता को समझने और फिर
वैज्ञानिक समाजवाद को स्वीकारने की मंज़िल तक पहुँचने के पीछे भगतसिंह और
भगवतीचरण वोहरा की महान प्रतिभा का योगदान तो था ही, लेकिन साथ ही,
इसके कुछ सुनिश्चित वस्तुगत ऐतिहासिक कारण भी थे। इस वैचारिक विकास के
पीछे ग़दर पार्टी के निकट अतीत की भूमिका काफ़ी महत्त्वपूर्ण थी। ग़दर पार्टी वह
पहली क्रान्तिकारी पार्टी थी जिसमें किसानों और मज़दूरों की भूमिका और
जनान्दोलनों की भूमिका को सशस्त्र क्रान्ति से जोड़ने की सोच मौजूद थी और जो
एक जनवादी गणतन्त्र की स्थापना की सुनिश्चित अवधारणा प्रस्तुत कर रही थी।
यह अनायास नहीं था कि आगे चलकर ग़दर पार्टी के अधिकांश क्रान्तिकारी
कम्युनिस्ट आन्दोलन में शामिल हो गये। ग़दर पार्टी के संस्थापक लाला हरदयाल
की विश्लेषण पद्धति में काफ़ी हद तक जुझारू भौतिकवादी वर्ग-विश्लेषण के तत्त्व
समाहित थे। भगतसिंह और उनके साथियों ने अजीत सिंह, लाला हरदयाल और
करतार सिंह सराभा की क्रान्तिकारी जनवादी परम्परा को आगे विस्तार दिया और उसे
मार्क्सवाद की मंज़िल तक उसी तरह आगे बढ़ाया जिस तरह रूस में प्लेख़ानोव
और वेरा ज़ासूलिच आदि की पीढ़ी नरोदवाद की क्रान्तिकारी जनवादी विरासत से
आगे बढ़कर मार्क्सवाद तक पहुँची। अन्तर सिर्फ़ यह था कि भगतसिंह,
भगवतीचरण वोहरा आदि को अपने मार्क्सवादी चिन्तन को सुव्यवस्थित ढंग से आगे
बढ़ाने और उसे अमल में लाने का अवसर ही नहीं मिला।
भगतसिंह की मार्क्सवाद तक की यात्रा एम.एन. राय और अन्य विलायतपलट
भारतीय कम्युनिस्ट नेताओं से भिन्न थी। उन्होंने मार्क्सवादी क्लासिक्स का अध्ययन
किया और इस प्रक्रिया में विकसित होती हुई दृष्टि से भारतीय समाज और राजनीति
का मौलिक विश्लेषण करने की कोशिश की। यह कोशिश चाहे जितनी भी छोटी
और अनगढ़ रही हो, पर इसकी मौलिकता और इसके विकास की तीव्र गति
सर्वाधिक उल्लेखनीय थी। भगतसिंह और उनके साथियों ने भारत के प्रारम्भिक
कम्युनिस्ट नेतृत्व की तरह सोवियत संघ और ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टियों तथा
भगतसिंह की वैचारिक विरासत और हमारा समय / 31
कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल के दस्तावेज़ों में प्रस्तुत विश्लेषणों-निष्कर्षों को आधार
बनाकर भारतीय परिस्थितियों को देखने और कार्यभार तय करने के बजाय स्वयं
अपनी दृष्टि और अध्ययन के आधार पर ब्रिटिश उपनिवेशवाद, कांग्रेस, गाँधी आदि
के बारे में मूल्यांकन बनाये। अप्रोच की यह मौलिकता विशेष रूप से हमारे देश
में उल्लेखनीय है जहाँ बड़ी पार्टियों और अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व का अन्धानुकरण
लगातार एक गम्भीर बीमारी के रूप में मौजूद रहा है। इस मायने में भगतसिंह,
भगवतीचरण वोहरा आदि की विकास-प्रक्रिया माओ त्से-तुङ और हो ची मिन्ह के
अधिक निकट जान पड़ती है जिन्होंने अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व से सीखते हुए भी,
अपने-अपने देशों की ठोस परिस्थितियों का स्वयं अध्ययन किया और क्रान्ति की
रणनीति, आम रणकौशल और मार्ग का निर्धारण किया। ऐसा सोचने का वस्तुगत
आधार है कि यदि भगतसिंह जीवित रहे होते और उन्हें अपनी सोच के आधार पर
कम्युनिस्ट पार्टी बनाने या कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होकर उसे अपनी सोच के
हिसाब से दिशा देने का अवसर मिला होता तो शायद इस देश के कम्युनिस्ट
आन्दोलन का इतिहास, या शायद इस देश का ही इतिहास किसी और ढंग से लिखा
जाता।
बहरहाल, आज ऐसा सोचने की एकमात्र प्रासंगिकता यही हो सकती है कि
क्रान्तिकारी विचार और कर्म की उस अधूरी यात्रा को एक बार फिर आगे बढ़ाने
और अंजाम तक पहुँचाने की बेचैनी से हर प्रगतिगामी भारतीय युवा के दिल को
लबरेज़ कर दिया जाये। भगतसिंह के ही सन्देश को आधार बनाकर जन-जन तक
इस सन्देश को पहुँचाना होगा कि यही साम्राज्यवाद और पूँजीवाद के विरुद्ध
निर्णायक संघर्ष का वह ऐतिहासिक काल है जिसकी भविष्यवाणी भगतसिंह ने की
थी। कांग्रेसी नेतृत्व ने राष्ट्रीय आन्दोलन को आधी सदी पहले एक ऐसे मुकाम तक
पहुँचाया, जब पूँजीवादी शासन के रूप में हमें अधूरी, खण्डित और विकलांग
आज़ादी मिली और तबसे लेकर आज तक इतिहास एक अँधेरी सुरंग का दुखदायी
सफ़रनामा बनकर रह गया। अब एक बार फिर, जैसाकि भगतसिंह ने कहा था, हमें
“क्रान्ति की तलवार विचारों की सान पर तेज़” करनी होगी और साम्राज्यवाद-
पूँजीवाद विरोधी नयी समाजवादी क्रान्ति का सन्देश कल-कारख़ानों-झोंपड़ियों
तक, मेहनतकशों के अँधेरे संसार तक, हर जीवित हृदय तक लेकर जाना होगा।
भगतसिंह का नाम आज इसी संकल्प का प्रतीक चिह्न है और उनका चिन्तन
क्षितिज पर अनवरत जलती मशाल की तरह हमें प्रेरित कर रहा है और दिशा
दिखला रहा है।
– सत्यम
10 जनवरी, 2006
32 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
प्रस्तावना
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास
( चापेकर बन्धुओं से भगतसिंह तक )
शिव वर्मा
स्वाधीनता संग्राम में क्रान्तिकारियों के प्रवेश की घोषणा करने वाला पहला धमाका
1897 में पूना में चापेकर बन्धुओं ने किया था। पूना शहर में उन दिनों प्लेग ज़ोरों
पर था। रैण्ड नाम के एक अंग्रेज़ को वहाँ प्लेग कमिश्नर बनाकर भेजा गया। वह
बड़ा ही ज़ालिम और तानाशाह क़िस्म का आदमी था। उसने प्लेग से प्रभावित
मकानों को बिना कोई अपवाद खाली कराये जाने का हुक्म जारी कर दिया। जहाँ
तक उस हुक्म का सवाल है उसमें कोई ग़लत बात नहीं थी। लेकिन जिस तरह
रैण्ड ने इस हुक्म पर अमल करवाया, उससे वह अलोकप्रिय हो गया। लोगों को
उनके घरों से निकाला गया और उन्हें कपड़े, बरतन आदि तक ले जाने का समय
नहीं दिया गया।
4 मई, 1897 को लोकमान्य तिलक ने अपने पत्र केसरी में एक लेख
लिखकर न सिर्फ़ नीचे के अफ़सरों पर बल्कि खुद सरकार पर इल्ज़ाम लगाया कि
वह जान-बूझकर जनता का उत्पीड़न कर रही है। उन्होंने रैण्ड को निरंकुश बतलाया
और सरकार पर "दमन का सहारा लेने" का आरोप लगाया।
फिर आया शिवाजी समारोह। इस अवसर पर, 12 जून, 1897 को एक
सार्वजनिक सभा में अध्यक्ष पद से बोलते हुए तिलक ने कहा : "क्या शिवाजी
ने अफ़ज़ल ख़ाँ को मारकर कोई पाप किया था? इस प्रश्न का उत्तर महाभारत में
मिल सकता है। गीता में श्रीमन कृष्ण ने अपने गुरुओं और बान्धवों तक को मारने
का उपदेश दिया है। उनके अनुसार अगर कोई व्यक्ति निष्काम भाव से कर्म करता
है तो वह किसी भी तरह पाप का भागी नहीं बनता है। श्री शिवाजी ने अपने
उदर-पूर्ति के लिए कुछ नहीं किया था। बहुत ही नेक इरादे के साथ, दूसरों की
भलाई के लिए उन्होंने अफ़ज़ल ख़ाँ का वध किया। अगर चोर हमारे घर में घुस
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 33
आयें और हमारे अन्दर उनको बाहर निकालने की ताक़त न हो तो हमें बेहिचक
दरवाज़ा बन्द करके उनको ज़िन्दा जला देना चाहिए। ईश्वर ने हिन्दुस्तान के राज्य
का पट्टा ताम्र-पत्र पर लिखकर विदेशियों को तो नहीं दिया है। शिवाजी महाराज
ने उनको अपनी जन्मभूमि से बाहर खदेड़ने की कोशिश की। ऐसा करके उन्होंने
दूसरों की वस्तु हड़पने का पाप नहीं किया। कुएँ के मेढ़क की तरह अपनी दृष्टि
को संकुचित मत करो, ताजीराते-हिन्द की क़ैद से बाहर निकलो, श्रीमद्भगवद्गीता
के अत्यन्त उच्च वातावरण में पहुँचो और महान व्यक्तियों के कार्यों पर विचार
करो।”¹
और 22 जून को चापेकर भाइयों ने रैण्ड व ऐवर्स्ट को मार दिया। इस तरह,
ऊपरी तौर पर देखने से यही लगता है कि चापेकर भाइयों के कार्य के तात्कालिक
प्रेरक तत्त्व रैण्ड की निरंकुशता और तिलक का भाषण थे। लेकिन यह सिर्फ़
अर्द्धसत्य है। दरअसल, चापेकर बन्धुओं के विचार महामारी फैलने या रैण्ड के पूना
आने से बहुत पहले से ही एक शक्ल अख़्तियार करने लगे थे।
1894 में ही चापेकर भाइयों ने पूना में शारीरिक और सैनिक प्रशिक्षण के लिए
‘हिन्दू धर्म अवरोध निवारण समिति’ क़ायम कर रखी थी कि जिसे हिन्दू संरक्षिणी
समिति भी कहा जाता था। यह समिति हर साल नियमपूर्वक शिवाजी व गणपति
समारोह आयोजित करती थी। इन समारोहों में चापेकर भाइयों द्वारा पढ़े जाने वाले
श्लोकों से उनकी भावना का पता चलता है। जनता से तलवार उठाने का आग्रह
करते हुए ‘शिवाजी श्लोक’ कहता है :
“भाँड की तरह शिवाजी की कहानी दुहराने-मात्र से स्वाधीनता प्राप्त नहीं की
जा सकती। आवश्यकता इसकी है कि शिवाजी और बाज़ी की तरह तेज़ी के साथ
काम किये जायें। आज हर भले आदमी को तलवार और ढाल पकड़नी चाहिए —
यह जानते हुए कि हमें राष्ट्रीय संग्राम के युद्धक्षेत्र में जीवन का जोखिम उठाना होगा।
हम धरती पर उन दुश्मनों का ख़ून बहा देंगे जो हमारे धर्म का विनाश कर रहे हैं।
हम तो मारकर मर जायेंगे, लेकिन तुम औरतों की तरह सिर्फ़ कहानियाँ सुनाते
रहोगे।”²
‘गणपति श्लोक’ तो ‘शिवाजी श्लोक’ से भी ज़्यादा उग्र था। गौ और धर्म की
रक्षा के लिए उठ खड़े होने का आह्वान करते हुए इसमें हिन्दुओं से कहा गया है
: “अफ़सोस, तुम ग़ुलामी की ज़िन्दगी पर शर्मिन्दा नहीं हो; जाओ, आत्महत्या कर
लो। उफ़्! ये कमीने कसाइयों की तरह गाय और बछड़ों को मार रहे हैं; उसे (गौ
को) इस संकट से मुक्त कराओ; मरो लेकिन अंग्रेज़ों को मारकर; नपुंसक होकर
धरती पर बोझ न बनो। इस देश को हिन्दुस्तान कहा जाता है; अंग्रेज़ भला किस
तरह यहाँ राज कर रहे हैं?³
इस तरह हम देखते हैं कि चापेकर बन्धु और उनके सहयोगी मुख्यतः तीव्र
34 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
धार्मिक भावनाओं से उत्प्रेरित थे और उनका दृष्टिकोण घोर कट्टरपन्थी था।
सम्भवतः इसी कारण से वे ब्रिटिश विरोधी ही नहीं, मुस्लिम विरोधी भी थे।
चापेकर बन्धुओं की देशभक्ति हिन्दुत्व पर आधारित थी। वे हिन्दू धर्म और
गौ की रक्षा के लिए अंग्रेज़ों को बाहर भगाना चाहते थे। रैण्ड की हत्या भी एक
ऐसे व्यक्ति के प्रति उनकी गहरी नफ़रत का नतीजा थी जो अपनी दमन और
निरंकुशता की कार्रवाइयों के कारण पूरी जनता की घृणा का पात्र बन गया था।
जहाँ तक उनको प्रेरित करने वाले दूसरे कारणों का सवाल है, इसका कोई
सबूत नहीं मिलता कि वे 1857 के भारतीय स्वाधीनता संग्राम से या फ्रांसीसी व
इतालवी क्रान्तियों से प्रभावित रहे हों।
इन तमाम सीमाओं के बावजूद मुक़दमे के दौरान या बाद में, चापेकर भाइयों
ने जिस वीरता, साहस और आत्मबलिदान की भावना का परिचय दिया उसके
महत्त्व को किसी भी तरह कम करके आँका नहीं जा सकता। सर ऊँचा किये हुए
तीनों भाइयों ने फाँसी के फन्दे को चूमा।
गुलामी और आज़ादी की समस्याओं के प्रति यह धार्मिक दृष्टिकोण चापेकर
भाइयों तक ही सीमित नहीं था। सावरकर बन्धु भी धार्मिक रहे...बंगाल के
क्रान्तिकारियों ने भी धर्म के सहारे लोगों को उभाड़ा था। इस वाक्य से शायद यह
ग़लतफ़हमी हो कि वे धर्म को न मानते थे केवल उभाड़ने का काम उससे लेते थे,
इसलिए यह कह देना ज़रूरी है कि वे स्वयं धर्म के कट्टर मानने वाले थे।⁴
1902 में कलकत्ता में क़ायम अनुशीलन समिति की कार्यप्रणाली का वर्णन
करते हुए तारिणीशंकर चक्रवर्ती लिखते हैं : “क्रान्तिकारी कार्य के लिए जो इस
समिति में आते थे, उनको दो वर्गों में बाँटा जाता था। धर्म में जिनकी आस्था थी
उनको एक वर्ग और धर्म-विशेष में, जिन्हें आस्था नहीं थी परन्तु क्रान्तिकारी कार्यों
में विशेष निष्ठा थी, ऐसी लड़कों को दूसरे वर्ग में रखा जाता था।” “धर्म के प्रति
जो श्रद्धावान थे वे इस बग़ीचे (मानिकतल्ला बागान – स.) में रहते थे...ये ही
लड़के प्रथम कोटि के क्रान्तिकारी समझे जाते थे।”⁵
उस समय बंगाल के क्रान्तिकारियों का बहुमत बंकिमचन्द्र चटर्जी और स्वामी
विवेकानन्द से बेहद प्रभावित था। “अनुशीलन समिति के सदस्यों को हिन्दू ग्रन्थों,
ख़ासकर गीता को बहुत ध्यान से पढ़ना पड़ता था।”⁶
“बंकिमचन्द्र चटर्जी और स्वामी विवेकानन्द की बौद्धिक परम्परा में पले-बढ़े
बंगाल के बीसवीं सदी के पहले दशक के ये क्रान्तिकारी धार्मिक उपादानों और
कर्मकाण्डों से तथा प्राचीन व तात्कालिक हिन्दुत्व के पौराणिक उपाख्यानों, प्रतीकों,
गीतों और नारों से प्रेरणा ग्रहण करते थे।”⁷
इस तरह, क्रान्तिकारी आन्दोलन के पहले चरण (1897-1913) के
क्रान्तिकारी आमतौर पर हिन्दू धर्म के प्रति आस्थावान थे और उससे प्रेरणा ग्रहण
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 35
करते थे। यह कोई आकस्मिक बात नहीं थी। इसके ऐतिहासिक कारण थे। पिछली
सदी के आठवें दशक में तरुण भारत के दिलों को एक नयी भावना मथ रही थी।
शिक्षित युवक राजनीतिक दृष्टिकोण से सोचने लगे थे। एक नयी क़िस्म का
राष्ट्रवाद जन्म ले रहा था। यह नया राष्ट्रवाद पुराने राजनीतिवाद के मुक़ाबले ज़्यादा
संजीदा, ज़्यादा खुले दिमाग़ वाला था। यह इस विचार से लैस और प्रेरित था कि
पूरे राष्ट्रीय जीवन का पुनरुत्थान आवश्यक है। भारतीय मानस किस सीमा तक
आन्दोलित हो उठा था, इसका अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि सभी
बेहतरीन सोच के लोगों की नयी भावनाएँ और विचार धर्म से अनुप्राणित थे। पुराने
देवताओं की जगह घृणा और रक्त के नये देवताओं की पूजा होने लगी थी।⁸
इस सीमा तक, धर्म की एक सकारात्मक भूमिका अवश्य थी। लेकिन
इसका एक नकारात्मक पहलू भी था। इस दौर में बाल गंगाधर तिलक,
बिपिनचन्द्र पाल, ब्रह्म बान्धव उपाध्याय और अरविन्द घोष जैसे सभी जुझारू
राष्ट्रीय नेता राजनीति को धर्म के रंग में रँग रहे थे। इस तरह अचेतन रूप में
ही सही, उन्होंने साम्प्रदायिक राजनीति के विषवृक्ष लगाये। गाँधी और उनके
अनुयायियों ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया और अन्त तक उससे चिपके रहे,
जबकि क्रान्तिकारियों ने 1914 में ही, जब उनका आन्दोलन दूसरे चरण में
प्रवेश कर रहा था, इसे छोड़कर धर्मनिरपेक्षता को अपना लिया था। धर्म और
राजनीति का यह तालमेल तब से आज तक लगातार हमारे सार्वजनिक जीवन
को तबाह करता रहा है, और अब तो इसके कारण हमारी राष्ट्रीय एकता का
ढाँचा ही चरमराता नज़र आ रहा है।
हालाँकि महाराष्ट्र के चापेकर बन्धु और बंगाल के पहले दशक के क्रान्तिकारी,
दोनों प्राचीन भारतीय संस्कृति से प्रेरणा ग्रहण करते थे लेकिन दोनों के बीच एक
मार्के का अन्तर भी है।
30 अप्रैल, 1908 को किंग्सफ़ोर्ड की बग्घी पर एक बम आकर गिरा जिससे
दो महिलाओं की मृत्यु हो गयी। इस घटना पर टिप्पणी करते हुए 22 जून के केसरी
में लोकमान्य तिलक ने लिखा : “1897 की हत्या और बंगाल के बमकाण्ड के
बीच काफ़ी अन्तर है। जहाँ तक दिलेरी और कार्य को कुशलतापूर्वक सम्पन्न करने
का सवाल है, चापेकर भाइयों का दर्जा बंगाल की बम पार्टी के सदस्यों से ऊँचा
है। लेकिन अगर साध्य और साधन के नज़रिये से देखें तो बंगालियों की ज़्यादा
तारीफ़ करनी होगी...वर्ष 1897 में पूना निवासी प्लेग के समय के दमन के शिकार
थे, और उस दमन से उत्पन्न उत्तेजना का कोई शुद्ध राजनीतिक चरित्र नहीं था।
यह शासन-प्रणाली ही ख़राब है और जब तक अधिकारियों को छाँट-छाँटकर
व्यक्तिगत रूप से आतंकित नहीं किया जाता, तब तक वे व्यवस्था को बदलने पर
तैयार नहीं होंगे – ऐसा कोई महत्त्वपूर्ण प्रश्न चापेकर भाइयों के सामने नहीं था।
36 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
उनका कर्म प्लेग के बाद जारी दमन के, यानी एक विशेष कार्य के ख़िलाफ़ था।
निश्चय ही बंगाल की बम पार्टी की दृष्टि एक ज़्यादा व्यापक पटल पर थी जिसे
बंगाल के विभाजन ने उभारा था।”⁹
इतना ही नहीं, बंगाल के क्रान्तिकारी धर्म को बहुत ज़्यादा महत्त्व देते थे, इस
तथ्य के बावजूद आन्दोलन के अन्तिम लक्ष्य की दृष्टि से कहें तो, 1902 में ही
उन्होंने एक बहुत महत्त्वपूर्ण घोषणा की थी। इसी वर्ष बंगाल के क्रान्तिकारियों ने
अपने को ‘अनुशीलन समिति’ नाम की एक पार्टी के रूप में संगठित किया था।
समिति की स्थापना के समय जारी घोषणापत्र में कहा गया था : “अनुशीलन की
कल्पना के समाज में अनपढ़, ग़रीब लोग नहीं होंगे, कायर, दुष्ट लोग नहीं होंगे और
अस्वस्थ लोग भी नहीं होंगे। ऐसे समाज के निर्माण के लिए सभी प्रकार की
विषमताओं को समाप्त करना होगा। विषमता के बीच मानव की मानवता विकसित
नहीं हो सकती। मानव समाज से धन की विषमता, सामाजिक विषमता,
साम्प्रदायिक विषमता और प्रादेशिक विषमता दूर कर सभी मनुष्यों में समानता लानी
होगी। केवल राष्ट्रीय सरकार द्वारा ही ऐसा किया जाना सम्भव है। पराधीनता की
दशा में अनुशीलन के स्वप्न के समाज की स्थापना सम्भव नहीं है, इसीलिए
अनुशीलन पराधीनता के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा करती है। अनुशीलन भारत की
पूर्ण स्वतन्त्रता चाहती है।”¹⁰
अनुशीलन समिति की यह घोषणा निश्चय ही आगे की तरफ़ एक बहुत बड़ा
क़दम था। यहीं पर बंगाल के क्रान्तिकारी 1897 के पूना केन्द्र से आगे हैं। चापेकर
बन्धु विदेशियों से नफ़रत तो करते थे मगर वे खुद क्या चाहते हैं इसके बारे में स्पष्ट
नहीं थे। यह बात बंगाल के क्रान्तिकारियों के साथ नहीं थी। ये लोग मुस्लिम
विरोधी भी नहीं थे, हालाँकि वे धार्मिक लोग थे और हिन्दू ग्रन्थों से प्रेरणा प्राप्त
करते थे।
इसके विपरीत इस दौर के पंजाब के क्रान्तिकारी आरम्भ से ही साम्प्रदायिकता
के दोष से मुक्त थे। सरदार अजीत सिंह, लालचन्द ‘फ़लक’, सूफ़ी अम्बा प्रसाद,
लाला हरदयाल और उनके सभी सहयोगी धर्मनिरपेक्ष थे। धर्म उनके लिए एक
निजी मामला था।
शताब्दी के पहले दशक के क्रान्तिकारी जिन स्रोतों से प्रेरणा ग्रहण कर रहे थे
उनमें धर्म के अलावा एक था 1857 का भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम। “इस
विषय पर 1907 या 1908 में लन्दन में लिखी गयी वीर सावरकर की पुस्तक ने
अपनी तमाम अपर्याप्तताओं के बावजूद, जो उस दौर में और उस समय के हालात
में स्वाभाविक थी, बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस विषय पर ब्रिटिश
साम्राज्यवादी लेखकों द्वारा फैलाये गये लांछनों तथा उनके झूठे ऐतिहासिक लेखन
की धज्जियाँ उड़ाकर इस पुस्तक ने बहुत बड़ा काम किया। इसने बातों को सही
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 37
तौर पर सामने रखा। इस किताब पर ब्रिटिश शासकों ने फ़ौरन प्रतिबन्ध लगा दिया,
लेकिन फिर भी यह मेहनत से और गुप्त रूप से तैयार की गयी पाण्डुलिपि के रूप
में भारत के उस समय के क्रान्तिकारियों के बीच घूमती रही।”11
वास्तविकता यह है कि 1857 का जन-विद्रोह पूरे स्वाधीनता संग्राम के दौरान
सभी स्वाधीनता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहा।
शताब्दी के पहले दशक में क्रान्तिकारियों के लिए प्रेरणा का दूसरा स्रोत था
फ़्रांसीसी, इतालवी और रूसी क्रान्तिकारियों की कहानियाँ।
आन्दोलन के पहले चरण की कमज़ोरियाँ और सीमाएँ
आन्दोलन के पहले चरण के दौरान पूना और बंगाल के क्रान्तिकारियों की पहली
कमज़ोरी थी उनका हिन्दू पूर्वाग्रह। इस पूर्वाग्रह ने मुस्लिम जनता को आन्दोलन से
दूर रखा। हालाँकि बंगाल के क्रान्तिकारी मुस्लिम विरोधी नहीं थे, लेकिन मुस्लिम
जनता से कार्यकर्ता भरती करने का कोई गम्भीर प्रयास उन्होंने कभी नहीं किया।
इस कथन के कुछ अपवाद यहाँ-वहाँ मिल सकते हैं। लेकिन अपवाद कभी नियम
नहीं बनते।
आन्दोलन के दायरे को सीमित करने वाली दूसरी कमज़ोरी थी जनता के साथ
जीवन्त सम्बन्धों का न होना। स्वदेशी आन्दोलन के तीन या चार सालों को छोड़कर,
जब बंगाल के क्रान्तिकारी जनता के बीच गये और लोगों को सक्रिय होने के लिए
प्रोत्साहित किया, आमतौर पर क्रान्तिकारी व्यक्तिगत क्रियाशीलता में विश्वास रखते
थे, जिसे सरकार आतंकवाद के ग़लत नाम से पुकारती थी। जनता इन क्रान्तिकारियों
के आत्मबलिदान, निर्भीकता और साहस की प्रशंसा तो करती थी लेकिन अपनी
रोज़मर्रा की समस्याओं के साथ उनकी कार्रवाइयों को जोड़ सकने में असमर्थ रहती
थी। ऐसी स्थिति में साम्राज्यवादियों के लिए क्रान्तिकारियों का दमन कर सकना
और भी आसान हो जाता था।
आन्दोलन की तीसरी सीमा थी उसके कार्यकर्ताओं का वर्ग-चरित्र। क्रान्तिकारी
आन्दोलन के कार्यकर्ताओं का एक बड़ा बहुमत निम्न-मध्यम वर्ग से सम्बन्धित था।
इस चरण में यह एकदम स्वाभाविक था। यह वही दौर था जबकि नई पीढ़ी विदेशी
शासन से पूर्ण मुक्ति का दावा करने लगी थी। यह पीढ़ी खुद को 'वयस्क' समझने
लगी थी। नौजवान तबके में बेचैनी थी मगर पुराना नेतृत्व होम रूल के लिए प्रस्तावों
और प्रार्थनापत्रों से आगे बढ़ने को तैयार न था। लेकिन शिक्षित नौजवान एक नयी
दुनिया पाने के लिए अपना सब लुटा देने पर आमादा था। नौजवानों का विश्वास था
कि वे जुझारू सशस्त्र संघर्ष के जरिये देश को आज़ाद करा सकते हैं। इसके लिए
वे अपना जीवन तक होम कर देने को तैयार थे।
मध्यम वर्ग स्वभाव से ही व्यक्तिवादी होता है। यह एक शक्तिशाली सहयोगी
38 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
हो सकता है। अगर यह पूँजीपति वर्ग की तरफ़ जाता है तो प्रतिक्रियावाद का वाहक
हो जाता है। अगर यह मज़दूर वर्ग के साथ खड़ा होता है तो, स्वयं नेतृत्व प्रदान कर
सकने की क्षमता न होते हुए भी, एक क्रान्तिकारी शक्ति बन जाता है। इसकी
स्वतन्त्र कार्रवाइयाँ प्रायः व्यक्तिगत कार्रवाइयों का रूप ले लेती हैं। जिस दौर की
बात हम कर रहे हैं उस समय स्वाधीनता के लिए जनान्दोलन खड़ा कर सकने में
न तो पूँजीपति वर्ग समर्थ था और न मज़दूर वर्ग ही। इस चुनौती का सामना अपने
सपनों को साकार करने के लिए सबकुछ कुर्बान कर देने को तैयार इन मध्यमवर्गीय
नौजवानों ने स्वभावतः अपने ढंग से किया जो आरम्भ में व्यक्तिगत कार्रवाइयों का
ही रूप ले सकती थी। यह सीमा एक ऐतिहासिक प्रक्रिया की उपज थी।
गुलामी की अपमानजनक स्थिति के सामने समर्पण करने से बेहतर होता है
चोट करना और नष्ट हो जाना। किसी न किसी को पहली चोट करनी ही पड़ती
है। पहली चोट का कोई नतीजा नहीं निकलता और पहली चोट करने वाले ज़्यादातर
नष्ट हो जाते हैं। लेकिन उनकी कुर्बानियाँ कभी बेकार नहीं जातीं। झरना बढ़कर
गरजता हुआ दरिया बन जाता है, चिनगारी ज्वालामुखी बनती है, व्यक्ति समष्टि से
एकाकार हो जाता है। पुरानी व्यवस्था की जगह एक नयी व्यवस्था आती है, और
सपना एक हक़ीक़त का रूप ले लेता है। क्रान्तियाँ इसी तर्ज़ पर आगे बढ़ती हैं।
भारत का क्रान्तिकारी आन्दोलन भी ठीक इसी तर्ज़ पर आगे बढ़ा।
“भारतीय क्रान्तिकारियों ने, अकल्पनीय कठिनाइयों के बीच भी, आधुनिक
युग की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी-उपनिवेशवादी ताक़त को चुनौती देने की जुर्रत
की। इतना ही नहीं, उस युग के क्रान्तिकारी शूरवीरों – चापेकर भाइयों, खुदीराम,
कनाईलाल और मदनलाल धींगरा ने अपने आत्मबलिदान और शहादत के माध्यम
से अपने ऊँघते हुए देशवासियों को जगाया और उन्हें राष्ट्रीय स्वाधीनता तथा अपने
जन्मसिद्ध जनवादी राजनीतिक अधिकारों के उच्च विचारों से भी परिचित कराया।
क्रान्तिकारी आन्दोलन, ऐतिहासिक रूप से, अपने ढंग का वह पहला आन्दोलन था
जिसने राष्ट्रीय स्वाधीनता और सम्प्रभुता के लिए भारत के संघर्ष के राजनीतिक
उद्देश्य के रूप में पूर्ण स्वाधीनता तथा ब्रिटिश साम्राज्य से हर तरह के राजनीतिक
सम्बन्ध-विच्छेद के लक्ष्य को जनता के सामने रखा। ठीक इसी उद्देश्य को ध्यान
में रखकर उन्होंने विदेशी साम्राज्यी शासन के विरुद्ध संगठित हथियारबन्द संघर्ष के
लिए जनता का आह्वान किया।
“वे शुरू से ही भारतीय जनता के लिए पूर्ण राष्ट्रीय प्रभुसत्ता और लोकतान्त्रिक
स्वतन्त्रता के लिए अनवरत संघर्ष करते रहे और उस लक्ष्य से कभी डिगे नहीं।
“उनकी शहादतों ने उनके प्रति जनता की प्रशंसा को उभारकर विदेशी
साम्राज्यवादी शासन के प्रति उसकी नफ़रत को और भी तीखा बनाया और उसके
संघर्षशील साहस को और भी ऊँचा उठाया।”¹²
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 39
ग़दर पार्टी की स्थापना
क्रान्तिकारी आन्दोलन के पहले दौर में बहुत-से क्रान्तिकारी देश छोड़कर यूरोप और
अमेरिका चले गये थे। उनका उद्देश्य था भारत में क्रान्तिकारी गतिविधियों के
संचालन के लिए धन संग्रह करना, प्रचार करना और साहसी, आत्मत्यागी तथा
समर्पित युवकों की एक टीम खड़ी करना। इस काम में उनको कुछ कम सफलता
नहीं मिली। लेकिन जहाँ तक अन्तिम लक्ष्य का प्रश्न है, उनके विचार अभी तक
भारत की आज़ादी की एक भावनात्मक धारणा तक ही सीमित थे। क्रान्ति के बाद
स्थापित होने वाली सरकार की रूपरेखा क्या होगी, दूसरे देशों की क्रान्तिकारी
शक्तियों के साथ उसके सम्बन्ध क्या होंगे, नई व्यवस्था में धर्म का क्या स्थान
होगा, आदि प्रश्नों पर उस समय के अधिकांश क्रान्तिकारी स्पष्ट नहीं थे। यह सूरत
कमोबेश 1913 तक जारी रही। इन सभी मुद्दों पर स्पष्ट रवैया अपनाने का श्रेय ग़दर
पार्टी के नेताओं को जाता है।
इस शताब्दी के पहले दशक में भारत छोड़कर जाने वाले क्रान्तिकारियों को
अंग्रेज़ सरकार के हाथों में पड़ने से बचने के लिए एक देश से दूसरे देश तक
भटकना पड़ता था। अन्त में, उनमें से कइयों ने अमेरिका में बसने और उस देश
को अपने कार्य का आधार-क्षेत्र बनाने का फ़ैसला किया। इनमें प्रमुख थे –
तारकनाथ दास, शैलेन्द्र घोष, चन्द्र चक्रवर्ती, नन्दलाल कार, बसन्तकुमार राय,
सारंगधर दास, सुधीन्द्रनाथ बोस तथा जी.डी. कुमार। पहले दशक के अन्त तक
लाला हरदयाल भी उनसे आ मिले। इन लोगों ने अमेरिका और कनाडा में बसे
भारतीय प्रवासियों से सम्पर्क किया, धन संग्रह किया, अख़बार निकाले, और कई
जगहों पर गुप्त संस्थाएँ क़ायम कीं।
तारकनाथ दास ने फ़्री हिन्दुस्तान नाम से अख़बार निकाला और अमेरिका में
रह रहे भारतीय छात्रों तथा भारतीय प्रवासियों के लिए व्याख्यान देते रहे। वे समिति
नाम की एक गुप्त संस्था के प्रधान भी थे। इस संस्था के अन्य सदस्य थे –
शैलेन्द्रनाथ बोस, सारंगधर दास, जी.डी. कुमार, लस्कर और ग्रीन नामक एक
अमेरिकी।
रामनाथ पुरी ने 1908 में ओकलैण्ड में 'हिन्दुस्तान एसोसिएशन' नाम की एक
संस्था क़ायम की, और सर्कुलर ऑफ़ फ़्रीडम नाम से एक अख़बार निकाला। ये
इस अख़बार के माध्यम से अंग्रेज़ों को भारत से खदेड़े जाने की वकालत करते रहे।
जी.डी. कुमार ने वैंकूवर से स्वदेशी सेवक नामक अख़बार निकाला। वे वहाँ की
एक गुप्त संस्था के सदस्य भी थे। इस संस्था के सदस्य रहीम और सुन्दर सिंह
भी थे। सुन्दर सिंह आर्यन नाम के एक अख़बार का सम्पादन भी करते थे और
उसके जरिये लगातार ब्रिटिश-विरोधी प्रचार चलाते थे। रहीम और आत्माराम ने
वैंकूवर में 'यूनाइटेड इण्डिया लीग' का गठन किया।
40 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
लाला हरदयाल 1911 में अमेरिका पहुँचे और वहाँ स्टैनफ़ोर्ड विश्वविद्यालय
में प्राध्यापक हो गये। सैन फ्रांसिस्को में 'हिन्दुस्तानी स्टूडेण्ट्स एसोसिएशन' नाम
की एक संस्था उन्होंने गठित की। 1913 में एस्टोरिया की 'हिन्दुस्तानी एसोसिएशन'
का गठन हुआ। करीम बख़्श, नवाब ख़ान, बलवन्त सिंह, मुंशीराम, केसर सिंह और
कर्तार सिंह सराभा इसके सदस्य थे। ठाकुरदास और उनके मित्रों ने सेण्ट जॉन में
रहने वाले भारतीयों की एक संस्था गठित की। 1913 में शिकागो में 'हिन्दुस्तानी
एसोसिएशन ऑफ़ दि युनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका' का गठन हुआ।$^{13}$
लाला हरदयाल ने महसूस किया कि संयुक्त राज्य अमेरिका के विभिन्न हिस्सों
में कार्यरत इन संगठनों की गतिविधियों का समन्वय आवश्यक है। अतः उन्होंने
कनाडा और अमेरिका में रहने वाले भारतीय क्रान्तिकारियों की एक मीटिंग बुलायी।
इस मीटिंग में 'हिन्दुस्तानी एसोसिएशन ऑफ़ द पैसिफ़िक कोस्ट' नाम की एक
संस्था के गठन का फ़ैसला लिया गया। बाबा सोहन सिंह भकना और लाला
हरदयाल इसके क्रमशः अध्यक्ष और सचिव चुने गये। लाला हरदयाल नौकरी से
इस्तीफ़ा देकर अपना पूरा समय एसोसिएशन के काम में लगाने लगे।
मार्च 1913 में एसोसिएशन ने सैन फ्रांसिस्को से ग़दर नाम से एक अख़बार
निकालने का फ़ैसला किया। उसके बाद एसोसिएशन का नाम भी बदलकर 'ग़दर'
पार्टी कर दिया गया।
आगे की तरफ़ एक बड़ा क़दम
1913 में ग़दर पार्टी का गठन क्रान्तिकारी आन्दोलन के विकास की दिशा में एक
बहुत बड़ा एवं महत्त्वपूर्ण क़दम था। इसने राजनीति को धर्म से मुक्त किया और
धर्मनिरपेक्षता को अपनाया। धर्म को निजी मामला घोषित कर दिया गया।
अख़बार ग़दर ने हिन्दू-मुसलमान दोनों का आह्वान किया कि वे आर्थिक
मसलों पर ज़्यादा ध्यान दें क्योंकि उनका दोनों के जीवन पर एक जैसा प्रभाव पड़ता
है। प्लेग से हिन्दू और मुसलमान दोनों ही मर रहे हैं। अकाल पड़ने पर अन्न से
दोनों ही वंचित रहते हैं। पगार के लिए ज़ोर-ज़बरदस्ती दोनों पर की जाती है और
दोनों को ही अत्यधिक ऊँची दरों पर भू-राजस्व तथा जल-कर देना पड़ता है।
समस्या हिन्दू बनाम मुसलमान की नहीं बल्कि भारतीय बनाम अंग्रेज़ शोषकों की
है। हिन्दू-मुस्लिम एकता को इतना मज़बूत बनाया जाना चाहिए कि कोई उसे तोड़
न सके।$^{14}$
ग़दर पार्टी “धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करती थी और ठोस हिन्दू-मुस्लिम
एकता की तरफ़दार थी। वह छूत और अछूत के भेदभाव को भी नहीं मानती थी।
भारत की एकता और भारत के स्वाधीनता-संग्राम के लिए एकता, यही उसे प्रेरित
करने वाले प्रमुख सिद्धान्त थे।”$^{15}$ इस मामले में ग़दर पार्टी उस समय के भारतीय
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 41
नेताओं से मीलों आगे थी। सोहन सिंह जोश के अनुसार, “ग़दर के क्रान्तिकारी
राजनीतिक-सामाजिक सुधार के सवालों पर अपने समसामयिकों से आगे थे।”¹⁶
14 मई, 1914 को ग़दर में प्रकाशित एक लेख में लाला हरदयाल ने लिखा
: “प्रार्थनाओं का समय गया; अब तलवार उठाने का समय आ गया है। हमें पण्डितों
और क़ाजियों की कोई ज़रूरत नहीं है।”¹⁷ 1913 में पोर्टलैण्ड में भाषण देते हुए
उन्होंने कहा था कि ग़दर के क्रान्तिकारियों को आगामी क्रान्ति के लिए तैयार रहना
चाहिए। उन्हें भारत जाकर और वहाँ से अंग्रेजों को भगाकर अमेरिका जैसी एक
जनतान्त्रिक सरकार क़ायम करनी चाहिए जिसमें धर्म, जाति और रंग के अन्तर से
परे सभी भारतीय समान और स्वतन्त्र हों।
लाला हरदयाल ने, जो अपनेआप को अराजकतावादी कहा करते थे, एक
बार कहा था कि स्वामी और सेवक के बीच कभी कोई समानता नहीं हो
सकती, भले ही वे दोनों मुसलमान हों, सिख हों, अथवा वैष्णव हों। अमीर
हमेशा ग़रीब पर शासन करेगा...आर्थिक समानता के अभाव में भाईचारे की बात
सिर्फ़ एक सपना है।¹⁸
हिन्दुस्तानियों के बीच साम्प्रदायिक सद्भाव बढ़ाने को ग़दर पार्टी ने अपना एक
उद्देश्य बनाया। युगान्तर आश्रम नाम के ग़दर पार्टी के दफ़्तर में सवर्ण हिन्दू, अछूत,
मुसलमान और सिख, सभी जमा होते और साथ-साथ भोजन करते थे।
धर्म जब राजनीति के साथ घुलमिल जाता है तो वह एक घातक विष बन जाता
है जो राष्ट्र के जीवन्त अंगों को धीरे-धीरे नष्ट करता रहता है, भाई को भाई से
लड़ाता है, जनता के हौसले पस्त करता है, उसकी दृष्टि को धुँधला बनाता है,
असली दुश्मन की पहचान कर पाना मुश्किल कर देता है, जनता की जुझारू
मनःस्थिति को कमज़ोर करता है, और इस तरह राष्ट्र को साम्राज्यवादी साज़िशों की
आक्रमणकारी योजनाओं का लाचार शिकार बना देता है। भारत में इस बात को
सबसे पहले ग़दर के क्रान्तिकारियों ने महसूस किया। उन्होंने दिलेरी के साथ एलान
किया कि वे इस ज़हर को अपनी राजनीति से दूर ही रखेंगे। और उन्होंने जो कहा
वैसा ही किया भी। भारतीय राजनीति में यह उनकी पहली महान उपलब्धि थी।
ग़दर के क्रान्तिकारियों की दूसरी महान उपलब्धि थी, उनका अन्तरराष्ट्रीय
दृष्टिकोण। “ग़दर का आन्दोलन एक अन्तरराष्ट्रीय आन्दोलन था। उसकी शाखाएँ
मलाया, शंघाई, इण्डोनेशिया, ईस्ट इण्डीज़, फिलीपींस, जापान, मनीला,
न्यूज़ीलैण्ड, हांगकांग, सिंगापुर, फिजी, बर्मा और दूसरे देशों में कार्यरत थीं। ग़दर
पार्टी के उद्देश्यों के प्रति इण्डस्ट्रियल वर्कर्स ऑफ़ द वर्ल्ड (आई.डब्ल्यू.डब्ल्यू.)
की बहुत हमदर्दी थी...वे (ग़दर के क्रान्तिकारी) सभी देशों की आज़ादी के
तरफ़दार थे।”¹⁹
कई कवियों की लिखी हुई कविताओं के संग्रह ग़दर दी गूँज में एक कवि
42 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
कहता है : “भाइयो, चीन के ख़िलाफ़ जंग में न लड़ो। भारत, चीन और तुर्की के
अवाम आपस में भाई हैं। दुश्मन को इसकी इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए कि वह
इस भाईचारे को तहस-नहस कर सके।”²⁰
वैंकूवर में 1911 में एक संस्था क़ायम हुई थी जिसका उद्देश्य था बाक़ी
दुनिया के साथ भारतीय राष्ट्र के स्वतन्त्रता, समानता और भाईचारे के सम्बन्ध
क़ायम करना। लाला हरदयाल ने भी कई बार अपने भाषणों में यह घोषणा की थी
कि वे केवल भारत में ही नहीं बल्कि हर उस देश में क्रान्ति चाहते हैं जहाँ गुलामी
और शोषण मौजूद है।²¹
ग़दर के क्रान्तिकारियों के प्रचार का एक प्रमुख अंग था दुनिया की श्रमिक
यूनियनों के नाम अपील जारी करना। उन्होंने पूरी दुनिया के जनसाधारण से अपील
की कि वे साम्राज्यी निज़ाम को उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट हों।²²
विचारधारा और कार्यक्रम
ग़दर पार्टी ब्रिटिश शासन की विरोधी थी और उसका उद्देश्य था सशस्त्र संघर्ष के
जरिये भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त करके यहाँ अमेरिकी ढंग का प्रजातन्त्र
स्थापित करना। उसका विश्वास था कि प्रस्तावों, प्रतिनिधि-मण्डलों और
प्रार्थना-पत्रों से हमें कुछ मिलने वाला नहीं है। अंग्रेज़ शासकों के सामने नरमदलीय
नेताओं का नाचना भी वे पसन्द नहीं करते थे। जिस गणतन्त्र की बात वे करते थे
उसमें किसी तरह के राजा की नहीं, बल्कि एक चुने हुए राष्ट्रपति की गुंजाइश थी।
भारत की आज़ादी हासिल करने के लिए ग़दर पार्टी व्यक्तिगत कार्रवाइयों पर
उतना निर्भर नहीं करती थी जितना इस बात पर कि सेना में प्रचार करके सैनिकों
को विद्रोह के लिए प्रोत्साहित किया जाये। उन्होंने सैनिकों से अपील की कि वे
विद्रोह के लिए उठ खड़े हों।
ग़दर के क्रान्तिकारियों का वर्ग-चरित्र भी पहले के क्रान्तिकारियों से भिन्न था।
पुराने क्रान्तिकारी मुख्यतः निम्न-मध्यम वर्ग के कुछ शिक्षित लोग थे जबकि ग़दर
पार्टी के अधिकांश सदस्य किसान से मज़दूर बने लोग थे, और इसलिए उन्होंने
विद्रोह के लिए किसानों से भी उठ खड़े होने की अपील की।
दो कमज़ोरियाँ
ग़दर पार्टी की स्थापना अमेरिका में हुई थी जहाँ लोगों को कुछ नागरिक स्वाधीनताएँ
और अभिव्यक्ति की आज़ादी हासिल थी जबकि उस समय भारत में ये चीज़ें नहीं
थीं। वहाँ ग़दर के नेता खुलकर अपनी योजनाओं, इरादों और कार्यक्रम पर बहस
करते और उन पर लेख लिखते थे। इस तरह ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को उनकी
योजनाओं की पूरी-पूरी जानकारी रहती थी और वे ग़दर के क्रान्तिकारियों की
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 43
गतिविधियों से पैदा हो सकने वाली हर स्थिति से निपटने को तैयार थे। ग़दर के
नेताओं और कार्यकर्ताओं की इस अगोपनीयता की बहुत बड़ी क़ीमत पार्टी को
चुकानी पड़ी।
दूसरी प्रमुख कमज़ोरी उनका यह भ्रामक विश्वास था कि एक साम्राज्यवादी
शक्ति उनको दूसरी साम्राज्यवादी शक्ति के चंगुल से आज़ाद कराने में ईमानदारी के
साथ सहायता करेगी। उनके दिमाग़ में यह बात साफ़ नहीं थी कि जर्मन हो या
ब्रिटिश या कोई और – सभी साम्राज्यवादी शक्तियों की प्रवृत्ति एक जैसी होती है।
जब पहला विश्वयुद्ध आरम्भ हुआ तब ग़दर पार्टी और दूसरे क्रान्तिकारियों ने नारा
दिया कि “ब्रिटेन की मुसीबत हमारे लिए सुनहरा अवसर है,” और कि “दुश्मन
का दुश्मन दोस्त होता है”। इस विश्वास के साथ उन्होंने जर्मनी के क़ैसर से
सहायता के लिए सम्पर्क किया। क़ैसर के प्रतिनिधियों से बातचीत के दौरान
स्वाधीन भारत की भावी व्यवस्था से सम्बन्धित कुछ शर्तें भी उन्होंने रखने की
कोशिश की। मगर इस नुक्ते पर क़ैसर का जवाब हमेशा अस्पष्ट रहा। उसकी
दिलचस्पी जंग के दौरान ब्रिटेन के ख़िलाफ़ ग़दर पार्टी के क्रान्तिकारियों का अधिक
से अधिक इस्तेमाल कर सकने तक ही सीमित थी। उसके अपने जंगी उद्देश्य थे –
ब्रिटेन और फ्रांस से अधिक से अधिक उपनिवेश छीनना। इस तरह ग़दर के
क्रान्तिकारी साम्राज्यवाद की वास्तविक प्रकृति से एकदम अनजान थे। वास्तविक
और स्थायी मुक्ति के लिए गुलाम देशों को पूरी साम्राज्यवादी व्यवस्था से लड़ाई
लड़नी होगी। – यह बात रूस में अक्टूबर (नई प्रणाली में नवम्बर) 1917 की
क्रान्ति के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट हुई।
महान अक्टूबर क्रान्ति और उसका प्रभाव
1917 की अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति मानवता के इतिहास में एक युगान्तकारी
घटना है। उसने केवल रूस में ही साम्राज्यवाद को पराजित नहीं किया बल्कि पूरी
साम्राज्यवादी व्यवस्था को भी एक ज़बरदस्त झटका दिया। इस क्रान्ति ने रूस में
मनुष्य द्वारा मनुष्य के और राष्ट्र द्वारा राष्ट्र के शोषण पर आधारित व्यवस्था को
समाप्त कर दिया। सोवियत जनता अपने भाग्य की स्वामी बन गयी। खेतों, कारख़ानों
और वर्कशॉपों पर उसका सामूहिक स्वामित्व क़ायम हो गया। अक्टूबर क्रान्ति ने
न सिर्फ़ रूस के अवाम को पूँजीपतियों और ज़मींदारों की गुलामी से मुक्त किया
बल्कि एक बिल्कुल नये समाज और नये इन्सान को भी जन्म दिया। उसने गुलाम
देशों के स्वाधीनता सेनानियों को प्रेरित किया और उनके अन्दर विश्वास जगाया कि
उनकी लड़ाई कामयाब होकर रहेगी। उसने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में चल रहे
मुक्ति-संघर्षों को नये आयाम भी दिये।
विश्वव्यापी साम्राज्यवाद-विरोधी संग्राम का अंग होने के नाते भारत का
44 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
स्वाधीनता संग्राम भी इससे अछूता नहीं रहा। उसके दृष्टिकोण में भी एक फैलाव
आया और महसूस किया गया कि आर्थिक और सामाजिक समानताओं के बिना
आज़ादी का कोई अर्थ नहीं होगा।
अक्तूबर क्रान्ति और यूरोप तथा एशिया में साम्राज्यवाद-विरोधी क्रान्ति की
लहर ने, और साथ ही प्रथम विश्वयुद्ध के उपरान्त भारतीय जनता के क्रान्ति की
तरफ़ बढ़ते क़दमों ने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को चौकन्ना कर दिया था। उन्होंने
अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए दोतरफ़ा नीति अपनायी। एक तरफ़ तो उन्होंने
मॉण्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधारों का ढकोसला खड़ा करके नरमपन्थी राष्ट्रीय नेताओं का
समर्थन प्राप्त करने की कोशिश की और दूसरी तरफ़ राजद्रोह के मामलों की
छानबीन करने और क्रान्तिकारियों के दमन के उपाय सुझाने के लिए न्यायमूर्ति
रौलट की अध्यक्षता में एक कमेटी नियुक्त की। इस कमेटी की सिफ़ारिशें बड़ी
ही पाशविक थीं। उसने साधारण राजनीतिक गतिविधियों तक को राजद्रोह क़रार
दे दिया था। रौलट कमेटी की दमनकारी सिफ़ारिशों के विरोध में गाँधीजी ने एक
दिन आम हड़ताल का आह्वान किया। इस आह्वान के अप्रत्याशित प्रभाव हुए और
जनता अपना क्रोध व्यक्त करने के लिए एकजुट होकर सामने आ गयी। यह सरकार
के लिए ही नहीं, हमारे नेताओं के लिए भी एक नयी बात थी। अंग्रेजों ने भारतीयों
को सबक सिखाने का निश्चय किया और 13 अप्रैल, 1919 को जलियाँवाला बाग़
में इस निश्चय को अमली रूप भी दे दिया गया। इसके बाद तो जनता में गुस्से
की लहर दौड़ गयी और पंजाब के लगभग सभी शहरों में लोग सड़कों पर निकल
आये। सरकार ने उसे संगठित विद्रोह की संज्ञा दी। लेकिन वास्तव में गाँधीजी भी
इस सबके लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने एलान किया कि एक दिन की आम हड़ताल
का नारा देकर उन्होंने भयंकर भूल की थी। उन्होंने लोगों से आन्दोलन बन्द करने
और सुधारों पर अमल करने का अनुरोध किया।
सितम्बर, 1920 में लाला लाजपत राय ने कांग्रेस को आगाह करते हुए कहा
था कि जनता क्षुब्ध एवं परेशान है और कुछ कर गुज़रने के मूड में है। उन्होंने कांग्रेस
से यह भी कहा कि अगर जनता के इस गुस्से को सही रास्ते पर न डाला गया
तो वह अपना रास्ता अपनायेगी जो देश के लिए अहितकर होगा। “इस तथ्य की
ओर से आँखें बन्द करने से कोई लाभ नहीं होगा कि हम क्रान्तिकारी युग से होकर
गुज़र रहे हैं।” उन्होंने एलान किया और कहा, “प्रकृति से और परम्परा से हम
क्रान्तियों को पसन्द नहीं करते हैं।”²³ कांग्रेस ने नागपुर अधिवेशन में लाला जी की
उस चेतावनी पर भी विचार किया और गाँधीजी को निर्देश दिया गया कि वे
स्वराज्य के लिए असहयोग आन्दोलन आरम्भ करें। आन्दोलन शुरू करने से पहले
महात्मा जी बंगाल गये और कुछ क्रान्तिकारी नेताओं से मिलकर उनसे एक साल
का समय माँगा और कहा कि अगर वे एक साल के अन्दर स्वराज्य न प्राप्त कर
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 45
लें तो क्रान्तिकारियों को अपने रास्ते पर चलने की पूरी छूट होगी। क्रान्तिकारी
नेताओं ने गाँधीजी की बात मान ली। सत्याग्रह आन्दोलन शुरू हुआ। देखते-देखते
वह सारे देश में फैल गया और गाँवों की छोटी-छोटी झोंपड़ियों तक में ‘स्वराज्य’
शब्द गूँजने लगा। आन्दोलन में भाग लेने के लिए गाँधीजी ने जो भी रोकथाम की
शर्तें लगाई थीं उन सबको भी तोड़कर किसान पूरे जोश के साथ आन्दोलन में कूद
पड़े। “सरकार परेशान और घबरायी हुई थी, उसके हाथ-पैर फूलने लगे थे। यदि
सरकार की चौमुखी अवज्ञा की छूट शहरों से चलकर करोड़ों किसानों तक पहुँच
जाती है तो अंग्रेज़ी हुकूमत के पास बचत के लिए कोई चारा नहीं रह जायेगा; तीस
करोड़ जनता के विद्रोह की खौलती हुई हाँडी से उनकी सारी तोपें और हवाई जहाज़
भी उन्हें बचा नहीं सकेंगे।”²⁴ गाँधीजी भी खुश नहीं थे और उतने ही घबराये हुए
थे। वे आन्दोलन वापस लेने के लिए किसी अवसर की प्रतीक्षा में थे और फ़रवरी,
1922 में चौरी-चौरा की घटना से उन्हें यह अवसर मिल गया। बजाय इसके कि
वे उस घटना का स्वागत करते और जनता से उसी प्रकार की हज़ारों और घटनाओं
की माँग करते, उन्होंने किसी से सलाह लिये बग़ैर चुपचाप आन्दोलन वापस ले
लिया और राजनीति से अलग हो गये। इस पृष्ठभूमि में क्रान्तिकारियों ने, जिन्होंने
गाँधीजी के कहने पर हथियार रख दिये थे, अपने को संगठित करके फिर से
हथियार उठाने का फ़ैसला किया।
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन
सभी क्रान्तिकारियों को एक अखिल भारतीय पार्टी में संगठित करने में पहल की
शचीन्द्रनाथ सान्याल ने। इसी उद्देश्य से उन्होंने 1923 के अन्त में ‘हिन्दुस्तान
प्रजातन्त्र संघ’ (हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन) की बुनियाद डाली। उन्होंने
पार्टी का संविधान भी तैयार किया जो पीले काग़ज़ पर छपा था और इसीलिए वह
‘पीला परचा’ के नाम से मशहूर है। एक और महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ जो उन्होंने तैयार
किया वह था ‘हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ’ का घोषणापत्र जिसका शीर्षक था (दि
रिवोल्यूशनरी)। यह दस्तावेज़ पहली जनवरी, 1925 की रात में पूरे उत्तर भारत में
बाँटा गया था। 1917 की अक्टूबर क्रान्ति से प्रभावित होकर घोषणापत्र में भारतीय
क्रान्तिकारियों के उद्देश्य का एलान नीचे लिखे शब्दों में किया गया था :
“राजनीति के क्षेत्र में क्रान्तिकारी पार्टी का तात्कालिक उद्देश्य संगठित सशस्त्र
क्रान्ति द्वारा भारत के संयुक्त राज्यों का एक संघीय गणराज्य (फ़ेडरल रिपब्लिक
ऑफ़ यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ इण्डिया) स्थापित करना है। इस गणराज्य के अन्तिम
संविधान का निर्माण एवं घोषणा तब होगी जब सम्पूर्ण भारत के प्रतिनिधि अपने
निर्णयों को लागू करने में सक्षम होंगे। लेकिन इस गणराज्य का मूलभूत सिद्धान्त
सार्वजनिक मताधिकार पर और शोषण पर आधारित ऐसी समस्त व्यवस्थाओं की
46 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
समाप्ति पर आधारित होगा जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को सम्भव बनाती हैं।
इस गणराज्य में मतदाताओं को, यदि वे चाहें तो, प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का
अधिकार होगा, अन्यथा प्रजातन्त्र एक मखौल बनकर रह जायेगा।”
घोषणापत्र में कहा गया था कि “यह क्रान्तिकारी पार्टी इन अर्थों में राष्ट्रीय न
होकर अन्तरराष्ट्रीय है कि इसका अन्तिम उद्देश्य विश्व में मेल एवं सामंजस्य
स्थापित करना है। यह विभिन्न राष्ट्रों और राज्यों के बीच प्रतिद्वन्द्विता के बजाय
सहयोग चाहती है; और इन अर्थों में वह भारत के उज्ज्वल अतीत के महान ऋषियों
एवं आज के बोल्शेविक रूस का अनुसरण करेगी।”²⁵
घोषणापत्र में साम्प्रदायिक समस्या के बारे में, जनता के आर्थिक एवं
सामाजिक हितों के सवाल पर और कांग्रेस तथा अन्य राजनीतिक पार्टियों के बारे
में क्रान्तिकारियों के दृष्टिकोण को स्पष्ट किया गया था।
इन सभी सवालों पर घोषणापत्र का दृष्टिकोण निश्चित रूप से अतीत का
दामन छोड़कर समाजवाद का और सोवियत को ‘विजयी समाजवाद का पहला देश’
कहकर उसका स्वागत करता है। उसमें हमें राष्ट्रीय आज़ादी के लिए चलने वाले
आन्दोलनों के अन्तरराष्ट्रीय चरित्र की समझ भी देखने को मिलती है। हालाँकि यह
समझ अभी बहुत साफ़ नहीं है। स्वतन्त्र भारत की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था
कैसी होगी, घोषणापत्र में उस पर भी प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है और
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मज़दूरों और किसानों को संगठित करने की
आवश्यकता को भी स्वीकार किया गया है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि
घोषणापत्र का लेखक मार्क्सवादी था या उसने वैज्ञानिक समाजवाद के सारतत्त्व को
आत्मसात कर लिया था। उसका झुकाव ख़ासतौर पर ईश्वर और रहस्यवाद की ओर
है। घोषणापत्र के अनुसार, “पार्टी का उद्देश्य सत्य को प्रस्थापित करना और उसका
प्रचार करना है। विश्व न माया है न भ्रम कि उसकी तरफ़ से आँख बन्द कर ली
जाये और उसकी उपेक्षा की जाये। वह एक अविभाज्य आत्मा का प्रकट स्वरूप
है, आत्मा जो शक्ति, ज्ञान और सौन्दर्य का सर्वोच्च उद्गम है।” लेखक मार्क्सवाद
के आर्थिक पक्ष को स्वीकार करता है, जो काकोरी से पहले के क्रान्तिकारियों के
मुक़ाबले निश्चय ही एक आगे बढ़ा हुआ क़दम है। लेकिन जहाँ तक मार्क्सवाद
के दार्शनिक पक्ष का सवाल है, लेखक भौतिकवाद को न मानकर भगवान और
धैर्य पर अडिग रहता है। आगे चलकर सान्याल जी स्वयं लिखते हैं : “कम्युनिस्ट
दर्शन में इतिहास के भौतिकवादी विश्लेषण का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। और
इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या में वर्ग-संघर्ष की अवधारणा शुरू से आख़िर तक
लगातार मौजूद है...मैं आज भी इन सिद्धान्तों को स्वीकार नहीं कर पाया हूँ...।”²⁶
एक और महत्त्वपूर्ण मुद्दा जिस पर उनका कम्युनिज़्म से मतभेद था, वह था
सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व की अवधारणा। उनका यह मत था कि “सिर्फ़ मध्यम वर्ग
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 47
के नौजवान ही नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता रखते हैं, जबकि मज़दूर और किसान
क्रान्तिकारी सेना के सिपाही का काम करेंगे।”27
शचीन्द्रनाथ सान्याल और उनके समय के अन्य क्रान्तिकारियों की सैद्धान्तिक
मान्यताओं का सत्येन्द्र नारायण मजूमदार ने अपनी पुस्तक इन सर्च ऑफ़ ए
रिवोल्यूशनरी आइडियोलोजी एण्ड रिवोल्यूशनरी प्रोग्राम में संक्षेप में बड़ा अच्छा
खुलासा प्रस्तुत किया है। दोनों दस्तावेज़ों (क्रान्तिकारी और संविधान) पर टिप्पणी
करते हुए उन्होंने लिखा है : “ये दोनों दस्तावेज़ उन क्रान्तिकारियों की सोच का
प्रतिनिधित्व करते हैं जो उन दिनों साम्यवाद की तरफ़ आकर्षित हो रहे थे।”28
इसके बाद दोनों दस्तावेज़ों की विशिष्टताओं का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं
: “इन दोनों दस्तावेज़ों की विशिष्टताएँ हैं – (क) समाजवाद की विजय-पताका
फहराने वाले पहले देश के रूप में बोल्शेविक रूस के प्रति और साम्यवाद के प्रति
स्पष्ट झुकाव; (ख) राष्ट्रीय मुक्ति के लिए क्रान्ति के अन्तरराष्ट्रीय चरित्र को
समझने की शुरुआत, हालाँकि यह समझ अभी बहुत साफ़ नहीं थी; (ग) स्वतन्त्र
भारत की सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था की रूपरेखा तैयार करने की कोशिश;
(घ) मज़दूरों और किसानों को संगठित करने के लिए कृत-संकल्प होना;
(ङ) पार्टी में जनवादी-केन्द्रीयता के सिद्धान्त का प्रवेश।”29
दोनों दस्तावेज़ों की कमज़ोरियों को मजूमदार ने इस प्रकार गिनाया है : “
(क) साम्यवाद के प्रति झुकाव अवश्य था, लेकिन अभी तक साम्यवाद के
अध्ययन का ठोस आधार उसे नहीं मिला था; (ख) राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्ष में मज़दूरों
और किसानों की भूमिका के वास्तविक महत्त्व को स्पष्ट रूप से नहीं समझा गया
था; (ग) घोषणापत्र का लेखक अभी तक धार्मिक रहस्यवाद के प्रभाव से ग्रस्त
है; (घ) घोषणापत्र यह समझने में असफल रहा कि आतंकवाद का मुक़ाबला करने
के लिए जवाबी आतंकवादी अभियान का मज़दूरों और किसानों को संगठित करने
के कार्य से सामंजस्य बैठाना अव्यावहारिक है; (ङ) राष्ट्रीय स्थिति का ग़लत
विश्लेषण देते हुए घोषणापत्र में कहा गया था कि 'हमारे जीवन के हर क्षेत्र में चरम
असहायता की भावना विद्यमान है और आतंकवाद उसमें यथोचित उत्साह पैदा करने
का प्रभावकारी साधन' आदि। जबकि उस समय तक भारत की मेहनतकश जनता
संघर्ष की राह पर कूच कर चुकी थी। उसका अगुवा दस्ता मज़दूर वर्ग निर्मम
पुलिस-दमन के बावजूद लगातार और बहादुरी के साथ शानदार लड़ाइयाँ लड़ रहा
था।”30
बंगाल में भी उसी दिशा में विकास हो रहा था। वहाँ अनुशीलन और युगान्तर
के कई नेताओं ने सोवियत रूस तथा कम्युनिज़्म में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी
थी। लेकिन यह दिलचस्पी साम्यवाद के अध्ययन पर या अक्टूबर क्रान्ति और
उसकी विशिष्टता की ठीक समझ पर आधारित नहीं थी। वे सोवियत यूनियन और
48 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
कोमिण्टर्न को “हथियार तथा अन्य प्रकार की सहायता, मसलन बम बनाने की
शिक्षा आदि, प्राप्त करने के एक सम्भावित स्रोत के रूप में देखते थे। लेकिन जब
उन्हें पता चला कि सोवियत यूनियन और कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल दोनों ही जनता
से अलग किसी प्रकार की सशस्त्र गतिविधियों को प्रोत्साहन नहीं देते हैं तो उनकी
दिलचस्पी ठण्डी पड़ गयी।”³¹
उस समय, अर्थात तीसरे दशक के उत्तरार्द्ध में भारतवर्ष में कम्युनिस्ट
विचारधारा जनप्रिय हो रही थी। अक्टूबर क्रान्ति और रूस के ख़िलाफ़ साम्राज्यवादी
हस्तक्षेप की पराजय के अलावा इस बदलाव के कुछ अन्य कारण भी थे। जैसे :
(क) पेशावर और कानपुर के बोल्शेविक षड्यन्त्र केस; (ख) देश के कई भागों
में किसानों के जुझारू संघर्ष; (ग) मज़दूरों की देशव्यापी बड़ी-बड़ी हड़तालें
(घ) मज़दूर-किसान पार्टी का गठन; (ङ) देश के विभिन्न कम्युनिस्ट ग्रुपों को
मिलाकर एक अखिल भारतीय पार्टी के गठन का प्रयास। राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय
पैमाने पर घटित इन घटनाओं से प्रभावित होकर अनुशीलन के कुछ कार्यकर्ता पार्टी
से अलग होकर कम्युनिस्ट आन्दोलन में चले गये। अनुशीलन में उनका अच्छा
सम्मान था और क्रान्तिकारी युवकों में साम्यवाद को जनप्रिय बनाने में उन लोगों
की काफ़ी हद तक महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।
हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ का गठन
संयुक्त प्रान्त (अब उत्तर प्रदेश) में 1925 में क्रान्तिकारी पार्टी के प्रायः सभी प्रमुख
नेता काकोरी षड्यन्त्र केस के सिलसिले में पकड़कर जेल में बन्द कर दिये गये
थे। इससे हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ के संगठन को बहुत बड़ा धक्का लगा। केवल
चन्द्रशेखर आज़ाद और कुन्दनलाल गुप्त ही पुलिस के चंगुल से बचकर निकल पाये
थे। इनके अतिरिक्त बाहर जो साथी रह गये थे वे सब दूसरी पंक्ति के सिपाही थे।
पार्टी को फिर से संगठित करने का दायित्व इन्हीं दूसरी पंक्ति के साथियों पर पड़ा।
उस समय अर्थात 1925 में कुछ क्रान्तिकारी लाहौर में सक्रिय थे और कुछ कानपुर
में फिर से काम आरम्भ करने का प्रयास कर रहे थे। सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से उस
समय तक इन दोनों केन्द्रों के साथियों के दिमाग़ साफ़ नहीं थे। हाँ, एक सही
सिद्धान्त की तलाश अवश्य आरम्भ हो गयी थी। इस दिशा में दोनों केन्द्रों के
साथियों को योग्य मार्गदर्शक भी मिल गये थे।
इस समय (1925-26) लाहौर के साथी, ख़ासकर भगतसिंह और सुखदेव,
रूसी अराजकतावादी बाकुनिन से प्रभावित थे। भगतसिंह को अराजकतावाद से
समाजवाद की ओर लाने का श्रेय दो व्यक्तियों को है – कामरेड सोहन सिंह जोश
जो अब हमारे बीच में नहीं हैं और लाला छबीलदास। जोश एक मशहूर कम्युनिस्ट
नेता और किरती नाम की पंजाबी मासिक पत्रिका के सम्पादक थे। वे भगतसिंह
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 49