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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 788 में से

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स्वाधीनता संग्राम भी इससे अछूता नहीं रहा। उसके दृष्टिकोण में भी एक फैलाव
आया और महसूस किया गया कि आर्थिक और सामाजिक समानताओं के बिना
आज़ादी का कोई अर्थ नहीं होगा।
अक्तूबर क्रान्ति और यूरोप तथा एशिया में साम्राज्यवाद-विरोधी क्रान्ति की
लहर ने, और साथ ही प्रथम विश्वयुद्ध के उपरान्त भारतीय जनता के क्रान्ति की
तरफ़ बढ़ते क़दमों ने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को चौकन्ना कर दिया था। उन्होंने
अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए दोतरफ़ा नीति अपनायी। एक तरफ़ तो उन्होंने
मॉण्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधारों का ढकोसला खड़ा करके नरमपन्थी राष्ट्रीय नेताओं का
समर्थन प्राप्त करने की कोशिश की और दूसरी तरफ़ राजद्रोह के मामलों की
छानबीन करने और क्रान्तिकारियों के दमन के उपाय सुझाने के लिए न्यायमूर्ति
रौलट की अध्यक्षता में एक कमेटी नियुक्त की। इस कमेटी की सिफ़ारिशें बड़ी
ही पाशविक थीं। उसने साधारण राजनीतिक गतिविधियों तक को राजद्रोह क़रार
दे दिया था। रौलट कमेटी की दमनकारी सिफ़ारिशों के विरोध में गाँधीजी ने एक
दिन आम हड़ताल का आह्वान किया। इस आह्वान के अप्रत्याशित प्रभाव हुए और
जनता अपना क्रोध व्यक्त करने के लिए एकजुट होकर सामने आ गयी। यह सरकार
के लिए ही नहीं, हमारे नेताओं के लिए भी एक नयी बात थी। अंग्रेजों ने भारतीयों
को सबक सिखाने का निश्चय किया और 13 अप्रैल, 1919 को जलियाँवाला बाग़
में इस निश्चय को अमली रूप भी दे दिया गया। इसके बाद तो जनता में गुस्से
की लहर दौड़ गयी और पंजाब के लगभग सभी शहरों में लोग सड़कों पर निकल
आये। सरकार ने उसे संगठित विद्रोह की संज्ञा दी। लेकिन वास्तव में गाँधीजी भी
इस सबके लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने एलान किया कि एक दिन की आम हड़ताल
का नारा देकर उन्होंने भयंकर भूल की थी। उन्होंने लोगों से आन्दोलन बन्द करने
और सुधारों पर अमल करने का अनुरोध किया।
सितम्बर, 1920 में लाला लाजपत राय ने कांग्रेस को आगाह करते हुए कहा
था कि जनता क्षुब्ध एवं परेशान है और कुछ कर गुज़रने के मूड में है। उन्होंने कांग्रेस
से यह भी कहा कि अगर जनता के इस गुस्से को सही रास्ते पर न डाला गया
तो वह अपना रास्ता अपनायेगी जो देश के लिए अहितकर होगा। “इस तथ्य की
ओर से आँखें बन्द करने से कोई लाभ नहीं होगा कि हम क्रान्तिकारी युग से होकर
गुज़र रहे हैं।” उन्होंने एलान किया और कहा, “प्रकृति से और परम्परा से हम
क्रान्तियों को पसन्द नहीं करते हैं।”²³ कांग्रेस ने नागपुर अधिवेशन में लाला जी की
उस चेतावनी पर भी विचार किया और गाँधीजी को निर्देश दिया गया कि वे
स्वराज्य के लिए असहयोग आन्दोलन आरम्भ करें। आन्दोलन शुरू करने से पहले
महात्मा जी बंगाल गये और कुछ क्रान्तिकारी नेताओं से मिलकर उनसे एक साल
का समय माँगा और कहा कि अगर वे एक साल के अन्दर स्वराज्य न प्राप्त कर
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 45