भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 53, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमाप्ति पर आधारित होगा जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को सम्भव बनाती हैं।
इस गणराज्य में मतदाताओं को, यदि वे चाहें तो, प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का
अधिकार होगा, अन्यथा प्रजातन्त्र एक मखौल बनकर रह जायेगा।”
घोषणापत्र में कहा गया था कि “यह क्रान्तिकारी पार्टी इन अर्थों में राष्ट्रीय न
होकर अन्तरराष्ट्रीय है कि इसका अन्तिम उद्देश्य विश्व में मेल एवं सामंजस्य
स्थापित करना है। यह विभिन्न राष्ट्रों और राज्यों के बीच प्रतिद्वन्द्विता के बजाय
सहयोग चाहती है; और इन अर्थों में वह भारत के उज्ज्वल अतीत के महान ऋषियों
एवं आज के बोल्शेविक रूस का अनुसरण करेगी।”²⁵
घोषणापत्र में साम्प्रदायिक समस्या के बारे में, जनता के आर्थिक एवं
सामाजिक हितों के सवाल पर और कांग्रेस तथा अन्य राजनीतिक पार्टियों के बारे
में क्रान्तिकारियों के दृष्टिकोण को स्पष्ट किया गया था।
इन सभी सवालों पर घोषणापत्र का दृष्टिकोण निश्चित रूप से अतीत का
दामन छोड़कर समाजवाद का और सोवियत को ‘विजयी समाजवाद का पहला देश’
कहकर उसका स्वागत करता है। उसमें हमें राष्ट्रीय आज़ादी के लिए चलने वाले
आन्दोलनों के अन्तरराष्ट्रीय चरित्र की समझ भी देखने को मिलती है। हालाँकि यह
समझ अभी बहुत साफ़ नहीं है। स्वतन्त्र भारत की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था
कैसी होगी, घोषणापत्र में उस पर भी प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है और
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मज़दूरों और किसानों को संगठित करने की
आवश्यकता को भी स्वीकार किया गया है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि
घोषणापत्र का लेखक मार्क्सवादी था या उसने वैज्ञानिक समाजवाद के सारतत्त्व को
आत्मसात कर लिया था। उसका झुकाव ख़ासतौर पर ईश्वर और रहस्यवाद की ओर
है। घोषणापत्र के अनुसार, “पार्टी का उद्देश्य सत्य को प्रस्थापित करना और उसका
प्रचार करना है। विश्व न माया है न भ्रम कि उसकी तरफ़ से आँख बन्द कर ली
जाये और उसकी उपेक्षा की जाये। वह एक अविभाज्य आत्मा का प्रकट स्वरूप
है, आत्मा जो शक्ति, ज्ञान और सौन्दर्य का सर्वोच्च उद्गम है।” लेखक मार्क्सवाद
के आर्थिक पक्ष को स्वीकार करता है, जो काकोरी से पहले के क्रान्तिकारियों के
मुक़ाबले निश्चय ही एक आगे बढ़ा हुआ क़दम है। लेकिन जहाँ तक मार्क्सवाद
के दार्शनिक पक्ष का सवाल है, लेखक भौतिकवाद को न मानकर भगवान और
धैर्य पर अडिग रहता है। आगे चलकर सान्याल जी स्वयं लिखते हैं : “कम्युनिस्ट
दर्शन में इतिहास के भौतिकवादी विश्लेषण का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। और
इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या में वर्ग-संघर्ष की अवधारणा शुरू से आख़िर तक
लगातार मौजूद है...मैं आज भी इन सिद्धान्तों को स्वीकार नहीं कर पाया हूँ...।”²⁶
एक और महत्त्वपूर्ण मुद्दा जिस पर उनका कम्युनिज़्म से मतभेद था, वह था
सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व की अवधारणा। उनका यह मत था कि “सिर्फ़ मध्यम वर्ग
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 47