भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 52, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंलें तो क्रान्तिकारियों को अपने रास्ते पर चलने की पूरी छूट होगी। क्रान्तिकारी
नेताओं ने गाँधीजी की बात मान ली। सत्याग्रह आन्दोलन शुरू हुआ। देखते-देखते
वह सारे देश में फैल गया और गाँवों की छोटी-छोटी झोंपड़ियों तक में ‘स्वराज्य’
शब्द गूँजने लगा। आन्दोलन में भाग लेने के लिए गाँधीजी ने जो भी रोकथाम की
शर्तें लगाई थीं उन सबको भी तोड़कर किसान पूरे जोश के साथ आन्दोलन में कूद
पड़े। “सरकार परेशान और घबरायी हुई थी, उसके हाथ-पैर फूलने लगे थे। यदि
सरकार की चौमुखी अवज्ञा की छूट शहरों से चलकर करोड़ों किसानों तक पहुँच
जाती है तो अंग्रेज़ी हुकूमत के पास बचत के लिए कोई चारा नहीं रह जायेगा; तीस
करोड़ जनता के विद्रोह की खौलती हुई हाँडी से उनकी सारी तोपें और हवाई जहाज़
भी उन्हें बचा नहीं सकेंगे।”²⁴ गाँधीजी भी खुश नहीं थे और उतने ही घबराये हुए
थे। वे आन्दोलन वापस लेने के लिए किसी अवसर की प्रतीक्षा में थे और फ़रवरी,
1922 में चौरी-चौरा की घटना से उन्हें यह अवसर मिल गया। बजाय इसके कि
वे उस घटना का स्वागत करते और जनता से उसी प्रकार की हज़ारों और घटनाओं
की माँग करते, उन्होंने किसी से सलाह लिये बग़ैर चुपचाप आन्दोलन वापस ले
लिया और राजनीति से अलग हो गये। इस पृष्ठभूमि में क्रान्तिकारियों ने, जिन्होंने
गाँधीजी के कहने पर हथियार रख दिये थे, अपने को संगठित करके फिर से
हथियार उठाने का फ़ैसला किया।
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन
सभी क्रान्तिकारियों को एक अखिल भारतीय पार्टी में संगठित करने में पहल की
शचीन्द्रनाथ सान्याल ने। इसी उद्देश्य से उन्होंने 1923 के अन्त में ‘हिन्दुस्तान
प्रजातन्त्र संघ’ (हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन) की बुनियाद डाली। उन्होंने
पार्टी का संविधान भी तैयार किया जो पीले काग़ज़ पर छपा था और इसीलिए वह
‘पीला परचा’ के नाम से मशहूर है। एक और महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ जो उन्होंने तैयार
किया वह था ‘हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ’ का घोषणापत्र जिसका शीर्षक था (दि
रिवोल्यूशनरी)। यह दस्तावेज़ पहली जनवरी, 1925 की रात में पूरे उत्तर भारत में
बाँटा गया था। 1917 की अक्टूबर क्रान्ति से प्रभावित होकर घोषणापत्र में भारतीय
क्रान्तिकारियों के उद्देश्य का एलान नीचे लिखे शब्दों में किया गया था :
“राजनीति के क्षेत्र में क्रान्तिकारी पार्टी का तात्कालिक उद्देश्य संगठित सशस्त्र
क्रान्ति द्वारा भारत के संयुक्त राज्यों का एक संघीय गणराज्य (फ़ेडरल रिपब्लिक
ऑफ़ यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ इण्डिया) स्थापित करना है। इस गणराज्य के अन्तिम
संविधान का निर्माण एवं घोषणा तब होगी जब सम्पूर्ण भारत के प्रतिनिधि अपने
निर्णयों को लागू करने में सक्षम होंगे। लेकिन इस गणराज्य का मूलभूत सिद्धान्त
सार्वजनिक मताधिकार पर और शोषण पर आधारित ऐसी समस्त व्यवस्थाओं की
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