भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 54, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंके नौजवान ही नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता रखते हैं, जबकि मज़दूर और किसान
क्रान्तिकारी सेना के सिपाही का काम करेंगे।”27
शचीन्द्रनाथ सान्याल और उनके समय के अन्य क्रान्तिकारियों की सैद्धान्तिक
मान्यताओं का सत्येन्द्र नारायण मजूमदार ने अपनी पुस्तक इन सर्च ऑफ़ ए
रिवोल्यूशनरी आइडियोलोजी एण्ड रिवोल्यूशनरी प्रोग्राम में संक्षेप में बड़ा अच्छा
खुलासा प्रस्तुत किया है। दोनों दस्तावेज़ों (क्रान्तिकारी और संविधान) पर टिप्पणी
करते हुए उन्होंने लिखा है : “ये दोनों दस्तावेज़ उन क्रान्तिकारियों की सोच का
प्रतिनिधित्व करते हैं जो उन दिनों साम्यवाद की तरफ़ आकर्षित हो रहे थे।”28
इसके बाद दोनों दस्तावेज़ों की विशिष्टताओं का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं
: “इन दोनों दस्तावेज़ों की विशिष्टताएँ हैं – (क) समाजवाद की विजय-पताका
फहराने वाले पहले देश के रूप में बोल्शेविक रूस के प्रति और साम्यवाद के प्रति
स्पष्ट झुकाव; (ख) राष्ट्रीय मुक्ति के लिए क्रान्ति के अन्तरराष्ट्रीय चरित्र को
समझने की शुरुआत, हालाँकि यह समझ अभी बहुत साफ़ नहीं थी; (ग) स्वतन्त्र
भारत की सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था की रूपरेखा तैयार करने की कोशिश;
(घ) मज़दूरों और किसानों को संगठित करने के लिए कृत-संकल्प होना;
(ङ) पार्टी में जनवादी-केन्द्रीयता के सिद्धान्त का प्रवेश।”29
दोनों दस्तावेज़ों की कमज़ोरियों को मजूमदार ने इस प्रकार गिनाया है : “
(क) साम्यवाद के प्रति झुकाव अवश्य था, लेकिन अभी तक साम्यवाद के
अध्ययन का ठोस आधार उसे नहीं मिला था; (ख) राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्ष में मज़दूरों
और किसानों की भूमिका के वास्तविक महत्त्व को स्पष्ट रूप से नहीं समझा गया
था; (ग) घोषणापत्र का लेखक अभी तक धार्मिक रहस्यवाद के प्रभाव से ग्रस्त
है; (घ) घोषणापत्र यह समझने में असफल रहा कि आतंकवाद का मुक़ाबला करने
के लिए जवाबी आतंकवादी अभियान का मज़दूरों और किसानों को संगठित करने
के कार्य से सामंजस्य बैठाना अव्यावहारिक है; (ङ) राष्ट्रीय स्थिति का ग़लत
विश्लेषण देते हुए घोषणापत्र में कहा गया था कि 'हमारे जीवन के हर क्षेत्र में चरम
असहायता की भावना विद्यमान है और आतंकवाद उसमें यथोचित उत्साह पैदा करने
का प्रभावकारी साधन' आदि। जबकि उस समय तक भारत की मेहनतकश जनता
संघर्ष की राह पर कूच कर चुकी थी। उसका अगुवा दस्ता मज़दूर वर्ग निर्मम
पुलिस-दमन के बावजूद लगातार और बहादुरी के साथ शानदार लड़ाइयाँ लड़ रहा
था।”30
बंगाल में भी उसी दिशा में विकास हो रहा था। वहाँ अनुशीलन और युगान्तर
के कई नेताओं ने सोवियत रूस तथा कम्युनिज़्म में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी
थी। लेकिन यह दिलचस्पी साम्यवाद के अध्ययन पर या अक्टूबर क्रान्ति और
उसकी विशिष्टता की ठीक समझ पर आधारित नहीं थी। वे सोवियत यूनियन और
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