भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 39, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास
( चापेकर बन्धुओं से भगतसिंह तक )
शिव वर्मा
स्वाधीनता संग्राम में क्रान्तिकारियों के प्रवेश की घोषणा करने वाला पहला धमाका
1897 में पूना में चापेकर बन्धुओं ने किया था। पूना शहर में उन दिनों प्लेग ज़ोरों
पर था। रैण्ड नाम के एक अंग्रेज़ को वहाँ प्लेग कमिश्नर बनाकर भेजा गया। वह
बड़ा ही ज़ालिम और तानाशाह क़िस्म का आदमी था। उसने प्लेग से प्रभावित
मकानों को बिना कोई अपवाद खाली कराये जाने का हुक्म जारी कर दिया। जहाँ
तक उस हुक्म का सवाल है उसमें कोई ग़लत बात नहीं थी। लेकिन जिस तरह
रैण्ड ने इस हुक्म पर अमल करवाया, उससे वह अलोकप्रिय हो गया। लोगों को
उनके घरों से निकाला गया और उन्हें कपड़े, बरतन आदि तक ले जाने का समय
नहीं दिया गया।
4 मई, 1897 को लोकमान्य तिलक ने अपने पत्र केसरी में एक लेख
लिखकर न सिर्फ़ नीचे के अफ़सरों पर बल्कि खुद सरकार पर इल्ज़ाम लगाया कि
वह जान-बूझकर जनता का उत्पीड़न कर रही है। उन्होंने रैण्ड को निरंकुश बतलाया
और सरकार पर "दमन का सहारा लेने" का आरोप लगाया।
फिर आया शिवाजी समारोह। इस अवसर पर, 12 जून, 1897 को एक
सार्वजनिक सभा में अध्यक्ष पद से बोलते हुए तिलक ने कहा : "क्या शिवाजी
ने अफ़ज़ल ख़ाँ को मारकर कोई पाप किया था? इस प्रश्न का उत्तर महाभारत में
मिल सकता है। गीता में श्रीमन कृष्ण ने अपने गुरुओं और बान्धवों तक को मारने
का उपदेश दिया है। उनके अनुसार अगर कोई व्यक्ति निष्काम भाव से कर्म करता
है तो वह किसी भी तरह पाप का भागी नहीं बनता है। श्री शिवाजी ने अपने
उदर-पूर्ति के लिए कुछ नहीं किया था। बहुत ही नेक इरादे के साथ, दूसरों की
भलाई के लिए उन्होंने अफ़ज़ल ख़ाँ का वध किया। अगर चोर हमारे घर में घुस
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