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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 788 में से

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पृष्ठ 40

आयें और हमारे अन्दर उनको बाहर निकालने की ताक़त न हो तो हमें बेहिचक
दरवाज़ा बन्द करके उनको ज़िन्दा जला देना चाहिए। ईश्वर ने हिन्दुस्तान के राज्य
का पट्टा ताम्र-पत्र पर लिखकर विदेशियों को तो नहीं दिया है। शिवाजी महाराज
ने उनको अपनी जन्मभूमि से बाहर खदेड़ने की कोशिश की। ऐसा करके उन्होंने
दूसरों की वस्तु हड़पने का पाप नहीं किया। कुएँ के मेढ़क की तरह अपनी दृष्टि
को संकुचित मत करो, ताजीराते-हिन्द की क़ैद से बाहर निकलो, श्रीमद्भगवद्गीता
के अत्यन्त उच्च वातावरण में पहुँचो और महान व्यक्तियों के कार्यों पर विचार
करो।”¹
और 22 जून को चापेकर भाइयों ने रैण्ड व ऐवर्स्ट को मार दिया। इस तरह,
ऊपरी तौर पर देखने से यही लगता है कि चापेकर भाइयों के कार्य के तात्कालिक
प्रेरक तत्त्व रैण्ड की निरंकुशता और तिलक का भाषण थे। लेकिन यह सिर्फ़
अर्द्धसत्य है। दरअसल, चापेकर बन्धुओं के विचार महामारी फैलने या रैण्ड के पूना
आने से बहुत पहले से ही एक शक्ल अख़्तियार करने लगे थे।
1894 में ही चापेकर भाइयों ने पूना में शारीरिक और सैनिक प्रशिक्षण के लिए
‘हिन्दू धर्म अवरोध निवारण समिति’ क़ायम कर रखी थी कि जिसे हिन्दू संरक्षिणी
समिति भी कहा जाता था। यह समिति हर साल नियमपूर्वक शिवाजी व गणपति
समारोह आयोजित करती थी। इन समारोहों में चापेकर भाइयों द्वारा पढ़े जाने वाले
श्लोकों से उनकी भावना का पता चलता है। जनता से तलवार उठाने का आग्रह
करते हुए ‘शिवाजी श्लोक’ कहता है :
“भाँड की तरह शिवाजी की कहानी दुहराने-मात्र से स्वाधीनता प्राप्त नहीं की
जा सकती। आवश्यकता इसकी है कि शिवाजी और बाज़ी की तरह तेज़ी के साथ
काम किये जायें। आज हर भले आदमी को तलवार और ढाल पकड़नी चाहिए —
यह जानते हुए कि हमें राष्ट्रीय संग्राम के युद्धक्षेत्र में जीवन का जोखिम उठाना होगा।
हम धरती पर उन दुश्मनों का ख़ून बहा देंगे जो हमारे धर्म का विनाश कर रहे हैं।
हम तो मारकर मर जायेंगे, लेकिन तुम औरतों की तरह सिर्फ़ कहानियाँ सुनाते
रहोगे।”²
‘गणपति श्लोक’ तो ‘शिवाजी श्लोक’ से भी ज़्यादा उग्र था। गौ और धर्म की
रक्षा के लिए उठ खड़े होने का आह्वान करते हुए इसमें हिन्दुओं से कहा गया है
: “अफ़सोस, तुम ग़ुलामी की ज़िन्दगी पर शर्मिन्दा नहीं हो; जाओ, आत्महत्या कर
लो। उफ़्! ये कमीने कसाइयों की तरह गाय और बछड़ों को मार रहे हैं; उसे (गौ
को) इस संकट से मुक्त कराओ; मरो लेकिन अंग्रेज़ों को मारकर; नपुंसक होकर
धरती पर बोझ न बनो। इस देश को हिन्दुस्तान कहा जाता है; अंग्रेज़ भला किस
तरह यहाँ राज कर रहे हैं?³
इस तरह हम देखते हैं कि चापेकर बन्धु और उनके सहयोगी मुख्यतः तीव्र
34 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़