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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 788 में से

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पृष्ठ 43

उनका कर्म प्लेग के बाद जारी दमन के, यानी एक विशेष कार्य के ख़िलाफ़ था।
निश्चय ही बंगाल की बम पार्टी की दृष्टि एक ज़्यादा व्यापक पटल पर थी जिसे
बंगाल के विभाजन ने उभारा था।”⁹
इतना ही नहीं, बंगाल के क्रान्तिकारी धर्म को बहुत ज़्यादा महत्त्व देते थे, इस
तथ्य के बावजूद आन्दोलन के अन्तिम लक्ष्य की दृष्टि से कहें तो, 1902 में ही
उन्होंने एक बहुत महत्त्वपूर्ण घोषणा की थी। इसी वर्ष बंगाल के क्रान्तिकारियों ने
अपने को ‘अनुशीलन समिति’ नाम की एक पार्टी के रूप में संगठित किया था।
समिति की स्थापना के समय जारी घोषणापत्र में कहा गया था : “अनुशीलन की
कल्पना के समाज में अनपढ़, ग़रीब लोग नहीं होंगे, कायर, दुष्ट लोग नहीं होंगे और
अस्वस्थ लोग भी नहीं होंगे। ऐसे समाज के निर्माण के लिए सभी प्रकार की
विषमताओं को समाप्त करना होगा। विषमता के बीच मानव की मानवता विकसित
नहीं हो सकती। मानव समाज से धन की विषमता, सामाजिक विषमता,
साम्प्रदायिक विषमता और प्रादेशिक विषमता दूर कर सभी मनुष्यों में समानता लानी
होगी। केवल राष्ट्रीय सरकार द्वारा ही ऐसा किया जाना सम्भव है। पराधीनता की
दशा में अनुशीलन के स्वप्न के समाज की स्थापना सम्भव नहीं है, इसीलिए
अनुशीलन पराधीनता के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा करती है। अनुशीलन भारत की
पूर्ण स्वतन्त्रता चाहती है।”¹⁰
अनुशीलन समिति की यह घोषणा निश्चय ही आगे की तरफ़ एक बहुत बड़ा
क़दम था। यहीं पर बंगाल के क्रान्तिकारी 1897 के पूना केन्द्र से आगे हैं। चापेकर
बन्धु विदेशियों से नफ़रत तो करते थे मगर वे खुद क्या चाहते हैं इसके बारे में स्पष्ट
नहीं थे। यह बात बंगाल के क्रान्तिकारियों के साथ नहीं थी। ये लोग मुस्लिम
विरोधी भी नहीं थे, हालाँकि वे धार्मिक लोग थे और हिन्दू ग्रन्थों से प्रेरणा प्राप्त
करते थे।
इसके विपरीत इस दौर के पंजाब के क्रान्तिकारी आरम्भ से ही साम्प्रदायिकता
के दोष से मुक्त थे। सरदार अजीत सिंह, लालचन्द ‘फ़लक’, सूफ़ी अम्बा प्रसाद,
लाला हरदयाल और उनके सभी सहयोगी धर्मनिरपेक्ष थे। धर्म उनके लिए एक
निजी मामला था।
शताब्दी के पहले दशक के क्रान्तिकारी जिन स्रोतों से प्रेरणा ग्रहण कर रहे थे
उनमें धर्म के अलावा एक था 1857 का भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम। “इस
विषय पर 1907 या 1908 में लन्दन में लिखी गयी वीर सावरकर की पुस्तक ने
अपनी तमाम अपर्याप्तताओं के बावजूद, जो उस दौर में और उस समय के हालात
में स्वाभाविक थी, बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस विषय पर ब्रिटिश
साम्राज्यवादी लेखकों द्वारा फैलाये गये लांछनों तथा उनके झूठे ऐतिहासिक लेखन
की धज्जियाँ उड़ाकर इस पुस्तक ने बहुत बड़ा काम किया। इसने बातों को सही
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 37