भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
रूस की जेलें भी स्वर्ग हैं
डब्ल्यू.जे. ब्राउन लिखित यह लेख 'किरती' सितम्बर, 1928 में प्रकाशित हुआ
था, जिस पर एक सम्पादकीय टिप्पणी भी थी। यहाँ यह लेख 'किरती' के
सम्पादकीय नोट सहित दिया गया है। — स.
(रूसी क्रान्ति केवल राजनीतिक क्रान्ति ही नहीं थी, बल्कि उसने राष्ट्र के जीवन
के हर पहलू में क्रान्ति पैदा कर दी। जहाँ राजनीतिक सत्ता एक ज़ालिम बादशाह
ज़ार से छीनकर देश की आम जनता के हाथों में सौंप दी गयी वहाँ आर्थिक मैदान
में 'कमाये कोई, और मौज़ उड़ाये कोई' वाली बात भी समाप्त कर दी गयी। आज
वहाँ न तो लाखों और करोड़ों श्रमिक भूखे नज़र आते हैं और न ही चन्द हरामख़ोरी
करने वाले मोटे पेटवाले पूँजीपति ही नज़र आते हैं। सामाजिक जीवन में कोई
ऊँच-नीच बाक़ी नहीं रही। स्त्रियों के भी समान अधिकार हैं। आज रूस ही ऐसा
देश है जहाँ अधिक से अधिक लोग खुश व प्रसन्न हैं। उनकी क्रान्ति वाक़ई सच्ची
क्रान्ति है।
और तो और, उन्होंने जेलों सम्बन्धी भी एक बड़ी भारी क्रान्ति कर दी है।
पहले भी कई बार वहाँ की जेलों का हाल पढ़ चुके हैं। वहाँ की जेलें हमारे देश
से हज़ार दर्जा अच्छी हैं। और तो और, उनके क़ैदी हमारे आज़ाद आदमियों से हज़ार
दर्जा बेहतर हैं। यहाँ रोटी का सवाल इतना मुश्किल होता जा रहा है कि ख़ामख़ाह
दिल करता है कि यहाँ से तो रूस में जाकर जेलों में ही रहें। बड़ा शानदार
रहन-सहन, बहुत अच्छा खाना-पीना और साथ में पढ़ाई भी होती है। कौशल
सिखाये जाते हैं, काम करने का वेतन दिया जाता है। आज हम एक ताज़ा लेख
पाठकों की सेवा में भेंट कर रहे हैं ताकि वे देख लें कि रूस की और बातों के
साथ-साथ जेल-विभाग में भी क्या परिवर्तन हो गये हैं? यह ध्यान रहे कि
समाजवाद में अपराध रोकने के लिए दण्ड ही पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि वे
अपराधियों को अच्छी शिक्षा देकर उन्हें हमेशा के लिए अपराध से रोकने की
कोशिश करते हैं। सज़ा के दिनों में वे क़ैदी को काम सिखाते हैं। बाहर आते ही
काम पर लगा देते हैं, ताकि बेकार रह भूखा मरता वह फिर अपराध न करने लगे।
यही अपराध को जड़ से मिटाने का ढंग है। — एडीटर)
220 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
मैं रूस गया। बड़ी-बड़ी चीजें देखकर हैरान रह गया। सबसे ज़्यादा हैरानी हुई
वहाँ की जेलें देखकर। मेरी इच्छा थी कि देखूँ यहाँ जेलों की क्या हालत है।
‘जार्जिया’ की जेल देखने का मौक़ा मिला। वहाँ पहुँचने पर पता चला कि जेलर
को मुझे जेल देखने की अनुमति मिलने की सूचना नहीं थी। इससे पहले थोड़ी
मुश्किल हुई। लेकिन फिर यह निर्णय हुआ कि मैं उसके साथ जाऊँ व घूमकर सब
देख लूँ। ख़ैर! मैं, जेलर व एक-दो और आदमी जेलयात्रा को निकले। सबसे पहले
मुझे जेल के लंगर (खाद्य-भण्डार) का वार्डर मिला। वह आदमी ज़ार के समय
भी जेल में नौकरी करता था और क्रेंसकी की अस्थायी पूँजीपति सरकार के अधीन
भी जेल कर्मचारी रहा। वह दोनों सरकारों की बड़ी निन्दा करता था। वह कहता
था कि उन दोनों सरकारों के अधीन क़ैदियों और वार्डरों को पशुओं की खुराक
दी जाती थी और बेचारे क़ैदियों पर बेहद अत्याचार होते थे। लेकिन सुनता कौन
था। ज़ार के बाद अस्थायी सरकार भी कुछ अच्छी नहीं थी। हाँ, तब ज़ार की
सरकार से एक बात अच्छी थी कि व्यक्ति अपनी तकलीफ़ों की शिकायत कर
सकता था। पर इससे कोई व्यावहारिक लाभ नहीं होता था, क्योंकि कोई शिकायत
दूर करने की कोशिश नहीं करता था। और सबसे अधिक क्रोध उसे इस बात पर
था कि अस्थायी सरकार ने उनका तीन महीने का वेतन नहीं दिया। इस बात का
अब तक बहुत प्रभाव है।
उससे पूछा कि अब क्या स्थिति है? तो उसने कहा, अब तो कमाल हो गया,
अब तो ख़ूब मजे हैं। अब क़ैदियों और वार्डरों को बहुत अच्छा भोजन मिलता है।
सबको सही समय पर वेतन मिलता है। बहुत खुशी से कहता था, “अब तो मैं भी
आदमी बन गया हूँ, भले ही अभी तक जेल का वार्डर हूँ।”
जेल में घुसते ही मैंने एक कमरा देखा, जिसमें बहुत-से आदमी क़ैदियों से
मिल रहे थे। वहाँ क़ैदियों और दूसरे आदमियों के बीच सिर्फ़ एक लोहे का डण्डा
था। वे बड़ी खुली तरह बातचीत कर सकते, हाथ मिला सकते और अपने प्रियजनों
को चूम सकते थे। मैंने उस समय एक आदमी को अपने बच्चे को चूमते देखा,
जिसे उसकी पत्नी साथ ले आयी थी। पता चला कि सप्ताह में तीन बार प्रत्येक
क़ैदी के दोस्त, रिश्तेदार मुलाक़ात करने आ सकते थे और मुलाक़ात आधे घण्टे
तक चल सकती है। मिलने वालों की संख्या पर भी कुछ ख़ास पाबन्दी नहीं, जितने
लोग चाहें, मिलने आ जायें। यह देखकर मैं बहुत हैरान हुआ।
फिर यह जानकर बहुत हैरानी हुई कि अब अकेली कोठरी में क़ैदियों को बन्द
नहीं रखा जाता। बड़ी-बड़ी बैरकें बनी हुई थीं, जिनमें 20-20 आदमी रहते हैं। उन
बैरकों को न रात में और न दिन में ही ताला लगाया जाता है। हाँ, रात को निचली
छत और ऊपरी छत के बीच की सीढ़ियों को ताला लगा दिन जाता है। दिन में
उसे भी खोल दिया जाता है। प्रत्येक क़ैदी किसी भी कमरे में जा सकता है। वे
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 221
चाहे सिगरेट पियें या पढ़ें या खेलें, जो चाहे करें, उन्हें पूरी छूट रहती है।
दिन में चार बार उन्हें कसरत के लिए बाहर निकाला जाता है। कसरत भी बन्द
अहातों में बन्दूकों के पहरे में नहीं, बल्कि बाहर के खेल के मैदानों में बिना किसी
ख़ास पहरे के। यह देखकर मेरी हैरानी की हद न रही।
पता चला कि शरीफ़ क़ैदियों को सप्ताह में एक दिन जेल से छुट्टी दी जाती
है, तब वे अपने घर जा सकते हैं और घरवालों के साथ पूरा दिन बिता सकते हैं
या सैर कर सकते हैं। मैंने पूछा - इस तरह क़ैदी भागते नहीं? उन्होंने कहा कि
ऐसा अवसर कम ही आता है। कभी कोई क़ैदी इस तरह नहीं भागा। गर्मियों में
शरीफ़ क़ैदियों को पन्द्रह दिन की छुट्टी मिल जाती है। तब वे जहाँ चाहे जा सकते
हैं। इन छुट्टियों में भी क़ैदी भागते नहीं, समय पूरा होने पर लौट आते हैं।
कई क़ैदी हमारे साथ चल पड़े। एक क़ैदी थोड़ी-सी अंग्रेज़ी सीख गया था।
उससे मैंने बात की। वह कहने लगा, जेल बड़ी अच्छी जगह है। क़ैदी आठ घण्टे
काम करते हैं। खुराक बहुत अच्छी मिलती है। कोई सख़्ती और ज़ुल्म नहीं होता।
उनकी अपनी अध्ययन-सभा, लाइब्रेरी, संगीत-पार्टी आदि बने हुए हैं, जिनका
प्रबन्ध उन्हीं की एक समिति करती है। सारी जेल देखकर कोई उसे जेल नहीं कह
सकता। वह तो एक सभा या क्लब लगता है।
इमारत जेल की ही लगती थी और अन्य सामान भी जेल का ही नज़र आता
था, लेकिन स्थिति बहुत-से परिश्रम करने वाले स्वतन्त्र लोगों से अच्छी थी। वहाँ
सप्ताह में तीन बार सिनेमा और थियेटर भी दिखाये जाते हैं।
क़ैदियों के कपड़े देख बहुत हैरानी हुई। क़रीब चालीस क़ैदी, जेल-दारोग़ा व
कुछ वार्डर खड़े थे। मजिस्ट्रेट साहिब आये। बातचीत में अंग्रेज़ी जेलों पर बात चल
पड़ी। सभी लोग, क्या क़ैदी और क्या अधिकारी, एक समान हिस्सा ले रहे थे।
यदि कोई अनजान आदमी वहाँ आ जाता तो बिल्कुल न पहचान पाता कि कौन
क़ैदी है और कौन दारोग़ा और कौन मजिस्ट्रेट।
क़ैदियों की अपनी दुकानें हैं। वे स्वयं ही उन्हें चलाते हैं। वहाँ वे तम्बाकू,
सिगरेट, मिठाई व ब्रुश आदि हज़ारों आवश्यक चीजें खरीद सकते हैं और जो मुनाफ़ा
हो वह रिहा होने पर क़ैदियों में बाँट दिया जाता है। सवाल उठेगा कि बिना पैसे
क़ैदी चीजें ख़रीदते कैसे हैं? लेकिन रूस में प्रत्येक क़ैदी को महीना परिश्रम करने
के बाद वेतन मिलता है। वे जैसे चाहें, उस रकम को ख़र्च कर सकते हैं। क़ैदियों
के अपराध अधिकारियों के पास नहीं जाते। क़ैदियों की समिति स्वयं ही सारी
समस्याएँ हल करती है।
क़ैदियों की अपनी एक समिति बनी हुई है ताकि जो तकलीफ़ हो, वह दूर
की जा सके। यह समिति अधिकारियों द्वारा मान्य है, वे फ़ौरन दारोग़ा को अपनी
सब तकलीफें बता देते हैं। और यदि कोई फ़ैसला न हो पाये तो स्वयं मजिस्ट्रेट
222 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
के सामने अदालत में मामला पेश कर सकते हैं। इनका अपना अख़बार भी होता
है। हाथ से ही लिखा जाता है। लेखक का नाम नहीं दिया जाता, लेकिन उन्हें
जेल-व्यवस्था की आलोचना करने का पूरा अधिकार है। जेलर का एक बड़ा
मज़ेदार कार्टून बना हुआ मैंने स्वयं देखा था।
कई कमरों में मैंने देखा कि क़ैदी अलग-अलग काम सीख रहे हैं। कहीं कपड़े
सीने का काम, कहीं जूता सिलने का काम और कहीं बढ़ई का काम सिखाया जा
रहा था।
और कई कमरों में पढ़ाई हो रही थी। कई मास्टर बाहर से पढ़ाने आते थे और
कई क़ैदियों में से ही थे। क़ैदी अध्यापक को प्रत्येक दो दिन की क़ैद के बदले
एक दिन की क़ैद माफ़ की जाती है।
मैं एक क़ैदी को एकान्त में ले गया। अधिकारी बड़ी खुशी से अलग हो गये।
उसने भी यही कहा कि सभी क़ैदी खुश हैं और यह जगह बहुत अच्छी है। मुझसे
पूछा गया कि इंग्लैण्ड में क़ैदियों से कैसा व्यवहार किया जाता है? उन्हें यह
विश्वास ही नहीं होता था कि इंग्लैण्ड में क़ैदियों को अलग-अलग कोठरियों में
बन्द किया जाता है और बातचीत करने की भी अनुमति नहीं होती।
वे पूछने लगे, फिर क़ैदियों की समिति क्या करती है? वह यह शिकायत दूर
क्यों नहीं करती? मैंने उन्हें बताया कि वहाँ कोई समिति नहीं बनायी जा सकती,
नहीं तो जेलर क्रोध से ही मर जायें। वे हैरान रह गये। वे विश्वास नहीं करते थे
कि जेल में क़ैदियों की समिति के बग़ैर क़ैदियों की गुज़र होती होगी।
उन्होंने यही निष्कर्ष निकाला कि मुझे अंग्रेज़ों की जेलों सम्बन्धी कुछ भी
जानकारी नहीं है। वे मुझे अपने नहाने के कमरे में ले गये। ज़ार के समय ये अँधेरी
कोठरियाँ थीं। अब वहाँ फव्वारे लगा दिये गये हैं और नहाने की बहुत अच्छी
व्यवस्था की गयी थी।
आख़िर में मैं उनके साथ लंगर (मेस) में गया। खाना बहुत सादा, बहुत बढ़िया
व स्वादिष्ट था। ऐसा बढ़िया खाना हमारे बहुत-से परिश्रम कर खाने वाले स्वतन्त्र
मज़दूर भी नहीं पा सकते। मेरे जाने से उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने मुझसे इंग्लैण्ड
के क़ैदियों तक उनकी दुआ-सलाम पहुँचाने को कहा। मुझे उन्होंने अपने बग़ीचे
का गुलदस्ता भेंट किया और बड़े सम्मान के साथ विदा किया और कहा कि
उम्मीद है आप फिर आयेंगे।
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 223
मेरी रूस यात्रा
लेखक-भाई शौक़त उस्मानी। प्रताप कार्यालय, कानपुर से प्रकाशित। 144
पृष्ठ, मूल्य – ।।=
हिन्दुस्तान के वर्तमान जन-आन्दोलन में विदेशों की यात्रा का काफ़ी प्रभाव है।
पाठक जानते हैं कि 1914-15 के जन-आन्दोलन में अमेरिका से लौटे हुए भाइयों
ने ही अपने प्राणों की बाज़ी लगाकर एक बार हिन्दुस्तान की क़िस्मत को बदलने
का यत्न किया था।
1918 में जब ‘ख़िलाफ़त’ का मामला खड़ा हुआ तभी मुसलमान भाइयों में
हिज़रत की लहर चली – कि हमें अंग्रेज़ी मुल्क ही छोड़कर चले जाना है। इस
सिलसिले में सैकड़ों आदमी गये और बाहर जाकर उनकी आँखें खुलीं। धर्मान्ध
मुसलमानों ने देखा कि कोई भी उनका बोझ उठाने को तैयार नहीं। आख़िर बहुत-से
तो अनेक झंझट उठाकर उसी समय वापस लौट आये। कई आगे चले गये। रूस
जा पहुँचे। जिन मुसीबतों को उठाकर वे लोग गये थे वह क़िस्सा बहुत उत्साहवर्धक
है और दर्दनाक भी है। शौक़त उस्मानी उन्हीं व्यक्तियों में से हैं। तुर्किस्तान की
लड़ाइयों में से वे किस तरह जान बचाकर निकले और किस तरह रूस पहुँचे और
वहाँ की हालत देखकर अचम्भित हो उठे। ये सब बातें किताब पढ़ने से ही सम्बन्ध
रखती हैं। नौजवानों को इस किताब की ओर अवश्य ध्यान देना चाहिए और बाहर
जाकर दुनिया देखने का शौक़ पैदा करना चाहिए। रूस का बहुत अच्छा हाल लिखा
हुआ है। प्रत्येक हिन्दी पढ़े सज्जन को यह किताब मँगवाकर पढ़नी चाहिए।
224 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
आयरिश स्वतन्त्रता युद्ध
इस पुस्तक का अनुवाद भगतसिंह ने किया था। यह अनुवाद इसी संकलन के
तीसरे खण्ड में प्रकाशित है। – स.
‘आयरिश स्वतन्त्रता युद्ध’ : हिन्दी में। प्रताप कार्यालय, कानपुर से प्रकाशित।
100 पृष्ठ 100, मूल्य – ॥=
यह किताब आयरलैण्ड के बहादुर युगान्तकारी श्री डॉन बीन की अंग्रेज़ी पुस्तक
‘माई फ़ाइट फ़ार आयरिश फ़्रीडम’ का हिन्दी अनुवाद है। पाठक जानते होंगे कि
सौ बरसों से आयरलैण्ड अंग्रेज़ों के पंजे से रिहा होने की कोशिश करता रहा था।
पिछली सदी में 1848, '68, '98 की बग़ावतें प्रसिद्ध हैं। पिछले संघर्ष के दिनों
में 1916 में ईस्टर के दिनों में उन्होंने फिर विद्रोह कर दिया था। उसमें भी उनकी
हार ही हुई थी। अब तक वह ईस्टर विद्रोह के नाम से प्रसिद्ध है।
बाद में लड़ाई समाप्त हो जाने पर पार्लियामेण्ट के लिए सदस्यों का चुनाव
हुआ और आयरलैण्ड के ‘सिनफिनरा’ के सदस्य ही ज़्यादा चुने गये। उन्होंने अलग
ही आयरिश पार्लियामेण्ट स्थापित कर ली और दूसरी तरह युगान्तकारी गुरिल्ला
युद्ध, अर्थात लुकाछिपी वाली लड़ाई आरम्भ कर दी। सबसे पहले लड़ाई छेड़कर
देश, देशवासियों और सरकार की नींद भंग करने वाले लोगों में से डेनब्रिल थे।
पहले ही दिन सिपाहियों से लड़कर उनसे उनका बारूद छीनकर वे भाग गये थे।
बाद में उनके वारण्ट निकाले गये और पकड़वाने के लिए ईनाम की भी घोषणाएँ
हुईं। रात-दिन अपना सिर हथेली पर रखे वे जनता के बीच बब्बर अकालियों की
तरह दौड़ते-फिरते रहे।
उनसे कहा गया कि तुम अमेरिका चले जाओ, लेकिन उन्होंने इन्कार कर दिया
और कहा कि हमें तो आयरलैण्ड में ही लड़ते हुए मरना है। किस प्रकार लोग उन्हें
गालियाँ बकते और पास न फटकने देते और किस प्रकार वे बार-बार पुलिस के
पंजे में फँसते-फँसते बचते, ये सब बातें पढ़ने योग्य हैं। श्री डेनब्रिल का लिखने
का ढंग बहुत अद्भुत है और व्यंगात्मक भी है। इसलिए उन्होंने सारा क़िस्सा ऐसी
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 225
तरतीब से लिखा है कि पढ़ने में बहुत ही आनन्द आता है।
उन्होंने पहली लड़ाई में अपने घबराने की तथा बाद की लड़ाइयों में अपने धैर्य
की स्पष्ट और सच्ची कथा लिखी, जोकि बिल्कुल ही स्वाभाविक नज़र आती है।
साथियों के गिरफ़्तार किये जाने पर वह किस तरह तड़प उठे और उन्हें छुड़ाने के
लिए कोशिशें करने लगे, यह सब पढ़ने वाली कहानी है।
एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात है श्री डेनब्रिल की। हमारे देश के नौजवान विवाह
कराने के लिए दौड़ते फिरते हैं। बाप ने कभी सवारी नहीं की होती लेकिन वर
बना बेटा तलवार बाँधकर मरियल घोड़ी पर चढ़कर निकल पड़ता है। उसकी उस
चाल को भी क़ाबू में रखने के लिए दो व्यक्ति आगे से उसे पकड़े रहते हैं। और
फिर जाकर कपड़ों की गाँठ की तरह बँधी लड़की के साथ (वर महोदय का)
गठबन्धन हो जाता है। सर्वत्र खुशियाँ मनायी जाती हैं। लड़का ब्याहा गया! लानत
है ऐसे विवाह पर और ऐसे वर पर।
डेनब्रिल के वारण्ट निकले हुए हैं। आदेश हुआ कि देखते ही गोली मारकर
ख़त्म कर दिया जाये। लड़ाई में वे ज़ख़्मी हो जाते हैं। तब एक युवती उनकी सेवा
करती है और अपनी जान हथेली पर रखकर उनकी हर प्रकार से मदद करती है।
आख़िरकार दोनों में प्रेम हो जाता है और बिल्कुल घमासान युद्ध के दिनों में एक
जगह फ़ौजें इकट्ठी करके यह शादी की जाती है। हर पल ख़तरा है कि दुश्मनों
ने हमला कर दिया तो ख़ैर नहीं। नौजवानो, यह असल विवाह है या मुरदों वाला
(वह) विवाह? नौजवान इस किताब को ज़रूर पढ़ें और ध्यान से पढ़ें।
अंग्रेज़ों के बेइन्तहा ज़ुल्मों की भी यह दर्दनाक कहानी है। साथ ही यह भी
रोचक ढंग से बताया गया है कि 'लातों के भूत बातों से नहीं मानते।'
226 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
V.
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न :
कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि
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ट्रेड यूनियन बिल
1927 में पूँजीवादी विश्व आर्थिक मन्दी की चपेट में आ रहा था, और मज़दूर
वर्ग के जनवादी अधिकारों पर हमले शुरू हो गये थे। इंग्लैण्ड में जब ट्रेड यूनियन
बिल पास हो रहा था तो ‘किरती’ ने (मई, 1927 में) एक लेख इस सम्बन्ध में
प्रकाशित किया। लेख के लेखक के सम्बन्ध में जानकारी हासिल नहीं है, लेकिन
यह उस समय क्रान्तिकारियों की सोच के बारे में बताता है। 1929 में जब ट्रेड
डिस्प्यूट्स बिल भारत में लागू करने की कोशिश की गयी थी तो भगतसिंह और
बी.के. दत्त ने असेम्बली हॉल, दिल्ली में बम फेंका था। – स.
इंग्लिस्तान के एक जगह टिके (Conservative) गुट के लोग कब से इस बात की
ताक में थे कि कैसे मज़दूरों में बढ़ती हुई ताक़त को रोका जाये। उनको यह बात
स्पष्ट नज़र आती थी कि यदि मज़दूरों की बढ़त को अभी न रोका गया तो मज़दूर
देखते ही देखते राज के मालिक बन जायेंगे और इस तरह उन्हें राज की बागडोर
छोड़नी पड़ेगी। उन्हें यह स्पष्ट पता था कि नाम मात्र स्वतन्त्र (Liberal) गुट तो
किसी काम का नहीं है और न ही अभी जल्दी उनके ताक़त में आने की उम्मीद
है। इसलिए यदि उन्हें ख़तरा था तो मज़दूरों से ही था और मज़दूरों की मुश्कें बाँधना
ही उन्होंने सबसे पहले ठीक समझा।
इस काम के लिए उन्होंने ट्रेड यूनियन बिल का आविष्कार किया, जिसके
सम्बन्ध में पिछले अंक में बताया गया था। वे मज़दूरों के सब करे-धरे को यह
बिल पास कर कुएँ में डालना चाहते हैं।
मज़दूरों ने इस बिल के ख़िलाफ़ बड़ी ज़ोरदार आवाज़ बुलन्द की है। उन्होंने
कहा है कि यह बिल एक वर्ग के द्वारा दूसरे वर्ग को मटियामेट करने के लिए
लाया गया वर्ग-बिल है। मि. रामजे मैकडानल्ड जैसे मज़दूर भी इस बिल को
वर्ग-युद्ध की घोषणा समझते हैं और श्रमिक-संसार में सब जगह इस बिल से तूफ़ान
मच गया है। मज़दूर फिर एक दिन के लिए बड़ी आम हड़ताल करने की सोच
रहे हैं। वे विरोध में मीटिंग कर रहे हैं। ख़याल किया जाता है कि संसद में इस
बिल पर घमासान बहस होगी, और मज़दूर-नेता यदि ख़रीद न लिये गये तो
जी-तोड़कर लड़ेंगे।
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 229
आजकल जो लोग अंग्रेज़ी अख़बार पढ़ते हैं उन्हें पता है कि इस बिल का
किस तरह अंग्रेज़ी श्रमिक प्रेस में विरोध हो रहा है। इस बिल को वर्ग-क़ानून कहा
जाता है। मज़दूर समझते हैं कि बाल्डविन की सरकार ने उनके बुनियादी अधिकारों
पर धावा बोल दिया है। इस बिल से उनके संगठन के बिखर जाने का भारी ख़तरा
है। मज़दूरों का अपना दैनिक अख़बार 'डेली हेराल्ड' (Daily Herald) लिखता है
कि यह बिल मज़दूरों को मानसिक रोगी समझता है और सख़्त अपराधियों के लिए
इसने सज़ा भी नियत कर दी है। एक और मज़दूर नेता ने इसे मुसोलिनी जैसा क़ानून
कहा है।
बड़ी हड़ताल के समय से ही एक जगह खड़े (अनुदार) गुट के लोग यह
माँग कर रहे थे कि सरकार कोई बिल संसद में पेश करे, जिससे कि सबके सब
मज़दूर हड़ताल ही न कर सकें। और यदि एक यूनियन के मज़दूर किसी दूसरी
यूनियन की हमदर्दी में हड़ताल कर दें तो वह हड़ताल गैर-क़ानूनी मानी जाये। इस
समय यदि कोई यूनियन हड़ताल करती है तो वे मज़दूर जो हड़ताल में शामिल नहीं
होंगे, उन्हें यह समझाया नहीं जा सकेगा कि वे भी इसमें शामिल हों, क्योंकि यदि
मज़दूर पिकेटिंग आदि के जरिये ऐसा करेंगे तो उन्हें सज़ा दी जा सकेगी। इस बिल
से सिविल सर्विस के कर्मचारियों के लिए किसी पार्टी में शामिल होना मना हो
गया है और सबसे बड़ी चोट मज़दूरों की राजनीतिक पार्टी पर की गयी है। वह
यह है कि कोई मज़दूर राजनीतिक कामों के लिए तब तक चन्दा नहीं दे सकता,
जब तक कि वह लिखकर न दे कि वह राजनीतिक कामों के लिए चन्दा इकट्ठा
कर सकते हैं, लेकिन जो लोग चन्दा नहीं देना चाहते, वे लिखकर दें कि वे चन्दा
नहीं देना चाहते। अब स्थिति उलटी हो गयी है।
इस आख़िरी अंक से श्रमिकों के संगठन को बड़ी भारी चोट पड़ेगी और इस
ज़माने में जबकि कोई पार्टी रुपयों के बग़ैर चल ही नहीं सकती तो यह स्पष्ट है
कि श्रमिक पार्टी का रुपयों के बग़ैर गला दबाने के लिए यह चाल चली गयी है।
अन्य पार्टियों की तरह लेबर पार्टी को भी संसद में अपने उम्मीदवार खड़े करने
और उन्हें सफल बनाने के लिए रुपयों की ज़रूरत है। जब दूसरी पार्टियाँ जैसे चाहे
रुपये इकट्ठा कर सकती हैं और उन्हें कभी पूछा तक नहीं गया है तो कोई वजह
नहीं कि मज़दूरों की पार्टी के भीतर कामों में ख़ामख़ाह टाँग अड़ायी जाये।
इस समय तक मज़दूरों की राजनीतिक पार्टी अपने फण्ड ट्रेड यूनियनों से
इकट्ठा करती रही है। अनुदारवादी गुट का यह विचार है कि इस तरह यदि मज़दूर
पार्टी के फण्ड ही बन्द कर दिये गये तो मज़दूरों का संगठन स्वयं ही दोफाड़ हो
जायेगा और इनके घरों में घी के दिये जल जायेंगे। इस तरह श्रमिक संगठन के टूट
जाने से यह सदा ही इंग्लिस्तान के राज पर क़ब्ज़ा जमाये रखेंगे। पर कौन-सी पार्टी
230 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
टूटेगी और कौन-सी सत्ता में आयेगी, इस बात का पता तो अनुभव और भविष्य
ही बतायेगा।
यदि यह बिल पास हो गया तो मज़दूर फिर उन्हीं ज़ंजीरों में जकड़े जायेंगे
जिनमें से कि यत्न से अभी वे निकले ही थे। फिर उन ज़ंजीरों को तोड़ना आसान
नहीं होगा। इसलिए श्रमिकों को अब वक़्त सँभालना चाहिए और ऐसा ज़ोरदार
आन्दोलन करना चाहिए कि इस पूँजीपति गुट को, जो अभी मज़दूरों को गुलामी से
छूटने नहीं देना चाहता, नानी याद आ जाये। पर यह नानी भी तभी याद आ सकती
है, यदि आने वाली संसद में इनकी ऐसी हार हो कि याद कर-कर आँखें मला
करें। इस समय संसद में इन पूँजीपतियों का बहुमत है। इस बहुमत के अभियान
में ही ये लोग अकड़े फिर रहे हैं और मज़दूरों को नज़रों में भी नहीं लाते।
हम चाहते हैं कि मज़दूर नाम मात्र स्वतन्त्र (उदार) गुट में भी प्रचार करें और
उनमें से बहुत-से सदस्यों को अपनी ओर कर लें, ताकि यह बिल पास ही न हो
सके। और न सिर्फ़ यह बिल ही असफल करा दें वरन इस मौजूदा सरकार को
भी उलट दें। इसने यह क़ानून पेश कर राज करने के सभी अधिकार गवाँ दिये
हैं।
इस समय ज़रूरत है कि मज़दूरों के अपने घर में भी किसी तरह की फूट न
हो और मज़दूरों के नरम और गरम गुटों के सब लोग एकजुट हो जायें ताकि साझे
ज़ोर से इस मौजूदा सरकार का डटकर मुक़ाबला किया जा सके और इसे ऐसे चने
चबाये जायें कि सारी उम्र ही इस वक़्त को याद कर-कर हाथ मला करें।
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 231
ग़दर आन्दोलन की कुछ व्यथा
सितम्बर, 1927 के ‘किरती’ में एक बहुत महत्त्वपूर्ण लेख ‘ग़दर लहर की कुछ
व्यथा’ छपा था। यह एक अख़बार से लेकर छापा गया था। लेखन-शैली और विचारों
से यह लेख शहीद भगवतीचरण वोहरा का हो सकता है। – स.
पहले मैं यह बता दूँ कि विप्लववाद का क्या अर्थ है। फिर मैं आगे चलूँगा। हर
गिरी हुई क़ौम हमेशा गिरी नहीं रहती और उस क़ौम के वीर उसकी उन्नति का
यत्न करते हैं और कुर्बानियाँ देते हैं, और अब यह सोचना है कि कुर्बानियाँ कई
तरह से दी जाती हैं। क़ौमों को उठाने का यत्न भी कई-कई तरीक़ों और हिम्मत
से किया जाता है। एक तो देश में शिक्षा का प्रचार करना। यह भी कोई छोटी-सी
बात नहीं। दूसरे, लोगों को उनके हक़ बताने और उन्हें हासिल करने के लिए
सरकार के आगे प्रार्थना करना। उसे (ऐसे दल को) हम माडरेट कहते हैं। यह
शब्द उस समय इस्तेमाल होता है, जब देश उस स्थिति से कुछ ऊपर उठ जाता
है। दूसरा दर्जा होता है गर्म दल का, जिस तरह 1907 में लोकमान्य तिलक जी
की पार्टी थी या आजकल महात्मा गाँधीजी का प्रचार कहा जा सकता है। लेकिन
जिस समय इन दोनों रास्तों पर चलने से भी सफलता नहीं मिलती तो तेज़
नौजवानों का एक दल कुछ और आगे बढ़ता है। वह हाथोहाथ काम करना चाहता
है, मरना और मारना चाहता है और इस ढंग से ही जीत प्राप्त करना चाहता है।
उसे (ऐसे लोगों को) अंग्रेज़ी भाषा में रिवल्यूशनरीज़ (Revolutionaries) कहते
हैं। इस रूप में वे गुप्त काम करते हैं और बाद में बदलकर खुल्लमखुल्ला
लड़ाई करने को तैयार हो जाते हैं, जिस तरह कि आयरलैण्ड वाले अब तक
लड़ते रहे हैं। यह काम जब तक गुप्त रहता है, तब तक उसे दबाने का यत्न
किया जाता है। इस स्थिति में उन्हें हिन्दुस्तानी भाषा में विप्लववादी कहते हैं,
उर्दू में इन्क़लाबी कहा जाता है। यह शब्द इज़्ज़त और निन्दा, दोनों के लिए
इस्तेमाल हो सकता है, अर्थात जब तक देश कमज़ोर है, तब तक वहाँ खुशामदी
अधिक होते हैं, तब तक वहाँ उन्हें सभी लोग बुरा कहते हैं और शासक तो उनके
दुश्मन होते ही हैं, लेकिन बाद में उन्हें ही देशभक्त कहा जाता है।
हम किसी डर के कारण चाहे उन्हें बुरा कहें, लेकिन वास्तव में वे किसी से
232 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
भी कम ‘देशभक्त’ नहीं होते, बल्कि हम यह कह सकते हैं कि वे दूसरे शोर मचाने
वालों से देश का अधिक दर्द रखने वाले होते हैं। उनकी कोई सहायता नहीं करता।
अपने-पराये सभी बुरा-भला कहते हैं और शासक तो जो करते हैं उसका पूछना
ही क्या है। वे वीर फिर भी डटे रहते हैं और ज़रा भी घबराते नहीं। तो क्या वे किसी
से कम देशभक्त होते हैं? मैं तो कहूँगा कि दुनिया में 'End Justifies the means'
अर्थात परिणाम से ही पता चल जाता है कि उनके द्वारा इस्तेमाल किये तरीक़े अच्छे
थे या बुरे? यदि परिणाम अच्छा हो तो झूठ बोला हुआ, हत्या किया गया भी ठीक
हो जाता है, और यदि असफलता हो तो शान्ति से होने वाला काम भी बुरा ही कहा
जाता है।
क्या वाशिंगटन को उस समय बागी कहकर दबाने की कोशिश नहीं की गयी
थी? क्या यदि वह उस समय दुश्मनों के हाथ आ जाता तो उसे फाँसी न मिलती?
क्या स्काटलैण्ड का वीर वालीस सच्चा देशभक्त नहीं था? क्या उसे फाँसी नहीं
दी गयी? इस देश में काम ऐसे ही होता है। इटली की हालत देख लो, मैजिनी
जैसों ने भी तो गुप्त सोसायटियाँ बनायीं, उनके परिश्रम का ही यह फल हुआ कि
गैरीबाल्डी जैसे वीर ने दो-दो हाथ कर दिखाये। दूर क्या जाना है, अभी कल की
बात है कि रूस उठा है। कितने आदमी फाँसी पर चढ़े और बाग़ी ठहराये गये। क्या
ये सच्चे देशभक्त नहीं थे? इस बात का जवाब आज रूसवालों से पूछिये तो। इन
बेचारों को ‘निहिलिस्ट’ और ‘अनार्किस्ट’ अर्थात दुनिया में ‘अराजकता फैलाने
वाले’ और ‘खून-ख़राबा करने वाले’ कहा जाता था। उनके परिश्रम के फलस्वरूप
ही आज वहाँ पंचायती सरकार बनी हुई है।
हाँ, ये लोग जो निराश होने से ख़ून-ख़राबे पर उतारू हो जाते हैं वे पहले गुप्त
सोसायटियाँ बना लेते हैं। उन्हें अंग्रेज़ी में Revolutionaries और हिन्दी में
‘विप्लववादी’ कहा जाता है।
यदि संसार में देखा जाये तो यह बात कि ज़ोरावर की सात कौड़ी सौ हुआ
करती हैं, ठीक लगती है, क्योंकि जितनी देर एक पक्ष का ज़ोर रहा उतनी देर तो
कमज़ोर बागी, अनार्किस्ट, निहिलिस्ट, विप्लववादी, इन्क़लाब-पसन्द कहलाते हैं,
लेकिन जब दूसरा पक्ष ताक़तवर हो जाता है तो वे सच्चे देशभक्त, क़ौम के परवाने
हो जाते हैं और दूसरे ज़ालिम, अत्याचारी, लालची आदि बन जाते हैं।
शिवाजी मराठा यदि राज क़ायम न कर पाता और ज़ालिम औरंगज़ेब के दाँत
खट्टे न कर पाता तो वह डाकू ही कहलाता, लेकिन आज हम भी उसे महापुरुष
कहते हैं। खैर!
यह ख़याल कि कोई इन्क़लाब करे और ख़ून-ख़राबे से न डरे, झटपट नहीं
आ जाता। धीरे-धीरे शासक लोग जुल्म करते हैं और लोग दरख्वास्तें देते हैं, लेकिन
अहंकारी शासक उस तरफ़ ध्यान नहीं देते। फिर लोग कुछ हल्ला करते हैं, लेकिन
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 233
कुछ नहीं बनता। उस समय फिर आगे बढ़े हुए नौजवान इस काम को सँभालते हैं।
यदि किसी देश में शान्ति हो और लोग सुख-चैन से बैठे हों तो वहाँ उतनी देर इन
विचारों का प्रचार नहीं हो सकता, जब तक कि उन्हें कोई ऐसा बड़ा भारी नया
विचार न दिया जाये, जिस पर कि वे परवानों की तरह कुर्बान हो जायें। या 'ज़ुल्म'
इस बात के लिए लोगों को तैयार करते हैं।
यदि हम अपने देश की ओर ध्यान दें तो इस बात का स्पष्ट पता चल जाता
है।
सबसे पहले यह विचार महाराष्ट्र अर्थात मराठों में किसी महापुरुष को सूझा,
लेकिन इसका प्रचार नहीं हो सका। फिर बंगाल में यह विचार आया। वीर वीरेन्द्रयश
सबसे पहले इस बात का प्रचार करने लगा। यह बात 1903 की है। लेकिन लोग
पूरे आराम में रहते थे तो ख़ामख़ाह कोई दुख में पड़े, किसी ने भी उनकी बात न
मानी। वे अपना ज़ोर लगाकर असफल होकर बैठ गये। यह पूरा विवरण रोल्ट कमेटी
की रिपोर्ट में दिया है।
फिर 1905 में बंगभंग हो गया। लोगों ने दरख्वास्तें दीं, लेकिन लॉर्ड कर्जन
ने कहा, 'सूरज पश्चिम से उग जाये लेकिन मैं बंगाल का विभाजन ऐसे ही
रखूँगा।' फिर स्वदेशी का प्रचार हुआ। कई बेचारे निर्दोष ही जेलों में ठूँस दिये
गये। कर्जन ने अपनी 'टें' नहीं छोड़ी। बताओ उस समय जब लोग दुखी बैठे हों,
तब उनमें इन बातों का प्रचार झटपट हो जाना ही हुआ कि नहीं? बस बम बनने
लगे। ख़ैर, 1908 में अलीपुर षड्यन्त्र केस चला। फिर तो काम और भी ज़ोरों पर
हो गया और 1916 तक होता रहा। फिर लोगों को डकैतियाँ डालनी पड़ीं। कुछ
दिन पहले एक बंगाली सज्जन ने भाषण दिया था कि लोग उन्हें डाकू कहते हैं।
लेकिन आप यह तो बताओ कि तुम उन्हें एक पैसा भी देते हो। वे बेचारे अपना
तो सबकुछ छोड़ बैठे हैं और आप उनकी सहायता नहीं करते तो आप सोचो कि
वे क्या करें, क्या अपना काम रोक दें? मैं बहुतों से मिला हूँ, वे सच्चे संन्यासी
हैं, देशभक्त हैं। ख़ैर, अब हम अपने प्रदेश की ओर आते हैं। पहले-पहले यह
हल्ला सरदार अजीत सिंह जी के समय हुआ था। सन् 1907 की बात है। दो
क़ानूनों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी गयी। जोश बढ़ता देखकर सरकार ने उनकी
बात झटपट मान ली और शोर-शराबा रुक गया। वह ज़माना चला गया। कहा
जाता है कि 1909 में सरकार को चिन्ता हुई कि बंगाल की बीमारी कहीं पंजाब
में भी न आ फैले। उन्होंने सरदार अजीत सिंह को पकड़ने की कोशिश की,
लेकिन वे बचकर निकल गये। उसके बाद पंजाब में सिवाय दिल्लीवाले बम
केस के और कोई शिगूफ़ा नहीं दीखता। वहाँ वह विचार भी बंगाल ने ही दिया
था। लेकिन उन्होंने कितने लोगों को अपने साथ मिलाया था? कुल दस-बारह
आदमी होंगे। साधारण लोग जलती आग में क्यों जाने लगे। चार को फाँसी मिली,
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कुछ को क़ैद कर दिया और बात ख़त्म हुई।
लेकिन झटपट अगले ही बरस 1915 में फिर पंजाब में ग़दर की तैयारियाँ
नज़र आती थीं। तब दो बातें थीं – एक तो लड़ाई छिड़ गयी (प्रथम महायुद्ध –
अनु.); दूसरे, सरकार ने कामागाटामारूवालों पर अत्याचार किया। वे भी अमेरिका
से, बेचारे विचार ही लेकर आये थे। लेकिन पंजाब में रहने वाले कितने लोगों ने
उनका साथ दिया? सिवाय 1907 के कुछ आदमियों के कितने लोग थे उनके
साथ? ख़ैर, मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार संक्षेप में क्रान्तिकारी विचारों के विकास
व प्रचार का कुछ वर्णन करने का यत्न किया है और यदि मुझे समय मिला तो
एक लम्बा लेख लिखकर अन्य देशों के विस्तृत हाल समेत इसका वर्णन करने का
यत्न करूँगा।
(एक अख़बार से)
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 235
तख़्तापलट गुप्त षड्यन्त्र
जनवरी, 1928 में जब शहीद भगतसिंह के दो लेख 'किरती' में छपे तो उनके
साथ एक लेख 'तख़्तापलट गुप्त षड्यन्त्र' नाम से भी छपा। इसके लेखक का नाम
नहीं दिया गया, लेकिन अंग्रेज़ सरकार किस तरह के तरीक़े इस्तेमाल कर क्रान्तिकारी
आन्दोलन के ख़िलाफ़ प्रचार करती थी, यह लेख इस सम्बन्ध में अच्छी जानकारी
देता है। – स.
अख़बार पढ़ने-सुनने वाले लोग इस बात से परिचित हैं कि ऐसी ख़बरें अक्सर
छपती ही रहती हैं कि हिन्द में आज फ़लाँ जगह अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़
षड्यन्त्र का पता पुलिस ने लगाया है। और फ़लाँ स्थान पर षड्यन्त्र का मुक़दमा
चलाया गया है। आज फ़लाँ जगह षड्यन्त्रकारियों को फाँसी दी गयी है। अभी ही
एक ख़बर छपी है कि एक ऐसे षड्यन्त्र का मुक़दमा चलने वाला है जिसमें चारों
उत्तरी प्रान्त लपेटे जायेंगे। ऐसी ख़बरें पढ़कर आम भोले-भाले लोग इन षड्यन्त्रों
सम्बन्धी अपने दिल में बड़े बुरे विचार रखने लगते हैं। वास्तव में उन्हें इन षड्यन्त्रों
से सम्बन्धी कोई जानकारी नहीं होती, जिससे इस विषय पर प्रकाश डालना ज़रूरी
है। जिस तरह रात के बाद दिन और दिन के बाद रात आने की वास्तविकता से
कोई इन्कार नहीं कर सकता, उसी तरह की वास्तविकता इस कथन में है कि
हिन्दुस्तान इस गुलामी को उतारकर आज़ाद हो जायेगा। यह बात अलग है कि इस
मनोरथ को पूरा करने में समय कम या ज़्यादा लगे, और मूल्य भी महँगा ही देना
पड़े। यही वास्तविकता मज़दूर वर्ग सम्बन्धी है कि आज वह भी पूँजीपतियों की
गुलामी का जुआ उतारकर ही रहेगा।
आज़ादी के आन्दोलन दुनिया में न कभी रुके हैं और न रुक सकते हैं, लेकिन
इन्हें रोकने के लिए क़ौमों और मज़दूर वर्ग के आन्दोलन के विरोधियों ने जो-जो
हथियार इस्तेमाल किये हैं, वे साक्षात रूप में इतिहास में मौजूद हैं और इन्हें अच्छी
तरह समझने के लिए हिन्दुस्तान का मौजूदा इतिहास ही काफ़ी है।
जब आज़ादी का कोई आन्दोलन सफल तरीक़ों पर चलता दिखायी दे तो इसे
असफल करने के लिए इसके सेवकों पर सबसे बड़े आरोप जो लगाये जाते हैं, वे
यह होते हैं – 1. कि ये षड्यन्त्र कर रहे हैं, और 2. ये धर्म-विरोधी हैं। इस लेख
236 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
में इन दोनों विषयों पर विचार करने का यत्न करना है ताकि आम जनता को इनकी
तह तक पहुँचने का अवसर मिले और यह पता चल सके कि सही मायनों में
षड्यन्त्र करने वाला और धर्मों का विरोधी कौन होता है और किस तरह दुनिया का
भला करने वालों को षड्यन्त्रकारी और अधर्मी कहा जाता है। वास्तव में
षड्यन्त्रकारी और अधर्मी तो ये स्वयं होते हैं।
गुप्त तख़्तापलट आन्दोलन
वर्तमान सरकार यह हल्ला करती नहीं थकती कि हिन्दुस्तान में गुप्त तख़्तापलट
आन्दोलन क़ायम है। इस आन्दोलन के अस्तित्व को प्रकट करने के लिए कहीं न
कहीं से टूटे-फूटे पिस्तौल और बम आदि अपने खुशामदियों के माध्यम से पकड़ने
का ढोंग रच लेती है और कहीं किसी अधिकारी पर कोई खाली जाने वाला हमला
ही करवाया जाता है और कभी रेलपटरी के पेंच ढीले किये जाते हैं, जबकि लाट
साहिब आदि को गुज़रना हो। यह सब ऐसी बातें हैं, जिन्हें गुप्त तख़्तापलट षड्यन्त्र
या आन्दोलन आमतौर पर इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इस समय यह सबकुछ पुलिस
की ओर से हो रहा है, जिसका सबूत इस बात से मिलता है कि बताये गये तख़्ता
पलटने वालों की इस कार्रवाई से नुक़सान कहाँ तक होता है? बंगाल को इस समय
सरकार इस आन्दोलन का घर बता रही है। पिछले कुछ सालों में चाहे बंगाल पुलिस
ने कितनी ही जगहों से टूटे-फूटे हथियार आदि पकड़े और कई बार सरकारी
अधिकारियों पर हमलों की साज़िश का अस्तित्व भी बताया, लेकिन आज तक वहाँ
किसी भी सरकारी अधिकारी की या कोई राजनीतिक मृत्यु नहीं हुई, जिससे यह
सिद्ध होता है कि यह सबकुछ पुलिस के आदमी ही करते हैं। यदि तख़्ता पलटने
वाले किसी सरकारी अधिकारी की जान लेने के लिए तैयार हो जायें तो क्या वे
उसे सूखा जाने देंगे? यदि तख़्ता पलटने वाले हथियार आदि रखें तो क्या इस तरह
के टूटे-फूटे ही रखें, जिनके बारे में बंगाल पुलिस भी अपनी गवाहियों में बता चुकी
है कि ये हथियार चलाने वालों के लिए ही ज़्यादा ख़तरनाक हैं और जिस पर चलाये
जाते हैं उसके लिए कम! यदि तख़्ता पलटने वाले गाड़ियाँ उलटने का यत्न करें
तो क्या इसमें सफल न हों? ये सब ऐसी बातें हैं जो सिद्ध करती हैं कि यह सबकुछ
आज़ादी के उपासकों को कुचलने के लिए पुलिस-कर्मचारियों की ओर से किया
जाता है।
हमें इस बात से इन्कार नहीं कि हिन्दुस्तान में तख़्ता पलटने का आन्दोलन है,
लेकिन हमारा कहना है कि इस समय जो हो रहा है वह पुलिस की ओर से है
और इतिहास बताता है कि जब भी कोई तख़्ता पलटने का काम शुरू करते हैं,
वे अपने वार कम ही खाली जाने देते हैं। और सरकार को भी यह निश्चय रखना
चाहिए कि ऐसे लोगों को (जिनका धर्म-ईमान ही देश की आज़ादी हो और जो
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 237
बाक़ी सब तरीक़ों से निराश होकर आज़ादी के लिए इस तरीक़े पर भरोसा रखने
लगें) दबाने में वह कभी भी सफल नहीं हो सकती, चाहे वह कितनी ही सख़्तियाँ
करे और कितनी ही चालें चले और न ही आज तक कोई सरकार इसमें सफल
हुई है। इन आन्दोलनों को समाप्त करने का सही तरीक़ा तो यही है कि उन लोगों
की माँग पूरी की जाये, ताकि वे शान्त हों।
ऊपर जो बताया गया है यह केवल हमारा अपना ही ख़याल नहीं, बल्कि
इसकी पुष्टि बंगाल आर्डिनेंस सम्बन्धी कई ज़िम्मेदार सज्जनों के भाषणों और उनके
बयानों से होती है। इन्हीं सज्जनों के सवालों का उत्तर सरकार की ओर से सिवाय
चुप के कुछ नहीं मिला। नीचे हम अपने विचारों की पुष्टि के लिए कुछ उद्धरण
दे रहे हैं जिनसे स्पष्ट सिद्ध हो जायेगा कि सरकार कैसे हिन्दुस्तान को गुलाम रखने
के लिए कमीनी चालें चल रही है।
श्रीयुत सुभाषचन्द्र बोस को, जोकि कलकत्ता नगर सभा के चीफ़ एग्ज़्यूक्टिव
ऑफ़िसर थे और जिन्हें तख़्ता पलट करने का अपराधी कहकर बंगाल आर्डिनेंस
के अनुसार जेल में बन्द किया गया था, अब ख़राब सेहत के कारण रिहा किया
गया है। आपने बंगाल आर्डिनेंस के सम्बन्ध में अभी एक बयान प्रकाशित करवाया
है, जिसमें आप लिखते हैं –
“बंगाली राजनीतिक नज़रबन्दों को और देर तक जेलों में बन्द रखने की कोई
सन्तोषजनक वजह न होने के कारण पुलिस ने अब बम और टूटे हुए पिस्तौल
पकड़ने शुरू कर दिये हैं, ताकि सिद्ध किया जा सके कि तख़्तापलट आन्दोलन
अभी तक मौजूद है। वास्तव में पिछले कुछ सालों में जब भी कभी बंगाली
राजबन्दियों की रिहाई की चर्चा चली है और जब भी कभी असेम्बली या बंगाल
कौंसिल में नज़रबन्दों के सवाल पर विचार करने के लिए बैठक हुई है तो पुलिस
के हाथों में खेलने वाले कुछ लोग अपने पास से हथियार लेकर झट गिरफ़्तारी के
लिए पुलिस के आगे पेश हो जाते रहे हैं और फ़ौरन ही कथित बम-कारख़ानों का
पता पुलिस को लग जाता है। इन कारख़ानों में आमतौर पर कुछ मसाला होता है,
जो हर जगह मिल सकता है। फिर टूटे हुए पिस्तौल, जोकि जिस पर निशाना साधा
जाये उससे ज़्यादा ख़तरनाक उसे चलाने वालों के लिए हो सकते हैं, जैसाकि
दक्षिणेश्वर बम केस में पुलिस के गवाहों ने अपने मुँह से माना कि ये दोनों चीजें
चाहे इस्तेमाल में किसी काम की न हों, लेकिन किसी को अपराधी ठहराने के
लिए काफ़ी होती हैं।
तख़्तापलट षड्यन्त्र साबित करने के लिए शस्त्र क़ानून के अन्तर्गत चलाये गये
साधारण मुक़दमों को पुलिस और एंग्लो-इण्डियन अख़बारों की ओर से
पोलिटिकल मुक़दमे सिद्ध किया जाता है। अभी एक ऐसे पोलिटिकल मुक़दमे में
जो वायदा माफ़ गवाह बना, वह एक पुराना पुलिस एजेण्ट है।
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पिछले कुछ सालों में निःसन्देह पुलिस की ओर से मनगढ़न्त तख्तापलट
आन्दोलन बनाने के लिए दलाल (Agent Provocateuors) रखे जाते हैं ताकि
खुफ़िया पुलिस के ख़ास हिस्से (Intelligence Branch) को क़ायम रखने की
ज़रूरत सिद्ध की जा सके, जिन्हें कुछ साल पहले बंगाल की सरकारी ख़र्च कम
करने वाली समिति (Bengal Retrenchment Committee) ने हटाने की सिफ़ारिश
की थी। मैं यह बयान अपनी ज़िम्मेदारी को पूरी तरह अनुभव कर लिख रहा हूँ
और जो आरोप मैं पुलिस पर लगा रहा हूँ, इनकी जाँच के लिए यदि कोई निष्पक्ष
समिति बनायी जाये और नज़रबन्दों और पब्लिक को यदि इसके सामने गवाहियाँ
देने में कोई बाधा न दी जाये और पूरी छूट हो तो इसके प्रमाण देने को भी मैं
प्रस्तुत हूँ...।
स्वर्गवासी श्रीयुत देशबन्धुदास जी ने भी बंगाल कौंसिल में भाषण देते हुए 23
जनवरी, 1924 को साफ़-साफ़ बताया कि कैसे ऊल-जलूल (सबूत) इकट्ठा कर
बंगाली देशभक्तों को जेल में डाल दिया गया है और किस प्रकार के निराधार आरोप
लगाये गये हैं। आपने यह भी ज़ाहिर किया कि इस तरह के आन्दोलन दमनकारी
तरीक़ों से दबाये नहीं जा सकते। नीचे आपके द्वारा कौंसिल में दिया गया भाषण
पूरे का पूरा दर्ज है –
“हमें यह शिकायत नहीं है कि सरकार ने इन व्यक्तियों को बग़ैर कोई सूचना
एकत्र किये ही गिरफ़्तार कर लिया है, लेकिन हमारी शिकायत यह है कि इन
सूचनाओं की अच्छी तरह जाँच नहीं की गयी और हमारी इस शिकायत के उत्तर
में एक शब्द भी नहीं कहा। हमें यह बताया गया है कि इस सम्बन्ध में कई
आदमियों ने बयान दिये हैं और यह भी बताया गया है कि जो रिपोर्टें मिली हैं,
सरकार ने उन पर विचार किया है। लेकिन जो कुछ मैं पूछना चाहता हूँ वह यह
है कि कोई सरकारी अधिकारी चाहे कितना भी योग्य क्यों न हो, किसी बयान के
ठीक होने का अनुमान कैसे कर सकता है, जब तक कि बयान देने वाले को सामने
बुलाकर उससे सवाल न किये जायें?
(जब भगतसिंह और उनके साथ भारतीय और अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी
आन्दोलन की समीक्षा करते हुए लोगों से उसे सांझा कर रहे थे तो भारत की
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के ढंग और स्वतन्त्रता-आन्दोलन के दरपेश पैदा रुकावटों के बारे
में चर्चा भी पूरे ज़ोर से चल रही थी। मई, 1928 से सितम्बर, 1928 तक जब
भगतसिंह पूरी तरह ‘किरती’ अख़बार चलाने में व्यस्त थे, उस समय के ये लेख
यहाँ दिये जा रहे हैं। चाहे इनके लेखकों के नामों का पता नहीं, लेकिन ये लेख
शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के तत्कालीन विचारों का प्रतिनिधित्व करते
हैं। इसीलिए इन्हें यहाँ दिया जा रहा है। शहीद भगवतीचरण वोहरा ‘किरती’ अख़बार
से गहरे रूप से जुड़े हुए थे। – स.)
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