सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

क्षणभङ्गवादः १७३
ममनुत्पत्तेः पूर्वस्मरणदिसहकारिवैधुर्यादिनिबन्धनत्वादि-
त्येषा दिक्।
अस्तु तर्हि प्रयोजनानुरोधादपोहस्वीकारः, सर्वधर्मावा-
च्यत्वसिद्धिर्हि परमं प्रयोजनम्, कल्पनाजालविधूननेन गम्भी-
रोदारसमाधिसमधिगमादिति चेत्, निष्प्रमाणमिदं कः श्रद्द-
ध्यात् ? प्रमाणं चात्र न प्रत्यक्षानुमाने । आगमश्च न
किञ्चिद् वदतीति त्वयैव ग्राहितः शिष्यः।
मात्रसे सविकल्पकी उत्पत्ति इसलिये नहीं होती, क्योंकि वह सहकारीके
रूपमें पूर्ववर्ती निर्विकल्पकी अपेक्षा करती है, तथा वही इन्द्रिय प्रत्य-
भिज्ञात्मक साक्षात्कारी ज्ञानकी उत्पत्तिके लिये सहकारीके रूपमें तत्तांशके
स्मरणकी अपेक्षा करती है, और इन्द्रियसम्पातक्षणमे उक्त सहकारियोंका
अभाव रहता है। यहाँ सामान्यज्ञानके प्रामाण्यकी उपत्तिके लिये
उसके इन्द्रियजन्यत्वका साधन तो एक दिग्दर्शनमात्र है। वस्तुतस्तु
विषय के अबाधित होनेसे ही कोई ज्ञान प्रामाणिक होता है। इसीलिये
इन्द्रियजन्य नहीं होनेपर भी अनुमित्यादि ज्ञान प्रमाण होता है।
(पूर्वपक्ष) "तो प्रयोजनके अनुरोधसे ही अपोह स्वीकार करना चाहिये
और गवादि शब्दोंके वाच्य गोत्व आदि धर्म नहीं होते, यह सिद्ध करना
ही यहाँ परम प्रयोजन है। क्योंकि अपोहस्वीकारद्वारा जात्यादि-
कल्पनाजालका उन्मूलन होकर वासनासहित मिथ्याज्ञानके उन्मूलनमे
समर्थ एव मुक्तिफलका प्रदान करनेवाले समाधिकी प्राप्ति हो जायगी।
अर्थात् जात्यादिक जब पारमार्थिक नहीं रहेंगे तो तुच्छ समझकर उसमें
प्रवृत्त्यादि नहीं होगी। इस प्रकार बाह्यव्यापारसे उपरत होकर मन
नैरात्म्यभावनामे समाहित होगा और मुक्त हो जायगा"
(उत्तरपक्ष) इस प्रमाणशून्य कथनमे कौन श्रद्धा करेगा? अर्थात्
अपोहका स्वीकार समाधिप्राप्तिका कारण है, यह कथन अप्रामाणिक
होनेसे अश्रद्धेय है। क्योंकि इसमें प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण नहीं
हैं। यदि कहो कि इसमे बौद्ध आगम प्रमाण है, तो शब्दरूप होनेसे
आगम भी किसी वस्तुको नहीं कह सकता यह बात तो तुमने ही अपने
शिष्योंको सिखा दी है।

१७४ आत्मतत्त्वविवेके
न चैवं चेतनो ग्राहयितुमपि शक्यते, स्ववाग्विरोधस्यो-
द्भटत्वात् । तथाहि—
शब्दस्य कस्यचिदपि¹ वस्तुनि मानसिद्धा
बाधा²विधिव्यवहृतिः क्वचिदस्ति नो वा ?
साथ ही इस प्रकारकी सीख किसी सचेतन व्यक्तिको नहीं दी जा
-सकती, क्योंकि उत्कट स्ववचनविरोध हो जायगा । अर्थात् "आगमो न
किञ्चिद् वक्ति" यह भी तो आगम ही है और कुछ विषयको भी कहता
है । फिर "आगम किसी वस्तुको नहीं कहता" ऐसा कहनेमें स्ववचन
विरोध क्यों न होगा ? एवं किसी शब्दद्वारा स्वलक्षणात्मक वस्तुमें
प्रामाणिक विधि और निषेधका व्यवहार होता है या नहीं ? यदि होता
है तो क्यों नहीं वे सम्पूर्ण दोष यहाँ भी हो जायेंगे ? जो तुम्हारे द्वारा
मेरे प्रति दिये गये हैं । अर्थात् अननुगत होनेसे स्वलक्षणात्मक वस्तु
शब्दसङ्केतका विषय नहीं हो सकता और शाब्दज्ञानका भी विषय नहीं
हो सकता । क्योंकि स्वलक्षणज्ञानको शब्दप्रयोगद्वारा अभिव्यक्त नहीं
किया जा सकता है ।
एवं अतद्व्यावृत्तिरूप अनुगतधर्मको मान कर भी स्वलक्षण वस्तु
शब्दका वाच्य नहीं हो सकती । क्योंकि वस्तुभूत स्वलक्षण अतद्व्या-
वृत्तिरूप अलीक (मिथ्या) धर्मका आश्रय नहीं हो सकता है, इत्यादि
दोष तुम्हारे पक्षमें भी हो जायेंगे ।
यदि कहो कि—स्वलक्षणात्मक वस्तुमें शब्दद्वारा विधि-निषेध
व्यवहार नहीं होता—तो यहाँ स्ववचनविरोध स्पष्ट है । क्योंकि उक्त
शब्दद्वारा भी वस्तुका ही व्यवहार किया गया है । इस प्रकार अवस्तुकी
जगहपर वस्तुपदका सन्निवेश कर तुम्हारे ही श्लोकको तुम्हारे विरोधमें
पढ़ा जा सकता है । जैसे—
शब्दस्य कस्यचिदपि वस्तुनि मानसिद्धा
बाधाविधिव्यवहृतिः क्वचिदस्ति नो वा ?
१ काचिदपि—इति क्वचित् पाठः ।
२ निषेधविधीत्यर्थः ।

क्षणभङ्गवादः १७५
अस्त्येव चेत्, कथमियन्ति न दूषणानि ?
नास्त्येव चेत्, स्ववचनप्रतिरोधसिद्धिः ॥
इति तवैव¹ विषयसञ्चारमात्रेण श्लोकः ।
न चास्माकमिव तवाप्यत्र मूकतैव शरणम् । सर्वथा
वचनविरोधे ह्युदासीनस्य सा शोभते, न चात्र विधौ विरोधः
कश्चित् । न च² त्वमुदासीनः, प्रयोजने प्रवृत्तत्वात् । तस्मादल-
मङ्गुलीदीपिकया ध्वान्तध्वंसविधिमनुष्ठायेति ।
अस्त्येव चेत्, कथमियन्ति न दूषणानि ?
नास्त्येव चेत्, स्ववचनप्रतिरोधसिद्धिः ॥
हमने जैसे तुम्हारी गाथाके प्रति मूकता गृहीत कर ली, वैसे ही विषय
बदल कर पढ़ी गयी मेरी गाथाके प्रति तुम्हारी भी मूकता ही शरण नहीं
बन सकती । क्योंकि हर हालतमें वचनविरोध होनेपर उदासीन हुए
व्यक्तिके लिये ही वह मूकता शोभा देती है । यहाँ विधिपक्षमें तो
कोई विरोध नहीं है और तुम उदासीन भी नहीं हो । क्योंकि अपोह-
सिद्धिद्वारा कल्पनाजालका ध्वंस कर समाधिप्राप्तिरूप प्रयोजनमें प्रवृत्त
हुए हो । इसलिये अङ्गुलीकी दीपिकासे अन्धकारको नष्ट करनेकी
चेष्टा न करो ।
अर्थात् 'यत् सत् तत् क्षणिकम्' इस अनुमानमें व्यतिरेकदृष्टान्तके
रूपमें तुमने कूर्मरोमका दृष्टान्त दिया है । उसका यदि मैं निषेध करूँ तो
कूर्मरोममें सत्त्वापत्ति हो जायगी, इस प्रकार उसे असत् माननेवाले
मुझे स्ववचनविरोध हो जायगा । अत मैंने मूकता स्वीकार कर ली ।
किन्तु तुम यहाँ मूकता का ग्रहण नहीं कर सकते । क्योंकि "अपोहसिद्धि-
१ यहाँ बौद्धकारिका यह है—
धर्मस्य शब्दस्य कस्यचिद्वस्तुनि मानसिद्धा ।
बाधाविधिप्रवृत्तिः क्वचिदस्ति नो वा ?
अस्त्येव चेत्, कथमियन्ति न दूषणानि ?
नास्त्येव चेत्, स्ववचनप्रतिरोध एव (सिद्धिः) ॥
२ न वा—इति शङ्करमिश्रसम्मतः पाठः ।

१७६ आत्मतत्त्वविवेके
आगमस्य तत्त्वार्थपरिस्पर्शित्वविरोधे न स्वर्गापवर्गार्थिनां
प्रवृत्तिः सिध्यतीति प्रयोजनमस्मद्विचारस्यैव परं सुन्दरम् ।
तस्माच्छब्दैः किं वाच्यमित्यनुयोगे किं प्रतिभासात् ?
अथाध्यवसायात् ? यद्वा तत्त्वतः ? इति विकल्पे विकल्पस्थो-
ऽन्यापोढाकारः, अन्यापोढस्वलक्षणं, न किञ्चिदिति यत् क्रमेण
प्रत्युक्तम्—तत्र प्रथमे समयविपर्यासः, विकल्पाकारस्य समया-
विषयत्वात् ।
द्वारा कल्पनाजालके ध्वंसमे शब्दका विधिनिषेधव्यवहार नहीं होता”
ऐसा कहनेवाले तुम्हें स्ववचनविरोध होगा ही ।
मेरे मतमे तो आगमको तत्त्वार्थप्रतिपादक न माननेपर स्वर्गार्थियों
और मोक्षार्थियोंकी प्रवृत्ति ही न हो सकेगी । इसप्रकार आगमको
प्रमाण माननेका प्रयोजन मेरे विचारानुसार ही परम सुन्दर है । अर्थात्
स्वर्ग और मोक्षमे प्रवृत्तिरूप प्रयोजनसिद्धिके लिये मैं तत्त्वप्रतिपादनमे
आगमको प्रमाण मानता हूँ । किन्तु आगमको प्रमाण नहीं माननेवाले
तुम्हें अपोहसिद्धिद्वारा समाधिप्राप्तिरूप प्रयोजनकी सिद्धि कैसे हो
सकेगी ? क्योंकि अपोहमे प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण हैं नहीं और
आगमको तुम प्रमाण मानते नहीं ।
इसलिये, शब्दोंका वाच्य अर्थ क्या है ? नैयायिकद्वारा इस प्रश्नके
किये जानेपर ज्ञानश्रीने तीन प्रकारके विकल्प किये हैं कि—१ शब्दजन्य
ज्ञानका विषय क्या है ? यह प्रश्न है ? या २—शब्दजन्यप्रवृत्तिका
विषय क्या है ? यह प्रश्न है ? अथवा ३—वस्तुत शब्दका वाच्य क्या
है ? यह प्रश्न है । और तीनोंका क्रमश उत्तर देते हुए कहा है कि—
यदि प्रथम प्रश्न हो 'तो उत्तर होगा कि सविकल्पकज्ञाननिष्ठ जो अन्य-
व्यावृत्त आकार, वही शब्दजन्य ज्ञानका विषय है । यदि द्वितीय प्रश्न
हो तो उत्तर होगा कि अन्यापोढ स्वलक्षणात्मक वस्तुमें ही शब्दद्वारा
प्रवृत्ति होती है । यदि तृतीय प्रश्न हो तो उत्तर होगा कि कोई भी वस्तु
शब्दका वाच्य नहीं होती ।
किन्तु यहाँ ज्ञानश्रीके प्रथम उत्तरमे सङ्केतका विपर्यय (अभाव) हो

क्षणभङ्गवाद. १७७
द्वितीये तु प्रवृत्तिविपर्यासः, अदृष्टे नियामकाभावात् ।
तृतीये स्ववाङ्निरोधः, अस्यैवार्थस्यानेन तत्त्वतावचनात् ।
अवचने वा तत्त्वतोऽनुत्तरत्वादित्युपसंहारः । तत् सिद्धमेतत्,
न क्षणिकत्वमात्मनि बाधकमिति ॥
॥ इति क्षणभङ्गवादनिरासः ॥
जाता है। क्योंकि ज्ञानका आकार सङ्केतका विषय नहीं होता, किन्तु
बाह्यवस्तु ही सङ्केतका विषय होती है। ऐसी स्थितिमे विकल्पगत
आकार शब्दजन्य ज्ञानका विषय नहीं हो सकता है।
द्वितीय उत्तरमे प्रवृत्तिका विपर्यय (अभाव) हो जाता है। क्योंकि
स्वलक्षणात्मक वस्तुओंके विकल्पका अविषय होनेके कारण विकल्पद्वारा
किस स्वलक्षणमे प्रवृत्ति हो और किसमे न हो, इसका नियामक नहीं
होनेसे कहीं भी प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी।
तृतीय उत्तरमे स्ववचन विरोध हो जाता है। क्योंकि “तत्त्वत
कोई अर्थ शब्दका वाच्य नहीं होता है” इसी अर्थकी तात्त्विकताको
“शब्दस्य किञ्चित् तत्त्वतो न वाच्यम्” यह आपका शब्द जब बता रहा
है, तब कोई भी शब्द किसी अर्थको नहीं बताता, ऐसा कहनेमें स्ववचन
विरोध अवश्य होगा। इससे बचनेके लिये यदि तृतीय प्रश्नका उत्तर
ही न दो तो उत्तर न देनेसे अप्रतिभा नामक निग्रहस्थानसे निगृहीत हो
जाओगे। इस प्रकार अपोहनिराकरणका यह प्रसङ्ग समाप्त होता है।
अतः यह बात सिद्ध हो गयी कि क्षणिकवाद आत्माकी सिद्धिमे
बाधक नहीं हो सकता।
इति क्षणभङ्गवादनिरास ।
१२

अथ बाह्यार्थभङ्गवादः
विज्ञानवादिनि जागरूके बाह्यमेव नास्ति, कुत आत्मेति
चेत्, स तावदिदं पृष्टो व्याचष्टाम्—किं ते ग्राह्यग्राहक-
भागयोः परमार्थसतोरेवाभेदो विवक्षितः ? उताहो अभिन्न-
जातीयत्वम् ? अथ ग्राह्यांशस्यालीकत्वमिति ?
तत्र प्रथमे साध्ये यः कश्चिद्धेतुरुपादीयते सहोपलम्भ-
नियमो वा, ग्राह्यत्वं वा, प्रकाशमानत्वं वा, स व्यक्तमाभासः।
योगाचारमतखण्डन
(पूर्वपक्ष) विज्ञानवादीके सजग रहते बाह्य कोई वस्तु ही सिद्ध
नहीं है, फिर तदन्तर्गत आत्माकी सत्ता कैसे हो सकती है ? अर्थात् एक
विज्ञान ही परमार्थ सत् है, उससे भिन्न सभी बाह्य असत् हैं। तथा
नैयायिकोंका आत्मा भी ज्ञानसे भिन्न होनेसे बाह्य और असत् है।
(उत्तरपक्ष) ऐसा कहनेवाला विज्ञानवादी इन प्रश्नोंका उत्तर
कहे कि क्या उसे वस्तुभूत ग्राह्य (विषय) और ग्राहक-(ज्ञान) भागोंका
अभेद विवक्षित है ? या उन दोनोंके एक जातिका होना विवक्षित है ?
अथवा ग्राह्यांश (विषयभाग) का मिथ्यात्व अभिप्रेत है ?
इनमे यदि प्रथम साध्य अभिप्रेत हो तो उसकी सिद्धिके लिये जो
कोई हेतु दिया जायगा, वह चाहे सहोपलम्भनियम हो या ग्राह्यत्व हो
अथवा प्रकाशमानत्व हो, वह स्पष्ट ही हेत्वाभास है, हेतु नहीं है।
अर्थात् ज्ञान और विषय अभिन्न है, क्योंकि विषयके साथ ही ज्ञानका
भी नियमतः भान विज्ञानवादी मानता है। एवं घटविषय घटज्ञानसे
अभिन्न है, क्योंकि वह ग्राह्य है। तथा घटज्ञान घटसे अभिन्न है,
क्योंकि ज्ञान स्वप्रकाशक है। ये तीनों ही हेतु हेत्वाभास हैं।
क्योंकि आपके मतानुसार ग्राह्य और ग्राहकमें अभेद होनेसे परामर्श
हेतु, पक्ष, साध्य और अनुमितिमें अभेद होगा, अत इनमें परस्पर

तथाहि नीलधवलादिपरस्परविरुद्धाकारनिकरावगाहि विज्ञान-
मनुभूयते, तदिदं तस्य स्ववधाय कृत्योत्थापनम् ।
यदि हि मिथः प्रत्यनीकधर्मानुल्लिखेत्, कथमेकं सत्
तदात्मकं भवेत् ? न चेदुल्लिखेत् कथं तदाकारं नाम ? स्व-
संवेदनस्यानुल्लिखितरूपाभावात् ।
बाह्यस्यैतन्मिथविरुद्धधर्माध्यासाद् भयम् , तथात्वेऽप्यभेदे-
ऽर्थक्रियाचेतनप्रवृत्तीनां सङ्करप्रसङ्गात्, विवेचनानुपपत्तिप्रस-
हेतुहेतुमद्भाव कैसे हो सकता है ? एव नील, धवल, पीत आदि
परस्पर विरुद्ध आकारोंका अवगाहन करनेवाला चित्ररूपका ज्ञान सबको
अनुभूत होता है । जो उस ज्ञानके अपने ही वधके लिये कृत्याको
जगानेके समान है । अर्थात् परस्पर विरुद्ध अनेक आकारोंको विषय
करनेवाला एक चित्रज्ञान होता है । यहाँ यदि ग्राह्य-ग्राहकमें अभेद
हो तो एक ज्ञान अनेक 'विरुद्धस्वरूपवाला कैसे हो सकता है ? ।
अतः चित्रज्ञानको भी आकारभेदसे भिन्न मानना पड़ेगा । इसस्थितिमें
चित्राकार एकज्ञान नहीं रह जायगा और स्वयं उसका ही विलय
हो जायगा ।
क्योंकि चित्रज्ञान यदि परस्पर विरोधी धर्मोंका उल्लेख करता है तो
वह ज्ञान एक होता हुआ उन अनेक विरोधी धर्मोंसे अभिन्न कैसे हो
सकता है ? और यदि उन विरोधी धर्मोंका उल्लेख नहीं करता है तो
वह नीलाकार धवलाकार आदि कैसे हो सकता है ?
यदि कहें कि—बिना उल्लेख हुए ही नील धवल आदि विरोधी
धर्म चित्रज्ञानके विषय होंगे—तो यह नहीं हो सकता है । क्योंकि
स्वप्रकाशपक्षमें विषयोंका उल्लेख किये बिना कोई ज्ञान ही नहीं
नहीं होता है ।
( पूर्वपक्ष ) बाह्य वस्तुको ही विरुद्धधर्माध्याससे भय है । क्योंकि
विरुद्धधर्मोंका अध्यास होनेपर भी यदि अभेद हो तो वस्तुओंमें अर्थ-
क्रिया एवं उनमें चेतनप्रवृत्तिका सङ्कर हो जायगा । अर्थात् आगसे भी
प्यासकी शान्ति और जलसे भी दाह होने लगेगा । इस प्रकार अर्थक्रिया

१८० आत्मतत्त्वविवेके
ज्ञाच्च, न ऽ विज्ञानस्य । न हि तस्यार्थक्रियाधीनं सत्त्वम्,
अपितु प्रतिभाससमात्राधीनम् । नापि तत्रार्थक्रियार्थिनः
काचित् प्रवृत्तिः, स्वरसवाहिविज्ञानप्रवाहातिरिक्ताया अर्थ-
क्रियायास्तदर्थिनश्चाभावात् । विवेचनाभावश्च परमो निर्वाहः,
स्वसंविदितरू ( द्रू ) पत्वादिति चेत्,
तन् किमङ्ग ! परिणतशान्तेराश्रमपदमिव विज्ञानमासाद्य
व्यालनकुलादेरिव नीलधवलादेः शाश्वतिकविरोधत्यागः ?
निभृतवैराणां तद्रूपत्यागो वा ?

का सङ्कर हो जायगा । एव दाहके लिये जलमें तथा प्यासकी शान्तिके
लिये आगमें प्राणियोंकी प्रवृत्ति होने लगेगी । इस प्रकार प्रवृत्तिका
भी सङ्कर हो जायगा । एवं, अभेद होनेपर नील और धवलका विवेचन
( भेदज्ञान ) नहीं हो सकेगा ।
विज्ञानको तो विरुद्धधर्माध्याससे कोई भय नहीं है । क्योंकि
अर्थक्रियाके अधीन विज्ञानकी सत्ता नहीं है, किन्तु स्वप्रकाश होनेसे
प्रतीतिमात्रके अधीन ही उसकी सत्ता है । साथ ही किसी अर्थक्रियाकी
इच्छासे विज्ञानमे किसीकी प्रवृत्ति भी नहीं होती है, क्योंकि मेरे मतमें
स्वरसवाही विज्ञानधाराके अतिरिक्त कोई अर्थक्रिया या उसका अर्थी
व्यक्ति ही नहीं होता ।
यदि “विरुद्धधर्मका अध्यास होनेपर भी विज्ञानमे अभेद माननेमें
नीलपीतादि विषयके भेदसे विज्ञानका विवेचन ( भेदज्ञान ) नहीं हो
सकेगा” यह अनुपपत्ति विज्ञानवादीके ऊपर दिया जाय तो यह
विज्ञानवादकी परम साधिका ही है, बाधिका नहीं । क्योंकि विज्ञान-
वादमें नीलपीतादि विषय और उसके विज्ञानमें भी अभेद ही इष्ट है ।
एवं विज्ञानको जाननेके लिये भी स्वभिन्न विज्ञानकी आवश्यकता
नहीं है । क्योंकि स्वप्रकाश होनेसे विज्ञान अपने आप विदितरूप
होता है ।
( उत्तरपक्ष ) तो क्या ? उच्चकोटिकी शान्तिवाले मुनिके आश्रम-
स्थानको पाकर सर्प और नेवलेके समान विज्ञानको पाकर नीलधवलादि

बाह्यार्थभङ्गवादः १८१
न तावत् प्रथमः, परस्परनिषेधविधिनान्तरीयकविधि-
निषेधयोरविरोधे जगति विरोधोच्छेदप्रसङ्गात् । न चैवमस्त्वि-
त्युत्तरेऽपि निर्वृतिः, कथमप्युक्तरूपताया अनिवृत्तेः, ताव-
न्मात्रशरीरत्वाच्च विरोधस्य । तत्सिद्धेरेव च भेदसिद्धिः ।
अतो न द्वितीयोऽपि ।
यस्तु बाह्ये विरोधपरिपालनाय विशेषो दर्शितः, स तेषा-
मेवास्तु । यदि हि विरुद्धधर्माध्यासस्य भेदसाधकत्वं प्रति
विरोधी धर्मोंका सदातन विरोध हट जाता है ? अथवा विरोधके रहते
हुए भी विरोधका फल हट जाता है ? अर्थात् नीलधवलादि विरोधी
विषयोंके कारण विज्ञानमें भेद नहीं आता ?
यहाँ प्रथम पक्ष ठीक नहीं है । क्योंकि परस्परके निषेध और विधि
का व्याप्य जो परस्परका विधि और निषेध, उसमें यदि अविरोध हो जाय
तो जगत्मात्रसे विरोधका उच्छेद हो जायगा । अर्थात् नीलत्व पीतत्वा-
भावका व्याप्य होता है और पीतत्व नीलत्वाभावका व्याप्य होता है ।
इस प्रकार परस्पर अत्यन्त विरोधी नील और पीतमें भी यदि विरोध
हट जाय तो संसारसे विरोधका नाम ही हट जायगा ।
(शंका) विज्ञानवादमें सभी वस्तुके विज्ञानसे अभिन्न होनेके कारण
विरोधकी स्वतन्त्रसत्ताका उच्छेद हो जाना भी अभीष्ट ही है ।
(उत्तर) तुम्हारे इस उत्तरसे भी शान्ति नहीं मिल सकती है।
क्योंकि नीलपीतादिमें किसी भी प्रकारसे परस्परविरहव्याप्यता (विरुद्ध-
रूपता) की निवृत्ति नहीं हो सकती है। कारण, परस्पर विरह-
व्याप्यरूपता ही विरोधका स्वरूप है । एवं, नीलपीतादिके विरोधकी
सिद्धि ही नीलपीतविषयक विज्ञानके भेदकी भी सिद्धि है । इसलिये
“विरोधके रहते हुए भी विज्ञानमें भेद नहीं होता” यह द्वितीय पक्ष
भी ठीक नहीं है ।
जो तो बौद्धोंने नीलपीतादि बाह्यवस्तुमें विरोधकी रक्षाके लिये अर्थ-
क्रियाप्रतिनियम (अर्थक्रियाकी व्यवस्था) को दर्शाया है, वह अर्थक्रिया-
प्रतिनियमरूप विशेष उन्हींके यहाँ रहे। क्योंकि “विरुद्धधर्माध्यास

१८२ आत्मतत्त्वविवेके
समाश्वासः, किमर्थक्रियाप्रतिनियमोपन्यासेन ? न चेत्,
तथापि किं तेन ? सोऽपि ह्यर्थक्रिययोर्विरुद्धधर्माध्यासेन भेदे
सति स्यात् ।
अन्यच्च, यथा बाह्येऽर्थक्रियाप्रतिनियमो न स्यादिति
दण्डस्तथा ज्ञानेऽपि प्रतिभासनियमो न स्यादिति दण्ड एव ।
क्व प्रतिभासासाङ्कर्यनियमः, सहैव प्रतिभासोऽपि स्या-
दिति चेत्, न सहानुपलम्भमसाङ्कर्यं ब्रूमः, किन्तु नीलस्यैव
वस्तुभेदका साधक है" इस बातपर यदि विश्वास है तो भेदसिद्धिके
लिये अर्थक्रियाके प्रतिनियमको उपस्थित करनेकी क्या आवश्यकता है ?
यदि उक्त बातपर विश्वास नहीं है तो भी अर्थक्रियाप्रतिनियमको भेद-
सिद्धिके लिए उपस्थित करने की क्या आवश्यकता है ? क्योंकि वस्तुओं
में अर्थक्रियाकी व्यवस्था भी तभी हो सकती है, जबकि विरुद्धधर्माध्यास
के कारण उनमें भेद हो । अर्थात् विरुद्धधर्माध्यास ही वस्तुत भेदका
साधक होता है ।
दूसरी बात यह भी है कि जिस प्रकार "बाह्यमे भेद न होनेपर उसमे
अर्थक्रियाकी व्यवस्था नहीं हो सकेगी" ऐसा विपक्षबाधक तर्क हो सकता
है, वैसे ही ज्ञानके सम्बन्धमें भी तर्क दिया जा सकता है कि "ज्ञानमें
यदि भेद न हो तो प्रतिभासकी भी व्यवस्था नहीं हो सकेगी" । अर्थात्
नील-पीतज्ञानमे यदि भेद न हो तो नीलज्ञानमे पीतका भान और पीत-
ज्ञानमें नीलका भान होने लगेगा ।
(शंका) प्रतिभासोंमें असाङ्कर्यका नियम ही कहाँ है ? क्योंकि
कभी अकेले नीलका और कभी अकेले पीतका प्रतिभास होता है तथा
कभी नील-पीत दोनोंका साथ साथ संकीर्णरूपसे भी प्रतिभास होता है ।
अत ज्ञानमे भेदसिद्धि करनेके लिये उक्त प्रकारसे प्रतिभासके असांकर्य-
नियमको तर्कके रूपमें नहीं उपस्थित किया जा सकता है ।
(उत्तर) हमारे कथनानुसार प्रतिभासके असांकर्यका यह अर्थ नहीं
है कि कई विषय एक साथ उपलब्ध (भासित) नहीं होते । किन्तु
साथ भासित होनेवाला भी नील पीतरूपसे और पीत नीलरूपसे भासित

[Header] बाह्यार्थभङ्गवादः १८३

पीतत्वेन पीतस्यैव नीलत्वेनानुपलम्भम् । स एव मूलं सर्वविरो-
धानाम् । अन्यथोपलम्भानुपलम्भयोरप्यसिद्धिरेव ।
यदपि नोपलभ्यत इत्युच्यते तदप्युपलभ्यत एव । यदि-
दमश्वादिकमुपलभ्यते तन्नोपलभ्यत इत्युक्त्यैव निर्वृत्तेः । तेना-
त्मना नोपलभ्यत इति चेत् , तत् किं सहोपलम्भेऽपि नीला-
त्मना पीतमुपलभ्यते यतो न विरोधः स्यात् ?

नहीं होता, इसे ही हम असांकर्य कहते हैं। और यही असांकर्य सभी
विरोधोंका ( बाह्य वस्तुओंके विरोधका और ज्ञानके भी विरोधका )
मूल है ।
यदि केवल सहोपलम्भके कारण अविरोध होगा तो उपलम्भ और
अनुपलम्भमें भी विरोधकी सिद्धि नहीं हो सकेगी । क्योंकि उपलम्भ
और अनुपलम्भकी भी एक साथ प्रतीति होती है । क्योंकि जो गवादिकी
अनुपलब्धि कही जाती है, वह भी एक प्रकारसे उपलब्धि ही है । कारण,
जो यह अश्वादिकी उपलब्धि है, उसे ही हम गवादिकी अनुपलब्धि
कहकर अभिव्यक्त करते हैं । अथवा जो अश्वादिकी उपलब्धि कही
जाती है, वह भी एक प्रकारसे अनुपलब्धि ही है । क्योंकि गवादिकी
अनुपलब्धिको ही हम अश्वादि-उपलब्धिशब्दसे अभिव्यक्त करते हैं ।
इस प्रकार सहप्रतीतिके कारण उपलम्भ और अनुपलम्भ भी परस्पर
अविरोधी होने लगेंगे ।
यदि कहें कि—उपलम्भ और अनुपलम्भमें अविरोधका प्रसङ्ग देना
तब समुचित होता, जब कि जिसरूपसे अश्वकी उपलब्धि होती है,
उसीरूपसे उसकी अनुपलब्धि भी होती, किन्तु ऐसा न होकर अश्वत्व-
रूपसे अश्वकी उपलब्धि होती है और गोत्वरूपसे उसकी अनुपलब्धि
होती है । अतः उक्त विभिन्न प्रकारसे उपलम्भ और अनुपलम्भकी
सहप्रतीति दिखलाकर उसमें विरोधकी असिद्धि नहीं कही जा सकती
है । अर्थात् एक ही रूपसे उपलम्भ और अनुपलम्भ दोनोंके होनेमें
परस्पर विरोध होगा ही—तो क्या नील और पीतका साथ-साथ उपलम्भ
होनेपर भी नीलरूपसे पीत उपलब्ध होता है कि उनमें परस्पर
विरोध न हो ?

१८४ आत्मतत्त्वविवेके
तस्मादुभावपि विरोधौ समौ क्षमौ चाभेदविसर्जने ।
केवलमेकस्य प्रौढिः सुभगाभिक्षुकन्यायेन यदि स्यात् ।
एतेन विवेचनाभावोऽपि निरस्तः, आकारयोरसम्भेदेन
वेदनस्यैव विवेचनत्वात् ।
अपि च क्षणिकतायामेकपुरुषापेक्षयाऽपि बाह्यस्यापि
इसलिए बाह्यवस्तुका पारस्परिक विरोध तथा नील-पीतादिविषयके
विरोधसे नीलपीतादिविषयक उक्त समूहालम्बनात्मकज्ञानका विरोध भी
समानरूपसे बाह्यवस्तुओंमें और उक्त ज्ञानमें भी अभेदको दूर करनेमें
समर्थ होंगे । इनमें यदि कुछ अन्तर होगा तो यही कि सुभगाभिक्षु-
कन्यायसे तुम्हारेद्वारा भी बाह्यवस्तुओंका भेद सम्मत होनेके कारण
बाह्यविरोधमे प्रौढता है और उक्त प्रकारसे मेरे द्वारा आपादित ज्ञान-
भेदके तुम्हारेद्वारा असम्मत होनेके कारण ज्ञानगत विरोध अप्रौढ है ।
अर्थात् जैसे, भिक्षुको विदा करनेमे भी अभागिनीकी प्रधानताको न
[L15

बाह्यार्थभङ्गवादः १८५
कुतो विवेचनम् ? नानापुरुषापेक्षयाऽपि सन्दिग्धम् । परेण
परस्यावेदनात् क्व सन्देह इति चेत्, अभेदेनैव तत्त्वविवेचनं
साध्यम्, तथा च किं तेनोपन्यस्तेन
तज्जातीयस्य तु बाह्यवद् विज्ञानस्यापि विवेचनमेवेति ।
सहोपलम्भ होगा, उसी नील-पीतका उसी क्षणमें दूसरे पुरुषके द्वारा
विवेचन ( भेदज्ञान ) हो सकता है—तो भी "अन्य पुरुषद्वारा उस
क्षणमें नील-पीतका विवेचन हुआ ही" ऐसा निश्चय नहीं होनेसे सन्देहा-
स्पद है । और सन्देहात्मक विवेचन तो ज्ञानके सम्बन्धमे भी कहा
जा सकता है । क्योंकि नील-पीतादि बाह्यके समान ही एक साथ
उपलब्ध होनेवाले नील और उसके ज्ञानमे भी अन्य पुरुषद्वारा विवेचन
हो सकता है ।
यदि कहें कि—अन्यसे अन्यका ज्ञान नहीं हो सकनेसे ज्ञानमे
विषयसे विवेचन ( भिन्नत्व ) का सन्देह भी कैसे हो सकता है ? एव
ज्ञान यदि अपने विषयसे भिन्न होता तो वह ज्ञान उस विषयका प्रकाशक
ही नहीं होता । क्योंकि परस्पर भिन्नमे प्रकाश्यप्रकाशकभाव माननेमे
अश्व भी गौका प्रकाशक होने लगेगा । अतः प्रकाश्यप्रकाशकभाव होनेके
कारण विषय और ज्ञानमे कथमपि विवेचन ( भिन्नत्व ) का सन्देह भी
नहीं हो सकता है—तो आप अभेदके द्वारा ही नीलविषय और उसके
ज्ञानमे अविवेचन सिद्ध करेंगे । ऐसी स्थितिमे ज्ञानका अपने ग्राह्य-
विषयके साथ अभेद सिद्ध करनेके लिये विवेचनानुपपत्तिका हेतु बनानेसे
भी क्या लाभ होगा ? अर्थात् ज्ञान और विषयमे पहले विवेचनानुपपत्ति
सिद्ध हो तो अभेद सिद्ध होगा और पहले अभेद सिद्ध हो जाय तो
अविवेचन सिद्ध हो । इस प्रकार अन्योन्याश्रयदोष होनेसे ज्ञान और
विषयका अभेद और अविवेचन नहीं सिद्ध हो सकेगा ।
यदि कहें कि—क्षणिक होनेके कारण भेदज्ञान होनेके कालमे नष्ट
हो जानेसे एकसाथ उपलब्ध हुए नीलव्यक्ति और पीतव्यक्तिका उस पुरुष
द्वारा परस्पर विवेचन ( भेदग्रह ) भले मत हो, फिर भी "नीलजातीय
पीतजातीयसे भिन्न है" इस प्रकारसे बाह्यवस्तुका विवेचन तो उस पुरुष
द्वारा हो सकता है—तो इस प्रकारसे विवेचन विज्ञानका भी हो ही

१८६ आत्मतत्त्वविवेके

स्वसंवेदनबाधितोऽयं विरुद्धधर्माध्यासो न भेदसाधक इति
उष्ट्रलगुडकम्, संवेदनेनैवास्य साधितत्वात् ।
हिनस्तु तर्हि प्रकाशमानताऽनेकत्वं विरुद्धधर्माध्यासो-
ऽप्येकताम्, तथाप्येकत्वानेकत्वविकलनीलाद्याकारप्रकाश-
स्वरूपे किमागतमिति चेन्, तदिदं भौतैः क्षेत्रनिलायनम् । नि-
यताकारत्वमेव ह्येकत्वमनियताकारत्वं चानेकता । तन्नि-
सकता है। अर्थात् "नीलज्ञानजातीय पीतज्ञानजातीयसे भिन्न है" ऐसा
विवेचन विज्ञानमें भी हो जायगा, इसमें कोई बाधा नहीं है।
यदि कहें कि—एक साथ नील और पीतको विषय बनानेवाले
समूहालम्बन ज्ञानके एकत्वमे अनुभव ही प्रमाण है। अतः नील-पीत
आदि विरुद्ध धर्मोंके अध्याससे उक्त समूहालम्बनात्मक ज्ञानमे भेद
साधन करना अनुभवसे बाधित है—तो यह कथन उष्ट्रलगुडकन्यायका
ही अनुसरण करता है। क्योंकि अनुभव (सवेदन) ने ही नीलपीतका
भेद सिद्ध किया है, फिर वही भेदका बाधक कैसे हो सकता है ?
अर्थात् "कुरूपो हन्यताम्" यह सुनकर कुरूपको मारनेके लिये जैसे (स्वयं
कुरूप) ऊंट ही डण्डा उठा ले, भेदको सिद्ध करनेवाले संवेदन (अनुभव)
को ही भेदका बाधक बताना वैसाही है।
(शङ्का) यद्यपि उक्त समूहालम्बनात्मक ज्ञान अनेक नहीं हो सकता,
क्योंकि विषयके भिन्न होनेपर भी अपने स्वरूपमें यह ज्ञान एक ही भासित
होता है। एवं नील-पीत आदि परस्पर विरोधी धर्मोंके अध्यासके कारण
यह एक भी नहीं हो सकता है। तथापि एकत्व अनेकत्व दोनोंसे अलिप्त
रहते हुए नीलपीतादि आकारवाला केवल प्रकाशस्वरूप उक्त समूहालम्बन
ज्ञानको माननेमें क्या आपत्ति है ?
(उत्तर) आपका यह कथन बनरोंके द्वारा घासके साथ साथ फसल
भी नष्ट कर देनेके समान है। अर्थात् प्रकाशस्वरूपकी रक्षाके लिये एकत्व-
अनेकत्वका निराकरण कर रहे हो। किन्तु एकत्व अनेकत्वके खण्डित
कर दिये जानेपर प्रकाशस्वरूपकी भी सत्ता स्वयं विलीन हो जाती है।
क्योंकि नियत आकारका होना ही प्रकाशस्वरूपका एकत्व है और अनियत
आकारका होना ही उसका अनेकत्व है। इसलिये एकत्व-अनेकत्वकी

[बाह्यार्थभङ्गवादः १८७]

वृत्ती च न नीलाकारं नापि नीलपीताद्याकारमित्यनाकारमे-
वावशिष्यते ।
स्यादेतत्, पारमार्थिको विरुद्धधर्माध्यासो भेदहेतुरयं
काल्पनिक इति चेत्, एवं तर्हि सुतरामयत्नसिद्धं स्फटिकवद्
बोधस्य निराकारशुद्धत्वम् । आकारनिकरस्त्वनात्मैव स्फुर-
तीत्युभयथैव कालात्ययापदिष्टाः सहोपलम्भादयः ।
अपि च आस्तां तावद् विरुद्धधर्माध्यासचिन्ता । योऽयं
निवृत्ति हो जानेपर वह प्रकाशस्वरूप न नियतरूपसे नीलाकार ही हो
सकेगा और न नील-पीतादिरूप अनियत आकारवाला ही हो सकेगा ।
इस प्रकार निराकारता ही शेष रह जाती है । अतः उक्तसमूहलम्बन-
ज्ञानको नीलपीताद्याकार-प्रकाशस्वरूप कहना व्याहत है ।
(पूर्वपक्ष) अस्तु, पारमार्थिक विरुद्धधर्माध्यास भेदका हेतु हो सकता
है, परन्तु यह तो काल्पनिक है । अर्थात् नीलपीतादि तो अवास्तविक
हैं, अतः उन्हें लेकर विरुद्धधर्माध्यास भी अवास्तविक ही है । इसलिये
अवास्तविक (काल्पनिक) विरुद्धधर्माध्याससे ज्ञानमे भेद कैसे सिद्ध
हो सकेगा ?
(उत्तरपक्ष) ऐसा कहो तो ज्ञानमे भी स्फटिकके समान बिना
प्रयासके ही अच्छी तरहसे निराकार शुद्धत्व सिद्ध हो गया । क्योंकि
नीलपीतादि आकारसमूह तो ज्ञानसे बहिर्भूत ही स्फुरित होता है । इस
प्रकार नीलपीताद्याकार पारमार्थिक हो या काल्पनिक हो, दोनों ही
दशाओंमे अभेदसाधक पूर्वोक्त सहोपलम्भ आदि हेतु बाधित हैं ।
अर्थात् नीलपीतादि आकार यदि पारमार्थिक है तो परमार्थतः विरोधी
नीलपीतादि धर्मोंका परस्परभेद, एवं उन्हें अवगाहन करनेवाले समूहा-
लम्बन ज्ञानके साथ उन धर्मोंका भेद, तथा उन विरोधी धर्मोंके कारण
समूहालम्बन ज्ञानमें भी स्वतः भेद सिद्ध हो जानेसे अभेद बाधित है ।
यदि नीलपीतादि अपारमार्थिक है तो पारमार्थिक ज्ञानके साथ अपार-
मार्थिक नीलपीतादिका अभेद सुतरा बाधित है ।
एवं पूर्वोक्त विरुद्धधर्माध्यासका विचार छोड़ भी दिया जाय, तो भी

१८८ आत्मतत्त्वविवेके
ग्राह्यग्राहकभागभेदो ग्राह्यनीलादिभेदो वा चकास्ति, स किं
सत्योऽसत्यो वा ? सत्यत्वे स एव दोषः । असत्यत्वे नाय-
मात्मा विज्ञानस्येत्यनात्मन्यपि सहोपलम्भनियमादयोग्यता।
इत्यनेकान्तः ।
भेदो न प्रथत एवेति चेत् , एव तर्हि अस्तु तावत् सर्व-
जनीनप्रतीतिविरोधः स्ववाग्विरोधो वा । असिद्धास्तर्हि
हेतवः । न हि भेदाप्रथने सहार्थं तद्व्याप्यतां वा पश्यामः ।
तदस्फुरणेऽपि पक्षादिप्रविभागोऽपि कथम् ? किं च बोधयितुं
जो यह ग्राह्यभाग ( विषय ) और ग्राहकभाग ( ज्ञान ) का भेद तथा
नीलादि विषयोंका पारस्परिक भेद भासित होता है, वह क्या सत्य है ?
अथवा असत्य है ? यदि भेद सत्य हो तो ग्राह्य-ग्राहकका तथा नील
पीतादि ग्राह्योंका अभेद बाधित ही हो गया । यदि यह भासमान भेद
असत्य हो तो इस असत्य भेदका सत्य ज्ञानके साथ तादात्म्य ( अभेद )
नहीं हो सकता है । इस प्रकार तादात्म्यरूप (अभेद) साध्यके नहीं
रहनेपर भी सहोपलम्भरूप हेतुके होनेसे पूर्वोक्त सहोपलम्भ हेतु व्यभि-
चारी है । अत विषय और ज्ञानका अभेद सिद्ध करनेमे यह हेतु
सर्वथा अयोग्य है ।
यदि कहो कि-ग्राह्यग्राहकका भेद अथवा नीलपीतादिका भेद
भासित ही नहीं होता है-तब तो सर्वजनीन प्रतीतिका विरोध तथा
स्ववचनका विरोध हो जायगा । अर्थात् सभीको ही उक्त भेदकी प्रतीति
होती है । इस प्रकार सर्वजनीन प्रतीतिका विरोध हो जाता है । एव
भेदकी प्रतीति न होनेपर "भेदो न प्रथते" यह वचन भी तुम कैसे कह
सकते हो ?
ऐसी स्थितिमे पूर्वोक्त सहोपलम्भ आदि हेतु भी स्वरूपासिद्ध हो
जाते हैं । क्योंकि भेदकी प्रतीति न होने पर सहोपलब्धिका कोई अर्थ
ही नहीं है । कारण, अभिन्न वस्तुमें साहित्यका व्यवहार नहीं होता है
तथा भेदकी प्रतीति न हो तो सहोपलम्भरूप हेतु अभेदरूप साध्यका
व्याप्य भी नहीं हो सकता है । क्योंकि भेदमें ही व्याप्य-व्यापकभाव
होता है ।

बाह्यार्थभङ्गवादः १८९
प्रवृत्तोऽसि किमर्थं च ? अन्वयव्यतिरेकाप्रतीतौ किं च हेतो-
र्बलम् ? कुतश्च विप्रतिपत्तिः कीदृशे चेति ? सोऽयं विचार-
मारभते, भेदं तु सांप्रतमपि नेच्छति, नूनमुन्मत्तोऽप्यनेन
जितः ।
विकल्पारूढ एव भेदो व्यवहाराङ्गं नानुभवारूढ इति
चेत्, सोऽपि सत्योऽसत्यो वा भासते न वेति विकल्पान्
नातिवर्तते ।
एवं भेदके अस्फुरणसे पक्ष, साध्य, हेतु, दृष्टान्त आदिका विभाग
नहीं हो सकनेसे अनुमानकी प्रवृत्ति भी कैसे हो सकेगी ? एवं किसे
जनानेके लिये अनुमानमे प्रवृत्त हुए हो ? क्योंकि तुम्हारे मतमे वादि-
प्रतिवादीमे भी भेद नहीं है । एवं तत्त्वनिर्णय विजय आदि उद्देश्योंके
असत् होनेसे किस प्रयोजनके लिये अनुमानमे प्रवृत्ति होगी ?
एवं भेदके अभावमे अन्वय-व्यतिरेककी भी प्रतीति नहीं हो सकनेसे
पक्षसत्त्व विपक्षव्यावृत्तत्व आदि हेतुका बल भी कैसे हो सकेगा ? एवं
विचार प्रवर्तक विप्रतिपत्ति भी कैसे हो सकेगी ? क्योंकि भेदके बिना
प्रतीतियोंमे भी विरोध नहीं हो सकेगा । विरुद्धा प्रतिपत्ति ही तो विप्रति-
पत्ति कहाती है । साथ ही भेदके अभावमे विप्रतिपत्तिके विषय भी
क्या होंगे ? इस प्रकार यह वादी विचार तो प्रारम्भ करता है किन्तु
विचारके लिये अपेक्षित भेद को प्रतीयमान भी नहीं मानना चाहता
है । निश्चित ही, इसने नैयायिकको कौन कहे उन्मत्तको भी जीत
लिया है ।
यदि कहो कि—सविकल्पकज्ञानका विषय (काल्पनिक) जो भेद,
वही पूर्वोक्त विविध व्यवहारोंके लिये अपेक्षित है । इसलिये व्यवहारों
की उपपत्तिके लिये भेदको निर्विकल्पकज्ञानका विषय (पारमार्थिक)
माननेकी आवश्यकता नहीं है—तो वह सविकल्पकज्ञान का विषयभेद
भी सत्य है या असत्य है ? तथा भासित होता है या नहीं भासित होता,
इत्यादि विकल्पोंसे नहीं बच सकता है । अर्थात् भेद यदि सत्य है और
भासित होता है तो हमारा ही अभीष्ट सिद्ध हुआ । सत्य भी भेद यदि

१९० आत्मतत्त्वविवेके
असन्नेवास्फुरन्नेवाध्यवसीयत इति चेत्, अध्यवसीयत
इति विवरणार्र्हमेतत् । तद्विषयव्यवहारजननमध्यवसायार्थ
इति चेत्, व्यवहारोऽपि यद्यज्ञानरूपः कथमसंस्तेन जन्यताम् ?
ज्ञानरूपश्चेत्, कथं नियामकं विना तद्विषयः ? स्वकारण-
सामग्रीसामर्थ्यादिति चेत्, सोऽयं व्यवहृतिरूपज्ञानालीकभेद-
योर्नियामकान्तराभावेऽपि कारणसामर्थ्यमाश्रित्य विषयविप-
यिभावमिच्छति न त्वनुभवानुभाव्ययोरिति क्षीरं विहाय रुचि-
ररोचकग्रस्तस्य सौवीरे ।
भासित न हो तो आभासमानका व्यवहार नहीं हो सकनेसे भेदका
व्यवहार ही लुप्त हो जायगा। यदि असत्य भेदको भासित हुआ
मानो तो तुम्हारे मतानुसार विषय और ज्ञानमें अभेद होनेसे असत्य
ही हो जायगा। यदि उस भेदको असत्य मानते हुए आभासमान भी
मानो तो भी पूर्ववत् भेद व्यवहार लुप्त हो जायगा। क्योंकि जो भासित
ही नहीं होता उसका व्यवहार कैसे हो सकेगा ?
यदि कहो कि—असत् होते हुए भी और निर्विकल्पकद्वारा आभास-
मान होते हुए भी भेदका अध्यवसाय होता है—तो अध्यवसायका ही
अर्थ यहाँ विचारणीय है। अर्थात् सविकल्पकद्वारा भेदाध्यवसाय होने
का क्या अर्थ है ?
यदि कहो कि—भेदविषयक व्यवहार करना ही अध्यवसायका अर्थ
है—तो आपके मतानुसार असन् होनेसे वह व्यवहार उस सविकल्पकसे
कैसे उत्पन्न हो सकेगा ? यदि वह व्यवहार ज्ञानरूप हो तो किसी
नियामकके बिना असत् और आभासमान भेद उसका विषय कैसे
हो सकेगा ?
यदि कहो कि—व्यवहारस्वरूपज्ञान अपने कारणबलसे ऐसा ही
उत्पन्न होता है कि अलीकभेदको भी अपना विषय बना लेता है—तो
यह किसी अन्य नियामकके अभावमें भी कारणसामर्थ्यका आश्रयकर
व्यवहाररूप ज्ञान और मिथ्याभेदमें तो परस्पर विषय विषयिभाव
(ग्राह्य-ग्राहकभाव) चाहता है, किन्तु निर्विकल्पक और वस्तुभूत

बाह्यार्थभङ्गवादः १९१
भेदोऽपि विकल्पाकार, न तु बाह्य इति चेत्, यद्यसन्ने-
वासौ, कथं विकल्पाकारः ? तदाकारश्चेत्, कथमसन्निति
परिभावय ।
अस्तु तर्हि सन्नेवेति चेत्, नन्वद्वयदर्शि चेद् विज्ञानम्
कथं भेदप्रथा ? आकारद्वयदर्शि चेत्, कथमेकं सद्द्वयात्मकम् ?
चित्राकारमिति चेत्, चित्रमेकमनेकं वेति विकल्पगलितमेव
नीलादिमें ग्राह्य-ग्राहकभाव नहीं चाहता । इस प्रकार अरुचिरोगसे
ग्रस्त इस वादीकी रुचि दूध छोड़कर सौवीर¹ (कांजी) में ही हो
रही है ।
यदि कहो कि—नील-पीतादिका भेद तथा स्वयं नील-पीतादि भी
सविकल्पकद्वारा भासित तो होता है किन्तु वह भी विकल्पका ही आकार
है, न कि उससे भिन्न बाह्य वस्तु है—तो यदि वह भेद असत् ही है
तो वह सत्रूप विकल्पका आकार कैसे हो सकता है ? यदि वह
विकल्पका आकार है तो वह असत् कैसे हो सकता है ?

१९२ आत्मतत्त्वविवेके
तव पश्यतः । अनेकत्वे क्व एकविज्ञानतादात्म्यम् ? विज्ञान-
स्यापि यावदाकारमनेकत्वे क्व चित्राकारसंवेदनम् ? स्वस्व-
मात्रमग्नत्वात् । एकत्वे क्व भेदप्रतीतिः ?
अनीलाद्यनेकव्यावृत्तिकृतोऽनेकत्वाध्यवसाय एवेति चेत् ,
अतादात्म्ये कथं व्यावृत्तीनामुल्लेखः ? तादात्म्ये कथम-
नेकत्वम् ? एकत्वेऽपि क्व तत्कृतोऽपि भेदाध्यवसायः ? उल्ले-
खोऽयमस्य विज्ञानस्य यदनेकत्वं नाम, न पुनस्तत्त्वान्तर
सकेगा ? क्योंकि प्रत्येक विज्ञान नील पीत रक्त आदि अपने अपने
आकारोंके साथ पृथक् पृथक् सम्बद्ध होनेके कारण सभी विज्ञान एकैका
कार ही होंगे, चित्राकार कोई भी नहीं हो सकेगा । यदि वह चित्राकार
एक हो तो उस विज्ञानद्वारा नील और पीत आदिकी तथा उनके भेदकी
प्रतीति कहाँ हो सकेगी ?
यदि कहो कि—जैसे •न्यायमतमें नील पीतादिसे विलक्षण चित्ररूप
माना गया है वैसे ही तुम्हारे मतमें भी समूहालम्बन विज्ञानका नीलादि
आकारोंसे विलक्षण एक चित्र कार माना गया है और उस चित्राकारक
एक होनेपर भी अनीलादि अनेक व्यावृत्तियोंके कारण ही उस चित्राकार
विज्ञानमें अनेकत्व ( भेद ) का उल्लेख होता है—तो वे व्यावृत्तियाँ
यदि विज्ञानसे भिन्न हों तो विज्ञानद्वारा उनका ग्रहण कैसे हो सकता
है ? और ग्रहण नहीं होनेपर व्यावृत्तियोंके कारण भेदका भी उल्लेख
नहीं हो सकना है । व्यावृत्तियोंका यदि विज्ञानके साथ तादात्म्य हो
तो विज्ञानके एक होनेसे व्यावृत्तियोंमें भी अनेकत्व ( भेद ) कैसे हो
सकेगा ? यदि विज्ञानके समान व्यावृत्तियोंमे भी एकत्व हो तो क्या
व्यावृत्तियोंके कारण विज्ञानद्वारा पूर्वोक्त भेदाध्यवसाय (अनेकत्वोल्लेख)
भी कैसे हो सकेगा ?
यदि कहो कि—विज्ञानद्वारा भासित होनेवाला जो अनेकत्व है,
वह काल्पनिक उल्लेखभर है न कि वास्तविक है । इसलिये उस
काल्पनिक अनेकत्वसे विज्ञानके वास्तविक एकत्वमें कोई बाधा नहीं
आ सकती है—तो वह काल्पनिक अनेकत्व विज्ञानका स्वरूप है अथवा
अस्वरूप है ?