आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[बाह्यार्थभङ्गवादः १८७]
वृत्ती च न नीलाकारं नापि नीलपीताद्याकारमित्यनाकारमे-
वावशिष्यते ।
स्यादेतत्, पारमार्थिको विरुद्धधर्माध्यासो भेदहेतुरयं
काल्पनिक इति चेत्, एवं तर्हि सुतरामयत्नसिद्धं स्फटिकवद्
बोधस्य निराकारशुद्धत्वम् । आकारनिकरस्त्वनात्मैव स्फुर-
तीत्युभयथैव कालात्ययापदिष्टाः सहोपलम्भादयः ।
अपि च आस्तां तावद् विरुद्धधर्माध्यासचिन्ता । योऽयं
निवृत्ति हो जानेपर वह प्रकाशस्वरूप न नियतरूपसे नीलाकार ही हो
सकेगा और न नील-पीतादिरूप अनियत आकारवाला ही हो सकेगा ।
इस प्रकार निराकारता ही शेष रह जाती है । अतः उक्तसमूहलम्बन-
ज्ञानको नीलपीताद्याकार-प्रकाशस्वरूप कहना व्याहत है ।
(पूर्वपक्ष) अस्तु, पारमार्थिक विरुद्धधर्माध्यास भेदका हेतु हो सकता
है, परन्तु यह तो काल्पनिक है । अर्थात् नीलपीतादि तो अवास्तविक
हैं, अतः उन्हें लेकर विरुद्धधर्माध्यास भी अवास्तविक ही है । इसलिये
अवास्तविक (काल्पनिक) विरुद्धधर्माध्याससे ज्ञानमे भेद कैसे सिद्ध
हो सकेगा ?
(उत्तरपक्ष) ऐसा कहो तो ज्ञानमे भी स्फटिकके समान बिना
प्रयासके ही अच्छी तरहसे निराकार शुद्धत्व सिद्ध हो गया । क्योंकि
नीलपीतादि आकारसमूह तो ज्ञानसे बहिर्भूत ही स्फुरित होता है । इस
प्रकार नीलपीताद्याकार पारमार्थिक हो या काल्पनिक हो, दोनों ही
दशाओंमे अभेदसाधक पूर्वोक्त सहोपलम्भ आदि हेतु बाधित हैं ।
अर्थात् नीलपीतादि आकार यदि पारमार्थिक है तो परमार्थतः विरोधी
नीलपीतादि धर्मोंका परस्परभेद, एवं उन्हें अवगाहन करनेवाले समूहा-
लम्बन ज्ञानके साथ उन धर्मोंका भेद, तथा उन विरोधी धर्मोंके कारण
समूहालम्बन ज्ञानमें भी स्वतः भेद सिद्ध हो जानेसे अभेद बाधित है ।
यदि नीलपीतादि अपारमार्थिक है तो पारमार्थिक ज्ञानके साथ अपार-
मार्थिक नीलपीतादिका अभेद सुतरा बाधित है ।
एवं पूर्वोक्त विरुद्धधर्माध्यासका विचार छोड़ भी दिया जाय, तो भी